जुझता चिराग

कहानी                                                                                                                                                                         ओलिवा अ. इंदवार

बस से उतरकर मैं इधर-उधर देखने लगी, कोई मुझे रिसीव करने आया होगा। पर कोई दिखाई नहीं पड़ा। दिसंबर का महीना था, पाँच बजते ही अंधेरा छाने लगा था, सर्द हवा चल रही थी, हड्डी कंपाने वाली। मैंने सुन रखा था कि शाम होते ही जंगली हाथियों का जबरदस्त आतंक रहता है इस चाय बागान में। फोन पर अपने आने की सूचना दी तो थी मैंने, पर शायद ऐन मौके पर कुछ काम आ पड़ा होगा। दो दिन की छुट्टी लेकर मैं अपनी सहेली नीता से मिलने आयी थी। वह बागान के स्वास्थय केंद्र में नर्स है और उसके मिस्टर स्कूल टीचर। दो बच्चे हैं उनके, दोनों कोलकाता में पढ़ाई कर रहे हैं। सासू माँ भी है।

        काफी देर तक कोई दिखाई नहीं दिया तो मुझे घबराहट होने लगी। डुवार्स के अधिकतर चाय बागानों की तरह ही यह बागान भी तीन ओर से जंगल से घिरा है और कोई साधन उपलब्ध नहीं हो तो बस से उतर कर दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।

        मैंने फोन लगाया, नीता ने जवाब दिया  ”अनु जरा वहीं इंतजार करना, हमारी गाय बच्चा देने वाली है, जो अभी तक जंगल से घर नहीं लौटी है, घर में माँ है, मिस्टर मीटिंग में गये हैं, सो गाय ढूंढने के लिए आयी हूँ, साॅरी थोड़ा सा लेट होगा, मैंने रोहित बाबू को तुम्हें रिसीव करने के लिए भेजा है, अभी पहुँचता होगा।“

        मैं वहीं एक चाय की छोटी सी दुकान के पास रखी बेंच पर बैठकर इंतजार करने लगी और आसपास के लोगों को देखने लगी, जो ठण्ड और गहराते अंधेरे के कारण अपने-अपने घर लौटने की जल्दी में थे। करीबन आधे घंटे के बाद  एक लड़का मेरे पास आया, और बोला –

“बड़ी माँ अकेली आयी हैं ?”  

और प्रणाम करने के लिए झुका।

        ”अरे इतना बड़ा हो गया रोहित बाबू, पहचान में नहीं आ रहे हो। खुश रहो,“ कहते हुए उसे जरा ध्यान से देखा।

रोहित साइकिल लेकर आया था, सामान वगैरह साइकिल में डालकर हम चलने लगे। रोहित नीता के पड़ोस में रहता है अपनी दादी और पिताजी के साथ। एकाध बार नीता उसे साथ लेकर हमारे घर आयी थी, तब काफी छोटा था। मुझसे अच्छा हिलमिल गया था। चलते-चलते मैंने रोहित से पूछा – घर में सब कैसे हैं? दादी कैसीं हैं? पिताजी क्या कर रहे है? थोड़ी बहुत जानकारी थी उसके बारे।

रोहित ने कहा – “आपको पता नहीं बड़ी माँ, दादी तो पिछले महीेने ही गुजर गयी, और मैं अकेला रह गया हूँ।”

एकपल को तो मैं कुछ कह नहीं पायी, फिर पूछा – “पिताजी तो हैं न, ऐसे क्यों बोल रहे हो?”

रोहित ने उदास भरे आवाज में कहा –  उम्म —- पिताजी ——- 

तभी नीता लगभग दौड़ती हुई आ गयी और गले मिलकर बोली – “माफ करना रे, क्या करेंगे सब तरफ दौड़ना पड़ता है।” उसने शिकायत भरे लहजे में कहा। पाँच-दस मिनट के बाद हम घर पहुँच गये। सालों बाद मिलना हुआ था, बीते दिनों की ढेर सारी बातें, नीता मेरी बचपन की सहेली है।

