कुड़ुख है एक अति प्राचीन भाषा

                                                                                    नेह अर्जुन इंदवार
गत वर्ष कुड़ुख भाषा को मान्यता देने के लिए पश्चिम बंगाल विधान सभा में विधेयक पारित करने के बाद इसी सप्ताह पश्चिम बंगाल सरकार ने इस विषय पर गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है। अब कुड़ुख झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश सहित पश्चिम बंगाल राज्यों में राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त भाषा का दर्जा हासिल कर लिया है।

दक्षिण भारत के तमिल के साथ इसके शब्दों और अर्थों की समानता के अनुसार भाषा वैज्ञानिकों ने कुड़ुख को द्रविड़ परिवार की भाषा माना है।  कुड़ुख भारत की एक अति प्राचीन भाषा है। ई-लंग्वेस्टिक नेट में प्रकाशित तमिल और कुड़ुख (शब्दों) भाषाओं की उत्पत्ति और समानता पर हुई शोध के अनुसार कुड़ुख और तमिल को दूर का रिश्तेदार Remotely related Language (RrL) बताया गया है। RrL या दूर का रिश्तेदार के पैमाने पर दो भाषाओं की रिश्तेदारी 4000 से लेकर 6000 वर्ष मानी गई है। इसका एक मतलब यह है कि 4000-6000 वर्ष पूर्व दोनों भाषाएँ एक ही जगह से अलग हुई थीं। उत्तर भारत में कुड़ुख के साथ गोंडी, कुई, माल्तो आदि भाषाएँ द्रविड़ परिवार की भाषाएँ हैं। वहीं दक्षिण भारत की आदिवासी समुदायों द्वारा बोली जाने वाली इलुरा, टोडा, कोटा, कोडावा, कुरूँबा आदि भी इस प्राचीन भाषा के सदस्य हैं। जबकि इस परिवार की भाषा सदस्य पाकिस्तान स्थिति बलुचिस्तान के ब्रहुई भी है। द्रविड़ भाषाओं के शब्द अफ्रीका के कैमरून देश के एक छोटे से आदिवासी समूह की भाषाओं में भी मिलती है। अमेरिका के हर्वर्ड विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञानी अलेक्स कोलियर के अनुसार एक समय दुनिया के अधिकांश समूह द्रविड़ भाषाओं का उपयोग करते थे। इस तरह द्रविड़ परिवार की भाषाएँ दुनिया के विशिष्ट भाषाएँ बन जाती है।

यूनेस्को की सूची में कुड़ुख भाषा को अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करने में कमजोर और खतरे में बताया गया है। Moseley, Christopher, ed. (2010). Atlas of the World’s Languages in Danger. Memory of Peoples (3rd ed.). Paris: UNESCO Publishing. ISBN 978-92-3-104096-2. Retrieved 2015-04-11.

भारत सरकार ने तमिल, तेलगु, मलयालम, उडिया और संस्कृत सहित कई प्राचीन भाषाओं को उनकी प्राचीनता के हिसाब से Classical Language के रूप में मान्यता दी है। इस हिसाब से कुड़ुख अपने आप ही भारत की एक प्राचीन भाषा के रूप में मान्यता पाने का हकदार हो जाता है। क्योंकि तमिल के साथ इसकी प्राचीनता स्वतः स्पष्ट है।

संस्कृत भाषा का विकास लगभग 4000 वर्ष पूर्व आर्यों के आगमन के बाद का माना जाता है। उल्लेखनीय है कि 4500 वर्ष पूर्व के राखीगढ़ी मानव कंकाल में आर्य जीन नहीं मिला। मतलब आर्यों का आगमन इसके बहुत बाद की है। आधुनिक भारतीय भाषाओं का इतिहास 1000-1500 वर्ष से अधिक पुराना नहीं समझता जाता है। इस दृष्टि से जंगलों और दूसरे समुदायों के अमिश्रित आदिवासी भाषाएँ कुड़ुख, मुण्डारी, संथाली, हो, खडिया आदि भाषाएँ अति प्राचीन काल से लगभग अपने मूल स्वरूप, अर्थ, ध्वनि आदि को अपने कलेवर में छिपाए करीबन 4000-6000 वर्ष तक अपनी मौलिकता को बरकरार रखने में कामयाब रहे। मतलब यदि भारत की अति प्राचीन भाषाओं के पद और अधिकार की बात की जाए तो भारत की आदिवासी समुदायों की भाषाएँ ही प्रथम संदर्भ में स्थान पाएँगे। सिंधु घाटी सभ्यता में बोली जाने वाले यही अति प्राचीन भाषाएँ रहीं होंगी। उल्लेखनीय है कि राखीगढ़ी में मिले कंकाल के डीएनए के लक्षण दक्षिण भारत के एक आदिवासी समुदाय के डीएनए से कुछ मेल खाते हैं। देखिए https://www.indiatoday.in/magazine/cover-story/story/20180910-rakhigarhi-dna-study-findings-indus-valley-civilisation-1327247-2018-08-31 इसका एक मतलब यह भी है कि दक्षिण भारत की द्रविड़ आदिवासी जातियों के साथ उत्तर भारत की द्रविड़ परिवार की भाषा बोलने वाले आदिवासियों के साथ भाषाई और डीएनए के संबंध जरूर विद्यामान होंगे। बस इस संबध में आदिवासियों को खुद ही पुरातात्विक, भाषाई और बायोलॉजिकल शोध खुद ही करने होंगे। भारत का अति प्राचीन इतिहास लेखन में आदिवासियों को अपनी भाषा और संस्कृति के माध्यम से आगे आना होगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत देश आज के आदिवासियों के पूर्वजों का देश है और भारत में आदिवासी भाषा और संस्कृति को संरक्षण रखने में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। आदिवासियों को सौ-डेढ़-सौ सालों से शिक्षा पाने का अवसर मिला है और शिक्षित होने के बाद वे अपनी भाषा-संस्कृति को संरक्षित रखने के लिए जागरूक हुए हैं। डा. रामदयाल मुण्डा ने अमेरिका में अच्छे खासे प्रोफेसर की नौकरी को छोड़कर देश लौटा और आदिवासी भाषाओँ के संरक्षण और विकास के लिए अपनी जिंदगी लगा दी। आज राँची विश्वविद्यालय सहित देश के अनेक विश्वविद्यालयों में आदिवासी भाषाओं की पढ़ाई की जा रही है और भाषाओं पर शोध किए जा रहे हैं। आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के लिए आज समाज जागरूक हो गया है। आदिवासी भाषाओं पर देश में शोध के फलस्वरूप  आज सैकड़ों पीएचडी धारी आदिवासी हैं जो भाषाओं और अन्य क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। समाज धीरे-धीरे विकास के पथ पर अग्रसर है।

पश्चिम बंगाल में कुड़ुख भाषा की मान्यता इसी विकास के पथ पर एक मील का पत्थर है। कल और भी आदिवासी भाषाओं को मान्यता मिलेगी, इसमें किसी तरह की शंका रखना बेवकूफी है।  कुड़ुख भाषा का किसी अन्य आदिवासी भाषा के साथ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। बल्कि कुड़खरों को गर्व होना चाहिए कि उनके पूरखों के द्वारा 6000 या शायद 10000 वर्ष से बचाए गए भाषा को विकसित करने और अपनी भाषा और संस्कृति के साथ जीवन जीने का उन्हें जो मौका मिला है, वैसा मौका भारत के आधुनिक भाषा बोलने वाले और किसी जाति और समुदाय को नहीं मिला है। क्योंकि सभी आधुनिक भाषाओं का विकास काल खण्ड आदिवासी भाषाओं से बहुत बाद का है और उनकी भाषाओं का अतिप्राचीनता कई सहस्त्रबादी पहले ही नष्ट हो गयी है। कई लोगों के मन में कुड़ुख के व्यवहार से पिछड़े हो जाने की शंका भी है, लेकिन यह शंका उनके भाषा और विकास संबंधी ज्ञान, जानकारी के अभाव के कारण है। व्यक्ति या समाज का सम्पूर्ण विकास असंख्य कारकों पर निर्भर होता है। आधुनिक तकनीकी की दुनिया में किसी भाषा का विकास उनके तकनीकी ज्ञान पर भी निर्भर करता है।

