सरकार देगी चाय मजदूरों के बच्चों को रोजगारमूलक प्रशिक्षण

                                                                                        नेह अर्जुन इंदवार 

लगता है सरकार द्वारा चाय बागानों के आदिवासियों के लिए रोजगारमूलक कार्यक्रम उपलब्ध नहीं करने लिए किए जा रहे लगातार आलोचना की बात सरकार तक पहुँच गयी है। अब आम चुनाव के पूर्व सरकार 40 बंद, रूग्ण और अचल चाय बागानों के मजदूरों और उनके बच्चों के लिए पश्चिम बंगाल सोसायटी फॉर स्किल डिवलेपमेंट के द्वारा रोजगारमूलक प्रशिक्षण देने की घोषणा की है।

घोषणानुसार नार्सिंग सहित विभिन्न स्वास्थ्य सेवा, बैंकिंग और व्यावसायिक हिसाब किताब, व्यवसाय, वाणिज्य, डेटा इन्पुट, इलेक्ट्रोनिक्स, कम्प्यूटर हार्डवेयर, विकलांगों की देखभाल, पर्यटन व्यवसाय जनसंपर्क, विभिन्न सामग्री निर्माण, इंटिरियर डेकोरेशन, ब्युटीशियन, लकड़ी-कार्य, हस्तशिल्प, टेलरिंग, खुचरा और थोक व्यवसाय आदि के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा। इन प्रशिक्षणों के लिए राज्य के आईटीआई और विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों की मदद ली जाएगी।

इसके लिए सरकार द्वारा एक वेबपेज भी बनाया जाएगा। मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार जलपाईगुड़ी, अलिपुरद्वार जिलों के चाय बागानों के मजदूर और उनके बच्चों तथा चाय बागानों में रहने वालों के लिए यह कार्यक्रम पाईलट परियोजना के अन्तर्गत चलाया जाएगा। इस परियोजना का लक्ष्य चाय बागानों में रहने वाले करीब चार लाख लोग हैं। पायलट परियोजना का मतलब है यह स्थायी प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह परिक्षण मूलक कार्यक्रम है। जिसे बाद में स्थायी किया जा सकता है या बंद भी किया जा सकता है। लेकिन उपरोक्त दो जिलों में सरकार द्वारा उत्कर्ष परियोजना की शुरूआत की गई है जो इसी तर्ज पर लोगों को रोजगारमूलक प्रशिक्षण देगा।

दोस्तों, चाय बागानों में मजदूरों की मुख्य मांग अपने आठ घंटे या 24 किलोग्राम हरी पत्तियाँ तोड़ने के बदले न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत एक सम्मानजनक मजदूरी जो आज की तारीख में किसी भी हालत में 350 रूपये से ज्यादा होना चाहिए, की मांग है। इसके साथ मजदूर उन आवास और भूमि में रहने के लिए कानूनी पट्टा की मांग कर रहे हैं, जिसमें वे पिछले एक डेढ़ सदी से रह रहे हैं। आज जो पीढ़ी चाय बागानों के उन घरों में रह रही है, उनके दादा और परदादा भी उन्हीं घरों में पैदा हुए थे और उन्हीं घरों में मर खप गए।

चाय बागानों की सारी भूमि सरकारी भूमि है और बागान मालिक को चाय बागान चलाने के लिए उन भूमि को लीज पर दिया जाता है। पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि देश भर में जहाँ कहीं सरकारी में गरीब लोग बस गए हैं और कई दशक तक बसे हुए हैं, सरकार वहाँ मानवीय दृष्टिकोण रखते हुए उन जगहों पर बसने वालों को उस भूमि के टूकड़े के मालिकाना हक के लिए उन्हें सरकारी पट्टा प्रदान करती है। चाय बागानों में तो सरकारी अनुमति और लाईसेंस के आधार पर चाय मजदूरों को उन भूमि या बस्ती में बसाया गया है। लेकिन वे आज भी उस भूमि के मालिकाना हक से वंचित है.। उल्लेखनीय है कि तत्कालीन भारत सरकार की औद्योगिक नीति की जरूरत के हिसाब से तब आदिवासियों को चाय बागानों में कानूनी रूप से लाया गया और बसाया गया था।

चाय बागानों के मजदूरों की मुख्य मांग मजदूरी और जमीन का पट्टा है। लेकिन सरकार दोनों ही चीजें देने में बहुत अनाकानी कर रही है। इसी बीच सरकार विभिन्न भाषा-भाषी समुदायों को संस्कृति विकास बोर्ड के नाम पर करोड़ों रूपये देने लगी है। आदिवासी समाज के नाम पर भी करीबन 20 करोड़ रूपये प्राप्त हुए हैं। हमारी मांग थी कि उन पैसों को चाय बागानों के बेरोजगारों के लिए प्रशिक्षण देने के लिए उपयोग किया जाए। लगता है, डुवार्स तराई के नौजवानों द्वारा फेसबुक और अन्य माध्यमों द्वारा बार-बार प्रशिक्षण की बात को उठाए जाने की बात सरकार तक पहुँची और सरकार प्रशिक्षण के लिए आगे आई है। हम सरकार की इस बात के लिए उन्हें बहुत बधाई देते हैं। साथ ही अनुरोध करते हैं कि चाय बागानों की अन्य समस्याओं को भी सरकार इसी सदाह्रदयता के साथ देखें। यदि सरकार चुनाव के पूर्व न्यूनतम वेतन और जमीन का पट्टा भी दे तो चाय बागानों के हर मददाता तृणमूल कांग्रेस को ही अपना वोट देंगे।

दोस्तों कौन कहता है, आसमान में छेद नहीं होता है, एक पत्थर तो तबियत से उछालों दोस्तों। फिलहाल हम इतना जरूर कहेंगे, कि फेसबुक जनमत बनाने और जनमत का आदान-प्रदान करने का एक मजबूत माध्यम है। जय हो फेसबुक की।नेह इंदवार

 

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