मडुवा, मक्कई के व्यावसायिक दाने

                          महेश्वर मुंडा 

दो  साल पुरानी बात है । मैं एक महानगर  के Big bazar में गया । वहाँ मेरी नजर एक पॉकेट पर पड़ी । वह रागी  (मड़ुवा) के आटे की थी । मैंने उसे उठाया । 1/2 के.जी. का दाम 70 रुपया था।

दाम देख के मैं हैरान रह गया । बचपन में रागी से बनी रोटी खूब खाया । गाँव में सिर्फ हमारे घर में ही “जंती”/जांता था । “जंती” दाल , रागी , ज्वार , बाजरा आदि पीसने या टुकड़ा करने के काम में लाया जाता है । यह आटा चक्की का देसी और बेसिक रूप है।

गाँव में हर कोई हमारे घर ही रागी / ज्वारी पीसने आता था और जाते-जाते  एक कटोरी में आटा छोड़ जाता था।

1990 के समय स्कूल में भूगोल विषय की किताब में पढ़ा था कि रागी / मड़ुवा , ज्वार , बाजरा निम्न कोटि के अनाज हैं अर्थात् यह गरीबों का अनाज है और इसमें पौष्टिकता अधिक नहीं है। 

हैरान इसीलिए हुआ कि जब रागी निम्न कोटि का अनाज है, तो इसका दाम गेंहू के आटे से ज्यादा क्यों ? बहरहाल, दाम ज्यादा था, फिर भी बचपन याद आया तो मैंने दो किलो खरीदा और घर जाकर रोटी बनाया और खाया । Google मारा तो रागी के गुणों के बारे मिल गया ।

उसके बाद मैं दो महीने बाद Reliance के स्टोर्स में गया । वहाँ भी रागी मिला । दो-तीन बार वहाँ से रागी का आटा लिया तो वहाँ कांउटर  पर बिल बनाने वाली लड़की ने पूछा , “सर , ये क्या है और इसे कैसे पकाया जाता है ?”

Finger millet

अब हम मुद्दे पे आते हैं । आज हमारे आदिवासी लोगों की गरीबी या कहें बुरी हालत का एक कारण यह है कि बहुत सी चीजों के लिए आत्मनिर्भर हो सकते थे, उनके लिए भी हम बाजार पर निर्भर होना शुरू कर दिए हैं। अपने आस पास सहज रूप से उपलब्ध चीजों को छोड़ कर हम बाजार में बेची जाने वाली खाद्य वस्तुओं पर निर्भर होने लगे हैं । उदाहरण के तौर पर :
1 – रागी (Finger millet , मुण्‍डारी में कोदे )। इसकी खेती के लिए झारखंड की मिट्टी उपयुक्त है । इसकी खेती आसान भी है, कम बारिस में भी इसकी खेती संभव है। इसके पत्ते चट्टाई बनाने के काम भी आते हैं। फिर भी हम गेंहू के आटे खरीदने लगे । रागी से बने बिस्कुट / cookies के दाम देखिये –  250 ग्राम के 50 रुपए । सोचिए।

2 – मक्कई (जोंरा / maize ) – इसकी खेती भी धान की अपेक्षा आसान ही है । शहरों में “भूट्टा” खाने के लिए लोग दौड़ पड़ते हैं। 20-30 रुपया प्रति बूटा देते हैं। आप सभी मल्टीप्लेक्स जाते हैं। पोपकोर्न खाते हैं , मुट्टी भर पॉप्कॉर्न के लिए 100 रुपया देते हैं।
3 – हममे से बहुत से लोगों ने गोंदली भात खाया होगा । गोंदली को mundari में गुलूड़ू कहते हैं । यह फसल भी अब गायब सा हो गया । इ

सी के जैसे अन्य फसल “एड़ी / बेंडे ” भी अब इतिहास बन गए । शायद इसे ही Foxtail millet कहते हैं।

4 – Sorghum / ज्वारी की भी खेती कम होने लगी।
5 – Pearl Millet (बाजरा ) भी कम ही होता है , जबकि chotanagpur की मिट्टी में इन millets की खेती हो सकती है ।
6 – हम सब बाजार से आज 150 रुपया प्रति लिटर के हिसाब से सरसों या refined oil खरीदते हैं । जबकि छोटा नागपुर के इलाके में सरसों / सुरगुजा / सूरजमुखी की खेती हो सकती है।
7 – अरहर / मसूर / मूंग दाल आज कल 120 – 150 रु केजी खरीदते हैं । जबकि छोटानाग्पुर में कुलथी / उरद / रहड़ की खेती हो सकती हैं। 

ये सिर्फ उदाहरण हैं ।

मुख्य बात यही है कि हम आकर्षक विज्ञापनों के झांसे में क्यों आते हैं ? और अपने गाँव या घर के प्रोडक्टस / उत्पाद को छोड़कर महंगे दिकु उत्पाद के पीछे क्यों भागते हैं ? जिन फसलों की खेती हमारे खेतों में हो सकती है, उनकी खेती हम छोड़ क्यों रहे हैं ?

बाबा रामदेव टीवी में आके बोल देगा कि पतंजलि का केश तेल , cosmetic , सरसों तेल, आटा, चावल, बिस्कुट, मुल्तानी मिट्टी , beauty cream शुद्ध है और बेहतर है और हम यूँ ही मान लेते हैं !!””

I know many of us, among us, are very emotional and possessive over such Treasures of Jharkhand.
Its a good sign that many Jharkhandi know it and have a Love for Jharkhand for its Precious SOIL, and they love Jharkhand for its own sake.

सवाल है कि हम अपने झारखण्ड की ऐसी सभी अमूल्य और बेशकीमती माटी और यहाँ की सभी प्राकृतिक चीजों को बचाने/बचाये रखने के लिए क्या कर रहे हैं?

दुनिया सिर्फ भावनाओं से तो नहीं चलती। 

इसके लिए जागरूकता के साथ साथ आधुनिक कांसेप्ट के प्लानिंग, संगठन, प्रयास और मार्केटिंग की भी आवश्यकता है.

Can anyone lead in this particular field/entrepreneurship?

यह हम आदिवासियों के नयी पीढ़ी के मैनेजमेंट एक्सपर्ट्स, engineers की innovative सोच, administrative organisers और हमारे सोशल वैज्ञानिकों के लिए  यह एक बहुत बड़ी चुनौती है.

हम कब तक बंगलौर-बॉम्बे की ओर भागते रहेंगे और देशी-विदेशी कंपनियों की सेवा करते रहेंगे ?

यंग गाईज़ थिंक ओवर इट.

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1 Comment

  1. अद्धभुत जानकारी उपलब्ध कराने के लिए धन्यवाद सर जी ।
    वर्तमान की स्थिति का एकदम सटीक विशलेषण किये हो ।
    हमारे यहाँ भी मड़वा का कृषि लूप्त हो ही गया , शायद मैं लस्ट टाईम 1994/ 1995 तक देखा था ।
    मड़वा का कृषि हमारे गाँव के बुजुर्ग लोग करते थे, स्कूल के दिनों में मड़वा खेत में मैं भी चौकीदारी करने जाता था,अपने हाथों में रबड़ के बने गिटिस (बटूल) लेकर ।

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