चाय मजदूरों के साथ तृणमूल कांग्रेस पार्टी की ठगी कथा-7

नेह अ इंदवार

और जैसे कि आशंका थी तृणमूल कांग्रेस पार्टी की माँ-माँटी-मनुष्य की सरकार ने फिर से चाय मजदूरों के साथ न्यूनतम मजदूरी के नाम पर ठगी का खेल दिखाया। इस बार खेल दिखाने के लिए मंत्री महोदय उपस्थित नहीं थे। इस खेल को दिखाने का जिम्मा अफसरों को दिया गया था। एक दिन पूर्व जब खबरों में कहा गया कि बहुप्रतीक्षारत न्यूनतम वेतन की घोषणा श्रम मंत्रालय के अफसर करेंगे, तब ही स्पष्ट हो गया था कि न्यूनतम वेतन के नाम पर राज्य सरकार द्वारा दिखाई जा रही मदारी का खेल का पटाक्षेप नहीं होगी, बल्कि अनवरत चल रहे धारावाहिक की अगली कड़ी होगी। मतलब साफ है सरकार मजदूर संघों को समझाना चाहती है “तेल देखो और तेल की धार देखो।“

जनता को एक ही बार में आकृष्ट करने वाला नारा “माँ-माँटी-मनुष्य की सरकार” से आम जनता को अपने निकट आकृष्ट करने वाली सरकार के मन में चाय मजदूरों के लिए कितना सौतेलापन भरा हुआ है। यह सरकार द्वारा 172 की न्यूनतम वेतन के प्रस्ताव में झलक रहा है। इस तरह की भद्दा मजाक शायद ही दुनिया के किसी हिस्से में की गई होगी। 172 रूपये का प्रस्ताव देने का मतलब है कि सरकार पहले ही इसे 180-182 रेंज में देने के लिए मन बनाई है और सिर्फ सरकारी मोल तोल की ताकत दिखाने के लिए तथाकथित न्यूनतम वेतन की घोषणा के नाम पर 172 रूपये का प्रस्ताव दिया। इस तरह की घोषणा के बाद सरकार और एक दो बार बैठक का दिखावटी आयोजन करेगी और एकतरफा फैसला लेकर जबरदस्ती दो चार रूपये को बढ़ा कर एक नोटिफिकेशन निकाल देगी।
पश्चिम बंगाल सरकार चाय मजदूरों को कितना पश्चिम बंगाल के माटी के संतान समझती है। यह पिछले 72 साल का निकृष्ट शोषण का इतिहास बताती है। सरकार चाय मजदूरों को सिर्फ निकृष्ट गुलाम समझती है। वह चाय बागान मालिकों को खून चूसने की मनोवृत्ति को सरकारी मान्यता देकर संविधान में दी गई शोषण के विरूद्ध स्वतंत्रता का हनन में सरभागी बने रहना चाहती है।

पश्चिम बंगाल के चाय मजदूर भारत के ही संविधान और कानून के तहत बने नियमों के अधीन चल रहे चाय बागानों के चाय मजदूर हैं और चाय उद्योग उनके सहयोग के बिना एक दिन भी नहीं चल सकता है। तमिनाडु, केरल, कर्नाटक में मजदूरों को 300 रूपयों से अधिक की मजदूरी मिलती है। जबकि वहाँ के चाय का दाम भारत में सबसे कम है। पश्चिम बंगाल के चाय की कीमत सबसे ज्यादा है, लेकिन पश्चिम बंगाल में बागान मालिक सबसे कम मजदूरी देकर चाय मजदूरों का शोषण करते हैं। सरकारी विभागों को यह बात अच्छी तरह मालूम है, लेकिन पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी पार्टी के भ्रष्टाचार में डुबे मानसिकता ने चाय मजदूरों को हमेशा शोषित होने के लिए मझधार में छोड़ दिया है।

चाय बागान के सभी दोस्त कृपया निम्नलिखित लिंक में जाकर देखें कि भारत के चाय बाजार में किस राज्य के चाय की कीमत क्या है ?