हिब्रु भाषा आज से 2500 वर्ष विलुप्त हो गया था। हिब्रु भाषा बोलने वालों ने 2500 वर्ष पहले विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों के थोपेड़े में आकर अपनी भाषा को छोड़ दिया था और हजारों वर्षों तक दूसरी भाषाओं को अपना लिया था। हिब्रु भाषा सिर्फ धार्मिक किताबों और धार्मिक क्रियाओं में ही बचा हुआ था। लेकिन 19वीं सदी में इसे पुनर्जीवित किया गया और आज यह इजरायल की बहुत विकसित राजभाषा है। और अब तक इस भाषा के उपयोगकर्ताओं को 12 नॉबेल पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।

पश्चिम बंगाल में कुड़ुख को सरकारी मान्यता मिलने के बाद कुड़ुख भाषियों को इसके विकास के साथ अपने सहोदर भाषाएँ मुण्डारी, खडिया, हो, सादरी आदि के विकास के लिए भी साथ मिल कर कार्य करना चाहिए। जो व्यक्ति भाषाओं के नाम पर अलगाव की राजनीति करके अपनी नेतागिरी चमकाना चाहते हैं, उन्हें जनता से अलग-थलग करने की जरूरत हैं। संकीर्ण विचारधारा वाले अर्धशिक्षित नेतागण अपनी सकारात्मक क्षमता से कोई मुकाम बनाने में नकाम रहते हैं इसलिए वे नकरात्मक भावनाओं के बल पर नेता बनने के प्रयास में होते हैं। एक मौलिक आदिवासी  भाषा का विरोध एक नासमझी और नादानी भरा  क्रिया है। यह नेतागिरी चमकाने और विशेष स्वार्थ को पूरा करने का प्रयास भी है। इसे कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना के रूप में देखा जा सकता है।

भाषाओं के विकास का कार्य अत्यंत गंभीर कार्य है। इसके लिए निरंतर लेखन, मनन, चिंतन और सकरात्मक लक्ष्य की जरूरत होती है। इसमें उच्च शिक्षा, गंभीर अध्ययन और व्यापक दृष्टिकोण की जरूरत होती है। जिन्हें नेतृत्व का उत्तरदायित्व मिले, वे अपने उत्तरदायित्व की गंभीरता को समझें और उसी के अनुसार व्यवहार करें और समाज को नेतृत्व दें।

सरकारी मान्यता प्राप्त होने के बाद आज डुवार्स तराई के गाँव-गाँव में कुड़ुख स्कूल खोलने की जरूरत है। उन स्कूलों को प्राप्त आर्थिक संसाधनों और ढाँचागत सुविधा को मुण्डारी, खड़िया, हो, सादरी के विकास के लिए भी साझा करने की जरूरत है। कुड़ुख स्कूल का instructions (पढ़ाने की भाषा) आवश्यकता अनुसार इलाके में बोली जाने वाली घरेलू भाषा को बनाया जाए। जहाँ बच्चे मुण्डारी जानते हैं उन्हें मुण्डारी के माध्यम से पढ़ाया जाए, इससे मुण्डारी भाषा का संरक्षण, विकास भी साथ साथ होगा। जहाँ बच्चे सादरी जानते हैं वहाँ सादरी के माध्यम से पढ़ाया जाए। इससे सादरी में भी पढ़ने लिखने की सुविधा विकसित होगी और साहित्य की रचनाओं का निर्माण होगा। जहाँ बच्चे खड़िया जानते हैं या हो जानते हैं वहाँ खड़िया या हो में पढ़ाई करायी जाए। मुख्य बात है कि आदिवासी भाषाओं का विकास किया जाए। इसके लिए कुड़ुख स्कूल को मिले संसाधन या ढाँचागत सुविधाओं का उपयोग किया जाए।

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