कुड़ुख है एक अति प्राचीन भाषा

                                                                                    नेह अर्जुन इंदवार
गत वर्ष कुड़ुख भाषा को मान्यता देने के लिए पश्चिम बंगाल विधान सभा में विधेयक पारित करने के बाद इसी सप्ताह पश्चिम बंगाल सरकार ने इस विषय पर गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है। अब कुड़ुख झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश सहित पश्चिम बंगाल राज्यों में राजभाषा के रूप में मान्यता प्राप्त भाषा का दर्जा हासिल कर लिया है।

दक्षिण भारत के तमिल के साथ इसके शब्दों और अर्थों की समानता के अनुसार भाषा वैज्ञानिकों ने कुड़ुख को द्रविड़ परिवार की भाषा माना है।  कुड़ुख भारत की एक अति प्राचीन भाषा है। ई-लंग्वेस्टिक नेट में प्रकाशित तमिल और कुड़ुख (शब्दों) भाषाओं की उत्पत्ति और समानता पर हुई शोध के अनुसार कुड़ुख और तमिल को दूर का रिश्तेदार Remotely related Language (RrL) बताया गया है। RrL या दूर का रिश्तेदार के पैमाने पर दो भाषाओं की रिश्तेदारी 4000 से लेकर 6000 वर्ष मानी गई है। इसका एक मतलब यह है कि 4000-6000 वर्ष पूर्व दोनों भाषाएँ एक ही जगह से अलग हुई थीं। उत्तर भारत में कुड़ुख के साथ गोंडी, कुई, माल्तो आदि भाषाएँ द्रविड़ परिवार की भाषाएँ हैं। वहीं दक्षिण भारत की आदिवासी समुदायों द्वारा बोली जाने वाली इलुरा, टोडा, कोटा, कोडावा, कुरूँबा आदि भी इस प्राचीन भाषा के सदस्य हैं। जबकि इस परिवार की भाषा सदस्य पाकिस्तान स्थिति बलुचिस्तान के ब्रहुई भी है। द्रविड़ भाषाओं के शब्द अफ्रीका के कैमरून देश के एक छोटे से आदिवासी समूह की भाषाओं में भी मिलती है। अमेरिका के हर्वर्ड विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञानी अलेक्स कोलियर के अनुसार एक समय दुनिया के अधिकांश समूह द्रविड़ भाषाओं का उपयोग करते थे। इस तरह द्रविड़ परिवार की भाषाएँ दुनिया के विशिष्ट भाषाएँ बन जाती है।

यूनेस्को की सूची में कुड़ुख भाषा को अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करने में कमजोर और खतरे में बताया गया है। Moseley, Christopher, ed. (2010). Atlas of the World’s Languages in Danger. Memory of Peoples (3rd ed.). Paris: UNESCO Publishing. ISBN 978-92-3-104096-2. Retrieved 2015-04-11.

भारत सरकार ने तमिल, तेलगु, मलयालम, उडिया और संस्कृत सहित कई प्राचीन भाषाओं को उनकी प्राचीनता के हिसाब से Classical Language के रूप में मान्यता दी है। इस हिसाब से कुड़ुख अपने आप ही भारत की एक प्राचीन भाषा के रूप में मान्यता पाने का हकदार हो जाता है। क्योंकि तमिल के साथ इसकी प्राचीनता स्वतः स्पष्ट है।

संस्कृत भाषा का विकास लगभग 4000 वर्ष पूर्व आर्यों के आगमन के बाद का माना जाता है। उल्लेखनीय है कि 4500 वर्ष पूर्व के राखीगढ़ी मानव कंकाल में आर्य जीन नहीं मिला। मतलब आर्यों का आगमन इसके बहुत बाद की है। आधुनिक भारतीय भाषाओं का इतिहास 1000-1500 वर्ष से अधिक पुराना नहीं समझता जाता है। इस दृष्टि से जंगलों और दूसरे समुदायों के अमिश्रित आदिवासी भाषाएँ कुड़ुख, मुण्डारी, संथाली, हो, खडिया आदि भाषाएँ अति प्राचीन काल से लगभग अपने मूल स्वरूप, अर्थ, ध्वनि आदि को अपने कलेवर में छिपाए करीबन 4000-6000 वर्ष तक अपनी मौलिकता को बरकरार रखने में कामयाब रहे। मतलब यदि भारत की अति प्राचीन भाषाओं के पद और अधिकार की बात की जाए तो भारत की आदिवासी समुदायों की भाषाएँ ही प्रथम संदर्भ में स्थान पाएँगे। सिंधु घाटी सभ्यता में बोली जाने वाले यही अति प्राचीन भाषाएँ रहीं होंगी। उल्लेखनीय है कि राखीगढ़ी में मिले कंकाल के डीएनए के लक्षण दक्षिण भारत के एक आदिवासी समुदाय के डीएनए से कुछ मेल खाते हैं। देखिए https://www.indiatoday.in/magazine/cover-story/story/20180910-rakhigarhi-dna-study-findings-indus-valley-civilisation-1327247-2018-08-31 इसका एक मतलब यह भी है कि दक्षिण भारत की द्रविड़ आदिवासी जातियों के साथ उत्तर भारत की द्रविड़ परिवार की भाषा बोलने वाले आदिवासियों के साथ भाषाई और डीएनए के संबंध जरूर विद्यामान होंगे। बस इस संबध में आदिवासियों को खुद ही पुरातात्विक, भाषाई और बायोलॉजिकल शोध खुद ही करने होंगे। भारत का अति प्राचीन इतिहास लेखन में आदिवासियों को अपनी भाषा और संस्कृति के माध्यम से आगे आना होगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत देश आज के आदिवासियों के पूर्वजों का देश है और भारत में आदिवासी भाषा और संस्कृति को संरक्षण रखने में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। आदिवासियों को सौ-डेढ़-सौ सालों से शिक्षा पाने का अवसर मिला है और शिक्षित होने के बाद वे अपनी भाषा-संस्कृति को संरक्षित रखने के लिए जागरूक हुए हैं। डा. रामदयाल मुण्डा ने अमेरिका में अच्छे खासे प्रोफेसर की नौकरी को छोड़कर देश लौटा और आदिवासी भाषाओँ के संरक्षण और विकास के लिए अपनी जिंदगी लगा दी। आज राँची विश्वविद्यालय सहित देश के अनेक विश्वविद्यालयों में आदिवासी भाषाओं की पढ़ाई की जा रही है और भाषाओं पर शोध किए जा रहे हैं। आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के लिए आज समाज जागरूक हो गया है। आदिवासी भाषाओं पर देश में शोध के फलस्वरूप  आज सैकड़ों पीएचडी धारी आदिवासी हैं जो भाषाओं और अन्य क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। समाज धीरे-धीरे विकास के पथ पर अग्रसर है।