http://www.teaboard.gov.in/WEEKLYPRICES/2017 /

यह टी बोर्ड के वेबपेज का हिस्सा है और सभी से अनुरोध है कि वे कृपया इसे अपने मोबाईल या कम्प्यूटर में डाउनलोड करके सेव कर लें। इसे मजदूर और मजदूरों के स्थानीय नेताओं को दिखाएँ। पश्चिम बंगाल और असम के बागान मालिक पाँच दस रूपये की बढ़ोतरी देकर मजदूरों का शोषण करते हैं और कहते हैं कि The Plantation Labour Act 1951 के कारण सामाजिक क्षेत्र में भारी निवेश करना होता है और इस पर व्यय भी भारी होता है। लेकिन यही एक्ट दक्षिण भारत के चाय बागानों में भी लागू है वहाँ भी बागान चलाने वाली कंपनियों को यह खर्च उठाना पड़ता है। वहाँ तो चाय बागान कम आय करके भी रूग्न नहीं हो रहे है और न ही मजदूरों को वहाँ ठगा जाता है। वहाँ के श्रम अफसर को बागान में आते देख कर ही मैनेजर की सांस रूक जाती है। किसी भी मामले में किसी भी नियमों की चूक पर श्रम मंत्रालय चाय बागान पर भारी जुर्माना लगाते हैं और कानूनी कार्रवाई करते हैं। मैंने खूद तमिलनाडु के चाय बागानों और वहाँ के श्रम मंत्रालय में जाकर इस बात की जानकारी ली थी।

लेकिन पश्चिम बंगाल में श्रम दफ्तर के अफसरों को देखकर बागान मैनेजर बहुत खुश होते हैं और उन्हें कुछ रूपये देकर घुस देकर उन्हें बिदा करते हैं। इसीलिए The Plantation Labour Act 1951 के तरह चाय बागानों में कोई भी सुविधा मुक्कमल ढंग से चाय मजदूरों को नहीं मिलती है। इस एक्ट के नाम पर चाय बागान भारी कमाई करते हैं। लेकिन इसी एक्ट के नाम पर चाय मजदूरों को उनके न्यायपूर्ण वेतन से उन्हें वंचित भी करते हैं। यदि यह एक्ट चाय मजदूरों को 350-500 रूपये देने में रूकावट डालते हैं तो मजदूरों को मांग करनी चाहिए कि सरकार चाय बागानों को इन एक्ट से मुक्त कर दें और सामाजिक सुविधा के नाम पर दिए जाने वाले तमाम सुविधा मसलन – अस्पताल, राशन, घर, घर की मरम्मत, नाली, बिजली, टायलेट, स्कूल की गाड़ी आदि के बदले नगद रूपये दे दे। यह किसी भी तरह से दैनिक 500 रूपये से कम नहीं होगा। इसका मतलब होगा मजदूरों को महीना 13 हजार रूपये मिलेंगे। जब इन सुविधाओं को बागान मालिक ठीक से देता ही नहीं और सरकार बागान की गफलती पर कोई कार्रवाई करती ही नहीं तो इन सुविधाओं के नाम पर मजदूरों का शोषण क्यों अनवरत चलता रहे ?

तृणमूल के चाय बागान ट्रेड यूनियन सरकारी शोषण के मान्यता पर सहमति देता है। मतलब यह ट्रेड यूनियन चाय मजदूरों के कल्याण के लिए काम नहीं कर रहा है बल्कि सरकारी ठगी को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए ठगी करने के स्तर पर उतर गया है। नहीं तो क्या कारण है कि यह 172 रूपये के सरकारी प्रस्ताव को न्यायपूर्ण मजदूरी कह रहा है। आज चाय मजदूरों को अपने हित की लड़ाई में कौन उनका दोस्त है और कौन उनका शोषक यह जानना बहुत जरूरी है। मैंने कभी तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में वोट देने के लिए लोगों से आग्रह किया था, उसे सचमुच माँ-माटी और मनुष्य का पार्टी समझ लिया था, लेकिन अब तक के उनके नेताओं के रवैये से मुझे अपने विश्वास को तोड़ना पड़ा। सचमुच यह एक निराशा का समय है और डुवार्स तराई के हर जागरूक इंसान को इस पर गहरे रूप से चिंतन और मनन करने की जरूरत है। पार्टी कोई माँ-बाप नहीं है कि उसे बदला नहीं जा सकता है। बल्कि उसे तो सकरात्मक नीतियों, नियमों को बनाने के लिए समर्थन दिया जाता है। वह किसी के खून चूसने में सहायक की भूमिका निभाए और हम उसे अनवरत समर्थन देते रहे, इससे बड़ी बेवकूफी तो पूरी दुनिया में दूजा कोई नहीं होगा।

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