        शहर के पास के एक बागान में हम साथ-साथ बड़े हुए स्कूूल खत्म होने पर मैं काॅलेज के लिए बाहर चली गयी और वह नर्सिंग के लिए कहीं और। फिर नीता की शादी इस बागान में हो गईं। नीता से मिलने दो बार पहले भी यहाँ आई थी और उसने अपने पड़ोसियों से परिचय कराया था।

        चारों ओर घना अंधेरा छा गया था। सिर्फ घरों में एक दो लाइट जल रहीं थीं। घर के पास ही कहीं झींगुरों की चीं-चीं आवाजें आ रही थीं। कुत्ते भी कभी कभार जोर से भौंकने लगते। मैं डर जाती कहीं हाथियों का झूँड न आ जाए। 

शहर में प्रकाश की चकाचैंध में अंधेरापन कभी महसूस नहीं होता है, लेकिन यहाँ गहन अंधेरा और रात का एहसास  सिरहन पैदा कर रहा था। कितना अंतर है शहर और गाँव की जिंदगी में। बचपन में बिना लाइट के गाँव में हम कहीं भी निर्भय होकर चले जाते, लेकिन शहरी जिंदगी ने अब अंधेरे से डरना सीखा दिया है। पहले दिमाग में अंधेरा कोई डर पैदा नहीं करता था, लेकिन अब अंधेरा और झींगुरों की आवाज डर पैदा देता था । लगता है पूरा पृथ्वी ही एक न खत्म होने वाला सुनसान जगह है। 

        नीता खाना बनाते हुए कभी इस रूम में तो कभी उस रूम में आती-जाती तो वार्तालाप में विराम लग जाता, लेकिन फिर बचपन, जवानी और बच्चों की बातें  इधर-उधर से निकलती और हम पुरानी बातों में खो जाते। रात काफी हो चला था। नीता के मिस्टर भी आ चुके थे मीटिंग से, खान-पान से निपटने के बाद हम बिस्तर में आ कर बैठ गये, फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया।

        इसी बीच मुझे रोहित की बातें याद आयी, मैंने नीता से रोहित के बारे पूछा। नीता ने बताया –  रोहित के दादा जी पहले चाय बागान में सब-स्टाफ थे, दादी जी भी बागान में काम करतीें थी, अच्छा-खासा परिवार था, तीन बच्चे थे, दादा-दादी ने सबको हाॅस्टल में रखकर पढ़ाना चाहा, पर सभी बच्चे आधी-अधूरी पढ़ाई करके छोड़ दिए। बड़ा लड़का मनोज बागान में ही कुछ छोटा-मोटा काम करने लगा। दादा जी ने उसकी शादी कर दी। शादी के बाद वह नये लाइन में टाली का घर बना कर वहीं रहने लगा। घर से उसका नाता धीरे-धीरे कम होने लगा। 

        मनोज से छोटी थी बेटी सोनिया, लाडली थी माँ-बाप की, जिद करके बागान की कुछ लड़कियों के साथ दिल्ली चली गयी काम करने। वहीं किसी गैर आदिवासी लड़के  के साथ रहने लगी। जब सोनिया गर्भवती हो गयी तो वह लड़का उसे छोड़कर भाग गया। बिन ब्याही माँ बन चुकी सोनिया के पास बागान वापस आने से सिवा कोई चारा नहीं था। वह अपना बच्चा लेकर घर आ गयी।       

        माँ-बाप को बेटी की अवस्था से बहुत दुःख हुआ। समाज में बिन व्याही लड़की का माँ बनना परिवार के लिए बेहद कष्टकारी होता है। बेटी के साथ हुए धोखेबाजी में बेटी की बेबसी को समझ कर, माँ ने तो मन को समझा ली थी। लेकिन उसके पिताजी को अपने मानसम्मान पर आई चोट ने अंदर तक तोड़ दिया था। उन्होंने बाहर निकलना और लोगों से मिलना जुलना भी बंद कर दिया था। सिर्फ अपने काम के सिलसिले में बाहर निकलते नहीं तो अपने आप को घर में कैद कर लेतेे। सबसे छोटा बेटा रवि था। दीदी की हालत से उसे भी बहुत शर्मिंदगी का अहसास होता था। वह भी घर छोड़ कर काम की खोज में राजस्थान चला गया।

        कद-काठी अच्छी थी, बात-व्यवहार भी अच्छा था। काम भी जल्द ही मिल गया। उसके काम से उसके मालिक बहुत खुश थे, ईमानदारी से अपना काम करता था। साल में   एकाध बार बागान माँ-बाप से मिलने आ जाता था। वह बागान की एक लड़की को पसंद करता था, पर माँ-बाप को लड़की पसंद नहीं थी, रवि ने उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की पर वे नहीं माने, तो वह लड़की को लेकर राजस्थान चला गया। लड़की भी उसके मालिक के यहाँ छोटा-मोटा काम करने लगी। दोनों खुश थे, सालभर बाद गोद में नन्हा मेहमान भी आ गया। गोल-मटोल सा, उन्होंने प्यार से उसका नाम रखा, रोहित।

        जिंदगी खुशहाल चल रही थी। रोहित के आने के बाद वे  माँ-बाप से मिलने बागान आये, प्यारे-से रोहित को देखकर  दादा-दादी गिला-शिकवा भूल गये। कुछ दिन साथ रहने के बाद वे वापस जाने को हुए तो दादी जी ने बहू और रोहित को जाने से रोकना चाहा, घर पर कोई नहीं था, दादा-दादी की रिटायर की उम्र हो चली थी। सोनिया बागान में अपने बच्चे के साथ जहाँ जाती, लोगों की छींटाकस्सी सुननी पड़ती और हिकारत भरी निगाहों का सामना करना पड़ता। दो वर्ष के बाद वह फिर से बागान को अलविदा करके दिल्ली चली गई थी।

        माँ ने अपने बुढ़ापा का वास्ता देकर बेटी को अन्जाने लोगों के बीच, असुरक्षित जगह पर जाने से रोकने की बहुत कोशिश की। लेकिन बेटी को अपना दुख अपनी माँ के दुख से बड़ा लगा, और वह अपने बच्चे को लेकर हमेशा के लिए चली गई। । रवि भी बागान मेें रूकना नहीं चाहता था। वह फिर जल्द ही आने की बात कहकर परिवार सहित राजस्थान चला।

        रोहित के स्कूल जाने लायक हो जाने पर उसका दाखिला शहर के अच्छे स्कूल में हो गया। सबकुछ अच्छा चल रहा था, वे अपनी दुनिया में खुश थे। अचानक, उनकी जिंदगी में जोरदार तूफान आया, रोहित की माँ की तबियत खराब होती चली गयी, बहुत कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। रवि खुद को सम्भाल नहीं पा रहा था, रोहित को क्या सम्भालता। जिन्दगी में गहरा अंधेरा छा गया। रवि के लिए सबकुछ खत्म हो गया था। एकदम टूट चुका था वह। रोहित को देखकर तो वह बच्चों की तरह रोने लगता। नटखट रोहित भी माँ के बिना चुप सा हो गया। खाना वगैरह सही न होने के कारण उसकी तबियत खराब होने लगी।  दादा-दादी तो दोनों बाप बेटे को सदा के लिए बुलाते लेकिन रवि बागान वापस नहीं आना चाहता था। लेकिन बाहर काम करना और एक छोटे बीमार बच्चे को संभालना बहुत मुश्किल था। कई महीने के बाद माँ के बार-बार बुलाने पर वह बच्चे को लेकर  बागान वापस आ गया ।

        दादा-दादी को पाकर रोहित की हालात में सुधार आने लगा। अब वह बागान में ही स्कूल जाने लगा, उसके बहुत सारे दोस्त भी बन गये। दादी का आंचल पकड़कर आगे-पीछे झूलता फिरता, रोहित खुश था। रवि काम का वस्ता देकर वापस चला गया। लेकिन उसका मन वहाँ लग नहीं रहा था, हरदम पत्नी की मासूम सूरत आँखों के सामने तैरती रहती। पत्नी के गम ने उसे शराबी बना दिया। काम पर भी उसका मन नहीं लगता, उसके मालिक रवि की मनोस्थिति से परिचित थे। उन्होंने उसे समझाने का बहुत प्रयास किया। पर शायद रवि एकदम हार चुका था। कुछ साल इसी तरह चलने के बाद वह वापस बागान आ गया।

