निठल्ला नेह चिंतन

                                               नेह अर्जुन इंदवार

ईश्वर  ने पृथ्वी समेत पूरे ब्रह्माण्ड को बनाया (मनुष्‍य पूरे विश्वास से हजारों वर्षों से जम कर ऐसा सोचता रहा है) इस पर जम कर मोटी मोटी किताबें भी लिखी गई है।

मनुष्य अजब-गजब कमाल का प्राणी है। वह ब्रह्मांड के खरबों गैलेक्सी और एक-एक गैलेक्सी में समाए खरबों तारे और उससे भी अधिक ग्रहों, उपग्रहों और क्षुद्रग्रहों को बनाने वाला को पूरी तरह जानने समझने का दावा करता है। वह ईश्वर, परमेश्वर को भूमिहीन, आवासहीन, सहज में खुश होने वाला और आदमी के कुकर्मों को कुछ पैसे देकर और क्रंदन भरा प्रार्थना सुनकर क्षमा करने वाला रिश्वतखोर भी समझता है।

आदमी के पास कल्पना में विचरण करने वाला एक शानदार खोपड़ी है। उसकी परिकल्पना आकाश में लगातार उड़ान भरते रहती है। वह पल भर में इधर से उधर उड़ते रहती है। उसकी कल्पना ने ठान लिया कि परमेश्वर उसकी तरह ही दोपाया वाला है। इसलिए  वह ईश्वर के मूर्ति को अपने कदकाठी के अनुसार बनाता है उसके चेहरे को आदमी का बना कर फिल्मी हीरो हीरोइनों की तरह तीखे नक्श नैन वाला भी बनाता है। उसका रंग गोरा या काला या सांवला बना कर अपने विश्वास और कल्पना को थपथपाता है।

उसे लगता है कि ईश्वर तो उसके जैसे ही होगा। वही दो हाथ, दो पैर और दो आँखे वाला। आदमी अपने रूप को ही संसार का सबसे सुंदरतम और श्रेष्ठतम रूप और वजूद का मानता है। इसीलिए वह ईश्वर के मूर्ति को अपने कदकाठी के अनुसार बनाता है उसके चेहरे को आदमी का बना कर फिल्मी हीरो हीरोइनों की तरह तीखे नक्श नैन वाला भी बनाता है। उसका रंग गोरा या काला या सांवला बना कर अपने विश्वास और कल्पना को थपथपाता है।

चुटकुलानुमा सोच की बानगी देखिए कि आदमी कहता है ब्रह्मांड में सिर्फ एक ही परम शक्तिशाली, परम सृजनशील परमेश्वर है, बाकी सब उसके अधीन के प्रजानुमा गुलाम प्राणी हैं। वह उस परम शक्तिशाली, परम सृजनशील आदमी (?) को पूरी तरह जानने, पहचानने का दावा भी करता है। मनुष्य को अपने घर में रह रहे चिंटियों या सिर के बाल में घुम रहे जूँए तक के बारे कुछ नहीं पता रहता है, लेकिन कई खरब प्रकाश वर्ष की दूरी में किसी नये गैलेक्सी के निर्माण में व्यस्त ईश्वर के बारे सब कुछ जानने का अहंकार रहता है। 

चिड़ियाँ, तितलियाँ और शेरों को आदमी के इस विश्वास और कल्पना के बारे कुछ इल्म है या नहीं, अभी तक पता नहीं चला है। या उनके भी ईश्वर चिड़ियों, तितलियों और शेरों की तरह ही है। पता लगाना बहुत मुश्किल चिड़ियाँ और तितलियाँ मनुष्य को देख कर दूर भागती हैं और मनुष्य शेर को देख कर। वार्तालाप करने की गुँजाईश ही नहीं है। 

हँसते हँसते पेट में बल पड़ जाते हैं जब आदमी कहता है कि उसे उस परम सृजनशील के बारे सभी कुछ पता है मसलन उसने कब जन्म लिया, कैसे जन्म लिया, बचपन में क्या करता था, भरी जवानी में क्या-क्या गुल खिलाया, बुढ़ापे में क्या-क्या मजेदार क्रिया करम किया ?? आदमी तो यह भी कहता है कि परमेश्वर स्वर्ग में क्या करता है, कैसे उठता है बैठता है, दाएँ -बाएँ किनके साथ रहता है ?? क्या खाता है ? क्या पहनता है ?  रेश्मी या कृत्रिम रेशे से बुने गए किसी ब्रांडेड कंपनी के कपड़े पहनता है या  बिना कपड़े के ………। आदमी ईश्वर के बारे भूतकाल की ही बातें कहता है, या फिर सुदूर भविष्य की। वर्तमान काल में ईश्वर की बातें करने में मनुष्य को शर्म लगता है। 

आदमी का सोच कितना बालसुलभ है, बुद्धिमत्ता का स्तर क्या है ?? कल्पना की उड़ान तो खैर …..।

आदमी नामक क्षणभंगुर प्राणी अजर अमर ब्रह्माण्ड के निर्माता को दिल और दिमाग से पूर्ण भूमिहीन, आवासहीन समझता है और अपने प्यार उढ़ेलते हुए परमेश्वर के लिए खूब धन व्यय करके अपने पड़ोस में सुंदर इमारत का निर्माण करता है। ईट सीमेंट और पत्थरों से बने इमारतों को खूब सजाता है और उसका मेकअप करता है। वह बहुमूल्य पत्थर और कपड़ों से इमारत को सजा कर उस इमारत को धनवान बनाता है और उस परमेश्वर को वहाँ विराजमान करता है। परमेश्वर को सुनाने के लिए वह बकायदा बड़े-बड़े माईक लगाता है और सुबह शाम कानफोड़ू आवाज़ में ईश्वर को जगाता है। गाना सुनाता है, उसे नाच दिखाता है।  आदमी अपने इस कार्य को परम बुद्धिमानी का काम कहता है। अनेक लोगों का पेट यही काम करने  भरता है। अनेक लोगों को ऐसे काम करने पर बिना परिश्रम खाने-पीने की कोई कमी नहीं रहती है। 

