झारखण्ड चुनाव-2019 की राजनीतिक बिसात

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                                  वाल्टर कांडुलना 

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झारखंड की वर्तमान बीजेपी की सरकार “विकास” को मुख्य मुद्दा कहती है। लेकिन प्रचार के स्तर पर मोदीजी के भाषण “मित्रो,आपको मंदिर चाहिए कि मस्जिद?” के उलट यहाँ झारखण्ड की राजनैतिक-जमीन को बीजेपी धर्म और धर्मान्तरण के पिच में तब्दील कर रही है। मतलब यहाँ धर्म के खेल के रणनीति और पैंतरे होंगे। यहाँ हिन्दू- मुसलमान के उलट सरना-ईसाई के मैच होंगे, बोलिंग होंगे और कैच होंगे। घर-वापसी और संस्कृति विरूपण की गुगलियाँ फेंकी जाएँगी।
फिलहाल सरना आदिवासी और सरना धर्म के बारे एक दो सिद्धांतों के बॉल फेंकी जा रही है। लेकिन चुनाव के नजदीक आते-आते सरना के बारे में नए-नए सिद्धांत परोसे जायेगे।
जैसे सरना आदिवासी लोग वनाश्रम और तपस्या के लिए जंगलों में गए ऋषियों की संतान ही है।

संभव है कुछ इस प्रकार के नए नारे भी फेंके जायेंगे :

सरना-सदान एक हैं।
सरना-सनातन एक हैं।
सरना-ईसाई में ब्रेक हैं।

फिलहाल धर्मान्तरण के छिट-पुट लेकिन आधारहीन, असिद्ध आरोपों के सिवाय फिजा में और कुछ नहीं है। पर चुनाव के पहले धमार्न्तरण से संबंधित मामले / उदाहरण से न्यूज़-पेपर पट जाएँगे। प्रचार माध्यमों, अखबारों, टीवी बहसों में इसकी बाढ़-सी आ जाएगी, जिसमें सभी प्रतिभागी सरकार के और बीजेपी के पक्षधर होंगे। झारखंड से प्रकाशित अखबारों का बीजेपी समर्थक होना कोई नई बात नहीं है, क्योंकि ये अखबार दिकु विचारधारा से ही ओतप्रोत हैं। झारखंड में आदिवासी और दिकु हितों में टकराव जगजाहिर है। इन अखबारों का आदिवासी हित के विरोध में खबरें प्रकाशित करने का लम्बा इतिहास भी रहा है।
इन सारी कयावदों का एक ही उद्देश्य है — किसी भी तरह ईसाई-आदिवासियों को सरना-आदिवासियों से अलग-थलग कर दो, ताकि इनके बीच उत्पन्न सामाजिक कडुवाहट से आदिवासी वोट एकजुट ना हो सके और आदिवासी वोट के बिखराव से फिर के बीजेपी और उसके समर्थन से राजनीति करने वालों की जीत सुनिश्चित की जा सके। चुनावी जीत में एक-एक वोट मायने रखता है। यदि आदिवासी वोट एकजुट हो जाएँ तो उन उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित है, जो पाँचवी अनुसूची के क्षेत्र में आदिवासी हितार्थ नीतियों की वकालत करते हैं और उसके लिए आदिवासी हित में नीतियाँ बनाने की वकालत करते हैं।

लेकिन आदिवासी समाज को सतही धार्मिक झगड़ों में उलझा कर उन्हें उनकी जड़ों से जुड़े हुए मुद्दों से अलग-थलग करने की चाल बड़ी सिद्दत से चली जा रही है। सच पूछ जाए तो सभी राजनीतिक पार्टियों ने झारखण्ड की ‘आदिवासी जनता’ की उपयोगिता को सिर्फ वोट देने तक ही सीमित कर दिया है, जिसे एक commodity की भांति बेचा-ख़रीदा जा सकता है। लेकिन यह सिर्फ वोट की नीति नहीं है, बल्कि सामाजिक समरसता में जिंदगी जीता आदिवासी समाज को हमेशा के लिए खंड-खंड करने की लम्बी षड़यंत्र का भी यह एक अहम हिस्सा है।
एक ओर बीजेपी और हिन्दुत्व पार्टियों के विकास की छद्म मुद्दे है, जो अब तक आदिवासियों के लिए विनाश ही साबित होते रहे हैं तो दूसरी ओर आदिवासियों के लिए क्या मुद्दे हैं ?
यह जानना जरूरी है कि झारखण्ड के क्षेत्रीय और बृहद आदिवासी समाज के जमीनी, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, भाषाई या समुचित विकास के मुद्दे क्या-क्या हैं ?