        बाप रिटायर हो चुका था, उसके बदले रवि को बागान में काम मिला। काम तो करना ही था, रोहित की पढ़ाई-लिखाई जारी रखनी थी। हालात का मारा रवि शराबी तो बन ही चुका था, बागान में शराबियों की कमी नहीं थी, वह भी उनके साथ घूम-घूमकर शराब पीने लगा। काम में ज्यादा गैरहाजिरी होने के कारण तनख्वाह भी कम मिलने लगा, थोड़ा-बहुत जो मिलता उसे पीने में उड़ा देता। पैसे की किल्लत होती तो घर में परेशान करता।

        माँ ने रोहित की जिम्मेदारी बता कर बहुत समझाया, पर शायद अब रवि को कुछ कहना बेकार था। पिताजी कमजोर हो गये थे, कुछ दिनों बाद चल बसे।

        रोहित के बड़े बाबा मनोज की जिंदगी भी बागान मजदूर की तरह ही अभावों में बीत रही थी। वह जंगल से कभी लकड़ियाँ लाकर बेचता, तो कभी जंगल से होकर बहने वाली एक बड़ी सी नदी से मछली पकड़ कर बेचता। एक बेटी थी उसकी, जिसकी शादी जल्द ही हो गयी थी।

        एकदिन वह मछली पकड़ने गया था, मछली  पकड़ने में वह इतना मशगुल था, कि कब जंगली हाथी आकर उसे घायल कर गया पता ही नहीं चला। गिरता-पड़ता किसी तरह वह घर आया, पर तत्काल चिकित्सा की सुविधा न होने के कारण उसकी मौत हो गयी।

        फाॅरेस्ट विभाग ने उस पर गैर कानूनी रूप से जंगल में घुसने और मछली पकड़ने का आरोप लगा कर जंगली हाथी के शिकार लोगों को मिलने वाली क्षतिपूर्ति देने से मना कर दिया। बागान के नेताओं के पास घर वालों ने बहुत चक्कर लगाया, लेकिन उन्होंने फाॅरेस्ट विभाग के तर्को को ही दोहराते हुए मदद करने में अपनी असमर्थता जता दी।

        दादी भी रिटायर हो गयी। रोहित बड़ा हो रहा था, दादी को घर के सब काम में मदद करता, चपाकल से पानी लाता, खाना बनाता, घर की सफाई वगैरह सब करता। सीधा-सादा लड़का। बागान में सब उसकी प्रशंसा करते। घर का काम और पैसे की कमी रोहित की पढ़ाई पर असर दिखा रही थी, उसे स्कूल आने-आने के लिए बस का किराया सही ढंग से नहीं मिलने लगा, कभी किताब-कापी खरीदने के लिए तो कभी स्कूल की फीस जमा करने के लिए। चरमराती सी अवस्था थी।

        रवि तो पक्का मतलू बन चुका था, कभी-कभी पैसा न होने पर घर के सामानों को जा कर बेच डालता था। दादी और रोहित परेशान थे रवि से। अब घर का खर्चा चलाना मुश्किल हो गया था। रोहित को पढ़ने में खूब आनंद आता, वह पढ़ाई में तेज था। वह पढ़-लिख कर कुछ बनना चाहता था। लेकिन उसे पढ़ाई में सहायता करने वाला कोई नहीं था। और जैसे अक्सर होता है, बागान में काम करने वालों के बच्चे बीच में अपनी पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

        काश ! बागान के इस तरह के मजबूर बच्चों की मदद करने वाला कोई होता। हम कभी कभार कुछ मदद करते लेकिन हमारी भी अपनी मजबुरियाँ हैं। बच्चों के पढ़ाई में सब सैलरी निकल जाती है।  तमाम कोशिशों के वाबजूद भी रोहित पढ़ाई जारी नहीं रख सका, उसे बूढ़ी दादी की दवाई और तीन लोगों के खाने की जुगाड़ करने के लिए बागान में काम करना पड़ा। अब वह बागान का मजदूर बन चुका था।

        कभी-कभी रवि अपनी मनोज वाली भाभी के पास हालचाल जानने चला जाया करता था, दोनों दुखयारी अपना-अपना दुखड़ा सुनते-सुनाते कब एक दूसरे से अतंरंग संबंध बना लिए पता ही नहीं चला। माँ पहले ही रवि की आदतों से दुखी थी  अब तो जीना दुभर हो गया। वह एकदम बीमार सी रहने लगी।