पश्चिम बंगाल में कुड़ुख भाषा की मान्यता इसी विकास के पथ पर एक मील का पत्थर है। कल और भी आदिवासी भाषाओं को मान्यता मिलेगी, इसमें किसी तरह की शंका रखना बेवकूफी है।  कुड़ुख भाषा का किसी अन्य आदिवासी भाषा के साथ कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। बल्कि कुड़खरों को गर्व होना चाहिए कि उनके पूरखों के द्वारा 6000 या शायद 10000 वर्ष से बचाए गए भाषा को विकसित करने और अपनी भाषा और संस्कृति के साथ जीवन जीने का उन्हें जो मौका मिला है, वैसा मौका भारत के आधुनिक भाषा बोलने वाले और किसी जाति और समुदाय को नहीं मिला है। क्योंकि सभी आधुनिक भाषाओं का विकास काल खण्ड आदिवासी भाषाओं से बहुत बाद का है और उनकी भाषाओं का अतिप्राचीनता कई सहस्त्रबादी पहले ही नष्ट हो गयी है। कई लोगों के मन में कुड़ुख के व्यवहार से पिछड़े हो जाने की शंका भी है, लेकिन यह शंका उनके भाषा और विकास संबंधी ज्ञान, जानकारी के अभाव के कारण है। व्यक्ति या समाज का सम्पूर्ण विकास असंख्य कारकों पर निर्भर होता है। आधुनिक तकनीकी की दुनिया में किसी भाषा का विकास उनके तकनीकी ज्ञान पर भी निर्भर करता है।

हिब्रु भाषा आज से 2500 वर्ष विलुप्त हो गया था। हिब्रु भाषा बोलने वालों ने 2500 वर्ष पहले विभिन्न प्रतिकूल परिस्थितियों के थोपेड़े में आकर अपनी भाषा को छोड़ दिया था और हजारों वर्षों तक दूसरी भाषाओं को अपना लिया था। हिब्रु भाषा सिर्फ धार्मिक किताबों और धार्मिक क्रियाओं में ही बचा हुआ था। लेकिन 19वीं सदी में इसे पुनर्जीवित किया गया और आज यह इजरायल की बहुत विकसित राजभाषा है। और अब तक इस भाषा के उपयोगकर्ताओं को 12 नॉबेल पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं।

पश्चिम बंगाल में कुड़ुख को सरकारी मान्यता मिलने के बाद कुड़ुख भाषियों को इसके विकास के साथ अपने सहोदर भाषाएँ मुण्डारी, खडिया, हो, सादरी आदि के विकास के लिए भी साथ मिल कर कार्य करना चाहिए। जो व्यक्ति भाषाओं के नाम पर अलगाव की राजनीति करके अपनी नेतागिरी चमकाना चाहते हैं, उन्हें जनता से अलग-थलग करने की जरूरत हैं। संकीर्ण विचारधारा वाले अर्धशिक्षित नेतागण अपनी सकारात्मक क्षमता से कोई मुकाम बनाने में नकाम रहते हैं इसलिए वे नकरात्मक भावनाओं के बल पर नेता बनने के प्रयास में होते हैं। एक मौलिक आदिवासी  भाषा का विरोध एक नासमझी और नादानी भरा  क्रिया है। यह नेतागिरी चमकाने और विशेष स्वार्थ को पूरा करने का प्रयास भी है। इसे कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना के रूप में देखा जा सकता है।

भाषाओं के विकास का कार्य अत्यंत गंभीर कार्य है। इसके लिए निरंतर लेखन, मनन, चिंतन और सकरात्मक लक्ष्य की जरूरत होती है। इसमें उच्च शिक्षा, गंभीर अध्ययन और व्यापक दृष्टिकोण की जरूरत होती है। जिन्हें नेतृत्व का उत्तरदायित्व मिले, वे अपने उत्तरदायित्व की गंभीरता को समझें और उसी के अनुसार व्यवहार करें और समाज को नेतृत्व दें।

