नये विचारों का सृजन

                                   वाल्टर कांडुलना

पिछले कुछ सालों से देख रहा हूँ, विशेषकर फेसबुक और अन्य सोशल मंचों में, हम आदिवासी अपने समाज को कोई नवोवेषित विचार नहीं दे पा रहे हैं।  ले-दे के एक-दो विषय-वस्तुओं के इर्द-गिर्द ही हमारे पोस्ट घूमते नजर आते हैं।

इस बीच पिछले कई सालों में शंख और कोयल की नदियों में काफी पानी बह चुका है। 

1) आदिवासी कौन है ? आदिवासी की पहचान (आइडेंटिटी) क्या है ? इस अपनी पहचान की खोज के बहाने किसको समावेश (include) करें और किसको बहिष्कृत (exclude) करें इस पर संभवतः सबसे ज्यादा चर्चा किये जा रहे हैं। जो कि सरना-ईसाई की बहस में परिणत होकर बगैर किसी निष्कर्ष (conclusion) के (अ)समाप्त = open ended ही रुक जाता रहा है। यह किस चीज़ की ओर इशारा करती है ?
कहीं हमारी धारणाएं किन्हीं आयातित विचारों के परिणाम तो नहीं हैं !

नये विचार- फोटो-मनोजआर्यन

2) राजनीतिक तौर पर आदिवासी क्या किसी राष्ट्रीय पार्टी का अंधभक्त (वोट बैंक) बन कर ही अपने अस्तित्व या वजूद (existence) को बचा सकते हैं ? इस पर भी आपस में काफी नोक-झोंक , कटाक्ष और व्यंग-तीर चलते रहे हैं।
अपनी-अपनी पार्टियों में हमारे आदिवासी नेता या कुछ हद तक हम फेसबूकिये भी किसी मुद्दे पर जैसे जमीन के मुद्दे पर या हमारे संवैधानिक अधिकारों के मुद्दे पर <आदिवासी दृष्टिकोण> क्यों नहीं रख पाते हैं ? यहाँ भी हमारी अपनी कोई मौलिक “विचार धारा” धरातल पर उतरी नजर नहीं आती है। क्या हम दूसरों के <<विचारों>> पर “जिंदाबाद” या “मुर्दाबाद” के नारे लगाने को अभिशप्त हैं।

हम क्या-क्या कर सकते हैं :-

1) संसार में व्याप्त वर्तमान विचारों के बासीपन और अपनी पूर्व-धारणाओं, पूर्वाग्रह के मिथकों से हमें निकलना पड़ेगा। यह कोई वन टाइम एक्सरसाईज (one time exercise) नहीं है, बल्कि यह एक सतत चलने वाली प्रक्रिया (continuous process) है।  महत्वपूर्ण यह है कि हम अपने विचारों के साथ कितना जीते हैं और अपने समाज के प्रति कितना ईमानदार हैं।

2) नित नई सोचों और खोजों के साथ नए-नए प्रयोग किये जा रहे हैं। अपने क्षेत्र में या अपनी रूचि के विषय में मैं समाज को क्या नई चीज दे सकता हूँ ? उदाहरण के लिए यदि मैं एक शिक्षक /प्रोफेसर हूँ तो क्या मैं ऐसी तकनीक इजाद कर सकता हूँ, जिससे कि आदिवासियों के ग्रामीण माहौल को भी कैसे शिक्षण-प्रशिक्षण (education& training) के सहायक (conducive) कैसे बनाया जा सकता है।

3) परम्परागत आदिवासी शासन प्रणाली को क्या वर्तमान डेमोक्रेटिक सिस्टम में insert किया जा सकता है और अगर हाँ, insert किया जा सकता है तो इस शासन प्रणाली को हम insert कैसे करेंगे. क्या हमें इसके लिए रिसर्च नहीं करना चाहिए ?

4) हमारी अपनी आदिवासी ethos & psyche के आधार पर हम अपने आदिवासी समाज की उन्नति/आर्थिक उन्नति के लिये क्या-क्या नए योजनाएँ (प्रोजेक्ट और मॉडल) बना सकते हैं और उन्हें कैसे अपनी शासन प्रणाली में व्यवस्थित और समाहित (synchronize) कर सकते हैं।

5) अभी जो भी NGOs बन रहे हैं अथवा चल रहे हैं वे basically सरकारी योजनाओं की रकम को निकालने के नाल (siphon) मात्र हैं।

6) संविधान में आदिवासियों की सुरक्षा और संवर्धन के लिए सबसे ज्यादा प्रावधान दिए गए हैं, परन्तु फिर भी हमारी वर्तमान स्थिति-परिस्थिति हर क्षेत्र में चाहे शिक्षा का हो, या आर्थिक दशा का हो या सामाजिक हो या राजनीतिक हों, बेहद बुरी है।
क्या कभी हमने इसके कारणों की समीक्षा की है ?

हमने तो आज तक सिर्फ दूसरों पर दोषारोपण करना ही सीखा है।

आइये, नए विचार (mind-set) बनाएँ, नए (+)ve विचार (आइडियाज) लाएँ और कुछ नया कर दिखाएँ।
Ideas rule the World.
विचार ही संसार पर शासन करते हैं। विचार ही संसार में बदलाव लाते हैं। आईए हम समाज में नये-नये विचारों को लाएँ और उसे समाजोपयोगी बनाएँ। *