कम वेतन पर मजदूर काम नहीं करेंगे चाय बागानों में

                                                                                 नेह अर्जुन इंदवार

दार्जिलिंग टी एसोसिएशन से जुड़े संदीप मुख्योपाध्यय के अनुसार दार्जिलिंग के पहाड़ों में स्थित चाय बागानों में पिछले एक साल से 50 प्रतिशत चाय मजदूर अपने काम में नहीं आ रहे हैं। इसका चाय उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ा है और चाय उद्योग टूटने के कगार कर पहुँच चुका है। उनके अनुसार जब बागानों में 100 दिन रोजगार का काम शुरू हुआ था तो मजदूरों की अनुपस्थिति 20-25 प्रतिशत था, लेकिन अब वह बढ़ कर आधा हो गया है। सरकारी योजना के तहत चलाए जा रहे 100 दिन रोजगार में मजदूरों को 192 रूपये मिलते हैं, जबकि चाय बागानों में 176 रूपये। जाहिर है  कि अपने श्रम का मूल्य जहाँ अधिक मिलेगा, मजदूर उधर ही जाएँगे। कोई भी समझदार इंसान जानबुझ कर अपने शारीरिक श्रम और आर्थिक शोषण को नहीं चुनेगा।   

हाल ही में (नंवबर महीने के तीसरे हप्ते)  कोलकाता में सरकार, मालिकपक्ष और कुछ चुनिंदा मजदूर संघों के प्रतिनिधियों के बीच चाय उत्पादन बढ़ाने और मजदूरों से नियमित रूप से आठ घंटे काम लेने के विषय पर एक चर्चा हुई। मालिक पक्ष का कहना है कि वे सार्वजनकि अवकाश या सरकारी अवकाश- जैसे कालीपूजा, दुर्गापूजा, होली, गणतंत्रता और स्वतंत्रता दिवसों  पर मजदूरों को मजदूरी का भुगतान करते हैं। इससे उनके आर्थिक दशा पर प्रभाव पड़ता है। मालिक पक्ष इन छुट्टियों को समाप्त करना चाहते हैं या इसे कम करना चाहते हैं। 

उत्पादन बढ़ाने के लिए बुलाई गई इस बैठक का लब्बोलुआब यह था कि न्यूनतम वेतन अधिनियम के अन्तर्गत मजदूरों को वेतन देने से चाय बागानों को आर्थिक नुकसान होगा और उस नुकसान को पूरा करने के लिए मजदूरों से अधिक कार्य लेना पड़ेगा और उनकी दी गई सुविधाओं में कटौती करनी होगी। मजदूरों से हर हालत में 8 घंटे काम लिया जाएगा। मतलब  न्याय पूर्ण मजदूरी मांगने वाले चाय बागान मजदूरों को सबक सिखाया जाएगा। चाय बागान प्रबंधक और चाय बागान मजदूरों के वेतन में कितना अंतर है इस बात को कभी भी चाय बागान के आर्थिक हित वार्ता में कभी चर्चा नहीं की जा सकती है। 

दार्जिलिंग में चाय बागानों में काम करने वालों की संख्या कम हो गई है और डुवार्स में भी यही होने वाला है। भला 176 रूपयों में कौन 8 घंटा अपने खून पसीना को एक करके मालिकों को लाभ देना चाहेगा ?  जबकि चाय बागानों के बाहर मजदूरों को डुवार्स तराई में ही 400-500 रूपये अपने शारीरिक श्रम के बदले मजदूरी आसानी से मिल जाते हैं।

दार्जिलिंग के चाय बागानों में शिक्षा दर बढ़ गया है और डुवार्स तराई में भी क्रमशः यह बढ़ ही रहा है। अनपढ़ों और विकल्पहीन मजबूर लोगों का आर्थिक शोषण करना सहज है लेकिन चेतनाशील, शिक्षित और अन्य विकल्पों से लैस लोगों का अब चाय बागानों में शोषण होना मुश्किल है।

यदि चाय बागानों को बचाना है तो सरकार और चाय बागान मालिकों को इंसानियत और ईमानदारी का परिचय देना होगा और चाय मजदूरों के आर्थिक शोषण के लक्ष्य को दिमाग से निकालना होगा। फिलहाल तो नहीं लगता है कि चाय बागान मालिकों और पश्चिम बंगाल सरकार के पास चाय मजदूरों के लिए इंसानियत भरा कोई हमदर्दी है।

न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के पूर्व मजदूरों को मिलने वाली सभी सुविधाओं को मालिक पक्ष छीन लेना चाहता है और सरकार इस काम में मालिक पक्ष के साथ खड़ी नजर आती है। क्या सरकार को मालूम है कि चाय मजदूरों को रविवार या साप्ताहिक के अवकाश के लिए कोई मजदूरी नहीं मिलती है, जबकि रविवार का अवकाश सरकारी नीतियों और नियमों के तहत दी जाती है और सभी संगठित उद्योगों में मजदूरों को साप्ताहिक अवकाश के लिए भुगतान किया जाता है।

चाय बागान के मजदूर स्थायी मजदूर हैं और उन्हें पीएफ, ग्रेज्यएटी, मातृत्व अवकाश आदि अनेक कानूनी सुविधाएँ हासिल हैं, लेकिन उन्हें साप्ताहिक अवकाश के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता है। साल में कुल 52 सप्ताह होते हैं और चाय मजदूरों को इन 52 दिनों का कोई भुगतान नहीं मिलता है। लेकिन वे राष्ट्रीय और धार्मिक अवसरों पर दिए जाने वाले अधिकतम 15 दिनों की छुट्टियों के भुगतान को समाप्त करना चाहते हैं। आखिर क्यों ?  क्या दूसरे उद्योग और क्षेत्रों में स्थायी मजदूरों को ये अवकाश नहीं मिलते हैं ? चाय बागानों के मजदूर अधिकतर आदिवासी मजदूर हैं और वे दुर्गापूजा, कालीपूजा, होली दिवाली नहीं मनाते हैं। ये पर्व तो मालिक पक्ष मनाते हैं और अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जरूरतों को पूरा करते हैं।

यदि मजदूरों से वे इन पर्वों के बदले दिए जाने वाले भुगतान को छीनना चाहते हैं तो मजदूरों को हक है कि वे इन पर्वों के समय भी बागान में काम करें और सिर्फ अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पर्व त्यौहार करम, जितीया, नवाखानी, सरहुल बड़ादिन आदि के अवसरों पर छुट्टी रखें। या जो मजदूर जिस धर्म को मानता है, उस धर्म के अनुसार वह मजदूरी त्याग करके अपना अवकाश खुद तय करें। जब बागान मालिकों के पर्व त्यौहारों पर सवेतन अवकाश न मिले तो वे क्यों अपनी मजदूरी को उनके पर्व त्यौहारों पर बलिदान दे दें।

चाय पत्ती सीजन में एक मजदूर को मजदूरी पाने के लिए सामान्यता 24 किलोग्राम पत्ती तोड़ना होता है। 4.5 केजी पत्ती से एक किलोग्राम तैयार चाय बनती है। मतलब हर मजदूर रोज 24  4.5=5.33 केजी चाय बागान मालिक को बना कर देता है। नीलामी में औसतन प्रति केजी चाय न्यूनतम 151 रूपये में बिकता है। इसका मतलब है एक मजदूर रोज 804.83 रूपये कमा कर मालिक को देता है। बागान मालिक एक मजदूर से मजदूरी काट कर 628.83 रूपये कमाता है। यदि अन्य मद में 100 रूपये का लागत खर्च हो भी जाता है तो भी मालिक को 528.83 रूपये कमाई रोज होता है। लेकिन मालिक इतनी कमाई से संतुष्ट नहीं है वे मजदूरों के पॉकेट में हाथ डालना चाहते हैं ताकि उनकी अबाध कमाई बनी रहे।

जब मजदूर न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत न्यायपूर्ण मजदूरी की मांग कर रहे हैं तो मालिक पक्ष और सरकार उन्हें नकद राशि के रूप  में कुछ अधिक मजदूरी थमा कर उसकी वसूली अन्य तरीके से करने का दुष्चक्र कर रहे हैं। यह अत्यंत निंदनीय है। जबकि मालिक PLA (The Plantation Labour Act)  और  WBLR (West Bengal Labour Plantation Labour Rules) में लिखी गई अनेक बातों को कटौती करके पहले से ही मजदूरों का हक मार कर अपने मुनाफे में वृद्धि करने के अनेक रास्ते से लाभ बढ़ाने के उपाय ढूँढ चुकी है।

अस्पतालों में एमबीबीएस डाक्टर और प्रशिक्षित नर्स गायब हैं। जीवन रक्षक औषोधियौं की कितनी खरीदी की जाती है इसके क्या आंकड़े हैं ?  मजदूरों के पीएफ, ग्रेज्युएटी, आवास, रोड, नाली, मरम्मत के पैसे आदि की गबन कोई नई बात नहीं है। लकड़ी राशन, पानी बिजली के नाम पर मजदूरों को क्या सुविधाएँ मिलती है यह किसी से छुपी हुई नहीं है। मजदूरों में यूनिवर्सल पोषण की कमी सभी बातों को स्पष्ट रूप से बयान करती है।

चाय बागानों के चाय बनाने की प्रक्रिया में बागान मैनेजर कितना ध्यान रखते हैं? मजदूर कितनी मात्रा में चाय बागानों में उर्वरक और पेस्टिसाईड आदि का इस्तेमाल करते हैं इसे मैनेजर कितना देख पाते हैं ? आखिर यूरोपीय बाजार में भारतीय चाय यूरोपीय मानक में क्यों फेल हो जाते हैं ? यद्यपि भारतीय बाजारों में डुवार्स तराई के चाय की कीमत दूसरे राज्यों से अधिक होती है, लेकिन उनकी गुणवत्ता तय मानकों में खरा नहीं उतरती है और उसे निर्यात के लिए उपयुक्त नहीं समझा जाता है। क्या इन सभी त्रुटियों का का दोष मजदूरों का है ?

चाय बागान मालिक मजदूरों के कानूनी सुविधाओं और हक को मार कर मुनाफा कमाने के रास्ते को अपना हक और अधिकार समझते हैं जो उनके पेशेवरहीन होने का ऐलान करता है। पश्चिम बंगाल सरकार का श्रम विभाग उनके शोषण षडयंत्र को पूरी सहायता प्रदान करता है।  यदि चाय बागान प्रबंधन चाय बागानों में उत्पादन प्रक्रिया को गंभीरता से लेंगे और उच्च गुणवत्ता वाली चाय का उत्पादन करेंगे तो डुवार्स तराई के चाय 500-1500 रूपये से अधिक दाम में बिक सकते हैं। लेकिन बागान मालिक अपने उत्पादन को सुधारने कर आय बढ़ाने के प्रयास करने की जगह मजदूरों के जेब पर ही हाथ डालने का षड़यंत्र रच रहे हैं।

मजदूरों के शोषण को यथावत बनाए और उन्हें दीनहीन स्थिति में रखने का दूरगामी प्रभाव चाय उद्योग को बर्बाद कर देगा। क्योंकि तब चाय मजदूर चाय बागानों के कार्य से पूरी तरह विदा ले लेंगे और इससे अधिकतर बागान रूग्ण हो जाएँगे और अंततः बंद बागान में तब्दिल हो जाएँगे। तब दार्जिलिंग के चाय बागान हों या डुवार्स तराई के सभी जगह चाय के पौधे जंगल में तब्दिल हो जाएँगे और इन इलाकों के लोग चाय से नफरत करने लगेंगे। शोषक और अत्याचारी को दुनिया के किसी भी भाग में सम्मान नहीं मिलता है।

चाय बागान मालिक मजदूरौं के अधिकार और सुविधानों में कटौती करने के लिए प्रस्ताव पर प्रस्ताव दिए जा रहे हैं, लेकिन मजदूर संघ के पदाधिकारी अपना मूँह बंद करके रख रहे हैं। क्या वे नयी नवेली दुल्हन हैं जो मूँह को घुंघट से ढक कर रखती है।  ऐसा लगता है वे मजदूरों के हित में काम नहीं करते हैं बल्कि मालिकों के हित रक्षा के लिए मजदूरों को बेवकूफ बना रहे हैं। आखिर वे क्यों अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करते हैं ? वे क्यों नहीं कहते हैं कि यदि मालिक केवल नियम कानून और लाभ की बात करेंगे और मजदूरों को हासिल सुविधाओं और अधिकारों को खत्म करेंगे तो मजदूरों को न्याय दिलाने के लिए शोषण और अत्याचार में लिप्त बागान प्रबंधकों पर वे भी कानूनी कार्रवाई करने के लिए तैयार हैं? मजदूर संघ के पदाधिकारी कभी भी मजदूरों के अधिकार को लेकर कोर्ट जाने की बात नहीं करते हैं। यही वह बिन्दु है जहाँ वे बेनकाब हो जाते हैं।

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तृणमूल कांग्रेस पार्टी की ठगी नीति 10

