जुमलेबाज शासन-प्रशासन

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                                                                                                         नेह अर्जुन इंदवार

जिस भाषा के शब्द और संज्ञाओं से शिशु का प्रथम परिचय होता है, वही उसके लिए सबसे आसान भाषा होती है। अधिकतर मामले में यह भाषा उसकी मातृभाषा होती है। मातृभाषा में शिक्षा-दीक्षा प्राप्त होने पर वह उसे सहजता से ग्रहण करता है और उसकी सीखने की सहज प्रवृत्ति का विकास होता है। अपनी मातृभाषा में सीखने की प्रक्रिया से वह शब्दों और वाक्यों में छिपे हुए तथ्यों को ग्रहण करता है। किन्तु, मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होने पर बालक-बालिकाओं को दूसरी भाषा के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करना पड़ता है। कोई भी दूसरी भाषा सीखना एक श्रम साध्य कार्य है। दूसरी भाषा की प्रकृति, भाषा संरचना अलग होती है। उसकी प्रकृति अलग सांस्कृतिक भावों को व्यक्त करती है। अतः उसे पहले समझना पड़ता है, बच्चों के दैनिक जीवन में उन भाषाओं का व्यवहार नहीं होने के कारण उन्हें उन शब्दों को रटना पड़ता है और शब्दों के उचित, सटिक अर्थ और व्यवहार सीखने में उन्हें अनावश्यक अधिक समय और परिश्रम लगाना पड़ता है। इससे उनके नन्हें दिमागों में व्यर्थ जोर पड़ता है। उनकी सीखने की स्वभाविक उत्सुकता कुंद हो जाती है और अपरिचित शब्दों को सीखने के लिए इच्छा और उत्सुकता उत्पन्न नहीं होती है। शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चों में कॉमनसेंस, अवलोकन और विश्लेषण करने की क्षमता का विकास करना होता है। किन्तु अन्य भाषा में शिक्षा प्राप्त होने पर शिक्षा के माध्यम की  भाषा को सीखने में व्यर्थ का उर्जा व्यय होता है। जाहिर है कि गैर मातृ भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करने से बच्चों में इन गुणों का विकास नहीं हो पाता है और वे रटकर परीक्षा पास करते हैं। शिक्षा के लम्बे सत्रों में यह प्रक्रिया आदत बन  जाती है और शिक्षा का असली उद्देश्य पीछे छूट जाता है।

आदिवासी बालक-बालिकाओं को आदिवासी भाषाओं (मुण्डारी, संताली, कुँड़ुख़, हो, खड़िया आदि) में शिक्षा मुहैया कराने की बातें कई बार की गई। नीतियाँ बनीं, आदेश निकाले गए, लेकिन आदिवासी गाँवों में शिक्षा का माध्यम आदिवासी भाषाएँ बन नहीं पाईं। कार्यान्वयन के स्तर में सभी आदेश निष्प्रभावी हो गए। आदिवासी समाज को, तत्कालीन बिहार और मध्यप्रदेश, अब झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में हिन्दी, उड़िसा में उड़िया, पश्चिम बंगाल में बंग्ला, असम में असमिया आदि भाषाओं में शिक्षा ग्रहण करना पड़ रहा है। गैर-मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने के कारण वे स्वाभाविक रूप से न तो शिक्षण-भाषा में पारंगत हो पाते हैं और न ही अपनी भाषा के साथ स्वाभाविक जुड़ाव की भावना स्थापित कर पाते हैं। ऐसे वातावरण में एक अप्राकृतिक, खिचड़ी भाषा और शैक्षिक माहौल का निर्माण होता है जो आदिवासी समाज के लिए कतई लाभदायक सिद्ध नहीं हो पाया है। आज हमारी भाषाएँ विलुप्ति के कगार पर खड़ी हैं, क्योंकि हमें अन्य भाषाओं के माध्यम से शिक्षा मिलती रही है और उन अन्य भाषाओं को हम परिवार और समाज की भाषा बना लिए हैं। झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में हिन्दी हमारी मातृभाषा बन चुकी है तो पश्चिम बंगाल में शिक्षित आदिवासी बंग्ला भाषा को परिवार की भाषा बना लिए हैं। वहीं उड़िसा और असम में उड़िया और असमिया बोलना हमारी स्वाभाविक दैनिक आदत बन गयी है। अपनी भाषाओं में बातें करने में हमें हिचकिचाहट, दिक्कत, लज्जा का बोध होने लगा और हीन भावनाओं ने आ घेरा है। शिक्षित आदिवासियों की दुनिया में प्रवेश करने वाली गैर-आदिवासी भाषाएँ, हमें अपने ही अशिक्षित भाई-बहनों के बीच भाषाई दीवार खड़ी करने के लिए उकसाती है।

अब तो हालात ऐसे हो गए हैं कि कुछ लोगों के पास आदिवासीयत के नाम पर सिर्फ एक सार्टिफिकेट होता है। जिसमें उसकी जाति का नाम अंकित होता है बाकी सब चीजों में वे पक्के गैर-आदिवासी होते हैं।