सरकारी मान्यता प्राप्त होने के बाद आज डुवार्स तराई के गाँव-गाँव में कुड़ुख स्कूल खोलने की जरूरत है। उन स्कूलों को प्राप्त आर्थिक संसाधनों और ढाँचागत सुविधा को मुण्डारी, खड़िया, हो, सादरी के विकास के लिए भी साझा करने की जरूरत है। कुड़ुख स्कूल का instructions (पढ़ाने की भाषा) आवश्यकता अनुसार इलाके में बोली जाने वाली घरेलू भाषा को बनाया जाए। जहाँ बच्चे मुण्डारी जानते हैं उन्हें मुण्डारी के माध्यम से पढ़ाया जाए, इससे मुण्डारी भाषा का संरक्षण, विकास भी साथ साथ होगा। जहाँ बच्चे सादरी जानते हैं वहाँ सादरी के माध्यम से पढ़ाया जाए। इससे सादरी में भी पढ़ने लिखने की सुविधा विकसित होगी और साहित्य की रचनाओं का निर्माण होगा। जहाँ बच्चे खड़िया जानते हैं या हो जानते हैं वहाँ खड़िया या हो में पढ़ाई करायी जाए। मुख्य बात है कि आदिवासी भाषाओं का विकास किया जाए। इसके लिए कुड़ुख स्कूल को मिले संसाधन या ढाँचागत सुविधाओं का उपयोग किया जाए।

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पत्थलगड़ी की उलझन

                                                                              वाल्टर कांदुलना 

                        भाग एक

पत्थलगड़ी आदिवासियों का, विशेषकर मुंडा प्रजातियों की एक प्राचीनतम मेगालिथिक (पाषाण) परंपरा है. Megalithik ग्रीक भाषा के दो शब्दों अर्थात् Mega=महा,और Lithik=पाषाण से बना है; यानी बड़ा पत्थर.

किसी भी समाज में पत्थलगड़ी का मुख्य उद्देश्य किसी घटना को ना केवल स्मारक या यादगारी के रूप में संजोकर रखना है बल्कि वह उनकी अपनी जीवन शैली का भी परिचायक है. जैसे “ससन दिरी” अगर किसी #अपने_पूर्वज_की_याद_में_पत्थल_को_गाड़ा_जाता_है तो साथ ही उसकी आत्मा को अपने घर में स्थान और सम्मान देने का भी एक प्रतीक है.

पत्थलगड़ी आदिवासियों के अस्तित्व और उनकी आस्था की पहचान ही नहीं बल्कि उनका जीवन्त प्रमाण भी है. पत्थलगड़ी के द्वारा आम आदिवासी आपस में अपने परिवार से या अपने गाँव से या अपने समाज से एक भावनात्मक रिश्ते में बंधे हुए होते है. यही बंधन उनके भौतिक अस्तित्व को बनाये रखने में बेहद मददगार होती है और सामाजिक रूप से जिन्दा बनाये रखता है.

मुंडाओं में कम से कम #चालीस_प्रकार_के_पत्थलगड़ी होते हैं. ये मुंडा प्रजाति के इतिहास पथ है. और उनकी पहचान और अस्तित्व, सभ्यता और संस्कृति के गौरवशाली प्रमाण और विरासत है.
अभी भी यह परंपरा जीवित है.
पत्थलगड़ी के इसी क्रम में
“#सीमान_दिरी” एक तरह का #पत्थलगड़ी_है_जो_गांव_की_सीमा_को_दर्शाता_है.

#अखड़ा_दिरी_अखड़ा_में_गाड़ा_जाता_है, जिसका उद्देश्य शिक्षा देने के लिए होता है.
आज #पत्थलगड़ी एक सरकारी विवाद के घेरे में है. सरकार पत्थलगड़ी को अपने पूंजीपति मित्रों की राह में रोड़ा मान रही है और इसलिए इसको गैर-संवैधानिक घोषित करने में तुली हुई है.

आदिवासी क्षेत्रों में शिलापट्टों के द्वारा कानून सम्बन्धी जानकारी देंना कोई नई बात नहीं है.

बीस वर्ष गुजर गए. फरवरी,1997 में डॉ बी.डी शर्मा ने झारखण्ड के सैकड़ों गावों में दौरा करके The Provisions of the Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act-1996 संक्षेप में पी-पेसा कानून-1996 के द्वारा संवैधानिक प्रदत्त ग्राम सभा की सात शक्तियों को शिलापट्टों पर लिख कर उन्हें गडवाया थाI और पारंपरिक ग्राम-सभा को स्थापित करने की कोशिश की थीI उस समय डॉ शर्मा ने एक नारा भी दिया था :“ना लोक सभा ना विधान सभा, सबसे बड़ा ग्राम सभा”I लेकिन तब से अब तक सरकार ने अभी तक इस कानून पर कोई संज्ञान नहीं लिया तथा 20 वर्षों के गुजर जाने के बावजूद अब तक किसी भी सरकार ने इस कानून को लागू करने की कोई जहमत नहीं उठाई I
पर अब यह पत्थलगड़ी सरकार की आँखों में गड़ने लगी है. पत्थल-गड़ी की इसके आशय से सरकार को अपने और पूंजीपतियों के हित साधने में बाधा पहुँच रही है I
मूल सवाल यह है सरकार /सरकारों ने पी-पेसा कानून-1996 को अभी तक क्यों लागू नहीं किया है? कानून का पालन करने की जिम्मेदारी क्या सिर्फ नागरिकों/जनता को ही है सरकार को नहीं?