नेह अ इंदवार 
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इतना तो तय लगता है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता संभाल रही तृणमूल कांग्रेस पार्टी की ममता सरकार मजदूरों को भिखारी समझती है। वह उसे पाँच दस रूपये से अधिक पाने के योग्य नहीं मानती है। वह वास्तविक रूप से चाय मजदूरों के लगातार शोषण का पक्षधर है और उन्हें शोषण के चक्र में फंसाए रखने में पूँजीपतियों को सहयोग देने के लिए तैयार है।
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6 अगस्त 2018 को उत्तरकन्या में श्रम दफ्तर के अधिकारियों ने चाय बागान मजदूरों के न्यूनतम वेतन के नाम पर दैनिक 172 रुपये मजदूरी देने का प्रस्ताव दिया था, जिसे मजदूर संघों ने सिरे से अस्वीकार्य कर दिया और 7 अगस्त से तीन दिनों के लिए बागान हड़ताल पर चले गए। तब हड़ताल को टालने के लिए सरकार ने 16 तारीख को उत्तरकान्य में फिर से बैठक करने का वादा किया था। इस 16 अगस्त 2018 को पश्चिम बंगाल के श्रम मंत्री मलय घटक आए और चाय बागान मालिकों के साथ बैठक की और मजदूरों के लिए 4 रूपये बढ़ोतरी का प्रस्ताव करते हुए कुल 176 रूपये दैनिक मजदूरी का प्रस्ताव दिया। न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत न्यूनतम मजदूरी 350 रूपये से अधिक की मांग कर रहे मजदूरों के लिए यह प्रस्ताव अत्यंत अपमान जनक है।
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आज कल शहरों में भिखारी भी पाँच रूपये से कम लेने से इंकार देते हैं। लेकिन सरकार ने 4 रूपये की बढ़ोतरी देकर अपने कड़े परिश्रम के बल पर पेट पाल रहे मजदूरों को भिखारी के समकक्ष ला छोड़ा। लेकिन देखिए किसी खास या गुप्त रणनीति के तहत काम कर रहे बागान मालिक पक्ष ने इसे मानने से इंकार कर दिया है। सबसे आश्चर्य की बात है कि मंत्री के इस प्रस्ताव को चाय बागानों में लीडरगीरी कर रहे तृणमूल कांग्रेस के ट्रेड यूनियन नेताओं ने स्वागत किया है। दोस्तों यह बहुत महत्वपूर्ण बात है। कृपया सभी इसे जरूर नोट करें ।
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दो साल पहले मैंने मालिक पक्ष और सरकारी अधिकारियों और मंत्रियों के बयानों के आधार पर अनुमान लगा कर लिखा था कि बागान मालिक और सरकार मिल कर मजदूरों को अधिकतम 182 रूपये दैनिक देने का ऐलान करेंगे और उसे चालू वर्ष के किसी पिछली तारीख से देने की घोषणा करेंगे। इस तरह वे पिछले कई महीनों (अब सालों) के करीबन कई अरब बकाया को बचा लेंगे। इस काम में कई मजदूर नेता भी उन्हें साथ देंगे और अंततः मजदूरों के साथ भारी धोखाधड़ी होगा।
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दो साल पहले के मेरे अनुमान अब सच होते लग रहे हैं। यह एक खुला रहस्य है कि मालिक मजदूरों को उनका न्यायपूर्ण न्यूनतम वेतन से वंचित रखना चाहते हैं। वे उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को करूणामय बना कर रखना चाहते हैं ताकि मजदूर गरीब और अनपढ़ रहें और बागानों के लिए सस्ते मजदूर मिलता रहे। मालिक और मजदूर के हित समान नहीं होते हैं। बागान मालिक नहीं चाहते हैं कि बागानों में सच्चा और मजबूत ट्रेड यूनियन पनपे।
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बागान मालिक तो मजदूरों के दोस्त नहीं हो सकते हैं। लेकिन राजनीति पार्टियाँ और ट्रेड यूनियन तो मजदूरों के हितसाक्षी हो सकते हैं। लेकिन लगता है, चाय मजदूरों के साथ कोई भी अंदरूपनी तौर से खूले मन से साथ नहीं हैं। शायद कुछ ही ट्रेड यूनियन मजदूरों के न्याय दिलाने में दिलचस्पी रखते हैं।
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न्यूनतम मजदूरी के लिए गठित समिति ने पिछले तीन साल में कई दिखावटी बैठक करने के सिवाय कोई काम नहीं किया। समिति के कार्य को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी श्रम मंत्रालय की थी, लेकिन उसने यह काम ठीक से किया नहीं। उधर तृणमूल पार्टी के ट्रेड यूनियन नेता और विधायक बार-बार कहते रहे हैं कि मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी जल्द दी जाएगी। लेकिन वे मांगे जा रहे मजदूरी से बहुत कम के प्रस्ताव का स्वागत कर रहे हैं। यह वकई में बहुत आश्चर्यजनक है।
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भारत के किसी भी संगठित क्षेत्र में पाँच दस या पचास रूपये की बढ़ोतरी नहीं होती है। सरकारी और गैर सरकारी संगठित क्षेत्रों में वेतन संशोधनों के द्वारा, सैकड़ों हजारों रूपयों से लेकर लाखों रूपयों की बढ़ोतरी होती है। खुद चाय बागानों के डायरेक्टगण औसतन एक करोड़ रूपये से अधिक वेतन (बोनस सहित) पाते हैं। बागान के मैनेजरों का वेतन 25 हजार से लेकर 5 लाख तक है।
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लेकिन कितने आश्चर्य की बात है कि माँ-माटी-मनुष की सरकार होने का दंभ भरने वाली सरकार ने 4 रूपये की बढ़ोतरी का प्रस्ताव देकर मजदूरों के गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया है। ये नेतागण मजदूरों को शायद भिखारियों से गया गुजरा समझते हैं !!!
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तृणमूल कांग्रेस के तमाम बड़े नेता तो कोलकाता के हैं, लेकिन डुवार्स तराई के बड़े या छोटे नेतागण तो चाय बागानों से संबंध रखते हैं। अधिकतर मजदूरों के चंदे से अपना घर परिवार चलाते रहे हैं। उन्होंने मजदूरों का नमक खाया है। वे मजदूरों की स्थिति से अन्जान हैं ऐसा तो कदापि नहीं हो सकता है। तो फिर वे क्यों सरकार की बातों से हर बार सहमति दिखा रहे हैं। क्या वे इतने मजबूर हैं कि वे मजदूरों की सामाजिक और आर्थिक हालातों का बयान भी कोलकाता के नेताओं के साथ नहीं कर सकते हैं। क्या वे सचमुच इतने मजबूर हैं कि सरकार की बातों से असहमति भी जाहिर नहीं कर सकते हैं ? यदि ऐसा है तो मजदूरों के साथ धोखाधड़ी तय लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि सरकार और चाय बागान मालिकों के बीच कोई गुप्त पैक्ट हो गया है और इसमें सत्ताधारी पार्टी के स्थानीय नेतागण भी मजबूरी में या किसी अज्ञात कारणों से खुशी-खुशी शामिल हो गए हैं।
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फिलहाल मजदूरों को अंतरवर्तीकालीन मजदूरी मिल रही है। यह अंतरवर्तीकालीन मजदूरी 2014 के अप्रैल महीने से मिल रहा है। 2014 के अप्रैल से लेकर 2018 के जुलाई तक कुल 51 महीने बीत गए हैं। इस 51 महीने के मजदूरी का एरियर Arrear (बकाया) मजदूरों को मिलना है। न्यूनतम तय मजदूरी के साथ मजदूरों को 51 महीने के डीए भी मिलना है। सरकार असंगठित मजदूरों के लिए न्यूनतम अधिनिय़म 1948 के तहत हर छह महीने में नोटिफिकेशन जारी करती है। असंगठित मजदूरों को जनवरी-जून 2014 में जितना डीए मिला था, उतना ही डीए चाय मजदूरों को भी मिलना है। बेसिक पे और डीए मिला कर जितना बनेगा, उससे अब तक के प्राप्त हुए वेतन को घटाया जाएगा और कुल एरियर की गणना की जाएगी। यह कई सौ करोड़ में होगा।
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यदि इससे मजदूरों को वंचित किया जाएगा तो चाय बागान मालिकों को सीधे-सीधे कई सौ करोड़ों रूपयों का फायदा होगा। कई सौ करोड़ रूपये बचाने के लिए बागान मालिक कुछ कई करोड़ रूपये उन्हें मदद करने वालों (?) को “चंदे” में देने के लिए सहर्ष तैयार हो जाएँगे।
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इस प्रक्रिया में, कुछ नेताओं की चाँदी हो सकती है। लेकिन मजदूरों को न्यायपूर्ण न्यूनतम वेतन हासिल नहीं होने से इसका बहुत-बहुत दूरगामी असर होगा।
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एक बार न्यूनतम वेतन तय हो जाने पर उसी वेतन पर आगे का नोटिफिकेशन जारी होता रहेगा। मजदूरों को बहुत होगा तो चार पाँच रूपयों का फायदा होगा। एक बार (मतलब इस बार) यह तय हो जाएगा तो इसे दुबारा प्रक्रिया में डाला नहीं जा सकेगा। कानूनन इसे पलटा नहीं जा सकेगा। एक बार मजदूरों द्वारा इसे स्वीकार कर लेने के बाद इसे किसी भी कोर्ट या अन्य कानूनी प्रक्रिया से दुबारा इस पर कोई सुनवाई नहीं होगी।
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300-350 रूपये से कम पर मजदूरी तय हो जाने पर मजदूर समाज अगले कई दशक तक गरीबी में जीवन जीने के लिए बाध्य हो जाएगा। वे बहुत कम आय पर अपने बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं दिला पाएँगे और उनके जीवन में कभी भी उजाला नहीं आ पाएगा। मजदूरों को कम मजदूरी के जाल में फंसाने के लिए सरकार कई प्रतीकात्मक कदम उठाने का दिखावा करेगी, लेकिन मजदूरों के जीवन में, उनके परिवारों में उन दिखावे के कदमों का कोई सीधा फायदा कभी नहीं मिलेगा। सारे सरकारी कदम सार्वजनिक होंगे, वे व्यक्तिगत नहीं होंगे और होंगे भी तो नाममात्र के दिखावा के लिए होगा।
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न्यायपूर्ण वेतन (कम से कम 350 रूपये) का आंदोलन चाय बागान के इतिहास का एक बहुत महत्वपूर्ण आंदोलन हैं। यह चाय मजदूरों की असली आजादी और मौलिक अधिकर पाने का आंदोलन है। आज तक मजदूरों के वेतन का निर्णय बाहरी लोग करते रहे हैं। इस बार मजदूरों को खुद इसकी लड़ाई लड़नी होगी। इसे किसी भी रूप में मजदूरों को जीतना है। हमारे जैसे लोग हजारों किलोमीटर दूर रहते हुए भी लगातार इसलिए लिख रहे हैं कि चाय मजदूरों को उनका हक मिले और वे भी अन्य भारतीय समाज के साथ आगे बढ़ें। यह शोषण के विरूद्ध मानव अधिकार और न्याय की लड़ाई है। ख्याल कीजिए कोई भी पार्टी या ट्रेड यूनियन मजदूरों को विस्तृत रूप से लिखित में न्यूनतम मजदूरी के फंडा के बारे नहीं बता रहा है और न बताएगा।
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यदि सत्ताधारी पार्टी से जुड़े ट्रेड यूनियन सरकार और सत्ताधारी कोलकातावासी नेताओं को आंखे बंद करके उनके अन्याय, चालाकी और ठगी भरे कदमों को समर्थन देंगे और उनका साथ नहीं छोड़ेंगे तो चाय बागानों के तृणमूल कांग्रेस के नेतागण क्या करेंगे ?
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क्या जो पार्टी और सरकार मजदूरों के गला को काटना चाहते हैं, उन्हें (मजदूरों को) शोषण के जंजीरों में जकड़ कर रखना चाहते हैं, उन्हें सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े बनाए रखना चाहते हैं, के साथ जाएँगे और तृणमूल कांग्रेस जिंदाबाद कहेंगे ?
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क्या वे एक जुमलेबाज पार्टी के लिए अपने ही परिवार, खानदान और समाज के सीने में खंजर घोपेंगे ? आखिर किसी बाहरी राजनैतिक पार्टी से वे कब तक बेकार की आशा करेंगे और धोखा खाएँगे ? क्या धोखा खाने की कोई सीमा नहीं है ? यदि आज वे सच्चे रूप से जागरूक नहीं होंगे तो उनका समाज हमॆशा के लिए एक गुलाम समाज बन जाएगा। क्या वे एक गुलाम समाज का हिस्सा होकर जीना पसंद करेंगे ? क्या वे वकई में सच्चे नेता हैं और अपने समाज का सच्चे ढंग से सही नेतृत्व कर पा रहे हैं ?
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चाय मजदूरों के साथ तृणमूल कांग्रेस पार्टी की ठगी कथा-7

नेह अ इंदवार

और जैसे कि आशंका थी तृणमूल कांग्रेस पार्टी की माँ-माँटी-मनुष्य की सरकार ने फिर से चाय मजदूरों के साथ न्यूनतम मजदूरी के नाम पर ठगी का खेल दिखाया। इस बार खेल दिखाने के लिए मंत्री महोदय उपस्थित नहीं थे। इस खेल को दिखाने का जिम्मा अफसरों को दिया गया था। एक दिन पूर्व जब खबरों में कहा गया कि बहुप्रतीक्षारत न्यूनतम वेतन की घोषणा श्रम मंत्रालय के अफसर करेंगे, तब ही स्पष्ट हो गया था कि न्यूनतम वेतन के नाम पर राज्य सरकार द्वारा दिखाई जा रही मदारी का खेल का पटाक्षेप नहीं होगी, बल्कि अनवरत चल रहे धारावाहिक की अगली कड़ी होगी। मतलब साफ है सरकार मजदूर संघों को समझाना चाहती है “तेल देखो और तेल की धार देखो।“

जनता को एक ही बार में आकृष्ट करने वाला नारा “माँ-माँटी-मनुष्य की सरकार” से आम जनता को अपने निकट आकृष्ट करने वाली सरकार के मन में चाय मजदूरों के लिए कितना सौतेलापन भरा हुआ है। यह सरकार द्वारा 172 की न्यूनतम वेतन के प्रस्ताव में झलक रहा है। इस तरह की भद्दा मजाक शायद ही दुनिया के किसी हिस्से में की गई होगी। 172 रूपये का प्रस्ताव देने का मतलब है कि सरकार पहले ही इसे 180-182 रेंज में देने के लिए मन बनाई है और सिर्फ सरकारी मोल तोल की ताकत दिखाने के लिए तथाकथित न्यूनतम वेतन की घोषणा के नाम पर 172 रूपये का प्रस्ताव दिया। इस तरह की घोषणा के बाद सरकार और एक दो बार बैठक का दिखावटी आयोजन करेगी और एकतरफा फैसला लेकर जबरदस्ती दो चार रूपये को बढ़ा कर एक नोटिफिकेशन निकाल देगी।
पश्चिम बंगाल सरकार चाय मजदूरों को कितना पश्चिम बंगाल के माटी के संतान समझती है। यह पिछले 72 साल का निकृष्ट शोषण का इतिहास बताती है। सरकार चाय मजदूरों को सिर्फ निकृष्ट गुलाम समझती है। वह चाय बागान मालिकों को खून चूसने की मनोवृत्ति को सरकारी मान्यता देकर संविधान में दी गई शोषण के विरूद्ध स्वतंत्रता का हनन में सरभागी बने रहना चाहती है।

पश्चिम बंगाल के चाय मजदूर भारत के ही संविधान और कानून के तहत बने नियमों के अधीन चल रहे चाय बागानों के चाय मजदूर हैं और चाय उद्योग उनके सहयोग के बिना एक दिन भी नहीं चल सकता है। तमिनाडु, केरल, कर्नाटक में मजदूरों को 300 रूपयों से अधिक की मजदूरी मिलती है। जबकि वहाँ के चाय का दाम भारत में सबसे कम है। पश्चिम बंगाल के चाय की कीमत सबसे ज्यादा है, लेकिन पश्चिम बंगाल में बागान मालिक सबसे कम मजदूरी देकर चाय मजदूरों का शोषण करते हैं। सरकारी विभागों को यह बात अच्छी तरह मालूम है, लेकिन पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी पार्टी के भ्रष्टाचार में डुबे मानसिकता ने चाय मजदूरों को हमेशा शोषित होने के लिए मझधार में छोड़ दिया है।