        रोहित को कहती ‘‘मेरा समय आ गया,’’ रोहित मजाक में बात टाल देता, कहता ‘‘अरे दादी अभी तो मेरी शादी करानी है, इतनी जल्दी क्या है, जाने की’’। वह दादी को खुश रखने की कोशिश करता पर दादी का बूढ़ा शरीर कब तक साथ देता भला, कुछ दिनों के बाद दादी आखिर कर चल बसी। और रोहित अकेला रह गया। नीता के इतना बतलाने पर दिल दिमाग में रोहित की करूण आवाज गुँजने लगी। यही कहा था उसने मुझसे, ” बड़ी माँ मैं अकेला रह गया हूँ।“

        अरे सो जाओ, बहुत रात हो गयी है, बाकी बातें कल कर लेना। नीता के मिस्टर ने कहा। मैंने अपनी आँखे बंद कर ली, रोहित के बारे सोचते-सोचते पलकें भारी होती चली गईं।

    सबेरे सब काम निबटाकर मैं नीता से सवाल कर बैठी। दादा-दादी के रिटायरमेंट के पैसे का क्या किए ? नीता ने बताया – वही जो हर बागान में होता आ रहा है। प्रोविडेंड फंड दलालों का दल बूढ़े होते लोंगों को शराब पिलाकर उनके बैंक पासबुक को हथिया कर सारा पैसा हड़प लेते हैं। यहाँ के लीडरों को बहुत कुछ मालूम रहता है, वे अपने लोगों को मदद करने की जगह पैसों का बंटवारा कर लेते हैं। पुलिस और प्रशासन भी आदिवासियों के मामले में हाथ नहीं लगाती है। कुछ अच्छे लोग रिटायर्ड लोगों के लिए कुछ करना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें नियम कानून मालूम नहीं होने के कारण कुछ खास नहीं कर पाते हैं। अभी तो डुवार्स तराई में ऐसे ही लोगों की भरमार हो गई है। दादा-दादी का पी एफ पैसा मिलता तो शायद रोहित अपनी पढ़ाई जारी रखता।

        नीता की सासू माँ ने कहा – ”पड़ोस में रहने के कारण रोहित के दादा-दादी से हमारा अच्छा रिश्ता बन गया था। हम एक दूसरे की मदद किया करते थे। रोहित का अब तो कोई है नहीं। लेकिन बागान घर है और वह उस घर में अकेले ही रहता है। शादी हो जाने पर ही कोई उसका अपना होगा।“

        रोहित की बातें सुन कर मन विचलित हो गया था। मैं धीरे से उठी और रोहित के घर की ओर बढ़ गई। बाहर का गेट खुला हुआ ही था। सामने आँगन में रोहित बैठा था और रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े करके  चारा खोज रहे मुर्गियों की ओर फेंक रहा था। मैंने रोहित से पूछा- ‘‘कितने मुर्गी पाले हो रोहित ?‘‘ रोहित ने मुझे देखा और कहा ‘‘ये तो पड़ोस की मुर्गियाँं हैं बड़ी माँ। अभी तक तो मैंने एक भी नहीं पाला है। लेकिन सोच रहा हूँँ, मैं भी कुछ मुर्गियाँ और बकरियाँ पालूँगा। मुर्गियाँ, बकरियाँ होंगी तो घर भरा-भरा लगेगा और बाहर जाऊँगा तो घर जल्दी लौटने में दिल भी लगेगा।“ उसने बहुत ही उदास स्वर में कहा। उसके मन में अकेलेपन का एक समंदर तैर रहा था। उसकी बातें मुझे भीतर तक कचोट गई। मैंने कुछ बोलना चाहा, लेकिन गले से आवाज नहीं निकल पाई। मैं अपने आँसू को छुपाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन रोहित को अहसास हो गया, वह अपने आँसुओं को छिपाते हुए मुर्गियों के ज्यादा करीब चला गया। This work is copyright © Oliva A. Indwar, Dec. 2014. All rights reserved.
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