अब तक सरकार ने आदिवासियों से जो छल किया है क्या वह उसकी भरपाई कर सकती है.?
सर्वप्रथम तो सरकार ने The Provisions of the Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act-1996 से *Provisions* को गायब कर दिया और उक्त कानून के नाम को The Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act-1996 के नाम से प्रचारित कियाI और इसी गलत नाम के आलोक में झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम-2001 को , जो सामान्य क्षेत्र का कानून है, अनुसूचित क्षेत्र में भी थोप दिया . जबकि संविधान के अनुच्छेद 243 (M) में यह स्पष्ट है कि भाग IX की पंचायत व्यवस्था अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं की जा सकती हैI उसी प्रकार संविधान के अनुच्छेद 243ZC के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में नगर निगम और नगर-पंचायतें असंवैधानिक हैं क्योंकि राज्य विधायिका द्वारा निर्मित कानून झारखण्ड म्युनिसिपैलिटी अधिनियम 2011 अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं किया जा सकता हैIक्या सरकारें , कानून से ऊपर होती हैं?

अभी हाल में दिनांक 28/03/18 के प्रभात खबर प्रथम पृष्ठ पर यह छापा गया कि “ जमीन की हेराफेरी करने वाले अफसरों , कर्मियों पर नहीं होगा केस” यह मुद्दा और इसकी भाषा क्या किसी सभ्य समाज में मान्य हो सकती है? यह तो एक सीधा सा “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का लट्ठमार ऐलान है. लेकिन मुख्यमंत्री महोदय पूरी बेशर्मी और निर्लज्जता से एक झटके में पूरी मानवता की समस्त सभ्यता के आधार को ही नकार देते हैं..

दूसरा सवाल अब यह होता है कि वास्तविक देशद्रोही कौन है? जिसने कानून की गलत व्याख्या करके उसके द्वारा आदिवासियों की लाखो एकड़ जमीन को हथियाया /अधिगृहीत किया, जमीन की हेराफेरी करने वाले अफसरों पर कोई कानूनी कारर्वाई नहीं की या जिसने पत्थल पर अपनी जमीन और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए दो वाक्य लिखे ? वैसे भी जिसके लिए जमीन की हेराफेरी करना गलत नहीं है ,उसके लिए कानून की व्याख्या करना या अ-व्याख्या करने क्या कोई मतलब हो सकता है ?
सच पूछा जाए तो पत्थलगड़ी एक संवेदनहीन और बहरी सरकार के सामने अपने अस्तित्व को बचाने का एक आह्वान मात्र है.

पत्थलगड़ी …..(भाग –दो)

सरकार का #पत्थलगड़ी पर मूल आरोप यह है कि संविधान के अनुच्छेद 13(3) a ,19(5) 19(6), और 244 (1) को गलत ढंग से पेश किया गया है.
आइये इन पर हम एक-एक करके विचार करें.

1) अनुच्छेद 13(3) a का मूल भाव यह है .Law includes any ordinance ,order , bye-law, rule, regulations notifications , <Customs or Uses> having in the territory of India has the <Force of law> .#दूसरे_शब्दों_में_परंपरा_या_पारंपरिक_व्यवहार (#रुड़ीवादी_व्यवस्था) #को <#विधि_का_बल> #प्राप्त_है. झारखण्ड के  #आदिवासियों_ की_एक_सामजिक_राजनीतिक_व्यवस्था है जिसे एक common नाम दिया जा सकता है: “पड़हा व्यवस्था”.

पी-पेसा कानून 1996 का सेक्शन 4 (a) और 4(d) में #customary_law, social and religious practices and traditional management practices of community resources, traditions and customs ,cultural identity आदि के बारे में चर्चा है .
ये दोनों सेक्शन मूलतः अनुच्छेद 13(3) a के ही विस्तार (Extension) है. लम्बे 20 साल गुजर गए , अभी तक सरकार ने पी-पेसा कानून-1996 के इन सेक्शनों के संगत (in consonance) कोई विनियम नहीं बनाया है. आखिर क्यों ? गलती किसकी है? पत्थल पर लिखने वाले की या इसे गलत समझने वाली सरकार की? हमें सरकार यह बताये कि पी-पेसा कानून-1996 के सेक्शन 4 (a) और 4(d) का अनुपालन अभी तक क्यों नहीं किया गया है?
क्या कानून का पालन करने की जिम्मेदारी सिर्फ जनता पर होती है, सरकार पर नहीं ?
2) अनुच्छेद 19(5) और 19(6) Nothing in sub-clause (d) and (e) of the said clause shall affect the operation of any existing law in so far it imposes , or prevent the State from making any law imposing in the interest of public order or morality , <reasonable restrictions> on the exercise of the right conferred by the said sub clause.
Sub clause (d) और (e) आम नागरिकों के भारत में स्वतन्त्र रूप से विचरण करने, निवास करने तथा व्यापार करने का अधिकार देता है.
अब ध्यान देने योग्य बात यह है कि झारखण्ड मूलत आदिवासियों के हितों को ध्यान में रख कर बिहार से अलग किया गया था. लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में आदिवासी हित की बात तो छोड़िये , विभिन्न उद्योगों और माइंस और भूमि बैंक , झारखण्ड मोमेंटम आदि के द्वारा उनके विस्थापन और विनाश की पटकथा क्या नहीं लिखी जा रही है?

वैसे भी अनुच्छेद 19(5) और 19(6) का विस्तारण उपर्युक्त कानून पी-पेसा 1996 के आलोक में सेक्शन 4(m) (iii) और 4(m) (iv) के द्वारा किये गए हैं. सरकार किसी मुद्दे के एक पक्ष को ही देखने का प्रयत्न कर रही है?
3) अनुच्छेद 244(1) : The provisions of the Fifth Schedule shall apply to the administration and control of the Scheduled Areas and Scheduled tribes in any State other than the State of Assam, Meghalaya, Tripura and Mizoram.

संविधान के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन और नियंत्रण पांचवीं अनुसूची के तहत किया जाना है. इसके तहत #राज्य_सरकार_को_सिर्फ_कार्यपालिका_के_अधिकार_हैं.[*सेक्शन 2]

लेकिन सच्चाई तो यह है कि सरकार , अनुसूचित क्षेत्रों को एक <सामान्य क्षेत्र की तरह> मान कर इन पर अपना नियंत्रण रखने की कोशिश कर रही है. बल्कि यहाँ की कार्यपालिका ने राज्यपाल के अनुसूचित जनजातियों से सम्बंधित अधिकारों को हाईजैक कर लिया है. अनुसूचित जनजातियों की जमीन सम्बंधित मामलों में तथा जनजाति परामर्शदात्री परिषद् के मामले में राज्य की कार्यपालिका का अनधिकृत दखल-अंदाजी हो गया है , जो कि सिर्फ और सिर्फ राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में है.[सेक्शन4(2)]

अभी तक TAC की नियमावली नहीं बनी है इसके बावजूद आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा से सम्बंधित कानून जैसे सीएनटी/एसपीटी कानून, जमीन अधिग्रहण कानून 2013 आदि का संशोधन TAC की आड़ से किया जा रहा है.#रघुवर_दास_Tribes_Advisory_Council_का_अध्यक्ष_नहीं_बन_सकता है? [सेक्शन 4(1)]
सरकार के अधिकार क्षेत्र में भूमि-बैंक बनाने की शक्ति नहीं है.[सेक्शन 5(2)a]
हाल में सरकार ने जमीन पर अवैध कब्ज़ा करके रहने वालों को उस जमीन का मालिकाना देकर कब्जे को वैध घोषित कर दिया है.
दूसरे शब्दों में #सरकार_हर_दिन_आदिवासियों_के_हित_के_कानूनों का बलात्कार कर रही है .परन्तु उसे सवाल करने वाला कोई नहीं है. राज्यपाल का पद एक रबर-स्टाम्प में तब्दील कर दिया गया है . जबकि वह अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित क्षेत्र का संरक्षक (custodian) होता है.

पी-पेसा कानून 1996 के तहत, अपवादों और उपान्तरों के अधीन , अनुसूचित क्षेत्र की ग्राम सभाओं को सात शक्तियां दी गयी हैं. [सेक्शन 4 m (i) से (vii) तक.] ,लेकिन सरकार ने इनकी जगह ग्रामीण क्षेत्र में झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम 2001 और शहरी क्षेत्र में झारखण्ड म्युनिसिपैलिटी अधिनियम 2011 को लागू कर दिया है.
संविधान की धाराओं 243-M(1) और 243-ZC(1) के आलोक में उपर्युक्त ये दोनों अधिनियम बिल्कुल असंवैधानिक है.

निष्कर्ष: सरकार पत्थर पर लिखे गए व्याख्या को तो गलत कह रही है. और उसके द्वारा पत्थलगड़ी को ही असंवैधानिक सिद्ध करने की कोशिश में है. लेकिन अनुसूचित क्षेत्रों में गलत कानूनों को लागू कौन कर रहा है?. सरकार को पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिएI.

संभवतः झारखण्ड में खुद सरकार के ही द्वारा आदिवासी सम्बंधित संवैधानिक प्रावधानों का सबसे ज्यादा उल्लंघन हो रहा है.I इस प्रकार के संवैधानिक घोटाले सभी प्रकार के घोटालों से गंभीर और विस्तृत होता हैI
सरकार को पहले इस पर विचार करना चाहिए.I

सरकार आदिवासियों को और उनकी परम्पराओं को नष्ट करने का कुचक्र का चक्र चलाना छोड़ेI
पत्थलगड़ी संविधान के खिलाफ नहीं है.I

पत्थलगड़ी आदिवासियों की परंपरा है और इसे कानून का बल भी प्राप्त हैIयह आदिवासियों का मौलिक अधिकार हैI किसी को इसे छीनने का अधिकार नहीं है I सरकार को भी नहीं I

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जुमलेबाज शासन-प्रशासन

 

                                                                                                         नेह अर्जुन इंदवार

जिस भाषा के शब्द और संज्ञाओं से शिशु का प्रथम परिचय होता है, वही उसके लिए सबसे आसान भाषा होती है। अधिकतर मामले में यह भाषा उसकी मातृभाषा होती है। मातृभाषा में शिक्षा-दीक्षा प्राप्त होने पर वह उसे सहजता से ग्रहण करता है और उसकी सीखने की सहज प्रवृत्ति का विकास होता है। अपनी मातृभाषा में सीखने की प्रक्रिया से वह शब्दों और वाक्यों में छिपे हुए तथ्यों को ग्रहण करता है। किन्तु, मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं होने पर बालक-बालिकाओं को दूसरी भाषा के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करना पड़ता है। कोई भी दूसरी भाषा सीखना एक श्रम साध्य कार्य है। दूसरी भाषा की प्रकृति, भाषा संरचना अलग होती है। उसकी प्रकृति अलग सांस्कृतिक भावों को व्यक्त करती है। अतः उसे पहले समझना पड़ता है, बच्चों के दैनिक जीवन में उन भाषाओं का व्यवहार नहीं होने के कारण उन्हें उन शब्दों को रटना पड़ता है और शब्दों के उचित, सटिक अर्थ और व्यवहार सीखने में उन्हें अनावश्यक अधिक समय और परिश्रम लगाना पड़ता है। इससे उनके नन्हें दिमागों में व्यर्थ जोर पड़ता है। उनकी सीखने की स्वभाविक उत्सुकता कुंद हो जाती है और अपरिचित शब्दों को सीखने के लिए इच्छा और उत्सुकता उत्पन्न नहीं होती है। शिक्षा का मूल उद्देश्य बच्चों में कॉमनसेंस, अवलोकन और विश्लेषण करने की क्षमता का विकास करना होता है। किन्तु अन्य भाषा में शिक्षा प्राप्त होने पर शिक्षा के माध्यम की  भाषा को सीखने में व्यर्थ का उर्जा व्यय होता है। जाहिर है कि गैर मातृ भाषाओं में शिक्षा प्राप्त करने से बच्चों में इन गुणों का विकास नहीं हो पाता है और वे रटकर परीक्षा पास करते हैं। शिक्षा के लम्बे सत्रों में यह प्रक्रिया आदत बन  जाती है और शिक्षा का असली उद्देश्य पीछे छूट जाता है।

आदिवासी बालक-बालिकाओं को आदिवासी भाषाओं (मुण्डारी, संताली, कुँड़ुख़, हो, खड़िया आदि) में शिक्षा मुहैया कराने की बातें कई बार की गई। नीतियाँ बनीं, आदेश निकाले गए, लेकिन आदिवासी गाँवों में शिक्षा का माध्यम आदिवासी भाषाएँ बन नहीं पाईं। कार्यान्वयन के स्तर में सभी आदेश निष्प्रभावी हो गए। आदिवासी समाज को, तत्कालीन बिहार और मध्यप्रदेश, अब झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में हिन्दी, उड़िसा में उड़िया, पश्चिम बंगाल में बंग्ला, असम में असमिया आदि भाषाओं में शिक्षा ग्रहण करना पड़ रहा है। गैर-मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने के कारण वे स्वाभाविक रूप से न तो शिक्षण-भाषा में पारंगत हो पाते हैं और न ही अपनी भाषा के साथ स्वाभाविक जुड़ाव की भावना स्थापित कर पाते हैं। ऐसे वातावरण में एक अप्राकृतिक, खिचड़ी भाषा और शैक्षिक माहौल का निर्माण होता है जो आदिवासी समाज के लिए कतई लाभदायक सिद्ध नहीं हो पाया है। आज हमारी भाषाएँ विलुप्ति के कगार पर खड़ी हैं, क्योंकि हमें अन्य भाषाओं के माध्यम से शिक्षा मिलती रही है और उन अन्य भाषाओं को हम परिवार और समाज की भाषा बना लिए हैं। झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में हिन्दी हमारी मातृभाषा बन चुकी है तो पश्चिम बंगाल में शिक्षित आदिवासी बंग्ला भाषा को परिवार की भाषा बना लिए हैं। वहीं उड़िसा और असम में उड़िया और असमिया बोलना हमारी स्वाभाविक दैनिक आदत बन गयी है। अपनी भाषाओं में बातें करने में हमें हिचकिचाहट, दिक्कत, लज्जा का बोध होने लगा और हीन भावनाओं ने आ घेरा है। शिक्षित आदिवासियों की दुनिया में प्रवेश करने वाली गैर-आदिवासी भाषाएँ, हमें अपने ही अशिक्षित भाई-बहनों के बीच भाषाई दीवार खड़ी करने के लिए उकसाती है।

अब तो हालात ऐसे हो गए हैं कि कुछ लोगों के पास आदिवासीयत के नाम पर सिर्फ एक सार्टिफिकेट होता है। जिसमें उसकी जाति का नाम अंकित होता है बाकी सब चीजों में वे पक्के गैर-आदिवासी होते हैं।

भाषा समाज को जोड़ती है, लेकिन भाषा बदल जाए तो अपनत्व के भाव में भी कमी हो जाती है। कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि आदिवासी समाज के विकास, एकता, संरक्षण और पहचान में भाषा एक महत्वपूर्ण कड़ी है। लेकिन इतनी महत्वपूर्ण विषय पर कभी समाज ने इस पर कोई आंदोलन छेड़ने की कोशिश नहीं की। समाज के विकास के लिए अनेक मांगे सरकारों के सामने रखी गईं। लेकिन भाषा के सवाल में हमारे सामाजिक और राजनैतिक नेतृत्व हमेशा मौन धारण करके बैठे रहे। इसी का प्रतिफल हम आज भोग रहे हैं कि हमारा शिक्षित समुदाय शिक्षित होने के साथ-साथ अपनी भाषा से दूर होता जा रहा है और वैयक्तिक तथा भोैतिक विकास को ही असली विकास समझ बैठा है।

                2006 में झारखण्ड के तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री श्री बंधु तिर्की ने नये शिक्षा सत्र् में आदिवासी भाषाओं में शिक्षा शुरू करने की घोषणा की थी । यह अत्यंत प्रशंसनीय घोषणा थी । पूरा झारखंडी समाज ने  इसका स्वागत किया था । यह आशा की गई थी कि एक बार विद्यालयों में भाषा की शिक्षा शुरू हो जाए, तो इसके रास्ते में आने वाली तमाम बाधाएँ भी दूर हो जाएँगी। भाषाई नीति की यह रास्ता काफी उबड़़-खाबड़ है यह सभी जानते थे । भाषा के जनपथ पर तेज दौड़ के लिए इसे समतल बनाना था यह भी किसी से छिपा नहीं था । इस घोषणा ने शिक्षितों, शिक्षाविदों को युद्धस्तर पर कार्य करने की चुनौती प्रदान की थी । प्राथमिक स्तर से लेकर माध्यमिक स्तर तक भाषा की पाठ्य-पुस्तकें, कहानियाँ, कविताएँ, व्याकरण, पत्रा-पत्रिकाओं की एक लम्बी श्रृंखला लिखने, छापने और बनाने की आवश्यता थी। शिक्षा की शुरूआत के साथ साहित्य निर्माण का एक सफर शुरू होना था। साहित्य समृद्धि से समाज के बौद्धिक स्तर में वृद्धि होनी थी। पूरे आदिवासी समाज के सामने यह एक सुअवसर था कि वे श्री तिर्की की घोषणा को जमीनी स्तर में कार्यन्वित करने के लिए आगे आते और इस ऐतिहासिक मौके को हाथ से निकलने नहीं देते।

लेकिन इस रास्ते में हिमालय से भी अधिक ऊँचे पर्वत है यह किसी को भी पता नहीं था । एक संवैधानिक राज्य के एक मंत्री के द्वारा किए गए घोषणा को दस साल बीते गए। इन दस वर्ष में कुछ समितियाँ बनीं, कुछ किताबों को लिखने का प्रयास किया गया और कुछ किताबों का प्रकाशन भी हुआ। लेकिन जिन बच्चों और स्कूलों तक उन किताबों और मातृभाषा के प्यार को पहुँचना था वह नहीं पहुँचा, न ही किसी आदिवासी पार्टी, एनजीओ या संस्थाओं ने इसके लिए कोई आवाज उठायी और न ही इसे किसी आंदोलन का हिस्सा बनाए। जिन महानुभावों के कर कमलों के द्वारा इन किताबों को सामने लाया गया वे भी इसे जमीनी स्तर में पहुँचाने में असफल सिद्ध हुए।

बंधु तिर्की और उनकी सरकार के बाद भी कई सरकारें आयीं और गईं, लेकिन किसी भी सरकार ने इस विषय पर कोई ठोस कार्य नहीं की और न ही इस घोषणा को कार्यन्वित करने की कोशिश की गईं। जिस शिक्षा विभाग के प्रारंभिक परिकल्पनाओं पर यह घोषणा आधारित थी, उसी शिक्षा विभाग के अफसर आफिम की गोलियां खा कर सो गए। लगता है विभाग को कोई क्रांतिकारी दिमाग वाला अफसर नहीं मिला और वे अपने रचनात्मक दिमाग को इस मामले में खपा नहीं पाए। देश में कैसे लोगों के हाथों में शासन और प्रशासन है यह इसका एक उदाहरण है।

अपनी ही राज्य में अपनी ही मातृभाषा के शिक्षा के प्रति समाज कितना उदासीन हो सकता है, उसका यह एक ज्वलंत उदाहरण है। इस तरह की घोषणाएँ समाज और देश के लिए जुमला घोषणाओं की श्रेणी में आतीं हैं और जुमले घोषणाओं पर विश्वास करता समाज भी जुमला समाज हो जाता है।

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राही जीवन का

राही मैं भटका हुआ
डरा सा, घबराया हुआ,
सच्चे पथ की तलाश में,
यहाँ-वहाँ घूमता हूँ
तुझे ढूढ़ता हूँ ।
दुःख तकलीफों से घिरा,
घने अंधकार में तन्हा
तेरी रोशनी की उम्मीद में,
आँखे बंद करता हूँ,
तुझे ढूढ़ता हूँ ।
ठोकर खाते गिरते सम्भलते,
पर कदमों को बिना रोके,
बाधाओं को पार कर के
कामयाब पलों को चूमता हूँ,
तुझे ढूढ़ता हूँ ।
मंजिल को पा कर,
पीड़ा भूल मुस्कान लिए,
तुझे धन्यवाद देते हुए,
खुशी से झूमता हूँ ।
तुझे ढूढ़ता हूँ
                 मौसम केरकेट्टा, मधु बागान

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सिखबु लिखेक मोंय क ख

इसकूल जाबु मोंय पढ़बु क ख,
सिखबु मोंय तो इंगरेजी भाखा,
लिखवाय दे नी आयो इसकूल मोके,
लिखेक सिखबु नाम तोर,
पिइन्ध के जाबु मोंय जुता मोजा,
किन दे नी आयो खाता, पेंसील,
सिखबु लिखेक मोंय तो क ख ।

पेखना करोना आयो के,
नी बुझोना मजबुरी के,
संग मनके जायक देखोन होले,
भुख पियास मोर उड़ी जायल
जओन गुड़ियाय पिछे-पिछे,
आधा डहर मोंय घुईर अओन,
कहोन आयो लिखवाय दे नी इसकूल मोके,
कांदेल आयो मोर रझ-रझ कहेल मोके,
पावोन मांई मोंय आधा हजिरा,
तीन सांझ कर भात जेतरा,
का देबु मोंय खरचा तोर ले,
चुप रह नी मांई तोंय भात खाय के,

काम करबु आयो मोंय तोरे संगे,
हजिरा पाबु मोंय थोड़़को कने,
तेभियो जाबु मोंय इसकूल घरे,
सिखबु लिखेक मोंय क ख ।

                                          सानिया लकड़ा, मधु बागान

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आयो कर माया

 