चाय बागान के सभी दोस्त कृपया निम्नलिखित लिंक में जाकर देखें कि भारत के चाय बाजार में किस राज्य के चाय की कीमत क्या है ?

http://www.teaboard.gov.in/WEEKLYPRICES/2017 /

यह टी बोर्ड के वेबपेज का हिस्सा है और सभी से अनुरोध है कि वे कृपया इसे अपने मोबाईल या कम्प्यूटर में डाउनलोड करके सेव कर लें। इसे मजदूर और मजदूरों के स्थानीय नेताओं को दिखाएँ। पश्चिम बंगाल और असम के बागान मालिक पाँच दस रूपये की बढ़ोतरी देकर मजदूरों का शोषण करते हैं और कहते हैं कि The Plantation Labour Act 1951 के कारण सामाजिक क्षेत्र में भारी निवेश करना होता है और इस पर व्यय भी भारी होता है। लेकिन यही एक्ट दक्षिण भारत के चाय बागानों में भी लागू है वहाँ भी बागान चलाने वाली कंपनियों को यह खर्च उठाना पड़ता है। वहाँ तो चाय बागान कम आय करके भी रूग्न नहीं हो रहे है और न ही मजदूरों को वहाँ ठगा जाता है। वहाँ के श्रम अफसर को बागान में आते देख कर ही मैनेजर की सांस रूक जाती है। किसी भी मामले में किसी भी नियमों की चूक पर श्रम मंत्रालय चाय बागान पर भारी जुर्माना लगाते हैं और कानूनी कार्रवाई करते हैं। मैंने खूद तमिलनाडु के चाय बागानों और वहाँ के श्रम मंत्रालय में जाकर इस बात की जानकारी ली थी।

लेकिन पश्चिम बंगाल में श्रम दफ्तर के अफसरों को देखकर बागान मैनेजर बहुत खुश होते हैं और उन्हें कुछ रूपये देकर घुस देकर उन्हें बिदा करते हैं। इसीलिए The Plantation Labour Act 1951 के तरह चाय बागानों में कोई भी सुविधा मुक्कमल ढंग से चाय मजदूरों को नहीं मिलती है। इस एक्ट के नाम पर चाय बागान भारी कमाई करते हैं। लेकिन इसी एक्ट के नाम पर चाय मजदूरों को उनके न्यायपूर्ण वेतन से उन्हें वंचित भी करते हैं। यदि यह एक्ट चाय मजदूरों को 350-500 रूपये देने में रूकावट डालते हैं तो मजदूरों को मांग करनी चाहिए कि सरकार चाय बागानों को इन एक्ट से मुक्त कर दें और सामाजिक सुविधा के नाम पर दिए जाने वाले तमाम सुविधा मसलन – अस्पताल, राशन, घर, घर की मरम्मत, नाली, बिजली, टायलेट, स्कूल की गाड़ी आदि के बदले नगद रूपये दे दे। यह किसी भी तरह से दैनिक 500 रूपये से कम नहीं होगा। इसका मतलब होगा मजदूरों को महीना 13 हजार रूपये मिलेंगे। जब इन सुविधाओं को बागान मालिक ठीक से देता ही नहीं और सरकार बागान की गफलती पर कोई कार्रवाई करती ही नहीं तो इन सुविधाओं के नाम पर मजदूरों का शोषण क्यों अनवरत चलता रहे ?

तृणमूल के चाय बागान ट्रेड यूनियन सरकारी शोषण के मान्यता पर सहमति देता है। मतलब यह ट्रेड यूनियन चाय मजदूरों के कल्याण के लिए काम नहीं कर रहा है बल्कि सरकारी ठगी को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए ठगी करने के स्तर पर उतर गया है। नहीं तो क्या कारण है कि यह 172 रूपये के सरकारी प्रस्ताव को न्यायपूर्ण मजदूरी कह रहा है। आज चाय मजदूरों को अपने हित की लड़ाई में कौन उनका दोस्त है और कौन उनका शोषक यह जानना बहुत जरूरी है। मैंने कभी तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में वोट देने के लिए लोगों से आग्रह किया था, उसे सचमुच माँ-माटी और मनुष्य का पार्टी समझ लिया था, लेकिन अब तक के उनके नेताओं के रवैये से मुझे अपने विश्वास को तोड़ना पड़ा। सचमुच यह एक निराशा का समय है और डुवार्स तराई के हर जागरूक इंसान को इस पर गहरे रूप से चिंतन और मनन करने की जरूरत है। पार्टी कोई माँ-बाप नहीं है कि उसे बदला नहीं जा सकता है। बल्कि उसे तो सकरात्मक नीतियों, नियमों को बनाने के लिए समर्थन दिया जाता है। वह किसी के खून चूसने में सहायक की भूमिका निभाए और हम उसे अनवरत समर्थन देते रहे, इससे बड़ी बेवकूफी तो पूरी दुनिया में दूजा कोई नहीं होगा।

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डुवार्स तराई की चाय बागान मजदूरी गाथा-6

नेह अ इंदवार

1 अप्रैल 2011 से लागू तीन वर्षीय त्रिपक्षिक वेतन समझौता तीन साल चलने के बाद 31 मार्च 2013 को खत्म हो गया था। 1 अप्रैल 2014 से नया वेतन समझौता लागू होना था। लेकिन मजदूरों ने कहा हम तीन वर्षीय त्रिपक्षिक समझौता नहीं चाहते हैं। हमें न्यूनतम मजदूरी चाहिए। सरकार और मालिक पक्ष ने बहुत मनाने की कोशिश किया। लेकिन अडिग मजदूरों ने मालिक और सरकार की बात को माना नहीं। वे आंदोलन किए, गेट मिटिंग किए, कई दिनों तक हड़ताल किए। तब सरकार ने थक हार कर कहा “ठीक है मजदूरों तुम्हें न्यूनतम मजदूरी दी जाएगी, लेकिन उसके लिए कुछ समय लगेगा। नये ढंग से मजदूरी की गणना किए जाने की आवश्यकता होगी।”
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सरकार ने न्यूनतम वेतन निर्धारण करने के लिए एक समिति बना दी। सरकार ने कहा “जब तक न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत कानूनी रूप से वेतन निर्धारित नहीं होता, तब तक अंतरवर्तीकालीन मजदूरी दी जाएगी। और तब से चाय बागान मजदूरों को अंतरवर्तीकालीन मजदूरी दी जा रही है। इसका स्पष्ट और कानूनी मतलब है कि चाय मजदूरों को 1 अप्रैल 2014 से अंतरवर्तीकालीन मजदूरी दी जा रही है। इस अंतरवर्तीकालीन शब्द का ईजाद पश्चिम बंगाल के श्रम मंत्री श्रीमान मलय घटक ने किया है। इस शब्द को मजदूरों को नहीं भूलना चाहिए। वे इस अंतरवर्तीकालीन शब्द को स्थायी शब्द में न बदल दें, इसका ध्यान हमें रखना चाहिए।
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इसका मतलब यह होगा कि अंतरवर्तीकालीन मजदूरी के बदले मजदूरों के लिए निर्धारित होने वाला न्यूनतम वेतन दिनांक 1 अप्रैल 2014 से लागू होगा। चाहे जितना भी न्यूनतम वेतन निर्धारित होगा, वह कानूनन, सरकारी घोषणा और सरकारी नोटिफिकेशन के अनुसार दिनांक 1 अप्रैल 2014 से ही लागू होगा। उसके बाद की किसी भी तारीख से नहीं। उसके बाद की किसी भी तारीख से उसे लागू करना सरकार की नोटिफिकेशन और घोषणा को झूठा साबित कर देगा और यह कानून की नजर में गैरकानूनी होगा और उसे न्यायालय अवैध घोषित कर देगा।
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इसी आधार पर अर्थात् इसी सिद्धांत पर सरकार द्वारा घोषित 17.50 रूपये की वृद्धि भी अंतरवर्तीकालीन वृद्धि है।
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चाय मजदूरों, ट्रेड यूनियन के नेताओं को बस इतना याद रखना है कि मजदूरों को न्यूनतम वेतन या मजदूरी दिनांक 1 अप्रैल 2014 से मिलना है। अभी जो मजदूरी मिल रही है उसे घटा कर शेष बची राशि को मजदूरों को एरियर के रूप में मिलना है। यह राशि काफी मोटी होगी और इसे चाय बागान मालिक देने से इंकार करेंगे और वे सरकार पक्ष को अपनी ओर मिलाने के लिए भ्रष्टाचारियों को घुस देकर मजदूरों के साथ अन्याय करने के लिए दबाव डालेंगे। वे चाहेंगे कि न्यूनतम मजदूरी को बाद के किसी साल मसलन 2017 या 2018 से लागू किया जाए।
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मजदूरों को बस इसी ठगी से बचना है। मजदूरों को इतना ही याद रखना है कि उन्हें दिनांक 1 अप्रैल 2014 से मजदूरी मिलना है और वे उसे ही लेंगे,
किसी अन्य तारीख से लागू करने वाले वेतन को नहीं। भले ही इसके लिए मजदूरों को न्यायालय (कोर्ट) जाना पड़े।
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बागान मालिक लोग एरियर देने से बचने की पूरजोर कोशिश करेंगे। वे कहेंगे कि बागान रूग्ण हो जाएँगे। बागान की आर्थिक दशा खराब हो जाएगी। वे लोग कुछ बागानों को बंद करके मजदूरों को डराने की कोशिश भी करेंगे तो भी डरना नहीं है। यदि बागान के पास पैसा नहीं है तो वह बागान छोड़ दें। लेकिन अन्याय को जारी रखने की कोशिश न करें।
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यदि न्याय और अन्याय में से किसी को चुनना पड़े तो हमें सिर्फ न्याय को चुनना है। अन्याय तो पिछले सौ सालों से किया ही जा रहा है।
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चाय बागानों में लड़ी जा रही आजादी की अंतिम लड़ाई में, अनवरत भूख और झोलाछाप डाक्टरों के गलत दवाईयों से मरे हजारों लोगों की आत्माएँ भी साथ में है, और वे हमारी जीत के लिए स्वर्ग से दुआएँ दे रही हैं।

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डुवार्स तराई के बागान मजदूरों के साथ हो रही सरकारी ठगी कथा-5

नेह इंदवार 

उत्तरकन्या, सिलीगुड़ी में दिनांक 12 जुलाई को आहुत बैठक में पश्चिम बंगाल राज्य की मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने कहा है कि वाममोर्चा सरकार के मुकाबले उनकी सरकार ने चाय बागान मजदूरों की मजदूरी सबसे अधिक बढ़ायी है और इसे अब 159.50 रूपये कर दी है और उसे बढ़ा कर 176 रूपये करने का प्रयास किया जाएगा।

एक मुख्यमंत्री का बयान अपने आप में वजनदार और नीति-निर्धारक होती है। उनके एक-एक सार्वजनिक बयान का रिकार्ड रखा जाता है और राज्य के तमाम संबंधित मंत्रालय और नौकरशाही तंत्र उस रिकार्ड के अनुसार ही नीति बनाती है और उस नीतियों के आधार पर ही कोई भी सरकारी निर्णय को लागू किया जाता है।  

चाय मजदूरों के न्यूनतम वेतन वृद्धि के लिए सरकार ने एक त्रिपक्षीय सलाहकार समिति का गठन किया है। नियमतः उस समिति को अधिकार दिया गया है कि वह तमाम कानूनी पहलूओं, पृष्टभूमि और जमीनी स्तर की सच्चाईयों को लेकर एक सार्वमान्य निर्णय पर पहुँचे और सरकार को सामुचित अनुशंसा करे। सरकार उस अनुशंसा के आधारों की जाँच करेगी और फिर उसे कैबिनेट की स्वीकृति और राज्यपाल की सहमति के बाद उसे जमीना स्तर पर लागू करने के लिए नोटिफिकेशन जारी करेगी।

लेकिन पश्चिम बंगाल में चाय बागान मजदूरी के नाम पर कई आश्चर्यजनक घटनाएँ घट चुकी है। आईए इन घटनाओं को जरा जानने की कोशिश करते हैं।

  1. The Plantation Labour Act 1951 के तहत पहले चार सदस्यों के एक श्रमिक परिवार को औसत 32 केजी राशन मिलता था, जिसे बागान 21 रूपये की दर से फूड कार्पोरेशन ऑफ इंडिया से प्राप्त करता था और 40 पैसे प्रति केजी की दर से मजदूरों को आपूर्ति करता था। राशन के लिए एक परिवार के लिए बागान प्रबंधन महीने में कुल 672 रूपये व्यय करता था। बागान प्रबंधन मजदूरों से 40X32=12.80 लेकर 32 केजी राशन देता था।   यह बात बागान मालिक संघ ने वेतन समझौते की चर्चा-प्रक्रिया के दौरान लिखित में सरकार को पेश किया था।

तब 2015 के वेतन समझौते के समय मजदूर संघों ने न्यूनतम वेतन की मांग की थी और न्यूनतम वेतन के लिए मजदूरों को मिलने वाले तमाम सुविधाओं का रूपये में कितनी लागत कितना आती है, उसकी एक सूची चाय बागान मालिक संघ ने सरकार को प्रस्तुत किया था। मजदूरों को मिलने वाला राशन, मजदूरी की ही एक भाग होती है। यदि मजदूर को राशन (चावल, आटा) न दिया जाए तो राशन के बदले उसकी लागत को नकद राशि के रूप में मजदूर को भुगतान किया जाना चाहिए। यही वेतन के लिए स्वीकार्य साधारण सिद्धांत है, जिसका पालन पूरी दुनिया में होती है।

  1. देश में सन् 2013 में National Food Security Act, 2013 बना और इसे पूरे देश में लागू किया गया। जिसे पश्चिम बंगाल में भी विधान सभा चुनाव के पूर्व राज्य सरकार ने खाद्य साथी योजना के नाम से फरवरी 2016 से लागू चाय बागानों में लागू किया और तब से चाय बागानों के मजदूरों को 2 रूपये किलोग्राम के दर सरकारी राशन मिलने लगा है।

