The reason and goals of this course act as essential components of pupil composing

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Reason for the program work

The primary concern for the program work is its objective, which provides the program work a meaning and it is initially meant to influence this content.

Consequently, it is vital to manage to formulate a target properly. Accurate setting goals – this will be a great part of composing the information for the course work.

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Learn Who is speaking about how exactly Asian Women Age and exactly why you should be Concerned

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A Startling Fact about Write The University Analysis Paper Uncovered

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निठल्ला नेह चिंतन

                                               नेह अर्जुन इंदवार

ईश्वर  ने पृथ्वी समेत पूरे ब्रह्माण्ड को बनाया (मनुष्‍य पूरे विश्वास से हजारों वर्षों से जम कर ऐसा सोचता रहा है) इस पर जम कर मोटी मोटी किताबें भी लिखी गई है।

मनुष्य अजब-गजब कमाल का प्राणी है। वह ब्रह्मांड के खरबों गैलेक्सी और एक-एक गैलेक्सी में समाए खरबों तारे और उससे भी अधिक ग्रहों, उपग्रहों और क्षुद्रग्रहों को बनाने वाला को पूरी तरह जानने समझने का दावा करता है। वह ईश्वर, परमेश्वर को भूमिहीन, आवासहीन, सहज में खुश होने वाला और आदमी के कुकर्मों को कुछ पैसे देकर और क्रंदन भरा प्रार्थना सुनकर क्षमा करने वाला रिश्वतखोर भी समझता है।

आदमी के पास कल्पना में विचरण करने वाला एक शानदार खोपड़ी है। उसकी परिकल्पना आकाश में लगातार उड़ान भरते रहती है। वह पल भर में इधर से उधर उड़ते रहती है। उसकी कल्पना ने ठान लिया कि परमेश्वर उसकी तरह ही दोपाया वाला है। इसलिए  वह ईश्वर के मूर्ति को अपने कदकाठी के अनुसार बनाता है उसके चेहरे को आदमी का बना कर फिल्मी हीरो हीरोइनों की तरह तीखे नक्श नैन वाला भी बनाता है। उसका रंग गोरा या काला या सांवला बना कर अपने विश्वास और कल्पना को थपथपाता है।

उसे लगता है कि ईश्वर तो उसके जैसे ही होगा। वही दो हाथ, दो पैर और दो आँखे वाला। आदमी अपने रूप को ही संसार का सबसे सुंदरतम और श्रेष्ठतम रूप और वजूद का मानता है। इसीलिए वह ईश्वर के मूर्ति को अपने कदकाठी के अनुसार बनाता है उसके चेहरे को आदमी का बना कर फिल्मी हीरो हीरोइनों की तरह तीखे नक्श नैन वाला भी बनाता है। उसका रंग गोरा या काला या सांवला बना कर अपने विश्वास और कल्पना को थपथपाता है।

चुटकुलानुमा सोच की बानगी देखिए कि आदमी कहता है ब्रह्मांड में सिर्फ एक ही परम शक्तिशाली, परम सृजनशील परमेश्वर है, बाकी सब उसके अधीन के प्रजानुमा गुलाम प्राणी हैं। वह उस परम शक्तिशाली, परम सृजनशील आदमी (?) को पूरी तरह जानने, पहचानने का दावा भी करता है। मनुष्य को अपने घर में रह रहे चिंटियों या सिर के बाल में घुम रहे जूँए तक के बारे कुछ नहीं पता रहता है, लेकिन कई खरब प्रकाश वर्ष की दूरी में किसी नये गैलेक्सी के निर्माण में व्यस्त ईश्वर के बारे सब कुछ जानने का अहंकार रहता है। 

चिड़ियाँ, तितलियाँ और शेरों को आदमी के इस विश्वास और कल्पना के बारे कुछ इल्म है या नहीं, अभी तक पता नहीं चला है। या उनके भी ईश्वर चिड़ियों, तितलियों और शेरों की तरह ही है। पता लगाना बहुत मुश्किल चिड़ियाँ और तितलियाँ मनुष्य को देख कर दूर भागती हैं और मनुष्य शेर को देख कर। वार्तालाप करने की गुँजाईश ही नहीं है। 

हँसते हँसते पेट में बल पड़ जाते हैं जब आदमी कहता है कि उसे उस परम सृजनशील के बारे सभी कुछ पता है मसलन उसने कब जन्म लिया, कैसे जन्म लिया, बचपन में क्या करता था, भरी जवानी में क्या-क्या गुल खिलाया, बुढ़ापे में क्या-क्या मजेदार क्रिया करम किया ?? आदमी तो यह भी कहता है कि परमेश्वर स्वर्ग में क्या करता है, कैसे उठता है बैठता है, दाएँ -बाएँ किनके साथ रहता है ?? क्या खाता है ? क्या पहनता है ?  रेश्मी या कृत्रिम रेशे से बुने गए किसी ब्रांडेड कंपनी के कपड़े पहनता है या  बिना कपड़े के ………। आदमी ईश्वर के बारे भूतकाल की ही बातें कहता है, या फिर सुदूर भविष्य की। वर्तमान काल में ईश्वर की बातें करने में मनुष्य को शर्म लगता है। 

आदमी का सोच कितना बालसुलभ है, बुद्धिमत्ता का स्तर क्या है ?? कल्पना की उड़ान तो खैर …..।

आदमी नामक क्षणभंगुर प्राणी अजर अमर ब्रह्माण्ड के निर्माता को दिल और दिमाग से पूर्ण भूमिहीन, आवासहीन समझता है और अपने प्यार उढ़ेलते हुए परमेश्वर के लिए खूब धन व्यय करके अपने पड़ोस में सुंदर इमारत का निर्माण करता है। ईट सीमेंट और पत्थरों से बने इमारतों को खूब सजाता है और उसका मेकअप करता है। वह बहुमूल्य पत्थर और कपड़ों से इमारत को सजा कर उस इमारत को धनवान बनाता है और उस परमेश्वर को वहाँ विराजमान करता है। परमेश्वर को सुनाने के लिए वह बकायदा बड़े-बड़े माईक लगाता है और सुबह शाम कानफोड़ू आवाज़ में ईश्वर को जगाता है। गाना सुनाता है, उसे नाच दिखाता है।  आदमी अपने इस कार्य को परम बुद्धिमानी का काम कहता है। अनेक लोगों का पेट यही काम करने  भरता है। अनेक लोगों को ऐसे काम करने पर बिना परिश्रम खाने-पीने की कोई कमी नहीं रहती है। 

उसे खुश करने के लिए आदमी फल, फूल पकवान भी रखता है। अधिक खुश करने, भक्ति दिखाने के लिए डांस भी करता है। कई तो उनकी प्रसन्नता और  स्वस्थ होने या बीमार होने की बातें भी जानते हैं और ब्रह्मांड के निर्माता को इंजेक्शन देने, खाना-पीना देने का जतन भी करते हैं।

सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने का दावा करने वाला आदमी ईश्वर का कई-कई पेट नाम या उपनाम भी रखता है। ब्राह्मंड के स्वामी, लेकिन बेघर-बार ईश्वर के लिए ठाठ -बाट का घर बना कर ईश्वर पर एहसान करने का घमंड भी करता है। अहा ! ये पैसे वाला दयावान आदमी न होता तो ईश्वर को किसी सड़क के किनारे खुले आसमान तले बेनाम और बेघर होकर रात (दिन) बिताना पड़ता। बेचारे, सड़क के प्राणी को कोई पूछता है भला!!

सबसे दिलचस्‍प बात तो यह है कि वह ईश्‍वर को इन घरों में बंद करके बड़े बड़े ताला भी लगाता है और सुरक्षा गार्ड भी तैनात करता है। क्या ईश्वर का बंदीगृह से निकल कर कहीं भाग जाने की आशंका रहती है ? भगोड़ा ईश्वर कहीं सचमुच भाग ही न जाए ?

आदमी की भक्ति इतनी कि इन ईमारतों में आने पर वह अपनी जेब की कुल मुद्रा (मुद्रा बोले तो रूपये पैसे) में से “अत्यंत थोड़े” से रूपयों पैसों को ईश्वर को देता है। आदमी रूपया पैसा न दे तो बेचारा ईश्वर का क्या हाल होगा ?? जरूर गरीब हो जाएगा !!

गरीबी में दिन गुजारना किसे कहते है !!!! इसका दूसरा मतलब है सब चंदे या दान दे दे कर उन्हें धनवान बनाते हैं। इन पैसों से परमेश्वर जरूर किसी गैलेक्सी में खाने पीने का सामान खरीदते होंगे ? 

ये ईश्वर का घर भी अलग-अलग होता है। औने-पौने छोटे-मोटे सड़क किनारे के पर्मेश्वरालय (परमेश्वर का घर) का परम ईश्वर दुबला पतला, कमजोर और मरियल सा होता है, इसलिए आदमी इन सड़क छाप पर्मेश्वरालय में जाने से कतराते हैं। वे तो दूर देश के बड़े और शानदार प्रसिद्ध ईश्वरालय में जाते हैं या किसी कठिन पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने के बाद पहाड़ के उस पार रहने वाले ईश्वर के पास जाना पसंद करते हैं। शायद वहाँ का ईश्वर ज्यादा मोटा ताजा शक्तिशाली होता है। वहाँ की भीड़ बताता है कि वहाँ का ईश्वर कितना बलशाली है। तीर्थ यात्रा  में मोटी रकम खर्च करने पर ईश्वर बहुत खुश होता है। स्वर्ग में इससे मृत्यू पूर्व ही आरक्षण मिल जाता है।

आदमी कहता है पूरे ब्राह्मंड में सिर्फ और सिर्फ एक ही ईश्वर है। लेकिन क्यों कुछ ईश्वरालय मरियल सा होता है और कुछ बलशाली ?? कुछ का हाल खास्ताहाल तो कुछ 27 मंजिली जगमगाता अंटिलिया जैसा ??

कुछ लोगों को यह चक्करघिन्नी लगता है।

चक्करघिन्नी की बात को कौन समझाए !!!

संसार का सर्वश्रेष्ठ सृष्टि ”बुद्धिमान” प्राणी ”मनुष्‍य ।

आदमी का काम क्या है कमजोर ईश्वर का रखवाली करना  ?
बेघर-बार ईश्वर के लिए मकान बनाने वाला ?

ईश्वर क्या-क्या करता है ? कैसे उठता है, बैठता है, कैसे खुश होता है, कैसे नाराज होता है, के बारे विस्तार पूर्वक खबर रखने वाला और उस पर किताबें लिखने वाला। बड़ी बात उन किताबों को असली और सच्चा ईश्वरीय घोषित करने वाला ? उन सच्चाईयों को सबको बताने वाला ? प्रचार-प्रसार करने वाला ? ईश्वर के नाम पर चंदा इकट्ठा करने वाला ? ईश्वर के नाम पर तलवार चलाने वाला ?

मतलब परमेश्वर महान नहीं  बल्कि उसका मालिक आदमी है महान।

खुरदुरा चिंतन चल रहा है।
उधर कुछ बच्चे पापा-मम्मी  का खेल बहुत गंभीरता से खेल रहे हैं। लकड़ी और पत्थर के बच्चों को नहला रहे हैं, उन्हें भोजन करा रहे हैं और उन्हें प्यार करते हुए लोरी सुनाते हुए सुला रहे हैं।

इधर आँखें मिंचे सोच चिंतन में व्यस्त हैं नेह।

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वादा तेरा वादा-एक जुमला दास्ताँ

नेह अ इंदवार 
12 फरवरी 2014 को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, आर्मी ग्राउण्ड मालबाजार आई थी और तब उन्हें आदिवासी विकास परिषद की ओर से उन्हें सिनगी दाई की उपाधी दी गई थी। उस दिन की ठण्ड को ममता बनर्जी ने तब गर्मी में बदल दिया था- जब उन्होंने घोषणा की थी *आदिवासी भूमि के गैर कानूनी कब्जा को सरकार सहन नहीं करेगी, और किसी भी तरह के भूमि हड़पू घटनाओं की खबर पाकर जिलाधिकारी तुरंत उस पर कार्रवाई करेंगे। 
*सरकार चाय बागानों के मजदूरों को घर के लिए आवास का पट्टा देगी,
*उनके बच्चों को अफसर बनाने के लिए सरकार डुवार्स और तराई में यूपीएससी और डब्ल्यूबीसीएस के लिए कोचिंग सेंटर स्थापित करेगी,
साथ ही उन्हें *डाक्टर इंजीनियर आदि कोर्स कराने के लिए डुवार्स और तराई में उन्हें विशेष ट्यूशन देने की व्यवस्था करेगी।
तब ममता बनर्जी ने घोषणा की थी कि बंदरहाट और बिर्नागुड़ी के पास के कई सौ एकड़ जमीन में *फिल्म स्टूडियो की स्थापना की जाएगी और वहाँ *फूड पार्क बनाए जाएँगे। इससे डुवार्स तराई के साथ चाय बागान के लोगों का भी विकास होगा।
*उन्होंने घोषणा की थी चाय बागानों को बंद करने वाले बागान मालिकों के विरूद्ध सरकार कदम उठाएगी।
उन्होंने उपस्थित ताली बजाते जनसमूह से वादा किया कि चाय बागानों के आसपास में ही आईटीआई, पोलिटेक्निक इंस्टिट्यूट्स तथा अन्य प्रशिक्षण संस्थान आदि बनाए जाएँगे और चाय बागानों की बेरोजगारी को जड़ से खत्म किया जाएगा। उन्होंने घोषणा की थी चाय बागानों और डुवार्स तराई के प्राकृतिक सुंदरता से विकसित टी टूरिज्म में चाय बागान मजदूरों को भी जोड़ा जाएगा।
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अब 12 फरवरी 2019 आने वाला है और तब इन घोषणाओं की आयु पाँच साल हो जाएगा। इन पाँच साल में कितने वादे और घोषणाएँ पूरी हुई वह देखने, समीक्षा करने की गंभीर विषय है।
कितनी  आदिवासी जमीन वापस हुई ? 
कितने मजदूरों को अपने घर का पट्टा मिला ?
कितने मजदूरो के बच्चों को क्वालिटी एज्युकेशन मिला ?
चाय मजदूरों के कितने बच्चों को अफसर बनने का अवसर मिला?
कितनी बेरोजगारी दूर हुई ?
यह सवाल अब भी मूँह बाँए डुवार्स तराई में खड़ी है और लोग सरकार से जानना चाहते हैं कि वास्तविक रूप में सरकार ने सचमुच क्या किया ?
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अाज 11 दिसंबर की ठंड का मौसम है।  सरकारी घोषणानुसार दिनांक 13 दिसंबर 2018 को न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति की 13 वीं बैठक सिलीगुड़ी में होगी।
यह एक मौजू सवाल है कि सरकार द्वारा गठित वेतन सलाहकार समिति अब तक एक दर्जन से अधिक बैठक के बाद भी वेतन पर किसी अंतिम निर्णय पर क्यों नहीं पहुँच पा रही है ? सरकार क्यों न्यूनतम वेतन समिति के कार्य को जल्दी नहीं सलटा रही है और न्यूनतम वेदन देने की जगह क्यों मजदूरों को अंतरवर्तीकालीन मजदूरी दिए जाने का निर्देश दिए जा रही है?
उल्लेखनीय है कि इससे पहले सरकार ने घोषणा की थी कि जुलाई 2018 तक न्यूनतम मजदूरी के मुद्दे को सुलझा लिया जाएगा। लेकिन जुलाई के बाद और छह महीने बीत जा रहे हैं अब तक कुछ क्यों नहीं हो रहा है, इसका कोई जवाब सरकार के पास नहीं है।
अब तो बागान मालिकों के एक गुट ने इस अंतरवर्तीकालीन मजदूरी बढ़ोतरी के विरूद्ध हाईकोर्ट के सिंगल बेंच से एक निर्णय भी हासिल कर लिया है।
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कोर्ट ने भी माना है कि अंतरवर्तीकालीन बढ़ोतरी संबंधी श्रम मंत्रालय का आदेश, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 के विनियम 5 के अनुसार नहीं किया गया था। विनियम 5 में इस तरह के बढ़ोतरी के लिए विचार-विमर्श के लिए प्रावधान है। अब सरकार सिंगल बेंच के निर्णय के विरूद्ध में या डबल बेंच में जाएगी या सर्वोच्च न्यायालय में जाएगी।
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लेकिन क्या यह सरकार के लिए उचित होगा (?) कि वह न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति को अपनी रिपोर्ट जमा करने के लिए नहीं कहने की जगह वह कोर्ट में जाएगी और सलाहकार समिति के अपने कार्य से हाथ झाड़ लेगी? हमें याद रखना होगा कि सलाहकार समिति में मजदूर, बागान मालिक के साथ सरकार के नुमाईदें भी मौजूद हैं और उनकी जिम्मेदारी है कि वे कानून के अनुसार सलाहकार समिति के कार्य को जल्द सुलटाएं और मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत नया वेतन की घोषणा करें।
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उक्त अधिनियम के विनिमय (रूल्स) 5 के तहत सरकार द्वारा वेतन बढ़ोतरी पर सलाह मशवरा की प्रक्रिया के माध्यम से आपसी सहमति प्राप्त करना आवश्यक है, चाहे एक मुश्त वेतन बढ़ोतरी के लिए या फिर अंतरवर्तीकालीन खुदरा बढ़ोतरी के लिए।
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क्या सरकार के लिए यह उचित नहीं होगा कि वह लगातार लम्बा खींचते न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति के काम को तुरंत खत्म करके कानूनी प्रक्रिया को पूरा कराए और न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत तुरंत न्यूनतम वेतन और डीए की घोषणा कर दे। फ्रिंज बेनेफिट तो पहले ही मजदूरों को सही ढंग से नहीं मिल रहे हैं। उसे नकद रूपये में देने के लिए सरकार को और क्या कसरत करनी है? अब और किसी सरकारी बहाने बाजी की कोई गुंजाईश भी नहीं बची है। यदि सरकार लगातार बहानेबाजी करेगी तो उसे चुनाव में बीजेपी से हार के लिए तैयार भी रहना होगा।
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इतना तो तय है कि तृणमूल सरकार की प्राथमिकता सूची में चाय मजदूर और उनकी समस्या नहीं है। वे चाय मजदूरों की परवाह भी नहीं करती है। वह मजदूर नेताओं को पहले ही अपने पॉकेट के हवाले कर चुकी है और उनमें इतना दम नहीं कि वे चाय बागान मजदूरों के लिए कोई मुकम्मल आवाज निकालें।
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चाय बागान के मजदूर नेतागणों को मजदूर संघ और राजनैतिक पार्टी में अंतर करना भी नहीं आता है। वे मजदूर संघ और राजनैतिक पार्टी को एक ही थैली में रखते हैं और वे मजदूर संघों को राजनैतिक पार्टियों के पिछलग्गू बना कर रख छोड़े हैं। इन बागानिया नेताओं की वफादारी मजदूर संघ के प्रति नहीं होकर राजनैतिक पार्टी के प्रति है।
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डुवार्स तराई के किसी भी राजनैतिक पार्टी के दिलों दिमाग में चाय मजदूरों की समस्या नहीं है। तृणमूल पार्टी की सदिच्छा होती तो अब तक मजदूरों को आवास पट्टा मिल जाता। आवास पट्टा मिलने में किसी भी तरह की कोई कानूनी अड़चन नहीं है। बजट सत्र् में वित्त मंत्री ने चाय बागान को कृषि उद्योग क्षेत्र कहा है और उसे कृषि आयकर में छूट देने की घोषणा की थी। पश्चिम बंगाल भूमि सुधार कानून में उद्य़ोग क्षेत्रों के कामगार को आवास पट्टा के लिए भूमि आबंटन को मना किया गया है, कृषि क्षेत्र के गृहहीन मजदूरों के लिए नहीं।
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चाय मजदूर संघ यदि चेतनाशील होते तो वे इस मामले को राज्य सरकार के माध्यम से सुलझा लेते। लेकिन अधिकतर मजदूर नेता शहरी और गैर बागानिया हैं, उन्हें मजदूरों के आवासहीन स्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता है। लालपार्टी (सीपीएम नीत पार्टियाँ) और सादापार्टी (कांग्रेस) या गेरूआ पार्टी (भाजपा) को भी सिर्फ मजदूरों के वोट और चंदे से मतलब है। फिलहाल गेरूआ पार्टी रथ यात्रा निकाल कर लोगों को बेवकूफ बनाने के प्रयास में रत है वहीं कांग्रेस के नेतागण कब्र से निकाल कर पार्टी को जिंदा करके चुनाव जीतने के फेरे में हैं। इन पार्टियों को मजदूरों के किसी भी क्लासिक समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है। ये पार्टी वाले इतने स्वार्थी हैं कि ये मजदूरों को अलग-अलग बाँट कर उन्हें आपस में लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं।
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यदि ये पार्टियाँ और इनके नेताओं के दिलों में मजदूरों के लिए दर्द रहता तो ये पार्टियाँ हाईकोर्ट में बागान मालिकों या सरकार द्वारा दायर किए जाऩे वाले मामले में मजदूरों को भी एक पार्टी बनाने के लिए हाईकोर्ट में कैविएट दायर करके मजदूरों की भी बात सुनने के लिए कोर्ट से अनुरोध करते।
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चूँकि मजदूरी का मामला सीधे-सीधे मजदूरों के हित से जुड़ा हुआ है न कि सरकार और बागान मालिकों के हित से। लेकिन बागान मजदूरों को ठगने के लिए सरकार, पार्टी और मजदूर संघ कभी कोई कोर कसर नहीं छोड़ते।
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लोकसभा का चुनाव नजदीक आ रहा है और पार्टियों की लड़ाई तेज होती जा रही है। इन लड़ाईयों में ये पार्टियाँ मजदूरों को इंधन के रूप में प्रयोग करेंगी और मजदूरों को पैसे देकर अपने रैली और सभा आदि के लिए ले जाएगी और झूठे बातों से मजदूरों के दिलों को जीतने की कोशिश करेंगे। लेकिन मजदूरों को अपने हित के लिए काम करने वालों को वोट देने की बातें करनी चाहिए न कि झूठे आशा दिलाने वाली पार्टियों वालों को। लेकिन क्या मजदूरों के पास अपना कोई सच्चा और धाकड़ नेता मौजूद है ?

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कुड़ुख है एक अति प्राचीन भाषा

                                                                                    नेह अर्जुन इंदवार
गत वर्ष कुड़ुख भाषा को मान्यता देने के लिए पश्चिम बंगाल विधान सभा में विधेयक पारित करने के बाद इसी सप्ताह पश्चिम बंगाल सरकार ने इस विषय पर गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है। अब कुड़ुख झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश सहित पश्चिम बंगाल राज्यों में राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त भाषा का दर्जा हासिल कर लिया है।

दक्षिण भारत के तमिल के साथ इसके शब्दों और अर्थों की समानता के अनुसार भाषा वैज्ञानिकों ने कुड़ुख को द्रविड़ परिवार की भाषा माना है।  कुड़ुख भारत की एक अति प्राचीन भाषा है। ई-लंग्वेस्टिक नेट में प्रकाशित तमिल और कुड़ुख (शब्दों) भाषाओं की उत्पत्ति और समानता पर हुई शोध के अनुसार कुड़ुख और तमिल को दूर का रिश्तेदार Remotely related Language (RrL) बताया गया है। RrL या दूर का रिश्तेदार के पैमाने पर दो भाषाओं की रिश्तेदारी 4000 से लेकर 6000 वर्ष मानी गई है। इसका एक मतलब यह है कि 4000-6000 वर्ष पूर्व दोनों भाषाएँ एक ही जगह से अलग हुई थीं। उत्तर भारत में कुड़ुख के साथ गोंडी, कुई, माल्तो आदि भाषाएँ द्रविड़ परिवार की भाषाएँ हैं। वहीं दक्षिण भारत की आदिवासी समुदायों द्वारा बोली जाने वाली इलुरा, टोडा, कोटा, कोडावा, कुरूँबा आदि भी इस प्राचीन भाषा के सदस्य हैं। जबकि इस परिवार की भाषा सदस्य पाकिस्तान स्थिति बलुचिस्तान के ब्रहुई भी है। द्रविड़ भाषाओं के शब्द अफ्रीका के कैमरून देश के एक छोटे से आदिवासी समूह की भाषाओं में भी मिलती है। अमेरिका के हर्वर्ड विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञानी अलेक्स कोलियर के अनुसार एक समय दुनिया के अधिकांश समूह द्रविड़ भाषाओं का उपयोग करते थे। इस तरह द्रविड़ परिवार की भाषाएँ दुनिया के विशिष्ट भाषाएँ बन जाती है।

यूनेस्को की सूची में कुड़ुख भाषा को अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करने में कमजोर और खतरे में बताया गया है। Moseley, Christopher, ed. (2010). Atlas of the World’s Languages in Danger. Memory of Peoples (3rd ed.). Paris: UNESCO Publishing. ISBN 978-92-3-104096-2. Retrieved 2015-04-11.

भारत सरकार ने तमिल, तेलगु, मलयालम, उडिया और संस्कृत सहित कई प्राचीन भाषाओं को उनकी प्राचीनता के हिसाब से Classical Language के रूप में मान्यता दी है। इस हिसाब से कुड़ुख अपने आप ही भारत की एक प्राचीन भाषा के रूप में मान्यता पाने का हकदार हो जाता है। क्योंकि तमिल के साथ इसकी प्राचीनता स्वतः स्पष्ट है।

संस्कृत भाषा का विकास लगभग 4000 वर्ष पूर्व आर्यों के आगमन के बाद का माना जाता है। उल्लेखनीय है कि 4500 वर्ष पूर्व के राखीगढ़ी मानव कंकाल में आर्य जीन नहीं मिला। मतलब आर्यों का आगमन इसके बहुत बाद की है। आधुनिक भारतीय भाषाओं का इतिहास 1000-1500 वर्ष से अधिक पुराना नहीं समझता जाता है। इस दृष्टि से जंगलों और दूसरे समुदायों के अमिश्रित आदिवासी भाषाएँ कुड़ुख, मुण्डारी, संथाली, हो, खडिया आदि भाषाएँ अति प्राचीन काल से लगभग अपने मूल स्वरूप, अर्थ, ध्वनि आदि को अपने कलेवर में छिपाए करीबन 4000-6000 वर्ष तक अपनी मौलिकता को बरकरार रखने में कामयाब रहे। मतलब यदि भारत की अति प्राचीन भाषाओं के पद और अधिकार की बात की जाए तो भारत की आदिवासी समुदायों की भाषाएँ ही प्रथम संदर्भ में स्थान पाएँगे। सिंधु घाटी सभ्यता में बोली जाने वाले यही अति प्राचीन भाषाएँ रहीं होंगी। उल्लेखनीय है कि राखीगढ़ी में मिले कंकाल के डीएनए के लक्षण दक्षिण भारत के एक आदिवासी समुदाय के डीएनए से कुछ मेल खाते हैं। देखिए https://www.indiatoday.in/magazine/cover-story/story/20180910-rakhigarhi-dna-study-findings-indus-valley-civilisation-1327247-2018-08-31 इसका एक मतलब यह भी है कि दक्षिण भारत की द्रविड़ आदिवासी जातियों के साथ उत्तर भारत की द्रविड़ परिवार की भाषा बोलने वाले आदिवासियों के साथ भाषाई और डीएनए के संबंध जरूर विद्यामान होंगे। बस इस संबध में आदिवासियों को खुद ही पुरातात्विक, भाषाई और बायोलॉजिकल शोध खुद ही करने होंगे। भारत का अति प्राचीन इतिहास लेखन में आदिवासियों को अपनी भाषा और संस्कृति के माध्यम से आगे आना होगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत देश आज के आदिवासियों के पूर्वजों का देश है और भारत में आदिवासी भाषा और संस्कृति को संरक्षण रखने में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। आदिवासियों को सौ-डेढ़-सौ सालों से शिक्षा पाने का अवसर मिला है और शिक्षित होने के बाद वे अपनी भाषा-संस्कृति को संरक्षित रखने के लिए जागरूक हुए हैं। डा. रामदयाल मुण्डा ने अमेरिका में अच्छे खासे प्रोफेसर की नौकरी को छोड़कर देश लौटा और आदिवासी भाषाओँ के संरक्षण और विकास के लिए अपनी जिंदगी लगा दी। आज राँची विश्वविद्यालय सहित देश के अनेक विश्वविद्यालयों में आदिवासी भाषाओं की पढ़ाई की जा रही है और भाषाओं पर शोध किए जा रहे हैं। आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के लिए आज समाज जागरूक हो गया है। आदिवासी भाषाओं पर देश में शोध के फलस्वरूप  आज सैकड़ों पीएचडी धारी आदिवासी हैं जो भाषाओं और अन्य क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। समाज धीरे-धीरे विकास के पथ पर अग्रसर है।

पश्चिम बंगाल में कुड़ुख भाषा की मान्यता इसी विकास के पथ पर एक मील का पत्थर है। कल और भी आदिवासी भाषाओं को मान्यता मिलेगी, इसमें किसी तरह की शंका रखना बेवकूफी है।  कुड़ुख भाषा का किसी अन्य आदिवासी भाषा के साथ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। बल्कि कुड़खरों को गर्व होना चाहिए कि उनके पूरखों के द्वारा 6000 या शायद 10000 वर्ष से बचाए गए भाषा को विकसित करने और अपनी भाषा और संस्कृति के साथ जीवन जीने का उन्हें जो मौका मिला है, वैसा मौका भारत के आधुनिक भाषा बोलने वाले और किसी जाति और समुदाय को नहीं मिला है। क्योंकि सभी आधुनिक भाषाओं का विकास काल खण्ड आदिवासी भाषाओं से बहुत बाद का है और उनकी भाषाओं का अतिप्राचीनता कई सहस्त्रबादी पहले ही नष्ट हो गयी है। कई लोगों के मन में कुड़ुख के व्यवहार से पिछड़े हो जाने की शंका भी है, लेकिन यह शंका उनके भाषा और विकास संबंधी ज्ञान, जानकारी के अभाव के कारण है। व्यक्ति या समाज का सम्पूर्ण विकास असंख्य कारकों पर निर्भर होता है। आधुनिक तकनीकी की दुनिया में किसी भाषा का विकास उनके तकनीकी ज्ञान पर भी निर्भर करता है।

हिब्रु भाषा आज से 2500 वर्ष विलुप्त हो गया था। हिब्रु भाषा बोलने वालों ने 2500 वर्ष पहले विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों के थोपेड़े में आकर अपनी भाषा को छोड़ दिया था और हजारों वर्षों तक दूसरी भाषाओं को अपना लिया था। हिब्रु भाषा सिर्फ धार्मिक किताबों और धार्मिक क्रियाओं में ही बचा हुआ था। लेकिन 19वीं सदी में इसे पुनर्जीवित किया गया और आज यह इजरायल की बहुत विकसित राजभाषा है। और अब तक इस भाषा के उपयोगकर्ताओं को 12 नॉबेल पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।

पश्चिम बंगाल में कुड़ुख को सरकारी मान्यता मिलने के बाद कुड़ुख भाषियों को इसके विकास के साथ अपने सहोदर भाषाएँ मुण्डारी, खडिया, हो, सादरी आदि के विकास के लिए भी साथ मिल कर कार्य करना चाहिए। जो व्यक्ति भाषाओं के नाम पर अलगाव की राजनीति करके अपनी नेतागिरी चमकाना चाहते हैं, उन्हें जनता से अलग-थलग करने की जरूरत हैं। संकीर्ण विचारधारा वाले अर्धशिक्षित नेतागण अपनी सकारात्मक क्षमता से कोई मुकाम बनाने में नकाम रहते हैं इसलिए वे नकरात्मक भावनाओं के बल पर नेता बनने के प्रयास में होते हैं। एक मौलिक आदिवासी  भाषा का विरोध एक नासमझी और नादानी भरा  क्रिया है। यह नेतागिरी चमकाने और विशेष स्वार्थ को पूरा करने का प्रयास भी है। इसे कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना के रूप में देखा जा सकता है।

भाषाओं के विकास का कार्य अत्यंत गंभीर कार्य है। इसके लिए निरंतर लेखन, मनन, चिंतन और सकरात्मक लक्ष्य की जरूरत होती है। इसमें उच्च शिक्षा, गंभीर अध्ययन और व्यापक दृष्टिकोण की जरूरत होती है। जिन्हें नेतृत्व का उत्तरदायित्व मिले, वे अपने उत्तरदायित्व की गंभीरता को समझें और उसी के अनुसार व्यवहार करें और समाज को नेतृत्व दें।

सरकारी मान्यता प्राप्त होने के बाद आज डुवार्स तराई के गाँव-गाँव में कुड़ुख स्कूल खोलने की जरूरत है। उन स्कूलों को प्राप्त आर्थिक संसाधनों और ढाँचागत सुविधा को मुण्डारी, खड़िया, हो, सादरी के विकास के लिए भी साझा करने की जरूरत है। कुड़ुख स्कूल का instructions (पढ़ाने की भाषा) आवश्यकता अनुसार इलाके में बोली जाने वाली घरेलू भाषा को बनाया जाए। जहाँ बच्चे मुण्डारी जानते हैं उन्हें मुण्डारी के माध्यम से पढ़ाया जाए, इससे मुण्डारी भाषा का संरक्षण, विकास भी साथ साथ होगा। जहाँ बच्चे सादरी जानते हैं वहाँ सादरी के माध्यम से पढ़ाया जाए। इससे सादरी में भी पढ़ने लिखने की सुविधा विकसित होगी और साहित्य की रचनाओं का निर्माण होगा। जहाँ बच्चे खड़िया जानते हैं या हो जानते हैं वहाँ खड़िया या हो में पढ़ाई करायी जाए। मुख्य बात है कि आदिवासी भाषाओं का विकास किया जाए। इसके लिए कुड़ुख स्कूल को मिले संसाधन या ढाँचागत सुविधाओं का उपयोग किया जाए।

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टी बोर्ड देगा युवाओं को रोजगारमूलक प्रशिक्षण

                                                                 नेह अर्जुन इंदवार

भारत सरकार की संस्था इलेक्ट्रोनिक्स आफ इंडिया, जलपाईगुड़ी जिले के बंदरहाट, मालबाजार और जलपाईगुड़ी शहरों में चाय बागान के कुल 75 बच्चों आदिवासी को 3 महीने का रोजगारमूलक प्रशिक्षण देगा। उपरोक्त तीन प्रशिक्षण केन्द्रों में 8 लाख रूपये करके प्रति केन्द्र खर्च होंगे। व्यय का भार टी बोर्ड उठाएगा। बेरोजगार आदिवासी युवाओं को कम्प्यूटर डाटा इंट्री अपरेटर, मोबाईल रिपेयरिंग, कम्प्यूटर हार्डवेयर आदि के क्षेत्रों में Skill Training दिया जाएगा।

बेरोजगारों को कौशल प्रशिक्षण देना उन्हें रोजगार के क्षेत्र में नौकरी देने का प्रथम चरण होता है। नौकरी के बाजार में सिर्फ कुशल हाथों की मांग होती है। अकुशल हाथों को कोई भी नौकरी देना नहीं चाहता है। डुवार्स तराई में माध्यमिक, उच्च माध्यमिक और ग्रेज्युएट सहित पोस्ट ग्रेज्युएट युवाओं की अच्छी खासी तदाद है। गरीबी में रह कर भी किसी तरह शिक्षा प्राप्त युवाओं के पास डिग्री आदि प्राप्त करने के बाद रोजगारमूलक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए संसाधन नहीं होते हैं और वे अकुशल शिक्षित बेरोजगार होकर नौकरी की खोज में दिशाहीन होकर दर-दर भटकते हैं। व्यवसाय के क्षेत्र में भी वे उतरने का साहस नहीं करते हैं, क्योंकि उसके लिए भी उन्हें उचित सलाह और प्रशिक्षण कहीं नहीं मिलता है। गरीब युवाओं को बिना कौंसिलिंग के किसी भी क्षेत्र में जाने के लिए कोई सटीक मार्ग नहीं मिलता है और वे भटकते रहते हैं।

चाय बागानों में करीब 2 लाख से अधिक बेरोजगार युवा हैं और उनमें से इक्का दुक्का को प्रतिस्पर्धा के बाद ढंग की सरकारी-बेसरकारी नौकरी हाथ लगती है। अधिकतर युवाओं को निराशा ही हाथ लगती है और वे या तो मानसिक अवसाद का शिकार हो जाते हैं या अन्य ऐसे कार्य करने लग जाते हैं जहाँ उनका कोई निश्चित भविष्य नहीं होता है।

यहाँ ध्यान देने की बात है कि टी बोर्ड जलपाईगुड़ी जिले में अवस्थित प्राईवेट प्रशिक्षण संस्थानों में 8 लाख रूपये खर्च करके 25-25 युवाओं को प्रशिक्षण दिलाएगा। मतलब प्रत्येक युवा पर 32 हजार रूपये खर्च करेगा। इनमें प्रत्येक प्रशिक्षणार्थी को प्रति महीना 1500 अर्थात् तीन महीने में 4500 रूपये का वजीफा दिया जाऩा भी शामिल है।

कितना अच्छा होता यदि टी बोर्ड यही प्रशिक्षण वह खुद के प्रशिक्षण संस्थान में देता तो उसमें बमुश्किल 8 से 10 हजार रूपये खर्च आता।

चाय बागान औद्योगिक क्षेत्र होने के कारण यहाँ की कंपनियों पर CSR (Company Social Responsibility) को पूरा करने का भी उत्तरदायित्व है। कई कंपनियाँ सिलीगुड़ी और अन्य शहरों में CSR के पैसों को खर्च करती है। यदि टी बोर्ड इन कंपनियों के CSR के पैसों से अपना स्वयं का प्रशिक्षण संस्थान शुरू करे, तो यह प्रति वर्ष कई सौ युवाओं को मुफ्त में रोजगारमूलक प्रशिक्षण दिला सकता है। राज्य सरकार के श्रम दफ्तर भी इस संबंध में नया कदम उठा सकता है। डुवार्स तराई के चाय मजदूर संघ को भी आगे आकर इस विषय पर काम करना चाहिए। डेटा इंट्री, मोबाईल मरम्मत, कम्प्यूटर हार्डवेयर, टीवी मरम्मत, मोटर साईकिल, बड़ी गाड़ी मरम्मत आदि ऐसे प्रशिक्षण हैं पर जिन कर करोड़ों का खर्च नहीं आता है, बल्कि ऐसे प्रशिक्षण संस्थान महज कुछ लाख रूपयों से ही शुरू किया जा सकता है।

आदिवासी विकास परिषद के नेतृत्व में आदिवासी संस्कृति और विकास बोर्ड तथा डुवार्स तराई के विकास के लिए कार्यरत कई संस्थाओं को पिछले तीन चार वर्षों में करीबन 20 करोड़ रूपये प्राप्त हो चुके हैं। जिसे इन संस्थाओं ने गैर उत्पादक मदो में व्यय किया और समाज के हाथों कुछ पल्ले नहीं आया। यदि ये संस्थाएँ अपने बजट में से सिर्फ एक करोड़ रूपये प्रति वर्ष युवाओं के प्रशिक्षण के लिए डुवार्स तराई में कई प्रशिक्षण संस्थाएँ स्थापित करने के लिए खर्च करे तो डुवार्स तराई के युवाओं का बड़ा कल्याण होगा। लेकिन अफसोस की बात है कि ये संस्थाएँ गरीबों के घर बनाने के नाम पर दिखावा का कार्य करके समाज विकास के लिए मिले पैसे का दुरूपयोग करती है और अपनी अदूरदर्शिता का परिचय देता है।

किसी भी समाज में युवा वर्ग उस समाज की जीवंत संपदा होती है। लेकिन उनकी शिक्षा-दिक्षा, उत्साह-उर्जा का सही दिशा में नियोजन न हो तो वह संपत्ति कुड़ा में बदल जाता है। युवाओं को रोजगारमूलक प्रशिक्षण देने से उन्हें अधिक आय की नौकरी मिलने में सुविधा होती है और अपने हुनर का उपयोग वे अपने निजी व्यवसाय शुरू करके भी करते हैं। युवाओं को नौकरी मिलने से वे अपने घर-परिवार के शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक उन्नति में हाथ बँटाते हैं और एक आदमी के पर्याप्त आय से चार-पाँच लोगों की जिंदगी को बदलने में समर्थ होते हैं। समाज के अधिक युवाओं का रोजगारयुक्त होना समाज के विकासमय होने की निशानी है।

उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करने में खर्च हुए पैसों को उत्पादन के सकरात्मक मद (आईटम) में हुए खर्च के रूप में देखा जाता है। प्रशिक्षित व्यक्ति प्रशिक्षण के बाद में लगातार उन्नति के मार्ग में अग्रसर होता है और इससे समाज आगे बढ़ता है। लेकिन समाज विकास के काम में मिले पैसों को गरीबों के घर बनाने में खर्च करने के कार्य को बुद्धिमानी का फैसला नहीं कहा जा सकता है, जैसे कि आदिवासी संस्कृति विकास बोर्ड फिलहाल कर रहा है। क्योंकि गरीबों को घर तो इंदिरा आवास और अन्य योजनाओं के अन्तर्गत भी बनाया जा सकता है। इसलिए ऐसे व्यय को अदूरदर्शी गैर उत्पादक व्यय कहा जाता है। समाज के लिए प्राप्त होने वाले रूपयों का सही और सटीक कार्य में उपयोग किया जाए यह जरूरी है। यदि इसमें भ्रष्टाचार का प्रवेश हो जाए तो वह बेहद दुखद होती है। ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई करना बेहद जरूरी हो जाता है।

चाहे सकरात्मक कार्य टी बोर्ड के द्वारा किया जाए, राज्य सरकार के द्वारा किया जाए या सामुदायिक संस्कृति विकास बोर्ड के द्वारा किया जाए, सबका स्वागत करना आवश्यक है। साथ ही विकास के नाम पर किए जाने वाले फिजुल खर्चों पर भी लगाम लगाने की जरूरत है। कम पैसों में भी समाज का कायाकल्प किया जा सकता है, इसका दृष्टांत टी बोर्ड दिखा रहा है। धन्यवाद टी बोर्ड। नेह इंदवार     

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पत्थलगड़ी की उलझन

                                                                              वाल्टर कांदुलना 

                        भाग एक

पत्थलगड़ी आदिवासियों का, विशेषकर मुंडा प्रजातियों की एक प्राचीनतम मेगालिथिक (पाषाण) परंपरा है. Megalithik ग्रीक भाषा के दो शब्दों अर्थात् Mega=महा,और Lithik=पाषाण से बना है; यानी बड़ा पत्थर.

किसी भी समाज में पत्थलगड़ी का मुख्य उद्देश्य किसी घटना को ना केवल स्मारक या यादगारी के रूप में संजोकर रखना है बल्कि वह उनकी अपनी जीवन शैली का भी परिचायक है. जैसे “ससन दिरी” अगर किसी #अपने_पूर्वज_की_याद_में_पत्थल_को_गाड़ा_जाता_है तो साथ ही उसकी आत्मा को अपने घर में स्थान और सम्मान देने का भी एक प्रतीक है.

पत्थलगड़ी आदिवासियों के अस्तित्व और उनकी आस्था की पहचान ही नहीं बल्कि उनका जीवन्त प्रमाण भी है. पत्थलगड़ी के द्वारा आम आदिवासी आपस में अपने परिवार से या अपने गाँव से या अपने समाज से एक भावनात्मक रिश्ते में बंधे हुए होते है. यही बंधन उनके भौतिक अस्तित्व को बनाये रखने में बेहद मददगार होती है और सामाजिक रूप से जिन्दा बनाये रखता है.

मुंडाओं में कम से कम #चालीस_प्रकार_के_पत्थलगड़ी होते हैं. ये मुंडा प्रजाति के इतिहास पथ है. और उनकी पहचान और अस्तित्व, सभ्यता और संस्कृति के गौरवशाली प्रमाण और विरासत है.
अभी भी यह परंपरा जीवित है.
पत्थलगड़ी के इसी क्रम में
“#सीमान_दिरी” एक तरह का #पत्थलगड़ी_है_जो_गांव_की_सीमा_को_दर्शाता_है.

#अखड़ा_दिरी_अखड़ा_में_गाड़ा_जाता_है, जिसका उद्देश्य शिक्षा देने के लिए होता है.
आज #पत्थलगड़ी एक सरकारी विवाद के घेरे में है. सरकार पत्थलगड़ी को अपने पूंजीपति मित्रों की राह में रोड़ा मान रही है और इसलिए इसको गैर-संवैधानिक घोषित करने में तुली हुई है.

आदिवासी क्षेत्रों में शिलापट्टों के द्वारा कानून सम्बन्धी जानकारी देंना कोई नई बात नहीं है.

बीस वर्ष गुजर गए. फरवरी,1997 में डॉ बी.डी शर्मा ने झारखण्ड के सैकड़ों गावों में दौरा करके The Provisions of the Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act-1996 संक्षेप में पी-पेसा कानून-1996 के द्वारा संवैधानिक प्रदत्त ग्राम सभा की सात शक्तियों को शिलापट्टों पर लिख कर उन्हें गडवाया थाI और पारंपरिक ग्राम-सभा को स्थापित करने की कोशिश की थीI उस समय डॉ शर्मा ने एक नारा भी दिया था :“ना लोक सभा ना विधान सभा, सबसे बड़ा ग्राम सभा”I लेकिन तब से अब तक सरकार ने अभी तक इस कानून पर कोई संज्ञान नहीं लिया तथा 20 वर्षों के गुजर जाने के बावजूद अब तक किसी भी सरकार ने इस कानून को लागू करने की कोई जहमत नहीं उठाई I
पर अब यह पत्थलगड़ी सरकार की आँखों में गड़ने लगी है. पत्थल-गड़ी की इसके आशय से सरकार को अपने और पूंजीपतियों के हित साधने में बाधा पहुँच रही है I
मूल सवाल यह है सरकार /सरकारों ने पी-पेसा कानून-1996 को अभी तक क्यों लागू नहीं किया है? कानून का पालन करने की जिम्मेदारी क्या सिर्फ नागरिकों/जनता को ही है सरकार को नहीं?

अब तक सरकार ने आदिवासियों से जो छल किया है क्या वह उसकी भरपाई कर सकती है.?
सर्वप्रथम तो सरकार ने The Provisions of the Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act-1996 से *Provisions* को गायब कर दिया और उक्त कानून के नाम को The Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act-1996 के नाम से प्रचारित कियाI और इसी गलत नाम के आलोक में झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम-2001 को , जो सामान्य क्षेत्र का कानून है, अनुसूचित क्षेत्र में भी थोप दिया . जबकि संविधान के अनुच्छेद 243 (M) में यह स्पष्ट है कि भाग IX की पंचायत व्यवस्था अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं की जा सकती हैI उसी प्रकार संविधान के अनुच्छेद 243ZC के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में नगर निगम और नगर-पंचायतें असंवैधानिक हैं क्योंकि राज्य विधायिका द्वारा निर्मित कानून झारखण्ड म्युनिसिपैलिटी अधिनियम 2011 अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं किया जा सकता हैIक्या सरकारें , कानून से ऊपर होती हैं?

अभी हाल में दिनांक 28/03/18 के प्रभात खबर प्रथम पृष्ठ पर यह छापा गया कि “ जमीन की हेराफेरी करने वाले अफसरों , कर्मियों पर नहीं होगा केस” यह मुद्दा और इसकी भाषा क्या किसी सभ्य समाज में मान्य हो सकती है? यह तो एक सीधा सा “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का लट्ठमार ऐलान है. लेकिन मुख्यमंत्री महोदय पूरी बेशर्मी और निर्लज्जता से एक झटके में पूरी मानवता की समस्त सभ्यता के आधार को ही नकार देते हैं..

दूसरा सवाल अब यह होता है कि वास्तविक देशद्रोही कौन है? जिसने कानून की गलत व्याख्या करके उसके द्वारा आदिवासियों की लाखो एकड़ जमीन को हथियाया /अधिगृहीत किया, जमीन की हेराफेरी करने वाले अफसरों पर कोई कानूनी कारर्वाई नहीं की या जिसने पत्थल पर अपनी जमीन और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए दो वाक्य लिखे ? वैसे भी जिसके लिए जमीन की हेराफेरी करना गलत नहीं है ,उसके लिए कानून की व्याख्या करना या अ-व्याख्या करने क्या कोई मतलब हो सकता है ?
सच पूछा जाए तो पत्थलगड़ी एक संवेदनहीन और बहरी सरकार के सामने अपने अस्तित्व को बचाने का एक आह्वान मात्र है.

पत्थलगड़ी …..(भाग –दो)

सरकार का #पत्थलगड़ी पर मूल आरोप यह है कि संविधान के अनुच्छेद 13(3) a ,19(5) 19(6), और 244 (1) को गलत ढंग से पेश किया गया है.
आइये इन पर हम एक-एक करके विचार करें.

1) अनुच्छेद 13(3) a का मूल भाव यह है .Law includes any ordinance ,order , bye-law, rule, regulations notifications , <Customs or Uses> having in the territory of India has the <Force of law> .#दूसरे_शब्दों_में_परंपरा_या_पारंपरिक_व्यवहार (#रुड़ीवादी_व्यवस्था) #को <#विधि_का_बल> #प्राप्त_है. झारखण्ड के  #आदिवासियों_ की_एक_सामजिक_राजनीतिक_व्यवस्था है जिसे एक common नाम दिया जा सकता है: “पड़हा व्यवस्था”.

पी-पेसा कानून 1996 का सेक्शन 4 (a) और 4(d) में #customary_law, social and religious practices and traditional management practices of community resources, traditions and customs ,cultural identity आदि के बारे में चर्चा है .
ये दोनों सेक्शन मूलतः अनुच्छेद 13(3) a के ही विस्तार (Extension) है. लम्बे 20 साल गुजर गए , अभी तक सरकार ने पी-पेसा कानून-1996 के इन सेक्शनों के संगत (in consonance) कोई विनियम नहीं बनाया है. आखिर क्यों ? गलती किसकी है? पत्थल पर लिखने वाले की या इसे गलत समझने वाली सरकार की? हमें सरकार यह बताये कि पी-पेसा कानून-1996 के सेक्शन 4 (a) और 4(d) का अनुपालन अभी तक क्यों नहीं किया गया है?
क्या कानून का पालन करने की जिम्मेदारी सिर्फ जनता पर होती है, सरकार पर नहीं ?
2) अनुच्छेद 19(5) और 19(6) Nothing in sub-clause (d) and (e) of the said clause shall affect the operation of any existing law in so far it imposes , or prevent the State from making any law imposing in the interest of public order or morality , <reasonable restrictions> on the exercise of the right conferred by the said sub clause.
Sub clause (d) और (e) आम नागरिकों के भारत में स्वतन्त्र रूप से विचरण करने, निवास करने तथा व्यापार करने का अधिकार देता है.
अब ध्यान देने योग्य बात यह है कि झारखण्ड मूलत आदिवासियों के हितों को ध्यान में रख कर बिहार से अलग किया गया था. लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में आदिवासी हित की बात तो छोड़िये , विभिन्न उद्योगों और माइंस और भूमि बैंक , झारखण्ड मोमेंटम आदि के द्वारा उनके विस्थापन और विनाश की पटकथा क्या नहीं लिखी जा रही है?

वैसे भी अनुच्छेद 19(5) और 19(6) का विस्तारण उपर्युक्त कानून पी-पेसा 1996 के आलोक में सेक्शन 4(m) (iii) और 4(m) (iv) के द्वारा किये गए हैं. सरकार किसी मुद्दे के एक पक्ष को ही देखने का प्रयत्न कर रही है?
3) अनुच्छेद 244(1) : The provisions of the Fifth Schedule shall apply to the administration and control of the Scheduled Areas and Scheduled tribes in any State other than the State of Assam, Meghalaya, Tripura and Mizoram.

संविधान के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन और नियंत्रण पांचवीं अनुसूची के तहत किया जाना है. इसके तहत #राज्य_सरकार_को_सिर्फ_कार्यपालिका_के_अधिकार_हैं.[*सेक्शन 2]

लेकिन सच्चाई तो यह है कि सरकार , अनुसूचित क्षेत्रों को एक <सामान्य क्षेत्र की तरह> मान कर इन पर अपना नियंत्रण रखने की कोशिश कर रही है. बल्कि यहाँ की कार्यपालिका ने राज्यपाल के अनुसूचित जनजातियों से सम्बंधित अधिकारों को हाईजैक कर लिया है. अनुसूचित जनजातियों की जमीन सम्बंधित मामलों में तथा जनजाति परामर्शदात्री परिषद् के मामले में राज्य की कार्यपालिका का अनधिकृत दखल-अंदाजी हो गया है , जो कि सिर्फ और सिर्फ राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में है.[सेक्शन4(2)]

अभी तक TAC की नियमावली नहीं बनी है इसके बावजूद आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा से सम्बंधित कानून जैसे सीएनटी/एसपीटी कानून, जमीन अधिग्रहण कानून 2013 आदि का संशोधन TAC की आड़ से किया जा रहा है.#रघुवर_दास_Tribes_Advisory_Council_का_अध्यक्ष_नहीं_बन_सकता है? [सेक्शन 4(1)]
सरकार के अधिकार क्षेत्र में भूमि-बैंक बनाने की शक्ति नहीं है.[सेक्शन 5(2)a]
हाल में सरकार ने जमीन पर अवैध कब्ज़ा करके रहने वालों को उस जमीन का मालिकाना देकर कब्जे को वैध घोषित कर दिया है.
दूसरे शब्दों में #सरकार_हर_दिन_आदिवासियों_के_हित_के_कानूनों का बलात्कार कर रही है .परन्तु उसे सवाल करने वाला कोई नहीं है. राज्यपाल का पद एक रबर-स्टाम्प में तब्दील कर दिया गया है . जबकि वह अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित क्षेत्र का संरक्षक (custodian) होता है.

पी-पेसा कानून 1996 के तहत, अपवादों और उपान्तरों के अधीन , अनुसूचित क्षेत्र की ग्राम सभाओं को सात शक्तियां दी गयी हैं. [सेक्शन 4 m (i) से (vii) तक.] ,लेकिन सरकार ने इनकी जगह ग्रामीण क्षेत्र में झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम 2001 और शहरी क्षेत्र में झारखण्ड म्युनिसिपैलिटी अधिनियम 2011 को लागू कर दिया है.
संविधान की धाराओं 243-M(1) और 243-ZC(1) के आलोक में उपर्युक्त ये दोनों अधिनियम बिल्कुल असंवैधानिक है.

निष्कर्ष: सरकार पत्थर पर लिखे गए व्याख्या को तो गलत कह रही है. और उसके द्वारा पत्थलगड़ी को ही असंवैधानिक सिद्ध करने की कोशिश में है. लेकिन अनुसूचित क्षेत्रों में गलत कानूनों को लागू कौन कर रहा है?. सरकार को पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिएI.

संभवतः झारखण्ड में खुद सरकार के ही द्वारा आदिवासी सम्बंधित संवैधानिक प्रावधानों का सबसे ज्यादा उल्लंघन हो रहा है.I इस प्रकार के संवैधानिक घोटाले सभी प्रकार के घोटालों से गंभीर और विस्तृत होता हैI
सरकार को पहले इस पर विचार करना चाहिए.I

सरकार आदिवासियों को और उनकी परम्पराओं को नष्ट करने का कुचक्र का चक्र चलाना छोड़ेI
पत्थलगड़ी संविधान के खिलाफ नहीं है.I

पत्थलगड़ी आदिवासियों की परंपरा है और इसे कानून का बल भी प्राप्त हैIयह आदिवासियों का मौलिक अधिकार हैI किसी को इसे छीनने का अधिकार नहीं है I सरकार को भी नहीं I

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कम वेतन पर मजदूर काम नहीं करेंगे चाय बागानों में

                                                                                 नेह अर्जुन इंदवार

दार्जिलिंग टी एसोसिएशन से जुड़े संदीप मुख्योपाध्यय के अनुसार दार्जिलिंग के पहाड़ों में स्थित चाय बागानों में पिछले एक साल से 50 प्रतिशत चाय मजदूर अपने काम में नहीं आ रहे हैं। इसका चाय उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ा है और चाय उद्योग टूटने के कगार कर पहुँच चुका है। उनके अनुसार जब बागानों में 100 दिन रोजगार का काम शुरू हुआ था तो मजदूरों की अनुपस्थिति 20-25 प्रतिशत था, लेकिन अब वह बढ़ कर आधा हो गया है। सरकारी योजना के तहत चलाए जा रहे 100 दिन रोजगार में मजदूरों को 192 रूपये मिलते हैं, जबकि चाय बागानों में 176 रूपये। जाहिर है  कि अपने श्रम का मूल्य जहाँ अधिक मिलेगा, मजदूर उधर ही जाएँगे। कोई भी समझदार इंसान जानबुझ कर अपने शारीरिक श्रम और आर्थिक शोषण को नहीं चुनेगा।   

हाल ही में (नंवबर महीने के तीसरे हप्ते)  कोलकाता में सरकार, मालिकपक्ष और कुछ चुनिंदा मजदूर संघों के प्रतिनिधियों के बीच चाय उत्पादन बढ़ाने और मजदूरों से नियमित रूप से आठ घंटे काम लेने के विषय पर एक चर्चा हुई। मालिक पक्ष का कहना है कि वे सार्वजनकि अवकाश या सरकारी अवकाश- जैसे कालीपूजा, दुर्गापूजा, होली, गणतंत्रता और स्वतंत्रता दिवसों  पर मजदूरों को मजदूरी का भुगतान करते हैं। इससे उनके आर्थिक दशा पर प्रभाव पड़ता है। मालिक पक्ष इन छुट्टियों को समाप्त करना चाहते हैं या इसे कम करना चाहते हैं। 

उत्पादन बढ़ाने के लिए बुलाई गई इस बैठक का लब्बोलुआब यह था कि न्यूनतम वेतन अधिनियम के अन्तर्गत मजदूरों को वेतन देने से चाय बागानों को आर्थिक नुकसान होगा और उस नुकसान को पूरा करने के लिए मजदूरों से अधिक कार्य लेना पड़ेगा और उनकी दी गई सुविधाओं में कटौती करनी होगी। मजदूरों से हर हालत में 8 घंटे काम लिया जाएगा। मतलब  न्याय पूर्ण मजदूरी मांगने वाले चाय बागान मजदूरों को सबक सिखाया जाएगा। चाय बागान प्रबंधक और चाय बागान मजदूरों के वेतन में कितना अंतर है इस बात को कभी भी चाय बागान के आर्थिक हित वार्ता में कभी चर्चा नहीं की जा सकती है। 

दार्जिलिंग में चाय बागानों में काम करने वालों की संख्या कम हो गई है और डुवार्स में भी यही होने वाला है। भला 176 रूपयों में कौन 8 घंटा अपने खून पसीना को एक करके मालिकों को लाभ देना चाहेगा ?  जबकि चाय बागानों के बाहर मजदूरों को डुवार्स तराई में ही 400-500 रूपये अपने शारीरिक श्रम के बदले मजदूरी आसानी से मिल जाते हैं।

दार्जिलिंग के चाय बागानों में शिक्षा दर बढ़ गया है और डुवार्स तराई में भी क्रमशः यह बढ़ ही रहा है। अनपढ़ों और विकल्पहीन मजबूर लोगों का आर्थिक शोषण करना सहज है लेकिन चेतनाशील, शिक्षित और अन्य विकल्पों से लैस लोगों का अब चाय बागानों में शोषण होना मुश्किल है।

यदि चाय बागानों को बचाना है तो सरकार और चाय बागान मालिकों को इंसानियत और ईमानदारी का परिचय देना होगा और चाय मजदूरों के आर्थिक शोषण के लक्ष्य को दिमाग से निकालना होगा। फिलहाल तो नहीं लगता है कि चाय बागान मालिकों और पश्चिम बंगाल सरकार के पास चाय मजदूरों के लिए इंसानियत भरा कोई हमदर्दी है।

न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के पूर्व मजदूरों को मिलने वाली सभी सुविधाओं को मालिक पक्ष छीन लेना चाहता है और सरकार इस काम में मालिक पक्ष के साथ खड़ी नजर आती है। क्या सरकार को मालूम है कि चाय मजदूरों को रविवार या साप्ताहिक के अवकाश के लिए कोई मजदूरी नहीं मिलती है, जबकि रविवार का अवकाश सरकारी नीतियों और नियमों के तहत दी जाती है और सभी संगठित उद्योगों में मजदूरों को साप्ताहिक अवकाश के लिए भुगतान किया जाता है।

चाय बागान के मजदूर स्थायी मजदूर हैं और उन्हें पीएफ, ग्रेज्यएटी, मातृत्व अवकाश आदि अनेक कानूनी सुविधाएँ हासिल हैं, लेकिन उन्हें साप्ताहिक अवकाश के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता है। साल में कुल 52 सप्ताह होते हैं और चाय मजदूरों को इन 52 दिनों का कोई भुगतान नहीं मिलता है। लेकिन वे राष्ट्रीय और धार्मिक अवसरों पर दिए जाने वाले अधिकतम 15 दिनों की छुट्टियों के भुगतान को समाप्त करना चाहते हैं। आखिर क्यों ?  क्या दूसरे उद्योग और क्षेत्रों में स्थायी मजदूरों को ये अवकाश नहीं मिलते हैं ? चाय बागानों के मजदूर अधिकतर आदिवासी मजदूर हैं और वे दुर्गापूजा, कालीपूजा, होली दिवाली नहीं मनाते हैं। ये पर्व तो मालिक पक्ष मनाते हैं और अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जरूरतों को पूरा करते हैं।

यदि मजदूरों से वे इन पर्वों के बदले दिए जाने वाले भुगतान को छीनना चाहते हैं तो मजदूरों को हक है कि वे इन पर्वों के समय भी बागान में काम करें और सिर्फ अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पर्व त्यौहार करम, जितीया, नवाखानी, सरहुल बड़ादिन आदि के अवसरों पर छुट्टी रखें। या जो मजदूर जिस धर्म को मानता है, उस धर्म के अनुसार वह मजदूरी त्याग करके अपना अवकाश खुद तय करें। जब बागान मालिकों के पर्व त्यौहारों पर सवेतन अवकाश न मिले तो वे क्यों अपनी मजदूरी को उनके पर्व त्यौहारों पर बलिदान दे दें।

चाय पत्ती सीजन में एक मजदूर को मजदूरी पाने के लिए सामान्यता 24 किलोग्राम पत्ती तोड़ना होता है। 4.5 केजी पत्ती से एक किलोग्राम तैयार चाय बनती है। मतलब हर मजदूर रोज 24  4.5=5.33 केजी चाय बागान मालिक को बना कर देता है। नीलामी में औसतन प्रति केजी चाय न्यूनतम 151 रूपये में बिकता है। इसका मतलब है एक मजदूर रोज 804.83 रूपये कमा कर मालिक को देता है। बागान मालिक एक मजदूर से मजदूरी काट कर 628.83 रूपये कमाता है। यदि अन्य मद में 100 रूपये का लागत खर्च हो भी जाता है तो भी मालिक को 528.83 रूपये कमाई रोज होता है। लेकिन मालिक इतनी कमाई से संतुष्ट नहीं है वे मजदूरों के पॉकेट में हाथ डालना चाहते हैं ताकि उनकी अबाध कमाई बनी रहे।

जब मजदूर न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत न्यायपूर्ण मजदूरी की मांग कर रहे हैं तो मालिक पक्ष और सरकार उन्हें नकद राशि के रूप  में कुछ अधिक मजदूरी थमा कर उसकी वसूली अन्य तरीके से करने का दुष्चक्र कर रहे हैं। यह अत्यंत निंदनीय है। जबकि मालिक PLA (The Plantation Labour Act)  और  WBLR (West Bengal Labour Plantation Labour Rules) में लिखी गई अनेक बातों को कटौती करके पहले से ही मजदूरों का हक मार कर अपने मुनाफे में वृद्धि करने के अनेक रास्ते से लाभ बढ़ाने के उपाय ढूँढ चुकी है।

अस्पतालों में एमबीबीएस डाक्टर और प्रशिक्षित नर्स गायब हैं। जीवन रक्षक औषोधियौं की कितनी खरीदी की जाती है इसके क्या आंकड़े हैं ?  मजदूरों के पीएफ, ग्रेज्युएटी, आवास, रोड, नाली, मरम्मत के पैसे आदि की गबन कोई नई बात नहीं है। लकड़ी राशन, पानी बिजली के नाम पर मजदूरों को क्या सुविधाएँ मिलती है यह किसी से छुपी हुई नहीं है। मजदूरों में यूनिवर्सल पोषण की कमी सभी बातों को स्पष्ट रूप से बयान करती है।

चाय बागानों के चाय बनाने की प्रक्रिया में बागान मैनेजर कितना ध्यान रखते हैं? मजदूर कितनी मात्रा में चाय बागानों में उर्वरक और पेस्टिसाईड आदि का इस्तेमाल करते हैं इसे मैनेजर कितना देख पाते हैं ? आखिर यूरोपीय बाजार में भारतीय चाय यूरोपीय मानक में क्यों फेल हो जाते हैं ? यद्यपि भारतीय बाजारों में डुवार्स तराई के चाय की कीमत दूसरे राज्यों से अधिक होती है, लेकिन उनकी गुणवत्ता तय मानकों में खरा नहीं उतरती है और उसे निर्यात के लिए उपयुक्त नहीं समझा जाता है। क्या इन सभी त्रुटियों का का दोष मजदूरों का है ?

चाय बागान मालिक मजदूरों के कानूनी सुविधाओं और हक को मार कर मुनाफा कमाने के रास्ते को अपना हक और अधिकार समझते हैं जो उनके पेशेवरहीन होने का ऐलान करता है। पश्चिम बंगाल सरकार का श्रम विभाग उनके शोषण षडयंत्र को पूरी सहायता प्रदान करता है।  यदि चाय बागान प्रबंधन चाय बागानों में उत्पादन प्रक्रिया को गंभीरता से लेंगे और उच्च गुणवत्ता वाली चाय का उत्पादन करेंगे तो डुवार्स तराई के चाय 500-1500 रूपये से अधिक दाम में बिक सकते हैं। लेकिन बागान मालिक अपने उत्पादन को सुधारने कर आय बढ़ाने के प्रयास करने की जगह मजदूरों के जेब पर ही हाथ डालने का षड़यंत्र रच रहे हैं।

मजदूरों के शोषण को यथावत बनाए और उन्हें दीनहीन स्थिति में रखने का दूरगामी प्रभाव चाय उद्योग को बर्बाद कर देगा। क्योंकि तब चाय मजदूर चाय बागानों के कार्य से पूरी तरह विदा ले लेंगे और इससे अधिकतर बागान रूग्ण हो जाएँगे और अंततः बंद बागान में तब्दिल हो जाएँगे। तब दार्जिलिंग के चाय बागान हों या डुवार्स तराई के सभी जगह चाय के पौधे जंगल में तब्दिल हो जाएँगे और इन इलाकों के लोग चाय से नफरत करने लगेंगे। शोषक और अत्याचारी को दुनिया के किसी भी भाग में सम्मान नहीं मिलता है।

चाय बागान मालिक मजदूरौं के अधिकार और सुविधानों में कटौती करने के लिए प्रस्ताव पर प्रस्ताव दिए जा रहे हैं, लेकिन मजदूर संघ के पदाधिकारी अपना मूँह बंद करके रख रहे हैं। क्या वे नयी नवेली दुल्हन हैं जो मूँह को घुंघट से ढक कर रखती है।  ऐसा लगता है वे मजदूरों के हित में काम नहीं करते हैं बल्कि मालिकों के हित रक्षा के लिए मजदूरों को बेवकूफ बना रहे हैं। आखिर वे क्यों अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करते हैं ? वे क्यों नहीं कहते हैं कि यदि मालिक केवल नियम कानून और लाभ की बात करेंगे और मजदूरों को हासिल सुविधाओं और अधिकारों को खत्म करेंगे तो मजदूरों को न्याय दिलाने के लिए शोषण और अत्याचार में लिप्त बागान प्रबंधकों पर वे भी कानूनी कार्रवाई करने के लिए तैयार हैं? मजदूर संघ के पदाधिकारी कभी भी मजदूरों के अधिकार को लेकर कोर्ट जाने की बात नहीं करते हैं। यही वह बिन्दु है जहाँ वे बेनकाब हो जाते हैं।

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सरकार देगी चाय मजदूरों के बच्चों को रोजगारमूलक प्रशिक्षण

                                                                                        नेह अर्जुन इंदवार 

लगता है सरकार द्वारा चाय बागानों के आदिवासियों के लिए रोजगारमूलक कार्यक्रम उपलब्ध नहीं करने लिए किए जा रहे लगातार आलोचना की बात सरकार तक पहुँच गयी है। अब आम चुनाव के पूर्व सरकार 40 बंद, रूग्ण और अचल चाय बागानों के मजदूरों और उनके बच्चों के लिए पश्चिम बंगाल सोसायटी फॉर स्किल डिवलेपमेंट के द्वारा रोजगारमूलक प्रशिक्षण देने की घोषणा की है।

घोषणानुसार नार्सिंग सहित विभिन्न स्वास्थ्य सेवा, बैंकिंग और व्यावसायिक हिसाब किताब, व्यवसाय, वाणिज्य, डेटा इन्पुट, इलेक्ट्रोनिक्स, कम्प्यूटर हार्डवेयर, विकलांगों की देखभाल, पर्यटन व्यवसाय जनसंपर्क, विभिन्न सामग्री निर्माण, इंटिरियर डेकोरेशन, ब्युटीशियन, लकड़ी-कार्य, हस्तशिल्प, टेलरिंग, खुचरा और थोक व्यवसाय आदि के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा। इन प्रशिक्षणों के लिए राज्य के आईटीआई और विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों की मदद ली जाएगी।

इसके लिए सरकार द्वारा एक वेबपेज भी बनाया जाएगा। मुख्यमंत्री के निर्देशानुसार जलपाईगुड़ी, अलिपुरद्वार जिलों के चाय बागानों के मजदूर और उनके बच्चों तथा चाय बागानों में रहने वालों के लिए यह कार्यक्रम पाईलट परियोजना के अन्तर्गत चलाया जाएगा। इस परियोजना का लक्ष्य चाय बागानों में रहने वाले करीब चार लाख लोग हैं। पायलट परियोजना का मतलब है यह स्थायी प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह परिक्षण मूलक कार्यक्रम है। जिसे बाद में स्थायी किया जा सकता है या बंद भी किया जा सकता है। लेकिन उपरोक्त दो जिलों में सरकार द्वारा उत्कर्ष परियोजना की शुरूआत की गई है जो इसी तर्ज पर लोगों को रोजगारमूलक प्रशिक्षण देगा।

दोस्तों, चाय बागानों में मजदूरों की मुख्य मांग अपने आठ घंटे या 24 किलोग्राम हरी पत्तियाँ तोड़ने के बदले न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत एक सम्मानजनक मजदूरी जो आज की तारीख में किसी भी हालत में 350 रूपये से ज्यादा होना चाहिए, की मांग है। इसके साथ मजदूर उन आवास और भूमि में रहने के लिए कानूनी पट्टा की मांग कर रहे हैं, जिसमें वे पिछले एक डेढ़ सदी से रह रहे हैं। आज जो पीढ़ी चाय बागानों के उन घरों में रह रही है, उनके दादा और परदादा भी उन्हीं घरों में पैदा हुए थे और उन्हीं घरों में मर खप गए।

चाय बागानों की सारी भूमि सरकारी भूमि है और बागान मालिक को चाय बागान चलाने के लिए उन भूमि को लीज पर दिया जाता है। पश्चिम बंगाल ही नहीं, बल्कि देश भर में जहाँ कहीं सरकारी में गरीब लोग बस गए हैं और कई दशक तक बसे हुए हैं, सरकार वहाँ मानवीय दृष्टिकोण रखते हुए उन जगहों पर बसने वालों को उस भूमि के टूकड़े के मालिकाना हक के लिए उन्हें सरकारी पट्टा प्रदान करती है। चाय बागानों में तो सरकारी अनुमति और लाईसेंस के आधार पर चाय मजदूरों को उन भूमि या बस्ती में बसाया गया है। लेकिन वे आज भी उस भूमि के मालिकाना हक से वंचित है.। उल्लेखनीय है कि तत्कालीन भारत सरकार की औद्योगिक नीति की जरूरत के हिसाब से तब आदिवासियों को चाय बागानों में कानूनी रूप से लाया गया और बसाया गया था।

चाय बागानों के मजदूरों की मुख्य मांग मजदूरी और जमीन का पट्टा है। लेकिन सरकार दोनों ही चीजें देने में बहुत अनाकानी कर रही है। इसी बीच सरकार विभिन्न भाषा-भाषी समुदायों को संस्कृति विकास बोर्ड के नाम पर करोड़ों रूपये देने लगी है। आदिवासी समाज के नाम पर भी करीबन 20 करोड़ रूपये प्राप्त हुए हैं। हमारी मांग थी कि उन पैसों को चाय बागानों के बेरोजगारों के लिए प्रशिक्षण देने के लिए उपयोग किया जाए। लगता है, डुवार्स तराई के नौजवानों द्वारा फेसबुक और अन्य माध्यमों द्वारा बार-बार प्रशिक्षण की बात को उठाए जाने की बात सरकार तक पहुँची और सरकार प्रशिक्षण के लिए आगे आई है। हम सरकार की इस बात के लिए उन्हें बहुत बधाई देते हैं। साथ ही अनुरोध करते हैं कि चाय बागानों की अन्य समस्याओं को भी सरकार इसी सदाह्रदयता के साथ देखें। यदि सरकार चुनाव के पूर्व न्यूनतम वेतन और जमीन का पट्टा भी दे तो चाय बागानों के हर मददाता तृणमूल कांग्रेस को ही अपना वोट देंगे।

दोस्तों कौन कहता है, आसमान में छेद नहीं होता है, एक पत्थर तो तबियत से उछालों दोस्तों। फिलहाल हम इतना जरूर कहेंगे, कि फेसबुक जनमत बनाने और जनमत का आदान-प्रदान करने का एक मजबूत माध्यम है। जय हो फेसबुक की।नेह इंदवार

 

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