उसे खुश करने के लिए आदमी फल, फूल पकवान भी रखता है। अधिक खुश करने, भक्ति दिखाने के लिए डांस भी करता है। कई तो उनकी प्रसन्नता और  स्वस्थ होने या बीमार होने की बातें भी जानते हैं और ब्रह्मांड के निर्माता को इंजेक्शन देने, खाना-पीना देने का जतन भी करते हैं।

सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने का दावा करने वाला आदमी ईश्वर का कई-कई पेट नाम या उपनाम भी रखता है। ब्राह्मंड के स्वामी, लेकिन बेघर-बार ईश्वर के लिए ठाठ -बाट का घर बना कर ईश्वर पर एहसान करने का घमंड भी करता है। अहा ! ये पैसे वाला दयावान आदमी न होता तो ईश्वर को किसी सड़क के किनारे खुले आसमान तले बेनाम और बेघर होकर रात (दिन) बिताना पड़ता। बेचारे, सड़क के प्राणी को कोई पूछता है भला!!

सबसे दिलचस्‍प बात तो यह है कि वह ईश्‍वर को इन घरों में बंद करके बड़े बड़े ताला भी लगाता है और सुरक्षा गार्ड भी तैनात करता है। क्या ईश्वर का बंदीगृह से निकल कर कहीं भाग जाने की आशंका रहती है ? भगोड़ा ईश्वर कहीं सचमुच भाग ही न जाए ?

आदमी की भक्ति इतनी कि इन ईमारतों में आने पर वह अपनी जेब की कुल मुद्रा (मुद्रा बोले तो रूपये पैसे) में से “अत्यंत थोड़े” से रूपयों पैसों को ईश्वर को देता है। आदमी रूपया पैसा न दे तो बेचारा ईश्वर का क्या हाल होगा ?? जरूर गरीब हो जाएगा !!

गरीबी में दिन गुजारना किसे कहते है !!!! इसका दूसरा मतलब है सब चंदे या दान दे दे कर उन्हें धनवान बनाते हैं। इन पैसों से परमेश्वर जरूर किसी गैलेक्सी में खाने पीने का सामान खरीदते होंगे ? 

ये ईश्वर का घर भी अलग-अलग होता है। औने-पौने छोटे-मोटे सड़क किनारे के पर्मेश्वरालय (परमेश्वर का घर) का परम ईश्वर दुबला पतला, कमजोर और मरियल सा होता है, इसलिए आदमी इन सड़क छाप पर्मेश्वरालय में जाने से कतराते हैं। वे तो दूर देश के बड़े और शानदार प्रसिद्ध ईश्वरालय में जाते हैं या किसी कठिन पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने के बाद पहाड़ के उस पार रहने वाले ईश्वर के पास जाना पसंद करते हैं। शायद वहाँ का ईश्वर ज्यादा मोटा ताजा शक्तिशाली होता है। वहाँ की भीड़ बताता है कि वहाँ का ईश्वर कितना बलशाली है। तीर्थ यात्रा  में मोटी रकम खर्च करने पर ईश्वर बहुत खुश होता है। स्वर्ग में इससे मृत्यू पूर्व ही आरक्षण मिल जाता है।

आदमी कहता है पूरे ब्राह्मंड में सिर्फ और सिर्फ एक ही ईश्वर है। लेकिन क्यों कुछ ईश्वरालय मरियल सा होता है और कुछ बलशाली ?? कुछ का हाल खास्ताहाल तो कुछ 27 मंजिली जगमगाता अंटिलिया जैसा ??

कुछ लोगों को यह चक्करघिन्नी लगता है।

चक्करघिन्नी की बात को कौन समझाए !!!

संसार का सर्वश्रेष्ठ सृष्टि ”बुद्धिमान” प्राणी ”मनुष्‍य ।

आदमी का काम क्या है कमजोर ईश्वर का रखवाली करना  ?
बेघर-बार ईश्वर के लिए मकान बनाने वाला ?

ईश्वर क्या-क्या करता है ? कैसे उठता है, बैठता है, कैसे खुश होता है, कैसे नाराज होता है, के बारे विस्तार पूर्वक खबर रखने वाला और उस पर किताबें लिखने वाला। बड़ी बात उन किताबों को असली और सच्चा ईश्वरीय घोषित करने वाला ? उन सच्चाईयों को सबको बताने वाला ? प्रचार-प्रसार करने वाला ? ईश्वर के नाम पर चंदा इकट्ठा करने वाला ? ईश्वर के नाम पर तलवार चलाने वाला ?

मतलब परमेश्वर महान नहीं  बल्कि उसका मालिक आदमी है महान।

खुरदुरा चिंतन चल रहा है।
उधर कुछ बच्चे पापा-मम्मी  का खेल बहुत गंभीरता से खेल रहे हैं। लकड़ी और पत्थर के बच्चों को नहला रहे हैं, उन्हें भोजन करा रहे हैं और उन्हें प्यार करते हुए लोरी सुनाते हुए सुला रहे हैं।

इधर आँखें मिंचे सोच चिंतन में व्यस्त हैं नेह।

Please follow and like us:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *