राही जीवन का

राही मैं भटका हुआ
डरा सा, घबराया हुआ,
सच्चे पथ की तलाश में,
यहाँ-वहाँ घूमता हूँ
तुझे ढूढ़ता हूँ ।
दुःख तकलीफों से घिरा,
घने अंधकार में तन्हा
तेरी रोशनी की उम्मीद में,
आँखे बंद करता हूँ,
तुझे ढूढ़ता हूँ ।
ठोकर खाते गिरते सम्भलते,
पर कदमों को बिना रोके,
बाधाओं को पार कर के
कामयाब पलों को चूमता हूँ,
तुझे ढूढ़ता हूँ ।
मंजिल को पा कर,
पीड़ा भूल मुस्कान लिए,
तुझे धन्यवाद देते हुए,
खुशी से झूमता हूँ ।
तुझे ढूढ़ता हूँ
                 मौसम केरकेट्टा, मधु बागान

Please follow and like us:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *