वादा तेरा वादा-एक जुमला दास्ताँ

नेह अ इंदवार 
12 फरवरी 2014 को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, आर्मी ग्राउण्ड मालबाजार आई थी और तब उन्हें आदिवासी विकास परिषद की ओर से उन्हें सिनगी दाई की उपाधी दी गई थी। उस दिन की ठण्ड को ममता बनर्जी ने तब गर्मी में बदल दिया था- जब उन्होंने घोषणा की थी *आदिवासी भूमि के गैर कानूनी कब्जा को सरकार सहन नहीं करेगी, और किसी भी तरह के भूमि हड़पू घटनाओं की खबर पाकर जिलाधिकारी तुरंत उस पर कार्रवाई करेंगे। 
*सरकार चाय बागानों के मजदूरों को घर के लिए आवास का पट्टा देगी,
*उनके बच्चों को अफसर बनाने के लिए सरकार डुवार्स और तराई में यूपीएससी और डब्ल्यूबीसीएस के लिए कोचिंग सेंटर स्थापित करेगी,
साथ ही उन्हें *डाक्टर इंजीनियर आदि कोर्स कराने के लिए डुवार्स और तराई में उन्हें विशेष ट्यूशन देने की व्यवस्था करेगी।
तब ममता बनर्जी ने घोषणा की थी कि बंदरहाट और बिर्नागुड़ी के पास के कई सौ एकड़ जमीन में *फिल्म स्टूडियो की स्थापना की जाएगी और वहाँ *फूड पार्क बनाए जाएँगे। इससे डुवार्स तराई के साथ चाय बागान के लोगों का भी विकास होगा।
*उन्होंने घोषणा की थी चाय बागानों को बंद करने वाले बागान मालिकों के विरूद्ध सरकार कदम उठाएगी।
उन्होंने उपस्थित ताली बजाते जनसमूह से वादा किया कि चाय बागानों के आसपास में ही आईटीआई, पोलिटेक्निक इंस्टिट्यूट्स तथा अन्य प्रशिक्षण संस्थान आदि बनाए जाएँगे और चाय बागानों की बेरोजगारी को जड़ से खत्म किया जाएगा। उन्होंने घोषणा की थी चाय बागानों और डुवार्स तराई के प्राकृतिक सुंदरता से विकसित टी टूरिज्म में चाय बागान मजदूरों को भी जोड़ा जाएगा।
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अब 12 फरवरी 2019 आने वाला है और तब इन घोषणाओं की आयु पाँच साल हो जाएगा। इन पाँच साल में कितने वादे और घोषणाएँ पूरी हुई वह देखने, समीक्षा करने की गंभीर विषय है।
कितनी  आदिवासी जमीन वापस हुई ? 
कितने मजदूरों को अपने घर का पट्टा मिला ?
कितने मजदूरो के बच्चों को क्वालिटी एज्युकेशन मिला ?
चाय मजदूरों के कितने बच्चों को अफसर बनने का अवसर मिला?
कितनी बेरोजगारी दूर हुई ?
यह सवाल अब भी मूँह बाँए डुवार्स तराई में खड़ी है और लोग सरकार से जानना चाहते हैं कि वास्तविक रूप में सरकार ने सचमुच क्या किया ?
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अाज 11 दिसंबर की ठंड का मौसम है।  सरकारी घोषणानुसार दिनांक 13 दिसंबर 2018 को न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति की 13 वीं बैठक सिलीगुड़ी में होगी।
यह एक मौजू सवाल है कि सरकार द्वारा गठित वेतन सलाहकार समिति अब तक एक दर्जन से अधिक बैठक के बाद भी वेतन पर किसी अंतिम निर्णय पर क्यों नहीं पहुँच पा रही है ? सरकार क्यों न्यूनतम वेतन समिति के कार्य को जल्दी नहीं सलटा रही है और न्यूनतम वेदन देने की जगह क्यों मजदूरों को अंतरवर्तीकालीन मजदूरी दिए जाने का निर्देश दिए जा रही है?
उल्लेखनीय है कि इससे पहले सरकार ने घोषणा की थी कि जुलाई 2018 तक न्यूनतम मजदूरी के मुद्दे को सुलझा लिया जाएगा। लेकिन जुलाई के बाद और छह महीने बीत जा रहे हैं अब तक कुछ क्यों नहीं हो रहा है, इसका कोई जवाब सरकार के पास नहीं है।
अब तो बागान मालिकों के एक गुट ने इस अंतरवर्तीकालीन मजदूरी बढ़ोतरी के विरूद्ध हाईकोर्ट के सिंगल बेंच से एक निर्णय भी हासिल कर लिया है।
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कोर्ट ने भी माना है कि अंतरवर्तीकालीन बढ़ोतरी संबंधी श्रम मंत्रालय का आदेश, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 के विनियम 5 के अनुसार नहीं किया गया था। विनियम 5 में इस तरह के बढ़ोतरी के लिए विचार-विमर्श के लिए प्रावधान है। अब सरकार सिंगल बेंच के निर्णय के विरूद्ध में या डबल बेंच में जाएगी या सर्वोच्च न्यायालय में जाएगी।
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लेकिन क्या यह सरकार के लिए उचित होगा (?) कि वह न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति को अपनी रिपोर्ट जमा करने के लिए नहीं कहने की जगह वह कोर्ट में जाएगी और सलाहकार समिति के अपने कार्य से हाथ झाड़ लेगी? हमें याद रखना होगा कि सलाहकार समिति में मजदूर, बागान मालिक के साथ सरकार के नुमाईदें भी मौजूद हैं और उनकी जिम्मेदारी है कि वे कानून के अनुसार सलाहकार समिति के कार्य को जल्द सुलटाएं और मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत नया वेतन की घोषणा करें।
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उक्त अधिनियम के विनिमय (रूल्स) 5 के तहत सरकार द्वारा वेतन बढ़ोतरी पर सलाह मशवरा की प्रक्रिया के माध्यम से आपसी सहमति प्राप्त करना आवश्यक है, चाहे एक मुश्त वेतन बढ़ोतरी के लिए या फिर अंतरवर्तीकालीन खुदरा बढ़ोतरी के लिए।
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क्या सरकार के लिए यह उचित नहीं होगा कि वह लगातार लम्बा खींचते न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति के काम को तुरंत खत्म करके कानूनी प्रक्रिया को पूरा कराए और न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत तुरंत न्यूनतम वेतन और डीए की घोषणा कर दे। फ्रिंज बेनेफिट तो पहले ही मजदूरों को सही ढंग से नहीं मिल रहे हैं। उसे नकद रूपये में देने के लिए सरकार को और क्या कसरत करनी है? अब और किसी सरकारी बहाने बाजी की कोई गुंजाईश भी नहीं बची है। यदि सरकार लगातार बहानेबाजी करेगी तो उसे चुनाव में बीजेपी से हार के लिए तैयार भी रहना होगा।
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इतना तो तय है कि तृणमूल सरकार की प्राथमिकता सूची में चाय मजदूर और उनकी समस्या नहीं है। वे चाय मजदूरों की परवाह भी नहीं करती है। वह मजदूर नेताओं को पहले ही अपने पॉकेट के हवाले कर चुकी है और उनमें इतना दम नहीं कि वे चाय बागान मजदूरों के लिए कोई मुकम्मल आवाज निकालें।
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चाय बागान के मजदूर नेतागणों को मजदूर संघ और राजनैतिक पार्टी में अंतर करना भी नहीं आता है। वे मजदूर संघ और राजनैतिक पार्टी को एक ही थैली में रखते हैं और वे मजदूर संघों को राजनैतिक पार्टियों के पिछलग्गू बना कर रख छोड़े हैं। इन बागानिया नेताओं की वफादारी मजदूर संघ के प्रति नहीं होकर राजनैतिक पार्टी के प्रति है।
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डुवार्स तराई के किसी भी राजनैतिक पार्टी के दिलों दिमाग में चाय मजदूरों की समस्या नहीं है। तृणमूल पार्टी की सदिच्छा होती तो अब तक मजदूरों को आवास पट्टा मिल जाता। आवास पट्टा मिलने में किसी भी तरह की कोई कानूनी अड़चन नहीं है। बजट सत्र् में वित्त मंत्री ने चाय बागान को कृषि उद्योग क्षेत्र कहा है और उसे कृषि आयकर में छूट देने की घोषणा की थी। पश्चिम बंगाल भूमि सुधार कानून में उद्य़ोग क्षेत्रों के कामगार को आवास पट्टा के लिए भूमि आबंटन को मना किया गया है, कृषि क्षेत्र के गृहहीन मजदूरों के लिए नहीं।
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चाय मजदूर संघ यदि चेतनाशील होते तो वे इस मामले को राज्य सरकार के माध्यम से सुलझा लेते। लेकिन अधिकतर मजदूर नेता शहरी और गैर बागानिया हैं, उन्हें मजदूरों के आवासहीन स्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता है। लालपार्टी (सीपीएम नीत पार्टियाँ) और सादापार्टी (कांग्रेस) या गेरूआ पार्टी (भाजपा) को भी सिर्फ मजदूरों के वोट और चंदे से मतलब है। फिलहाल गेरूआ पार्टी रथ यात्रा निकाल कर लोगों को बेवकूफ बनाने के प्रयास में रत है वहीं कांग्रेस के नेतागण कब्र से निकाल कर पार्टी को जिंदा करके चुनाव जीतने के फेरे में हैं। इन पार्टियों को मजदूरों के किसी भी क्लासिक समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है। ये पार्टी वाले इतने स्वार्थी हैं कि ये मजदूरों को अलग-अलग बाँट कर उन्हें आपस में लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं।
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यदि ये पार्टियाँ और इनके नेताओं के दिलों में मजदूरों के लिए दर्द रहता तो ये पार्टियाँ हाईकोर्ट में बागान मालिकों या सरकार द्वारा दायर किए जाऩे वाले मामले में मजदूरों को भी एक पार्टी बनाने के लिए हाईकोर्ट में कैविएट दायर करके मजदूरों की भी बात सुनने के लिए कोर्ट से अनुरोध करते।
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चूँकि मजदूरी का मामला सीधे-सीधे मजदूरों के हित से जुड़ा हुआ है न कि सरकार और बागान मालिकों के हित से। लेकिन बागान मजदूरों को ठगने के लिए सरकार, पार्टी और मजदूर संघ कभी कोई कोर कसर नहीं छोड़ते।
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लोकसभा का चुनाव नजदीक आ रहा है और पार्टियों की लड़ाई तेज होती जा रही है। इन लड़ाईयों में ये पार्टियाँ मजदूरों को इंधन के रूप में प्रयोग करेंगी और मजदूरों को पैसे देकर अपने रैली और सभा आदि के लिए ले जाएगी और झूठे बातों से मजदूरों के दिलों को जीतने की कोशिश करेंगे। लेकिन मजदूरों को अपने हित के लिए काम करने वालों को वोट देने की बातें करनी चाहिए न कि झूठे आशा दिलाने वाली पार्टियों वालों को। लेकिन क्या मजदूरों के पास अपना कोई सच्चा और धाकड़ नेता मौजूद है ?

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