मजदूरों को सरकारी राशन मिलने के बाद फरवरी 2016 से ही राशन के बदले मजदूरों को बागान प्रबंधन से 660 रूपये नकद के रूप में मिलना चाहिए था। इसे लेकर खाद्य मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक और श्रम मंत्री के बीच एक बैठक भी हुई थी और इस बैठक के परिणाम स्वरूप सरकार 660 रूपये मजदूरों को देने के लिए आदेश भी देने वाली थी। लेकिन एकाएक क्या हुआ कि सरकार ने 660 के बदले मजदूरों को प्रति दिन 9 रूपये देने का आदेश निकाला। 9 रूपये करके अब मजदूरों को 660 रूपये के बदले महज 216 रूपये मिलते हैं। यह एक अन्याय भरा निर्णय था।  यह एक संवेदनहीन सरकार द्वारा मजदूरों के विरूद्ध में दिया गया एक आश्चर्यजनक निर्णय था। मजदूरों के मेहनत की कमाई को कम करने का सरकार को कोई अधिकार नहीं है। क्योंकि यह राशि दी प्लान्टेशन लेबर एक्ट 1951 के प्रावधानों के तहत मिल रहा था न कि किसी राज्य सरकार के किसी आदेश के तहत।  लेकिन ममता बनर्जी की सरकार ने ऐसा करके चाय बागान मजदूरों के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। मजदूरों के लिए काटे गए 444 रूपये मासिक एक बड़ी राशि है। चाय बागानों में काम करने वाले तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने इसका कोई विरोध नहीं किया।

  1. आश्चर्यजनक तीसरी बात यह है कि सरकार द्वारा न्यूनतम मजदूरी के लिए समिति बनी हुई है, और इसकी बैठक चल ही रही है। फिर भी सरकार ने एकपक्षीय निर्णय करते हुए मजदूरों को अंतरवर्तीकालीन मजदूरी बढ़ोतरी के रूप में रूपये 50  जबरदस्ती बढ़ा दिया और मालिक पक्ष को फरमान दे दिया कि चाहे मजदूर न लेना चाहें लेकिन प्रबंधन जबरदस्ती उसे भुगतान करे।
  1. अब आश्चर्यजनक चौथी बात खुद मुख्यमंत्री ने की है। न्यूनतम वेतन की समिति को एक समय-सीमा के अंदर अपनी अनुशंसा प्रस्तुत करने के लिए प्रशासनिक आदेश देने के बजाय खुद एकतरफा मजदूरों की मजदूरी 176 रूपये करने की बात कह रही है। सरकार की कार्यप्रणाली पर यह एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।

अब राज्य की मुख्यमंत्री खुद अपने द्वारा बनाई गई समिति को दरकिनार करके एकतरफा निर्णय ले रही है तो सवाल उठता है कि उन्होंने क्यों आज से तीन साल पूर्व ही एकतरफा निर्णय लेकर मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं दिया ? आखिर न्यूनतम वेतन के लिए समिति बनाने की क्या जरूरत थी ?  क्या समिति की अब कोई इज्जत भी बची हुई है ?  

मैंने पहले ही ऊपर लिखा है कि एक मुख्यमंत्री के एक-एक बयान को पूरा करने के लिए पूरा शासन प्रशासन लग जाता है। यदि मुख्यमंत्री ने 176 रूपये मजदूरी की बात की है तो अब शासन प्रशासन और इसके लिए बनाई गई समिति भी इतना ही मजदूरी देने के लिए कमर कस लेगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह समिति अब न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948, जमीनी स्तर की यथार्थ को लेकर कोई निर्णय लेगी या मुख्यमंत्री की बात को पूरा करने के लिए 176 रूपये की घोषणा करेगी।

तृणमूल की सरकार ने मजदूरों के राशन के 660-214=444 रूपये को मजदूरों से छीना है यदि 444 को बागान के 24 कार्यदिवस से भाग किया जाए तो (444÷24=18.50) प्रति दिन रूपये 18.50 होता है। यदि इसे फिलहाल के 169.50 के साथ मिला दिया जाए तो यह 169.50+18.50 =188 रूपये होता है। मतलब सरकार मजदूर के राशन के राशि को लूट कर मजदूरी वृद्धि के नाम पर उसे ही मजदूर को देने का षड़यंत्र कर रही है। उसमें भी सरकार पुनः 188-176=12 रूपये छीनने का प्लान बना रही है। बंगाली में एक कहावत है कि “सयाने लोग मछली के तेल से ही मछली की फ्राई करते हैं।“ मजदूरों के साथ पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा किए जा रहे व्यवहार से सरकार के “अत्यधिक सयाने” होने के सबूत अपने आप मिल रहे हैं। मजदूरों के दुख-दर्द को कोलकाता के लोग कभी नहीं समझ सकते हैं यह स्पष्ट होता जा रहा है।   

अब देखना है कि तृणमूल के स्थानीय नेतागण किस करवट पैंतरा बदलते हैं।  तृणमूल कांग्रेस पार्टी के एमएलए, एमपी, तमाम जिला स्तर के नेतागण और स्थानीय स्तर के नेतागणों ने मुख्यमंत्री की बड़ाई करके उन्हें राज्य के उन्नयन और विकास की प्रतीक कहके विधानसभा और पंचायत चुनाव में वोट मांगा था। मजदूरों से उनकी बातों पर विश्वास करके उन्हें भारी संख्या में वोट भी दिया था।  सवाल है कि अब वे क्या करेंगे ? क्या उनमें इतनी साहस है कि वे मुख्यमंत्री को न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत मजदूरी देने के लिए निवेदन कर सकेंगे ? अपने ही समाज और स्थानीय समाज के गरीब मजदूरों के साथ होने वाली ठगी और धोखेबाजी में उनका क्या रवैया होगा ? क्या वे पार्टी को त्याग देंगे या न्याय पूर्ण मजदूरी के लिए आंदोलन करने में विपक्ष का साथ देंगे या फिर इसे लेकर कोर्ट जाने के लिए कोई निर्णय लेंगे ?

सवाल बहुतेरे है। अब देखते हैं ऊँट किस करवट बैठता है। अभी न्यूनतम वेतन के लिए बनाई गयी सलाहकार समिति का निर्णय आना है। जब वह आएगी तब ही वास्तविक स्थिति से मजदूर अवगत होंगे। इंतजार कीजिए और देखिए कि मजदूरों के खून चुसने वाली नीतियाँ चाय बागानों में जारी रहेगी, या न्यायपूर्ण मजदूरी प्राप्त होगी ?  

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डुवार्स तराई की सरकारी ठगी कथा- 4

नेह इंदवार 

यदि सिलीगुड़ी और अन्यत्र से प्रकाशित बंगला हिंदी और अंग्रेजी खबरों के प्रत्येक शब्दों पर विश्वास किया जाए तो यह कहने में मुझे कोई गुरेज नहीं कि डुवार्स तराई के चाय बागानों के मजदूरों के साथ एक बार फिर सरकारी ठगी कथा दूहराई जाएगी।

और दोस्तों इस बार यह सरकारी ठगी कथा का मंचन और कोई नहीं बल्कि माँ माटी और मनुष्य की उन्नयन और विकास की सरकार द्वारा की जाएगी। इस ठगी कथा का मंचन कैसे होगा, इस पर संक्षिप्त में कथा-वचन कर लेते हैं। 
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माँ माटी और मनुष्य की दीदीमुनी ममता दीदी ने चाय बागानों के प्रतिनिधियों से उत्तरकन्या में दिनांक 12 जुलाई 2018 को बैठक की और कहा कि
“वाममोर्चा के शासन के दौरान चाय मजदूर 67 रूपये पाते थे, हमारे आने के बाद वे 159 रूपये पा रहे हैं। अब इसे बढ़ाकर 176 रूपये करने का लक्ष्य है।“ 
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मतलब न्यूनतम वेतन के लिए गठित समिति Eye Wash है। 
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डुवार्स तराई के दोस्तों और चाय मजदूरगण, यह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री का चाय मजदूरी पर पहला बयान है। इससे पहले वे इस विषय पर कुछ भी बोलने से बचती रहीं हैं। 
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कृपया आप इसे उनका ऐतिहासिक बयान मान लें। ऐतिहासिक इसलिए कि माँ, मनुष और माटी की ममतामयी मामता दीदी ने न्यूनतम मजदूरी के बारे इस बार भी जिक्र तक नहीं किया। मतलब सरकार ही मजदूरी विषय पर सब कुछ करेगी, लेकिन दोष न्यूनतम मजदूरी के लिए बनी समिति पर मढ़ देगी।
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शायद ममता दीदी भूल गई कि उनके शासन में राज्य ने सात वर्ष पूरे कर लिया है । इन सात वर्षों में महंगाई ने लम्बी छलांग लगाई है। सभी क्षेत्रों के वेतन में भारी उछाल आया है। उनके लिए यह लज्जा का विषय नहीं है कि पूरे देश में उनकी ही शासन में चाय मजदूर को पश्चिम बंगाल में ही सबसे कम मजदूरी दी जाती है। चाय मजदूर संविधान और कानून के तहत न्यूनतम मजदूरी मांग रहे हैं और ममता दीदी सात बरस गुजर जाने और माँ माटी और मनुष की तथाकथित उन्नयन और विकास की सरकार आने के बावजूद चाय मजदूरों की बात उठने पर वाममोर्चा के शासन की याद दिलाने में कोई कंजूसी नहीं करती है। मतलब इनकी नजर में वाममोर्चा की सरकार बस कुछ महीने पहले की सरकार थी, सात साल पहले की नहीं। बीजेपी भी अपनी हर असफलता के लिए 60 वर्ष कांग्रेस शासन को दोष देती है। जुमलेबाजों में कितनी समानता है ?

उनके लिए मजदूरों के न्यायपूर्ण मजदूरी की बात का कोई मायने या मतलब नहीं है। बस उसे इतना ही याद है कि वाममोर्चा के समय मजदूरी में दो चार रूपये की बढ़ोतरी होती थी और अब वह एक साथ 17.50 रूपये की बढ़ोतरी कर रही है। 
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यह मजदूरों की बदनसीबी है कि उनकी कल्याण की बात करने वाली मुख्यमंत्री मजदूरों को कानून में विहित न्यायपूर्ण न्यूनतम मजदूरी देने की बात नहीं करती है और न उन्हें इस बात का कोई दुख है कि उनके ही शासन में न्याय, समानता और संवैधानिक अधिकारों का खुलेआम हनन हो रहा है। मजदूरों के अंतहीन शोषण को सुक्ष्म नजर से देखने में ममता दीदी पूरी तरह असफल दिखाई दे रही हैं। यह महान अफसोस और दुख की बात है। 
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इसी बैठक में उपस्थित श्रम मंत्री मलय घटक ने कहा कि वाममोर्चा के शासन काल में 1991 में रूपये 2.70, 1992 में रूपये 1.14, 1994 में 1.25, 1994 में रूपये 1.25, 1996 में रूपये 1.00, 1997 में रूपये 3.00, 1998 में 3.00, 1999 में रूपये 2.50, 2005 में रूपये 3.00 की वृद्धि की गई थी (स्रोत कोलकाता से 13 जुलाई 2018 को प्रकाशित सन्मार्ग)। शायद उनके पास 2006 से लेकर 2010 तक के आंकड़े नहीं थे, इसलिए उन्होंने उक्त अवधि के दौरान के आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए होंगे या फिर अखबार वालों ने उसे छापा नहीं। 
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श्रीमान मलय घटक के इस बेतुके से लगने वाले आंकड़ेबाजी पर ध्यान दें। यह सरकार की ठगी कथा के पूरे फिल्म का ट्रेलर है। सरकार ने तय कर लिया है कि मजदूरों को कोई न्यूनतम वेतन सेतन नहीं देना है। बस उन्हें 176 रूपये की भीख पकड़ा देना है। ये तमाम पुराने आंकड़े मनोवैज्ञानिक भूमिका बाँधने के लिए अखबारों के माध्यम से दी जा रही है ताकि डुवार्स तराई में तृणमूल कांग्रेस पार्टी के लिए वोट का जुगाड़ करने वाले कार्यकर्ता कह सकें कि देखो हमारी माँ माटी और मनुष्य की सरकार ने कितना अधिक रूपये मजदूरी के नाम पर बढ़ा दिया है। मजदूरों को ठगने के लिए मनोवैज्ञानिक दवा पिलाने की कसरत कर सकते हैं, लेकिन न्यायपूर्ण मजदूरी देने के लिए जुबानी खर्च भी नहीं कर सकते हैं। 
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याद रखें, डुवार्स तराई के मजदूरों के साथ अन्याय करने वाले ममता बनर्जी या मलय घटक नहीं है। बल्कि डुवार्स तराई और दार्जिलिंग में तृणमूल कांग्रेस पार्टी के नाम जपने वाले लोग ही असल में चाय मजदूरों के जानी दुश्मन साबित हो रहे हैं। उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री के द्वारा बुलाई गयी बैठक में डुवार्स तराई और दार्जिलिंग के चाय मजदूरों से तृणमूल कांग्रेस के लिए वोट मांगने वाले लोग भी शामिल थे। क्या उन्हें चाय मजदूरों के लिए न्याय मांगने की याद नहीं आई ?
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यदि खबरों पर विश्चास किया जाए तो चाय मजदूरों के लिए आवासीय पट्टा भी उन्हें ही मिलेगा जो वर्तमान में चाय बागानों में कार्यरत्त हैं । ऐसा सरकारी पक्ष का बयान है। 150 वर्षों से जो परिवार चाय बागानों में रहते आया है, वहाँ केवल जिनका नाम बागान में काम है उसे ही पट्टा का अधिकार मिलेगा अर्थात उस घर भिट्टा का मालिक होगा। उस घर भिट्टा में रहने वाले दूसरे लोगों को मालिकाना हक नहीं मिलेगा। 
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दूसरे लोग जिनकी संख्या करीब 8 लाख है ( जनसंख्या के बारे मुख्यमंत्री का बयान) सरकार की इस नीति से रोड पर आ जाएँगे। जिसके नाम पर आवासीय लीज होगा, वह लीज पाने के बाद घर में रहने वालों को या तो घर से निकालने में सक्षम होगा या फिर वह अपने ही पारिवारिक सदस्यों (भाई, बहन, चाचा, दादा, दादी, दमाद, भाभी आदि) से किराया वसूलेगा। एक विवेकहीन और संवेदनहीन सरकार कैसे 150 वर्षों से चाय बागानों में रहने वालों को रोड पर ला सकती है, इसका यह पूर्वाभास है। सरकार मनमानी निर्णय लेने में सक्षम होती है और ऐसा निर्णय सरकार कभी भी ले सकती है। क्योंकि सरकार से बात करने वाले जनता के प्रतिनिधि गुंगे और बहरे होते हैं। 
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इस बैठक के लब्बोलुआब यही है कि सरकार की नजर में न्यूनतम वेतन का कोई मतलब नहीं है। चाहे मजदूर कितना भी चिल्लाए। सरकार न्यूनतम वेतन के लिए किए जा रहे आंदोलन को मजदूरों के अधिकार के लिए किए जा रहे आंदोलन नहीं मानकर उसे महज बंद और हड़ताल का आंदोलन मानती है। 
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आईए देश के दूसरे राज्यों में चाय मजदूरों को कितनी मजदूरी मिल रही है। उसे एक सरसरी नजर से देखते हैं। 
The New India Express में 17 मई 2018 को प्रकाशित खबर के अनुसार केरल में अब से निम्मतम मजदूरी 600 रूपये से कम नहीं होंगे। केरल सरकार ने इस निमित्त केबिनेट में निर्णय ले लिया है। तदनुसार चाय बागान सहित किसी भी क्षेत्र में कार्य करने वाला मजदूर को 600 रूपये से कम मजदूरी पर काम में नहीं रखा जा सकता है। http://www.newindianexpress.com/…/its-official-lowest-minim…

2015 अक्तूबर महीने से ही केरल के चाय बागानों के मजदूर 301 रूपये की मजदूरी पा रहे थे। वह अब दूगुना होकर 600 रूपये हो गया है।

दूसरी ओर कर्नाटक के चाय मजदूर 2017 के नवंबर महीने से ही 277 रूपये नकद मजदूरी प्राप्त कर रहे हैं। https://www.business-standard.com/…/after-price-drop-climat…

तमिलनाडु के चाय मजदूर पहले से ही 303 रूपये मजदूरी पा रहे हैं और जल्द ही उनकी मजदूरी 450 रूपये होने की उम्मीद की जा रही है। 
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वास्तविक रूप से मजदूरों के माँ माटी और मनुष्य की सरकार तो केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में है। पश्चिम बंगाल में तो जुमलेबाजी की सरकार चल रही है जिनसे ठगी के सिवाय और किसी चीज की आशा करना बेकार है।

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डुवार्स तराई में न्यूनतम मजदूरी चर्चा:-
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कुछ बातों, आंकड़ों,घटनाक्रमों, बयानों, समय सीमा आदि को बहुत गंभीरता से विश्लेषण करने की जरूरत होती है। सभी आंकड़े आदि को, लगातार हो रहे अपडेट्स को, सामने रखकर उन पर विशेष नजर रखने और उनके बीच में छुपी हुई गुढ़ संदेशों, आधे-अधूरे संकल्पों, बेवकूफ बनाने के पैतरों, सचमुच की गंभीरता और दिखावे की गंभीरता के बीच अंतर करने और सीमा रेखा खींचने की जरूरत भी होती है। ऐसा करना कुछ हद तक सजगता एवं जागरूकता कहलाता है। चाय मजदूर कितने सजग व जागरूक हैं ?? यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह मानव के मौलिक अधिकारों और अपने कार्य से संबंधित अधिकारों के बारे में कितना जानते हैं और जानने के लिए उत्सुक रहते हैं ??
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वर्तमान में राजनीति शुद्ध सेवा का क्षेत्र नहीं रह गया है, बल्कि यह किसी भी तरह से मेवा अर्थात् धन-संपत्ति, प्रभाव, आदि प्राप्त करने का आसान रास्ता बन गया है। यह कैरियर बनाने अर्थात इसके माध्यम से जीने-खाने के लिए नियमित होने वाले आय और अपने लिए स्वार्थी परिस्थितियों का सृजन करने और लाभ की परिस्थिति को भाँपते हुए गिरगिट की तरह रंग बदल कर राजनीति के दाँवपेंच से अपना कैरियर और संपत्ति बनाने की एकमात्र राह बन गया है। बस आप उन तमाम लोगों के बारे सोचना शुरु कीजिए कि सामने वाला गिरगिट चारित्रिक दोषों से युक्त है या मुक्त्त है या सचमुच निस्वार्थी सच्चा नेता है। 
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लेकिन सभी कैरियरिस्ट हैं, ऐसा कहना उचित नहीं है। ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो इसके माध्यम से सचमुच जनता के कल्याण के लिए सकारात्मक रूप से योगदान देना चाहते हैं और जो लक्ष्य के प्रति भावनात्मक रूप से जुड़े हुए होते हैं। ऐसे लोग किसी कैरियर या लाभ पाने के लोभ में काम नहीं करते हैं। ऐसे लोगों की पहचान करना किसी समाज या किसी आंदोलन के विकास और सफलता के लिए बहुत ही जरूरी होता है। इसे आप अपना सार्वजनिक प्रबंधन कला या स्किल्स ऑफ सोशल मैनेजमेंट कह सकते हैं। 
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जो नौजवान, युवा और अन्य सज्जन या भाई-बहनें, जो न्याय पूर्ण मजदूरी के लिए लगातार कोशिश कर रहे हैं। जागरूकता बढ़ा कर सब मजदूरों को इसके लिए जोड़ रहे हैं। उन से अनुरोध है कि वे अपने स्तर पर आंकड़े जुटाने का काम बहुत गंभीरता से करें। वे किसी नेता या ट्रेड यूनियन के भरोसे ना बैठे रहें। 
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वे क्या करें :- 
पिछली बार हुई तमाम वेतन समझौतों, उनकी पृष्ठभूमि, तब के समय पर उठे सवाल और सवालों पर मिले जवाब, आज कहे जा रही तमाम बातों आदि को इकट्ठा करके उसका फाइल जरूर बनाएं। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर हो रहे तमाम अपडेट्स पर पैनी नजर रखें । वास्तविक रुप से नेता के गुणों का अर्जन करें । 
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याद रखें दुनिया में सभी नेता जन्म से नेतृत्व का गुण लेकर दुनिया में नहीं आते हैं । लेकिन संघर्षशील परिस्थितियाँ उन्हें नेतृत्व करने का शुभ अवसर प्रदान करती हैं । जिसमें उन्हें पूरी ईमानदारी से जनता जनार्दन की सेवा के लिए कमर कस लेनी चाहिए। नेता के पास उत्तम गुण और ठोस जानकारी और ज्ञान रहना अनिवार्य है। समय के साथ चलना और समय के अंदर अनिवार्य कदम उठाना अत्यंत आवश्यक होता है। याद रखिए, आर्थिक लोभ किसी भी नेता को नेता से अभिनेता अर्थात नकली नेता में बदल देता है और फिर उसे अंततः जोकर बना कर सार्वजनिक मंच से हमेशा के लिए बाहर कर देता है। ईमानदारी ही जिंदगी में सफलता की कुंजी होती है। जो ईमानदार नहीं वह सच्चा नेता भी नहीं। जनता बुडबक है, ऐसा सोचना बेवकूफ़ी है। 23 जून 2018 को फेसबुक में प्रकाशित लेख। 
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डुवार्स तराई में न्यूनतम मजदूरी चर्चा:-2

नेह इंदवार

पिछली बार मैंने लिखा था कि नेतृत्व का गुण सभी को जन्मजात नहीं मिलता है। सभी के अंदरूनी दिमाग में अनेक गुण छुपे हुए हुए हैं जो अनुकूल परिस्थितियों में अपने आप बाहर आते हैं और व्यक्ति को किसी क्षेत्र में सफलता दिलाता है। व्यक्ति की सफलता किसी साध्य की सफलता होती है न कि व्यक्ति की व्यक्तिगत सफलता। यदि आज तक मजदूरों को उनका हक दिलाने में असफलता मिली है तो वह असफलता नेताओं की है। अर्थात् साध्य (मजदूरी) की सफलता में ही नेताओं की सफलता निहित है।

मैंने यह भी लिखा था कि आंकड़ों, घटनाक्रमों, बयानों, नीतियों, नियमों, बाहरी और भीतरी मानसिकताओं, संभावित कुल परिणामों पर बहुत गंभीरता पूर्वक नजर रखने और विश्लेषण करने की जरूरत होती है।

जो नेता ईमानदार नहीं होते हैं, जिनमें सही नेतृत्व की क्षमता नहीं होती है, वे बेईमान होते हैं। वे नियमों, नीतियों, आंकड़ो पर जरा भी ध्यान नहीं देते हैं। जो नवीन मीडिया युग में चारों ओर से आगत समाचारों, आंकड़ों आदि को प्राप्त करने, उन्हें बाँचने और उन पर गंभीरता पूर्वक विचार करने की जरूरत नहीं समझते हैं। वे न सिर्फ आयोग्य होते हैं, बल्कि सिरे से बेईमान होते हैं।  वैसे लोग कभी सच्चे नेता नहीं बनते हैं। ऐसे लोगों को नेतृत्व देना और लड़ाई लड़ने का कोई मतलब नहीं होता है। लेकिन ऐसे नेता लोग ही डुवार्स तराई में सक्रिय रहे हैं। यहऱ सामाजिक और राजनैतिक दोनों हो क्षेत्रों की बात है। डुवार्स तराई की स्थानीय भाषा में हम ऐसे नेताओं को “चव्वन्नी नेता” संबोधित कर रहे हैं। ऐसे नेता स्वार्थी होते हैं, अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए वे गिरगिट की तरह कभी भी अपना रंग बदलते हैं। साध्य के प्रति वे ईमानदार नहीं होते हैं, बस अपनी चव्वन्नी स्वार्थ के लिए जीवन जीते हैं और नकली नेतृत्व के द्वारा लोगों को धोखा देते हैं। जब तक ऐसे लोगों की पहचान सही ढंग से नहीं की जाती है और उन्हें अलग-थलग नहीं किया जाता है, सुखद परिणाम की आशा करना व्यर्थ है।

आईए कुछ बातों पर गौर करें। न्यूनतम मजदूरी कौन देगा ? न्यूनतम मजदूरी चाय बागान प्रबंधन कंपनियों को देना होगा, लेकिन इसे सरकारी नोटिफिकेशन के माध्यम से सरकार घोषित करेगी। सवाल है सरकार ऐसा नोटिफिकेशन क्यों घोषित नहीं कर रही है ? यदि पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस की सरकार BLF (bought Leaf Factory) में कार्य कर रहे मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन की नोटिफिकेशन निकाल सकती है तो यही सरकार चाय बागानों में काम करने वाले मजदूरों के लिए क्यों नहीं नोटिफिकेशन जारी कर सकती है ?

जी हाँ, संविधान के समवर्ती सूची (Concurrent List) के अनुसार श्रमिक कल्याण, जिसमें कार्य परिस्थिति, प्रोविडेंट फंड, नियोक्ता की देनदारी, श्रमिकों को देय मुआवजा,  अपंगता और वृद्धावस्था पेंशन, मातृत्व लाभ। रोजगारजन्य प्रशिक्षण, ट्रेड यूनियन, औद्योगिक और श्रम विवाद आदि के बारे राज्य सरकार और केन्द्र सरकार दोनों ही कानून बना सकते हैं। केन्द्रीय कानून जहाँ नीति निदेशक का काम करता है वहीं राज्य सरकार तमाम स्थानीय परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए स्थानीय जरूरत के हिसाब से कानून या नीति बना सकती है।

सरकारी नीतियों के निर्माण के लिए जहाँ सरकार अपनी तई उपलब्ध आंकड़ों और परिस्थितयों, आवश्यकताओं के आधार पर नीतियाँ या कानून बनाती है वहीं, स्थान या उद्योग विशेष के नेतागण अपनी क्षेत्र की बातों को सिस्टेमेटिक ढंग से विश्लेषण करते हैं और उसे सरकार को पेश करके उस पर सरकार को संवैधानिक रूप से मिल अधिकारों के आधार पर कानून बनाने के लिए अनुरोध करते हैं।

आम तौर से यह अनुरोध स्थानीय नेता, कार्यकर्ता और विशेषज्ञ करते हैं। चाय बागानों के लिए अनुकूल नीतियों के निर्धारण करने के लिए चाय बागानों से जुड़े ट्रेड यूनियन लीडरस् या डुवार्स और तराई के क्षेत्रों से चुने गए एमएलए और एमपी को इस बारे कदम उठाने की जरूरत होती है। लेकिन क्या डुवार्स और तराई के ट्रेड यूनियन के नेतागणों ने अपना यह कर्तव्य पूरा किया है ? क्या यहाँ के भूतपूर्व या वर्तमान एमएलए और एमपी ने इस संबंध में नीतियों के निर्माण के लिए सरकार को अपना कोई प्रस्ताव पेश किया है ? यदि किया है तो वे उसे जनता के सामने लिखित रूप से लाएँ और बताएँ कि उन्होंने वास्तव में मजदूरों और इलाके के बेहतरी के लिए क्या-क्या काम किया है ?

इसी तरह चाय बागानों में सक्रिय ट्रेड यूनियन के नेतागण बताएँ कि वे वास्तविक रूप में चाय बागानों के मजदूरों के बेहतरी के लिए क्या-क्या नीतिगत और कानूनी पक्ष बनाने के लिए लिखित रूप में क्या-क्या कदम उठाएँ हैं। कृपया वे भाषणबाजी के माध्यम से नहीं बल्कि लिखित रूप में जनता को बताएँ कि वास्तव में वे कितने जागरूक हैं और कितनी सक्रियता भरा नेतृत्व की जिम्मेदारी उठाएँ हैं ? यहाँ मजदूरों या आदिवासी और नेपाली समाज के नाम से नेतृत्व करने वालों पर भी यही सवाल उठता है कि वास्तविक रूप में उन्होंने चाय मजदूरों या आदिवासी नेपाली समाज के विकास, उन्नति, आय के संवर्धन और अमुलचूल परिवर्तन करने के लिए क्या-क्या कदम उठाएँ हैं। उनके उठाए गए कदमों में किन बातों को आधार बनाया गया था और उन आधारों के माध्यम से किस तरह की परिवर्तन की आशा की गई थी, उन आशाओं में से कितनी पूरा हुई और कितनी नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई ?

हाल ही में आदिवासी सामाजिक संगठनों ने यूनाईटेड फ्रंट के माध्यम से डुवार्स-तराई के सभी एमएलए को न्यूनतम वेतन के मुद्दे पर मांग-पत्र सौंपा था और उनसे अनुरोध किया था कि वे आवश्यक कदम उठाएँ। मांग पत्र सौंपे हुए दो महीने से अधिक हो गए। अब यह सवाल करना बनता है कि इन MLAs ने इस संबंध में क्या-क्या कदम उठाए हैं। किन लोगों से बातचीत हुई है और न्यूनतम वेतन के मुद्दे पर क्या प्रगति हुई है?

मैंने पिछले पद्रंह सालों के दौरान पश्चिम बगाल विधानसभा में पूछे गए श्रम संबंधी तारांकित सवालों के बारे एक रिपोर्ट बनाने की कोशिश की, लेकिन अफसोस हमारे डुवार्स तराई के किसी भी जनप्रतिनिधियों के द्वारा पूछे गए सवाल मुझे नहीं मिले, जिस पर विस्तार से लिखा जा सकता था।

हमारे MLAs डुवार्स तराई के लोगों से हाथ जोड़कर वोट मांगते हैं। उनकी बेहतरी के लिए काम करने का ढोंग करते हैं, लेकिन ये जिस काम के लिए चुने जाते हैं वही काम करने में उसी काम में ये फिसड्डी साबित होते हैं। क्या उन्हें अपनी जिम्मेदारी का कोई एहसास नहीं है या वे  नियमों, नीतियों, आंकड़ो पर जरा भी ध्यान नहीं देते हैं और नवीन मीडिया युग में चारों ओर से आगत समाचारों, आंकड़ों आदि को प्राप्त करने, उन्हें बाँचने और उन पर गंभीरता पूर्वक विचार करने की जरूरत ही नहीं समझते हैं।  आखिर वे किस मर्ज की दवा हैं ? क्या जनता उन्हें ईमानदार और सच्चे नेता कह सकती है ? अभी इसी महीने विधानसभा का नया सत्र् चालू होने वाला है क्या वे इस विधानसभा सत्र् में न्यूनतम वेतन संबंधी मांग को सम्यक रूप से उठाने के बारे विचार कर सकते हैं ?

इसी तरह ट्रेड यूनियन और सामाजिक संगठनों का भी कर्तव्यों के बारे जनता को जानने का हक है।  सरकार को दी गई आल्टिमेटम और हड़ताल के सफल होने पर क्या परिस्थिति होगी और असफलता पर क्या परिस्थिति होगी इसका क्या आकलन किया गया है ? इस संबंध में भी जनता को जानने का हक है ?

यदि सरकार और चाय बागान मालिक हड़ताल को नजरांदाज करेंगे तो इन संगठनों का अगला क्या कदम होगा ? हड़ताल से मजदूरों को होने वाली आर्थिक और सामाजिक घाटे का निवारण किस तरह किया जाएगा ? यदि तमाम तरह के मूँछ ऐंठने वाले रणनीति खत्म हो जाएगी तो क्या ये संगठन कोर्ट में भी मजदूरों के मुद्दों को उठाएगी ? कोर्ट की बातें कोई संगठन नहीं करते हैं। जब संविधान के द्वारा दी गई शक्ति के माध्यम से ही राज्य सरकार को मजदूरों के पक्ष में निर्णय लेने हैं और जब सरकार कुछ नहीं करेगी तो संविधान के अनुसार ही कार्य करने वाले कोर्ट के दरवाजे पर जाने के लिए ट्रेड यूनियन और सामाजिक संगठनों को क्यों एतराज है ? आखिर इसमें छुपाने वाली राज क्या है ?  1 जुलाई 2018

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क्या तृणमूल कांग्रेस को चाय मजदूरों से वोट पाने का अधिकार है ?

            नेह इंदवार

पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव मई महीने में होगा, यह पहले ही तय था। बस विरोधियों को विभ्रांत करने के लिए कभी जुलाई तो कभी अगस्त महीने का जिक्र किया जा रहा था। विरोधी दल चुनाव की तैयारी में पीछे रहें और सत्ताधारी दल की तैयारी के सामने टिक न पाएँ यह रणनीति हर सत्ताधारी दल अपनाता है। पश्चिम बंगाल में सरकार की इस तैयारी के बारे हमने पहले भी कहा था।

डुवार्स और तराई में न्यूनतम न्यायपूर्ण मजदूरी पाने की एक लड़ाई चल रही है। इसमें एक ओर सुखी रोटी खााकर जीवन गुजारने वाले  बेहद गरीब मजदूर हैं, दूसरी ओर करोड़पति चाय बागान मालिक और संवैधानिक-लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई ताकतवर सरकार।

कानूनी, नैतिक और संवैधानिक रूप से सरकार को मजदूरों के साथ दिखनी चाहिए थी, लेकिन बेशर्मी की हद तक जाकर बंगाल की तृणमूल सरकार चाय बागान मालिकों के साथ खड़ी हो गई है और मजदूरों के साथ छल करने के लिए हमेशा तैयार दीख रही है। चुनाव के बिगुल बज चुके हैं और मजदूरों के साथ बेईमानी करने वाली तृणमूल पार्टी उन्हीं मजदूरों के दरवाजे में वोट की भीख मांगने के लिए  वोट का कटोरी लेकर फिर मजदूरों के पास आने वाली है।

सवाल है कि मजदूरों के शोषणकर्ताओं के साथ तृणमूल कांग्रेस  क्यों शामिल हो गई है ? क्या उन्हें मजदूरों से वोट मांगने का अधिकार है ? 

जब पूरे भारत में ट्रेड यूनियन एक्ट के तहत संगठित मजदूरों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी दिए जाने की नीति रही है, तो पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस की सरकार मजदूरों को  न्यूनतम मजदूरी से वंचित करने के लिए क्यों हजारों बहाने बना रही है। आशा की गई थी कि वोट के पहले सरकार मजदूरों को न्याय देगी। लेकिन यह मजदूरों को न्याय पूर्ण मजदूरी देने से बचने के लिए कभी केन्द्र सरकार तो कभी वाम मोर्चा सरकार के उपर बहाने के ठीकरे फोड़ रही है। लेकिन किसी भी बहाने के सबूत के रूप में कभी कोई कागजात नहीं दिखाती है और न  ही किसी कानूनी धाराओं को दिखाती है।      

वाममोर्चा सरकार की मौत सात सााल पहले हो गई थी और आज वह कब्र में दफन है।  मजदूरों को ठगने, बेवकूफ बनाने, उन्हें वंचित करने, उन्हें गरीब बनाए रखने, उनके साथ लगातार अन्याय करने के लिए क्यों तृणमूल के नेता कब्र खोद कर वामफ्रंट के पुराने लाश को मजदूरों को दिखा रहे हैं और तमाम बहानेबाजी में लिप्त हो रहे हैं यह समझ से परे है।  यदि वाम मोर्चा के समय मजदूरों से अन्याय हुआ था तो क्या तृणमूल को उसी अन्याय की पुनर्रावृत्ति करने का अधिकार हासिल हो गया है ? 

तृणमूल सरकार ने मजदूरों के लिए क्या की है ? मजदूरों के प्रति उनकी नीति, व्यवहार, तमाम आश्वासन और वादों पर समीक्षा करने के लिए क्या उनकी सात साल का शासन पर्याप्त नहीं है ? आखिर न्यूनतम मजदूरी पर निर्णायक निर्णय लेने में उन्हें और कितने साल चाहिए ? आखिर इस सरकार की नियत और लक्ष्य क्या है ?

जब बीएलटी फैक्ट्री के मजदूरों के लिए वह एकतरफा निर्णय लेकर उनके लिए न्यूनतम मजदूरी की घोषणा एक सप्ताह में कर सकती है तो चाय बागान मजदूरों के लिए क्यों उन्हें चार साल का समय चाहिए ?

कम आय में जीवन यापन करने वाले मजदूर गरीबी और बीमारी के कारण लगातार मौत का शिकार हो रहे हैं। उन्हें चाय बागान प्रबंधन द्वारा कानून में दिए गए सुविधाएँ नहीं दी जा रही है। उनका सामाजिक और आर्थिक जीवन तबाह हो गया है। उनके बच्चे मैट्रिक तक की शिक्षा भी बड़ी मुश्किल से हासिल कर पाते हैं। बागान प्रबंधन उनके साथ सौतेला व्यवहार और आर्थिक शोषण करते हैं। उनकी विकास की गति देश के गति तुलना में सबसे कम है, लेकिन तमाम बातों से वाकिफ रहने वाली पार्टी कैसे उनके साथ इतनी नाइंसाफी और अन्याय कर सकती है ? क्या यह पार्टी सचमुच राष्ट्रीय सोच वाली पार्टी है ?  

शोषकों के साथ गलबहियाँ करने वाले शोषक ही कहलाते हैं। पिछले सात साल में तृणमूल सरकार ने दिखा दिया है कि यह सरकार किसी भी अन्य सरकार से किसी भी मामले पर अलग नहीं है न ही यह परिवर्तन की सरकार है और न ही उन्नयन की। बल्कि यह शोषण, वंचना, ठगी, चालाकी, लूटेरों की सरकार है।

यदि तृणमूल की सरकार परिवर्तन और उन्नयन की सरकार होती तो वह चाय बागान मजदूरों के जीवन में परिवर्तन और उन्नयन लाने के लिए कमर कस कर निर्णय लेती और मजदूरों के चेहरे पर मुस्कान लाती। आखिर यह सरकार क्यों मजदूरों को अरबों रूपयों से वंचित करना चाहती है ? क्या मजदूरों की कमाई को चुनाव खर्च के लिए चंदे के रूप में मालिकों से लेने के लिए ही यह सरकार मजदूरों के विरूद्ध षड़़यंत्र कर रही है ?

This tea estate when bankrupt several years ago, leaving hundreds of families to fend for themselves. Public services like this hospital and clinic have also stopped working. Taken in West Bengal, India.

पिछले सात साल से मजदूरों के  साथ बहानेबाजी करने में तृणमूल सरकार हमेशा अव्वल रही है। आखिर बेवकूफ बनाने की भी एक सीमा होती है। यह सरकार उस सीमा को लांघ चुकी है।

क्या आज यह सरकार  चाय मजदूरों से पंचायत चुनाव में वोट लेने के लिए याचना करने की नैतिक और कानूनी अधिकार रखती है ?

न्यूनतम मजदूरी के लिए गठित सलाहकार समिति ने पिछली आठ बैठकों में कोई काम नहीं किया। बेमतलब के बैठकों में समय को जानबूझ कर नष्ट किया गया। मजदूरों के साथ धोखेबाजी करने में सरकार का श्रम मंत्रालय और तृणमूल पार्टी बागान मालिकों के साथ बेशर्मी से खड़े दिखाई देते रहे। सरकार ने सलाहकार समिति के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की। कोई एजेंडा को किसी भी बैठक में पूरी करने की तत्परता नहीं दिखाई गई न ही इसके लिए कोई संवैधानिक निदेश जारी किया गया। क्या सरकार के पास कानून प्रदत्त कोई संवैधानिक अधिकार  या विकल्प नहीं बचा है ?

सरकार के मंत्री ने खुद बागान राशन के बदले दिए जाने वाले नकद राशि की दर प्रति महीना 660 रूपये घोषित किया था। तृणमूल बताए कि यह किन आंकड़ों, कागजातों और गणनाओं के आधार पर किया गया था ? कुछ महीने बीतने के बाद कैसे मंत्री ने उसे दैनिक 9 रूपये करने का फरमान सुना दिया ?  इस हृदय परिवर्तन का कारण क्या है ? क्या बागान मालिकों ने उन्हें ऐसा करने का हुक्म दिया ?  2011 में त्रिपक्षीय समझौते में उल्लेखित मजदूरों को दिए जाने वाले डीए के बारे मंत्री और तृणमूल कांग्रेस की बोलती क्यों बंद है ?  क्या उनमें इतनी हिम्मत है कि पंचायत चुनाव में वे इसके बारे कोई विवरण पेश करें ?

2015 में गठित न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति कुछ भी निर्णय नहीं लिया लेकिन  न्यूनतम मजदूरी तय करने की जगह रूपये 17.50 की बढ़ोतरी की घोषणा कर दिया गया। आखिर इन घोषणाओं का आधार क्या है ? क्या यह सरकार को संवैधानिक प्रावधनों के तहत मिल अधिकार से अन्तर्गत किया गया या इसे मालिकों के साथ मिलकर एक षड़यंत्र के तहत किया गया ?

चाय मजदूरों को पिछले छह दशक तक प्लांटेशन एक्ट में उल्लेखित किसी भी सुविधा को पूरी तरह नहीं दी गई। उन्हें झोपड़ों में भिखारियों की तरह रहने के लिए विवश किया गया। जो आवास बनाए गए थे, उनकी मरम्मत मजदूर खूद करते रहे। बागान मालिक मजदूरों के कल्याण के नाम पर नकली राशि दिखा कर आयकर बचाते रहे।

उधर तृणमूल सरकार लाखों लोगों को आवास बनाने के लिए लाखों एकड़ जमीन गाँव और शहरों में पट्टा बाँट कर आबंटित किया। लेकिन चाय मजदूरों को न मालिकों से विधि पूर्वक आवास मिला न सरकार से आवासीय पट्टा। सरकार की जो नियत अब तक प्रगट हो चुकी है उससे नहीं लगता है कि यह सरकार मजदूरों के हित में कोई क्रांतिकारी कदम उठा कर उन्हें एक अदद घर का स्वामी बनने का मौका देगी। यह उन्हें भूमिहीन, आयहीन, गरीब बनाकर रखने के लिए कृतसंकल्प नजर आ रही है। तृणमूल सरकार और इसके कार्ताधर्ता बताएँ कि चाय बागानों में  The Workmen’s Compensation (Amendment) Bill, 2009 लागू है या नहीं ? तृणमूल नेता, डुवार्स के तृणमूल के विधायक, मंत्री,  श्रम मंत्री बताएँ कि चाय बागानों में इस कानून के तहत कितनी क्षतिपूर्ति का भुगतान किया गया है और इसे लागू करने के लिए मंत्रालय ने क्या कदम उठाया है ?

तृणमूल कांग्रेस के नेतागण बताएँ कि  चाय बागानों में Workmen’s Compensation Act, 1923, Factories Act, 1948, …..Payment of Gratuity Act, 1972, ……Payment of Wages Act, 1936, ………Trade Union Act, 1926,…. Industrial Disputes Act, 1947, ……..Labour Courts for disputes in India, …….Employee State Insurance Act, [ESI] 1948, ……..Payment of Bonus Act, 1965, ……….Employees’ Provident Fund Scheme, 1952, …….Maternity Benefit Act,1961 (with latest amendments) Maternity leave laws, ……. Industrial employment (standing orders) Act, 1946), ……… Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal) Act, 2013, ……..The Scheduled Castes and Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989  लागू है या नहीं ? यदि लागू है तो इन कानूनों का कितना उल्लंघन हुआ और उन उल्लंघनों पर सरकार ने पिछले सात साल में क्या-क्या कार्रवाई की है ? प्रोविडेंट फंड, ग्रेज्युएटी एक्ट, मेडिकल नेग्लीजेंस एक्ट आदि के उल्लंघन पर कितने लोगों को जेल में भेजा है ? तृणमूल के राज में कितने बागान बंद हुए, कितने लोग भूख से मर गए ? क्या सरकार और तृणमूल के नेतागण मजदूरों को सार्वजनिक रूप से इज्जत के साथ ये सारे विवरण उपलब्ध कराएँगे ? 

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तृणमूल के नेतागण बताएँ कि वे कौन सा मूँह लेकर चाय बागान के गरीब, मजबूर मजदूरों के पास जाएँगे और कहेंगे कि परिवर्तन और उन्नयन के लिए आप हमें वोट देकर पंचायत चुनाव में हमारी पार्टी के उम्मीदवार को जीताएँ ?

जिन लोगों के साथ तृणमूल की सरकार ने अंतहीन अन्याय, पक्षपात, वंचना, शोषण किया है क्या उनके कार्यकर्ताओं के पास मजदूरों का वोट मांगने का नैतिक और कानूनी अधिकार है ? क्या उनमें इंसानियत और शर्म नाम की कोई चीज बची हुई है ?

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चाय मजदूरों के शोषण में किनका हाथ है ?

                नेह अ. इंदवार 

डुवार्स और तराई के चाय मजदूरों की संख्या पाँच लाख के करीब है। परोक्ष रूप से 20 लाख लोगोंं की जिंदगी चाय बागानों से जुड़ी हुई है। वे दुनिया के सबसे अधिक शोषित, वंचित समुदाय बन गए हैं, क्योंकि उनके साथ पिछले आठ दशक से भी अधिक समय से उनका सिस्टेमेटिक शोषण किया जा रहा है । उनके शोषण में कौन-कौन क्या-क्या भूमिका निभाते हैं, यह जाने बिना चाय मजदूरों के लिए न्याय की अंतिम लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। चाय बागान से जुड़े लोगों को तो इसकी जानकारी रखना अनिवार्य है।

आईए  सीधे-सीधे दिखने वाले कुछ  कारणों को संक्षिप्त रूप से जानने की कोशिश करते हैं।

आज का डुवार्स कभी पश्चिम डुवार्स के नाम से जाना जाता था। आज के पूर्वी भाग जो अब असम राज्य के अधीन भूभाग है कभी पूर्वी डुवार्स कहलाता था।

1864-65 में ब्रिटिश इंडिया और भुटान के बीच चले पाँच महीने की इंडो भुटान लड़ाई जिसे डुवार्स वार भी कहा जाता है, में  भुटान  की हार हो गई थी और 11 नवंबर 1865 के सिन्चुला समझौते के अन्तर्गत भुटान ने पश्चिमी डुवार्स और पूर्वी डुवार्स को ब्रिटिश राज्य को सौंप दिया। जी हाँ कभी यह भुटान देश का हिस्सा था। भुटान देश के  अन्तर्गत तत्कालीन डुवार्स को पश्चिम डुवार्स कहा जाता था । यह आज के पश्चिम बंगाल राज्य के जलपाईगुडडी और अलिपुरद्वारा जिलों के उतरी भाग में पड़ता है और आज इसे हम डुवार्स के नाम से जानते हैं।  

उधर 1840-60 के दशक में असम में चाय का उत्पादन शुरू हो चुका था। ब्रह्मपुत्र घाटी के भौगोलिक परिस्थितियाँ और डुवार्स तराई के भौगोलिक परिस्थितयों में बहुत समानता होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने डुवार्स को अपने कब्जे में लेकर दार्जिलिंग की ऊँची पहाड़ियों के साथ डुवार्स में भी चाय उत्पादन शुरू कर दिया था । चाय बागानों में परिश्रमी लोगों की आवश्यकता होती है और अनेक कारणों के आधार पर तत्कालीन ब्रिटिश बंगाल के कई जिले यथा राँची, लोहरदगा, दुमका, मानभूम आदि से आदिवासियों को ब्रिटिश बंगाल के ही एक अन्य जिला जलपाईगुड़ी में चाय की खेती के लिए लाया जाता रहा। याद रखिए आदिवासी समुदाय बंगाल में किसी अन्य राज्य से नहीं लाए गए थे। वे तत्कालीन बंगाल के ही एक जिले से दूसरे जिले में काम के लिए लाए गए थे। हमारे पुरखे हाल तक डुवार्स तराई को भोटांग राईज कहा करते थे। आज भी छोटानागपुर के गाँवों में लोग कहते हैं कि उनके रिश्तेदार भोटांग में रहते हैं।

भोले-भाले आदिवासी व्यावसायिक दाँव-पेंच और मुनाफे की लालची प्रवृति से अपरिचित होने के कारण थोड़े से नकद पैसों के लिए बागान मालिकों के अमानवीय शर्तों को बिना सोचे समझे स्वीकार करते रहे, उन्हें मालिक मानते रहे और चाय बागानों में हाड़तोड़ मेहनत करते रहे। चाय बागान मुख्यतः श्रमिकों के मेहनत से चलता है और बागान मालिक मुलतः मुनाफे के लिए बागानों का प्रबंधन करते हैं। लेकिन चाय मजदूरों को कभी भी न्यायपूर्ण मेहनताना देने की कभी कोशिश नहीं हुई। सभी मालिक और सरकार शोषक प्रवृत्ति के होने के कारण वे हमेशा चाय मजदूरों का शोषण करने का ही षड़यंत्र में रत रहे।

तत्कालीन ब्रिटिश राज्य में देशवासियों का शोषण करके ब्रितानी लोगों को लाभान्वित करना ब्रिटिश नीति थी। लेकिन देश के आजाद होने के बाद भी चाय मजदूरों का जमकर शोषण करने वाली नीतियों को देश के बगडोर संभालने वालों ने जारी रखा।

कांग्रेस और वाममोर्चा के शासन काल में भी चाय बागान मजदूरों को कभी भी न्यायपूर्ण मजदूरी देने की कोई कोशिश नहीं हुई। सभी सरकारें बागान मालिकों के खून चुसने वाली अमानवीय शोषण नीतियों को बरकरार रखने के लिए मालिकों से भारी चंदा प्राप्त करते रहे। दो-तीन दशक पूर्व तक चाय बागानों में बागान मैनेजरों, साहबों का साम्राज्य हुआ करता था। उनके मर्जी के खिलाफ पत्ता तक नहीं हिलता था।

मजदूरों की अशिक्षापन का लाभ निरंतर उठाते रहने के लिए उन्हें शिक्षा- प्रशिक्षण, सूचनाएँ, ज्ञान आदि से निरंतर वंचित रखा गया। आवास के लिए सरकारी नीति होने के बावजूद उन्हें झोपड़ियों में रहने, सार्वजनिक नलों से पानी लाने, बागानों में दैनिक निवृत्ति के लिए मजबूर किया जाता रहा।  उन्हें मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखा गया, ताकि बागान मालिकों की जमींदारी हमेशा बरकरार रहे।

सरकार ने चाय बागानों में प्राईमरी स्कूल खोलने की नीति बनाई थी। लेकिन  मजदूरों के बच्चों को भी शिक्षा से वंचित करने के लिए उन्हें विद्यालयों में नाममात्र की शिक्षा दी जाती थी, ताकि वे सम्यक रूप से शिक्षित न बनें और आठ दस साल तक स्कूलों में समय नष्ट करने के बाद अपने माता-पिता की तरह ही बागानों में या और कहीं भी सिर्फ मजदूर बने रहें। बच्चों के शिक्षा में व्यावधान पैदा करने के लिए उन्हें पोका (कीड़ा) इकट्ठा करने, छोकड़ा के रूप में काम करने के लिए प्रेरित किया जाता था। क्योंकि इससे बच्चों को कुछ पैसे मिलते थे।  यह नीति किसी एक आदमी या कुछ लोगों की नहीं थी, बल्कि यह नीति चाय बागानों के मजदूरों के विकास के लिए उत्तरदायित्व उठा रहे अधिकतर लोगों की थी जिसमें प्रशासन और सरकार भी शामिल थी। यही कारण है कि देश में आजादी के बाद 1980 के दशक तक अर्थात् चाय बागानों में इने गिने लोग ही कुछ हद तक शिक्षित थे। यदि विदेशी मिशनों के द्वारा स्थापित एक दर्जन स्कूल वगैरह नहीं होते तो पूरा डुवार्स तराई के मजदूर बस्ती अनपढ़ों का  विशाल देश होता।

लेकिन शनै-शनै छिट-पुट परिवार अपने बच्चों को कम या अधिक शिक्षा देने में कामयाब रहे और फिर नये शिक्षित जन अन्य परिवारों को शिक्षा के प्रति प्रेरणा देते रहे और धीरे-धीरे शिक्षा का प्रतिशत बढ़ता रहा। लेकिन आरक्षण प्राप्त समुदाय होने के बावजूद सरकारी कार्यालयों में उन्हें नौकरी बड़ी मुश्किल से मिलती थी। भारत में ब्राह्मणवादी विचारधारा चाय मजदूरों के साथ कितना अन्याय, जुल्म और पक्षपाती किया यह एक अलग अध्ययन का विषय है। हर तरह से वंचित समुदाय अपने वजूद की लड़ाई लड़ता रहा और ब्राह्मणवाद और जातिवादी भावना से ग्रस्त लोग इनके साथ अपनी घटिया मानसिकता के साथ इनके साथ अन्याय और पक्षपात करते रहे। “दुनिया के मजदूर एक हो” जैसे सर्वहारा का नारा देने वाले और समानता के सिद्धांतों पर चलने का दावा करने वाले वामपंथी शासन ने मजदूरों के बेहतर के लिए कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठाया।

हिंदी पढ़ने वाले विद्यार्थियों को उनके मंत्रीयों ने कई बार कहा “हिंदी पढ़ना है तो बिहार जाओ,  यहाँ तो बंग्ला ही पढ़ना होगा।” हाँ, जब त्रिस्तरीय पंचायत कानून लागू हुआ और उससे चाय बागानों को बाहर रखा गया और सरकार की बदनामी शुरू हुई तो वाममोर्चा ने चाय बागानों में नाम भर के लिए पंचायत व्यवस्था लागू किया। लेकिन दशकों तक पंचायत व्यवस्था के लाभ से मजदूरों वंचित रहे। लेकिन जब बागानों में कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया जाने लगा तो पंचायत से जुड़े एक नये शोषक वर्ग का उदय हुआ जो भ्रष्टाचार में लिप्त होने में जरा भी समय नहीं गंवाया। आज भी पंचायत व्यवस्था चाय बागानों में भ्रष्टाचार का स्वर्ग बना हुआ है। भ्रष्टाचार के कारण चाय मजदूर आज भी क्वालिटी विकास कार्यों से वंचित है।

2011 में जब तृणमूल कांग्रेस की सरकार आयी तो मजदूरों को इनसे बहुत आशा थी। 2011 में हस्तारित त्रिपक्षीय समझौते में मजदूरी के साथ डी.ए. भी देने की बात को शामिल की गई। नई सरकार में नये लोग थे वे ममता बनर्जी के उन्नयन के नारे से प्रभावित थे और वास्तविक रूप से राज्य में परिवर्तन लाना चाहते थे। इसीलिए जब चाय मजदूरों के लिए कोलकाता में त्रिपक्षीय समझौता पर हस्ताक्षर हुए तो डी.ए. की बात भी शामिल थी। लेकिन चाय बागानों के मालिकों के मंच और अकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त बंगाल के श्रम मंत्रालय ने जोड़तोड़ करके छह महीने में तैयार होने वाले डी.ए. के फार्मुले को ही चर्चा के एजेंडे से गायब करवा दिए और अगली बैठकों में न तो सरकारी पक्ष ने इसे उठाया और न ही मजदूरों के तथाकथित नेताओं ने। मजदूरों के तथाकथित ट्रेड यूनियन नेतागण कितने काहिल, अक्षम और बेईमान हैं और मजदूरों के साथ कितने धोखेबाजी कर सकते हैं, इसे जाना जा सकता है।

निरंग पझरा के माध्यम से तथा अन्य संचार माध्यमों से बार-बार इस बात को उठाया गया, लेकिन अनपढ़ों के अर्द्ध शिक्षित नेता चाय मजदूरों का कितना नुकसान करवा सकते हैं, इस प्रकारण से अच्छी तरह से  समझा जा सकता है। सोचने वाली बात है कि चाय मजदूरों के असली रहनुमा आखिर कौन से नेतागण हैं ?

उधर परिवर्तन और उन्नयन के द्वारा इतिहास रचने का ख्वाब पाले तृणमूल नेताओं को भी चाय बागान के मालिक पक्ष मैनेज करने में कामयाब रहे और अब तो तृणमूल के तमाम मजदूर नेतागण सिर्फ वही बातें करते हैं जो उनके माय-बाप चाय बागान मालिक करने के लिए कहते हैं। यह अटल सत्य और इसे पोलिग्राफ मशीन जैसे माध्यमों से ही मौलिक रूप से जाना जा सकता है।

ममता बनर्जी दर्जनों बार चाय बागानों में और उत्तर बंगाल के जिलों में दौरे पर जाते ही रहती है। लेकिन पहले की ममता और आज की ममता में जमीन आसमान का अंतर है। वे चाहतीं तो एक दिन वे सिर्फ चाय बागानों के तमाम समस्याओं को सुलझान के लिए सभी को लेकर बैठ सकती हैं और मजदूरों के साथ डेढ़ सौ वर्षों से किए जा रहे अन्याय, जुल्म, पक्षपात, शोषण को एक झटके में खत्म कर सकती है। संविधान में राज्य सूची के मामलों पर राज्य सरकार को पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त है और संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के मामले पर राज्य सरकार किसी भी हद तक जा कर निर्णय ले सकती है। मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन निर्धारण करना तो राज्य सरकार के लिए बहुत ही साधारण बात है। लेकिन देखिए चाय मजदूरों के मामले पर सरकार यह साधारण सा काम भी नहीं करना चाहती है। बागान का पट्टा भी बहुत छोटा सा काम है, बस मजदूर जहाँ बसते हैं उन जगहों पर उनका कानूनन हक होगा, इतना एक नोटिफिकेशन निकाल कर किया जा सकता है। लेकिन सरकार करेगी नहीं। शोषण का चक्र अभी भी पूरी गति से चलायमान है।  

देश में वेतन और डी.ए. निर्धारण करने का एक सुसंगठित मेकानिज्म का विकास किया गया है। चाय बागान जैसे संगठित क्षेत्र का वेतन या मजदूरी देश में स्वीकृत वेतन मेकानिज्म के अन्तर्गत होने पर वह हर हालत में न्यूनतम वेतन से अधिक निर्धारित किया जाएगा। न्यूनतम वेतन कानून ऐसे असंगठित क्षेत्र के लिए बनाए गए हैं, जिसमें मजदूर असंगठित होने के कारण मालिक के साथ अपने श्रम के बदले मिलने वाली मजदूरी पर कोई तोलमोल नहीं कर पाते हैं और मालिक हमेशा कम वेतन देकर उनका शोषण करने की कोशिश करते हैं।

चाय बागान एक संगठित क्षेत्र है और उनके मजदूरों को तोलमोल करने का अधिकार है। वे अपनी ताकत के बल न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के  अधीन घोषित किए जाने वाले वेतन से बहुत अधिक वेतन या मजदूरी पाने का अधिकार रखते हैं। संगठित क्षेत्र के मजदूर जब मजबूत होते हैं तो वे अपने खून-पसीने के लिए सामुचित न्यायपूर्ण मजदूरी हासिल करते हैं। लेकिन यदि कमजोर होंगे तो भी उन्हें किसी भी हालत में सरकार द्वारा न्यूनतम अधिनियम 1948  के तहत किए जाने वाले अधिसूचना से कम वेतन नहीं दिया जा सकता है। देश के सभी संगठित क्षेत्रों में मजदूरों को नोटिफाईड न्यूनतम वेतन से अधिक ही मिलता है। बस चाय बागान मजदूरों को छोड़कर। क्योंकि यहाँ अंग्रेजों के जमाने से चला आ रहा शोषण को चालू रखने के लिए षड़यंत्र किए जाते रहे। लेकिन उसका सम्यक विरोध करने की किसी ने कोई कोशिश नहीं की।

जब बागान मजदूर बिल्कुळ अनपढ़ थे। तब कुछ ट्रेड यूनियन नेताओं ने चाय बागान मालिकों के साथ मिल कर राज्य सरकार के भ्रष्ट तत्वों को मिला कर वेतन कानून के द्वारा स्वीकृत पैरामीटर से  बाहर त्रिपक्षीय समझौता करने का एक नया फर्मुला निकाला। जिसे सभी मिले हुए लोगों ने सरकार से स्वीकृति दिलाए और उसे मजदूरों के उपर थोप दिया गया। जानबुझ कर मजदूरों की ओर से भ्रष्ट ट्रेड यूनियन नेतागण न्यूनतम मजदूरी से अत्यंत कम निर्धारित मजदूरी को स्वीकार करते रहै। याद रखे Indian Contract Act, 1872 के अन्तर्गत किए जाने वाले समझौते में दोनों पक्ष जब बिना दबाव के खुशी-खुशी हस्ताक्षर करते हैं तो वह दोनों पक्ष पर वह एग्रीमेंट बैंडिंग हो जाता है। बागान मालिक तो चाहते हैं कि ट्रेड यूनियन इसी प्रकार के द्विपाक्षिक या त्रिपाक्षिक समझौते करते रहे, ताकि वे न्यूनतम वेतन से भी कम मजदूरी देकर भारी मुनाफा कमाते रहें।

दशकों तक यही होता रहा। २०११ में तृणमूल सरकार के अधीन इस प्रकार के समझौते का विरोध पर सबसे पहले निरंग पझरा में आलेख लिखा गया और बताया गया कि यह मजदूरों के साथ किया जा रहा बेशर्मपूर्ण धोखेबाजी है। मजदूरों को कम से कम न्यूनतम वेतन तो मिलना ही चाहिए जो कि तत्कालीन दिए जाने वाले मजदूरी से बहुत अधिक होता।

मालिक और सरकार ट्रेड यूनियन और बागान मालिकों के साथ हुए उस प्रथम एग्रीमेंट का हवाला देते हैं जिसके तहत त्रिपक्षीय मजदूरी समझौते की शुरूआत हुई। लेकिन वह एग्रीमेंट की मूल प्रति किनके पास है और किसने मजदूरों की ओर से उन पर हस्ताक्षर किए थे यह बताने को कोई तैयार नहीं। Indian Contract Act, 1872 के अनुसार यदि किसी Promisee के द्वारा कॉन्ट्रैक्ट के किसी भी धारा  के उल्लंघन किए जाने पर वह एग्रीमेंट अपने आप खत्म हो जाता है। देखा जाए तो चाय बागान मजदूर यूनियन और चाय बागान मालिक तथा सरकार द्वारा हस्ताक्षिरत हर एग्रीमेंट के शर्तें दर्जनों बार टूट चुकी है और वह कानून की दृष्टि में रद्दी का टूकड़ा के सिवाय कुछ नहीं है।

सरकार ने न्यूनतम मजदूरी के लिए सलाहकार समिति का गठन जरूर कर दिया है और वह मजदूरों को बेवकूफ बनाने के लिए दिखावटी बैठक किए जा रहा है। हर बार बिना मतलब की बातों से खानापूर्ति की जा रही है। 12 मार्च 2018  को कोलकाता में हुई सलाहकार समिति की बैठक में न्यूनतम मजदूरी मुद्दे पर कोई बात ही नहीं हूई। बल्कि उस दिन को मजदूरी के बदले दी जाने वाली राशन के नाम बलिदान दे दिया गया। जबकि राशन के लिए दी जाने वाली 9 रूपये की बढ़ोतरी के लिए सरकार एकतरफा नोटिफिकेशन जारी कर सकती थी। जब वह अंतरवर्तीकालीन मजदूरी 17.50 बढ़ाने के लिए एकतरफा नोटिफिकेशन जारी कर सकती है तो राशन के बाबत दिए जाने वाले बढ़ोतरी के लिए क्यों नहीं कर सकती है। कुल मिला कर बैठक को बर्बाद करने और न्यूनतम वेतन पर बातचीत को टालने का यह एक षड़यंत्र का हिस्सा है। मैंने बार-बार लिखा है न्यूनतम वेतन नहीं देने के लिए बहुत उच्च स्तर पर व्यापक स्तर पर  षड़यंत्र किए जा रहे हैं और मजदूर पक्ष के भी कुछ लोग इन षड़यंत्रों में शामिल हैं।

मजदूरों ने जब Indian Contract Act, 1872 के तहत किए जाने वाले एग्रीमेंट को अपने ओर से खत्म करने का ऐलान कर दिया है तो वह मामला वहीं खत्म हो गया है। अब गेंद सरकार के पाले में हैं।  न्यूनतम वेतन सलाहकार समिति का गठन का औचित्य तब होता जब मजदूर न्यूनतम वेतन के लिए राज्य सरकार के द्वारा नोटिफाईड वेतन से अधिक की मांग करते। जब मजदूर कोई मांग न करे तो उन्हें सरकार द्वारा नोटिफाईड वेतन ही दिया जा सकता है। जिसमें डी.ए. भी एक अभिन्न हिस्सा होता है। क्या न्यूनतम सलाहकार समिति सरकार द्वारा नोटिफाईड वेतन से कम पर मजदूरी तय करने का साहस कर सकती है ? आखिर वह ऐसा किन कानूनी प्रावधानों के तहत कर सकती है ? मजदूरों ने 2014 में हस्ताक्षरित समझौते के पूर्व न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत मजदूरी मांगा था। तब कहा गया था कि कैश कम्पोनेंट, आवास किराय, बागान द्वारा दिए जा रहे दूसरी सुविधाओं को भी वेतन में जोड़ कर ही न्यूनतम वेतन का निर्धारण होना चाहिए। मालिकों का कहना था कि यदि वे न्यूनतम वेतन के साथ अन्य सुविधाएँ भी देगें तो वास्तविक वेतन की देनदारी बहुत अधिक हो जाएगी। तब सभी चीजों का अध्ययन करने और उसका मूल्याकन करने के लिए सलाहकार समिति का गठन किया गया था। लेकिन वास्तविक रूप से इस न्यूनतमत वेतन की प्रभावी तारीख 2014 के अप्रैल महीना ही होगी। लेकिन जैसे इन लोगों ने 2011 के डी.ए. को सिर से ही गायब करवा दिया वैसे ही न्यूनतम वेतन के मुद्दे को भी कई साल लटका कर उसे अगले सालों के आने वाली तारीखों से लागू करवाने का षड़़यंत्र रचा है।

चाय अंचल में करीब 19 चाय बागान या तो पूरी तरह बंद था या फिर  कभी बंद तो कभी खुला का खेल चल रहा था। इन बागानों से कच्चे पत्ती तोड़ कर बागान के मजदूर बाहर बेच रहे थे। लेकिन देखा गया है कि बीच के ठेकेदार जो चाय बागानों से चाय खरीद कर अन्य को बेच रहे थे, वे सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ता रहे हैं। वे इंटरमिडियेटर बन कर चाय पत्तियों से कमाई कर रहे थे या अभी भी कमाई कर रहे हैं। कभी-कभी यह भी अहसास होता है कि कहीं यही स्पलिंटर ग्रुप चाय बागानों के खुलने और न्यूनतम मजदूरी के बीच तो आंगड़ा नहीं डाल रहे हैं। चाय बागानों मेंं 350-400 रूपये दैनिक कमाई होने पर बाहर पलायन कर गए अधिकतर लोग वापस आएँगे और वे गंभीरता के साथ चाय बागानों में काम करेंगे। इससे बागान के रूग्न होने या बंद होने की प्रक्रिया बंद हो जाएगी। लेकिन इससे आज कच्चे पत्तियाँ बेच कर भारी मुनाफा कमाने वालों की कमाई बंद हो जाएगी। 

इस षड़यंत्रों को बहुत कम लोग समझते हैं। 2014 से 2018 के बीच बहुत लम्बा काल व्यतीत हो चुका है। लेकिन पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी पार्टी भी मजदूरों के शोषण षड़़यंत्र में शामिल हो गया है। पहले श्रम मंत्रालय के कुछ अफसर ही मालिकों के साथ मिल कर मजदूरों के हित के विरोध में कार्य करते थे। लेकिन अब श्रम मंत्री और तृणमूल से संबंधित ट्रेड यूनियन नेतागण जिस तरह की भाषा बोलते हैं और मामले को टालने में लगे हुए हैं यह एक बहुत सधे हुए अच्छी तरह से बुने हुए व्यापक  षड़यंत्र की ओर इंगित कर रहा है।

THE COMPANIES ACT, 2013 के अनुसार 5 करोड नेट प्रोफिट करने वाले कंपनियों को अपने लाभ का 2 प्रतिशत को स्थानीय जनता के कल्याण के लिए Corporate Social Responsibility के रूप में व्यय करना होता है। अनेक चाय बागान 5 करोड़ से अधिक का मुनाफा कमाते हैं लेकिन वे कितने पैसे चाय बागान में रहने वाले समाज के उत्थान के लिए व्यय करते हैं। यदि ट्रेड यूनियन नेता, राजनैतिक नेता, प्रशासन, श्रम मंत्रालय चाहे तो इन कंपनियों के पैसों से चाय मजदूरों के लिए अच्छा खासा बडे़ अस्पताल, रोजगार दिलाने वाले प्रशिक्षण संस्थान आदि बनाए जा सकते हैं। लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है, आखिर क्यों चाय बागानों के मजदूरों को विकास के कारकों से वंचित किया जा रहा है।

हाल ही में तृणमूल कांग्रेस ने आदिवासी तृणमूल कांग्रेस नामक एक संगठन का गठन किया है। कितनी अजीब बात है कि तृणमूल ने नेपाली तृणमूल, बोड़ो तृणमूल, बंगाली तृणमूल, बिहारी तृममूल, हिन्दू तृणमूल, मुसलमान तृणमूल कांग्रेस का गठन नहीं किया। इसे सिर्फ आदिवासी तृणमूल कांग्रेस का ही गठन का विचार आया। आखिर इस विचार के पीछे ठोस कारण क्या है ?  इस नये संगठन का प्रमुख राज्य के आदिवासी मंत्रालय के मंत्री को बनाया गया है। आखिर मंत्री ने आदिवासियों के कल्याण के लिए कौन सा क्रांतिकारी योजना लागू किया है ? हाल ही में तृणमूल कांग्रेस सरकार ने युवा  Clubs को कई लाख रूपये दिए हैं। कई आदिवासी संगठनों को भी ये पैसे दिए गए। इन तमाम कसरतों का लक्ष्य आदिवासियों को कुछ न दिए ही उनके वोट को हासिल करना है। चाहे सरकार कुछ भी छुट्टे रूप से विकास के कार्य करे लेकिन यदि पाँच लाख मजदूरों को न्यायपूर्ण मजदूरी न दी जाए तो तमाम विकास के दावे दिखावटी ही दीखते हैं। 

एक ओर तो पाँच लाख चाय बागान मजदूर जिसमें 90 प्रतिशत आदिवासी हैं को न्यूमतम मजदूरी से वंचित करके उनके सामाजिक, आर्थिक उन्नति को बाधित करने का षड़यंत्र चल रहा है। उन्हें गरीब बनाए रख कर उन्हें चाय बागानों से पलायन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है और आदिवासी जनसंख्या को कम करने की कोशिशें चालू हैं। वहीं उनके वोट के लिए उन्हें बेवकूफ बनाने की तैयारी अंदरूनी खानों से की जा रही है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने आदिवासी विकास के लिए कई वादे किए थे। आदिवासियों के रोटी कपड़ा और मकान की समस्याओं को सुलझाने का आश्वासन किए थे। एक आदिवासी मंत्री भी बन गया लेकिन रूटीन काम के सिवाय पश्चिम बंगाल नया कुछ भी नहीं हुआ अब तक। राज्य से नकली आदिवासी प्रमाण-पत्रों अब भी निर्बाध जारी किए जा रहे हैं। जो गैर आदिवासी आदिवासी के नाम से नौकरी कर रहे हैं उनकी धर पकड़ कहीं नहीं किया जा रहा है। राज्य को केन्द्र सरकार से २०११ के बाद आज तक हजार करोड़ रूपये से अधिक Consolidated Fund दिया गया है। यह बजट के अतिरिक्त मदद है। लेकिन चार-पाँच अंग्रेजी माध्यम स्कूल के सिवाय आदिवासियों के लिए एक भी प्रशिक्षण केन्द्र नहीं बनाया गया है। कितने आदिवासियों को व्यवसाय करने के लिए, उच्च शिक्षा (डाक्टर, इंजीनियर, पीएचडी आदि) के लिए आर्थिक मदद दी गई है ? राज्य में पिछले सात सालों में कितने युवकों को सिविल सर्विस में ऊँचे पद हासिल हुए हैं ?

चाय बागानों में चाय मजदूरों की इतनी शोषण हो रही है कि मजदूरों को बागानों में काम करने की कोई रूचि नहीं रह गई है। चाय बागानों में भ्रष्टाचार के कारण लोगों को वास्तविक रूप से पंचायत का लाभ ही नहीं मिल रहा है। जो रोड, ड्रेनेज, सोलार लैंप, स्कूल घर आदि बन रहे हैं वे थोड़े ही दिनों में बर्बाद हो जाते हैं। आखिर आदिवासी विभाग किनके लिए कार्य कर रहा है ? किन आधार पर आदिवासी के नाम पर जातीवादी संगठन बनाए गए हैं और आदिवासियों को जातिवादी बनाने का षड़यंत्र किया जा रहा है ? क्या एक जुमलेबाज ठग पार्टी को आदिवासी वोट पाने के लिए महाठगबाज बनने की जरूरत है ?

तृणमूल कांग्रेस यदि सचमुच उन्नयन और परिवर्तन की सरकार है और वह आदिवासी के नाम पर संगठन बना कर सचमुच उनका विकास चाहती है तो आदिवासियों की जिंदगी में क्यों परिवर्तन नहीं आ रहा है? यह सवाल हर चिंतनशील आदिवासी के जेहन में जरूर उठेगा।

 

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