भाषा समाज को जोड़ती है, लेकिन भाषा बदल जाए तो अपनत्व के भाव में भी कमी हो जाती है। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि आदिवासी समाज के विकास, एकता, संरक्षण और पहचान में भाषा एक महत्वपूर्ण कड़ी है। लेकिन इतनी महत्वपूर्ण विषय पर कभी समाज ने इस पर कोई आंदोलन छेड़ने की कोशिश नहीं की। समाज के विकास के लिए अनेक मांगे सरकारों के सामने रखी गईं। लेकिन भाषा के सवाल में हमारे सामाजिक और राजनैतिक नेतृत्व हमेशा मौन धारण करके बैठे रहे। इसी का प्रतिफल हम आज भोग रहे हैं कि हमारा शिक्षित समुदाय शिक्षित होने के साथ-साथ अपनी भाषा से दूर होता जा रहा है और वैयक्तिक तथा भोैतिक विकास को ही असली विकास समझ बैठा है।

                2006 में झारखण्ड के तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री श्री बंधु तिर्की ने नये शिक्षा सत्र् में आदिवासी भाषाओं में शिक्षा शुरू करने की घोषणा की थी । यह अत्यंत प्रशंसनीय घोषणा थी । पूरा झारखंडी समाज ने  इसका स्वागत किया था । यह आशा की गई थी कि एक बार विद्यालयों में भाषा की शिक्षा शुरू हो जाए, तो इसके रास्ते में आने वाली तमाम बाधाएँ भी दूर हो जाएँगी। भाषाई नीति की यह रास्ता काफी उबड़़-खाबड़ है यह सभी जानते थे । भाषा के जनपथ पर तेज दौड़ के लिए इसे समतल बनाना था यह भी किसी से छिपा नहीं था । इस घोषणा ने शिक्षितों, शिक्षाविदों को युद्धस्तर पर कार्य करने की चुनौती प्रदान की थी । प्राथमिक स्तर से लेकर माध्यमिक स्तर तक भाषा की पाठ्य-पुस्तकें, कहानियाँ, कविताएँ, व्याकरण, पत्रा-पत्रिकाओं की एक लम्बी श्रृंखला लिखने, छापने और बनाने की आवश्यता थी। शिक्षा की शुरूआत के साथ साहित्य निर्माण का एक सफर शुरू होना था। साहित्य समृद्धि से समाज के बौद्धिक स्तर में वृद्धि होनी थी। पूरे आदिवासी समाज के सामने यह एक सुअवसर था कि वे श्री तिर्की की घोषणा को जमीनी स्तर में कार्यन्वित करने के लिए आगे आते और इस ऐतिहासिक मौके को हाथ से निकलने नहीं देते।

लेकिन इस रास्ते में हिमालय से भी अधिक ऊँचे पर्वत है यह किसी को भी पता नहीं था । एक संवैधानिक राज्य के एक मंत्री के द्वारा किए गए घोषणा को दस साल बीते गए। इन दस वर्ष में कुछ समितियाँ बनीं, कुछ किताबों को लिखने का प्रयास किया गया और कुछ किताबों का प्रकाशन भी हुआ। लेकिन जिन बच्चों और स्कूलों तक उन किताबों और मातृभाषा के प्यार को पहुँचना था वह नहीं पहुँचा, न ही किसी आदिवासी पार्टी, एनजीओ या संस्थाओं ने इसके लिए कोई आवाज उठायी और न ही इसे किसी आंदोलन का हिस्सा बनाए। जिन महानुभावों के कर कमलों के द्वारा इन किताबों को सामने लाया गया वे भी इसे जमीनी स्तर में पहुँचाने में असफल सिद्ध हुए।

बंधु तिर्की और उनकी सरकार के बाद भी कई सरकारें आयीं और गईं, लेकिन किसी भी सरकार ने इस विषय पर कोई ठोस कार्य नहीं की और न ही इस घोषणा को कार्यन्वित करने की कोशिश की गईं। जिस शिक्षा विभाग के प्रारंभिक परिकल्पनाओं पर यह घोषणा आधारित थी, उसी शिक्षा विभाग के अफसर आफिम की गोलियां खा कर सो गए। लगता है विभाग को कोई क्रांतिकारी दिमाग वाला अफसर नहीं मिला और वे अपने रचनात्मक दिमाग को इस मामले में खपा नहीं पाए। देश में कैसे लोगों के हाथों में शासन और प्रशासन है यह इसका एक उदाहरण है।

अपनी ही राज्य में अपनी ही मातृभाषा के शिक्षा के प्रति समाज कितना उदासीन हो सकता है, उसका यह एक ज्वलंत उदाहरण है। इस तरह की घोषणाएँ समाज और देश के लिए जुमला घोषणाओं की श्रेणी में आतीं हैं और जुमले घोषणाओं पर विश्वास करता समाज भी जुमला समाज हो जाता है।