‘जल-जंगल-जमीन’ और ‘जान’ –
(क) इनसे सम्बंधित कानून हैं सीएनटी/एसपीटी कानून, झारखण्ड भूमि अधिग्रहण कानून 2017, पेसा कानून और इसी पेसा कानून पर बनने वाला पेसा विनियम तथा पूर् भारत के पाँचवी अनुसूची क्षेत्र में लागूयोग्य समता जजमेंट।
(ख) डोमिसाइल
(ग) आरक्षण
(घ) पांचवीं अनुसूची
आदिवासियों के ये सभी मुद्दे <संवैधानिक> मुद्दे हैं। याने अपने अधिकार या हक से सम्बंधित मुद्दे हैं, जिन्हें सरकार ने हड़प लिया है या कहें इसे छुपा दिया है और कभी भी नीतिगत मामलों पर इन विषयों पर कोई बात नहीं करती है। सरकार और बीजेपी के आदिवासी नेतागण भी कभी इन मुद्दों पर कोई बात नहीं करते हैं। मतलब वे भी आदिवासी हित के विरूद्ध कार्यशील हैं और इसका मुख्य कारण उनका व्यक्तिगत स्वार्थ है। वे सामाजिक हित से अधिक अपना व्यक्तिगत हित को ही सर्वोपरि रखते हैं। इसलिए उन्हें आदिवासी हित में कार्य करने वाले जन प्रतिनिधि नहीं कहा जा सकता है।
२०१९ के लोकसभा का चुनाव जीतने के लिए सरकार का जोर होगा : “सुशासन” पर। परन्तु सरकार अपने सुशासन के डंडा आदिवासी की “जान,” उसकी “आजीविका” और उसके “अस्तित्व” पर ही चलायगी।
हजारों सालों से आदिवासी समाज की मिल्कियत में रहने वाले आदिवासी भूमि को हड़पने के लिए सरकार ने पहले ही भूमि अधिग्रहण कानून बना लिया है और आदिवासियों के ग्राम सभा को निष्प्रभाव करने का इंतजाम कर लिया है।
इसलिए सरकार और सतारूढ़ पार्टी कभी भी आदिवासी हित के मुद्दों को नहीं उठाएगी। आदिवासियों का हित संविधान में दिए गए प्रावधानों के अंदर सुदृढ़ रूप से रूपांकित है। लेकिन वे इन रूपांकित प्रावधानों पर कभी भी बात नहीं करेगी। अपने आदिवासी विरोधी तत्व होने की बातों को छुपाने के लिए वे धर्म की बातों को खूब हवा देगी। क्योंकि धर्म की बातों से सरना आदिवासी भावुक हो जाते हैं और वे थोक के भाव में बीजेपी को वोट दे देते हैं। जबकि अक्सर देखा गया है कि बीजेपी के उम्मीदवारों और गैर बीजेपी पार्टियों के उम्मीदवारों में सामाजिक और धार्मिक रूप से कोई भी अंतर नहीं होता है।
बीजेपी एक दिकु मानसिकता की पार्टी है, जिसने आदिवासी मुख्यमंत्री की जगह रोजगार की खोज में एक भिन्न प्रांत से झारखंड आए व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना कर आदिवासी राज्य के सिद्धांतों पर कुठराघात किया। बीजेपी सरकार ने पाँचवी अनुसूची में आदिवासियों को मिले संवैधानिक अधिकारों पर हमला किया। भूमि संबंधी ग्राम सभा के अधिकारों पर हथौड़ा चलाया। गैर झारखंडियों के नाम पर झारखंड के शिक्षा संस्थानों का नाम रखा। आदिवासी भूमि हड़पा। झारखंड के प्रशासनिक ढाँचों में बाहरी लोगों के लिए द्वार खोल दिया। आदिवासियों और स्थानीय निवासियों की जगह बाहरी लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाए। एक रूपये की दर पर नकली कंपनियों को झारखंड में जमीन दिया। समता जजमेंट, पेसा कानून पर नियमावली बनवाने से परहेज किया। ऐसे विषयों की लम्बी फेरहिस्त है, जिसके द्वारा आदिवासी समाज के असली विकास को कुंद करने की सारी कोशिशें की गईं।
२०१९ में होने वाला लोकसभा का चुनाव आदिवासियों के लिए बहुत अहम साबित होगा। इसके साथ विधानसभा का चुनाव भी अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। इन चुनावों में आदिवासियों के एक-एक मत को आदिवासी अस्तित्व को बचाने के लिए उपयोग किया जाना बहुत महत्वपूर्ण है। यदि दिकु पार्टियों का नारा आदिवासियों के लिए “विनाश” साबित हुए विकास के लिए होगा तो आदिवासियों का मुद्दा होगा : “स्वशासन” जिसे भारत के संविधान ने आदिवासियों को दिया है।
संघर्ष इन्ही विपरीत ध्रुवों वाले मुद्दों, विचारधारा और कार्यक्रम के बीच होगा।
सरकार अपने मुद्दे को अपने सारे संसाधनों के जरिये हाईलाइट करेगी। कुछ दिनों के लिए प्रचार और विज्ञापनों से सारा झारखण्ड स्वर्गिक और चांदनीमय बना दिया जायेगा।
लेकिन हमें और आपको अपने मुद्दों को, अपने अस्तित्व के विषय को आदिवासी के मन-शरीर में और घर-गाँव में डालना पड़ेगा।
सिर्फ फेसबुक में लिखकर अपने मन को तसल्ली देने से काम नहीं चलेगा। आज आदिवासी मीडिया की कमी के कारण आदिवासी समाज के शिक्षित वर्ग फेसबुक के माध्यम से ही अपने विचारों को व्यक्त करते हैं। लेकिन जमीन की लडाई लड़ने के लिए सोशल मीडिया से बाहर आकर जमीन पर भी उतरना पड़ेगा।
आप अपने बौद्धिक तर्क और ताकत के साथ सरकार की हर चाल को काटने के लिए तैयार रहें।