                                                                                                  सानिया लकड़ा

आयो मोर बिहाने उठेल,

भात रांधेल, रोटी पकाएल,

मोके उठाएल, मुख धोवेल,

खाएक लगिन रोटे देवेल,

सीटी लागेल, मोके छोइड़ उरमाल जोरेल,

आयो मोर तोरेल पतई बगान में।

नदी नाला, गाड़हा ढ़ोड़हा सोब जगन,

उरमाल में भरेल पतई मगन,

खाली गतर, खाली गोड़े,

भरेल पतई, तोइर थोड़े-थोड़े,

गारा बजे छुट्टी होवेल,

आयो मोर घर आवेल,

कुँहुड़ होवल मोर काया,

नी मरेला आयो, करेल मुरूक माया ।

डेढ़ बजे फिन जाएल,

पतई तोरेक, कहेल आयो

ना कांदवे बेटी एकले-एकले,

लाईन देबु मोय, खाजा तोरले,

ओगरोत रहोन मोय सांझ होल तक।

आसरा देखोना मुरही लाडू कर,

आयो मोर आवेल नहीं, राईत होवेला,

कांदोन सोईच के आयो-आयो।

आबा कहेला, भाग हिंयाँ से दिगदारी छौवा,

कांदोन मुरूक भुंईया में सुइत-सुइत के,

आवेल आयो, करेल कोरा देवेल मोके

मुरही लाडू हासोन मुरूक खिट-खिटाय के,

देखेला आयो हाइंस- हाइंस के,

पोटरेल मोके साँवराय साँवराय के,

भात खियाएला निंदवाएल मोके

पिपर पतई कर गीत सुनाय के।

ऐ मोर सुंदरी आयो कहाँ पाबु मोंय,

एसेन दुलारी आयो, ना जाबे यो मोके छोइड़,

काइंद देबु मोंय आँईंख भईर।

 

  

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आदिवासी भाषाएँ – कुछ शब्द और उसके अर्थ

• Anger = गुस्सा= कुरकुर (हो),
• Aunty = ककी = चाची,(कुडुख)
• bird -चिड़िया– ओड़ा (कुडुख)
• Boy= कुक्को = लड़का (कुडुख)
• Cat =जंगली बिल्ली–बंडो (कुडुख) बेरखा-(घरेलु बिल्ली) (कुडुख) बंडो (जंगली बिल्ली) (कुडुख)। बंडो को कुरुख आदिवासी लोग मार के खाते हैं बहुत टेस्टी माँस होता है उसका। बेरखा (घरेलु बिल्ली ) को नहीं खाते हैं ।
• Chortle ठहाका – केड़े ते लान्दा (हो),
• Cloud = बादल= रिमिल(हो),
• Cooked rice =भात – मंडी (कुडुख) vegitable =सब्जी – अमखी (कुडुख) दाल – दाली (कुडुख
• Cow = मुड़ा=गाय, अड़मी=भैंस, येटी=बकरी (गोंडी)
• Curd दही जमे कियाना=.दही जमाना (गोंडी)
• घुसरे कियाना =मथना(गोंडी)
• Making butter = नोनी टन्डीना =.मक्खन निकालना (गोंडी)
• Ghee – पालनी=घी, कोर्रोप=छाच, कोर्रोप कड़ी=कड़ी (गोंडी)
• Dance Arena आखरा = अखरा(हो),
• Dance नृत्य = सुसुन(हो),
• Dark= अन्धेरा= नुबा (हो),
• Daughter in law = खेड़ो= पुताहू (कुडुख),
• Earth = धरती= ओते(हो),
Mother = एंगते = उसकी माँ (हो)।

• Mountain= पहाड़_बुरु(हो),
• Mountain= पहाड़_बुरु(हो),
• Oil = तेल – इसूंग ( कुरूख में)
• Oil = तेल – इसूंग ( कुरूख)
• Pit = गड्डा_लोहोर(हो),
• Pit = गड्डा_लोहोर(हो),
• Pullets = मुर्गी का बच्चा =चिवाल(गोंडी),
• Shadow = छाया_उमबुल(हो),
• Shadow = छाया_उमबुल(हो),
• She goat बकरी= अड़मी (गोंडी), येटी खरगोश= मोलोल कुत्ता = नैय
• Snake सांप =तरास (गोंडी),
• Son in law = जवनख़द्दिस = दामाद (कुडुख)
• Time – चेरो=आने वाला कल (कुडुख) ),
• Uncle = ककस = चाचा, (कुडुख)
• Aunty = ताची= फुफु, (कुडुख)
• Uncle= ममुस= मामा, (कुडुख)
• Well= कुआँ = इंदार, इंद्रा, (कुडुख)
• Wife = ख़ई= पत्नी (कुडुख) एंग खई= मेरी पत्‍नी (कुडुख)
• Woman = आली = औरत (कुडुख)
• Woman = मुक्का = औरत (कुडुख)
• Yesterday =नेला= बीता कल((कुडुख), कुडुख भाषी किसान समुदाय के लोग दोनों के लिए ‘चेरो’ का प्रयोग करते हैं। कुडुख में बीते कल के कल के लिये होर्भोरे का शब्द इस्तेमाल करते हैं, आने वाले कल के कल के लिये नेल्बेँजा शब्द का इस्तेमाल करते हैं कुडुख
• Youngman = जोंख़=युवा, नौकर (कुडुख)
केकड़ा बिल – ककड़ो लता, (कुडुख)
• Air = हवा – ताका (कुडुख), होयो(हो),
• Anger = गुस्सा= कुरकुर (हो),
• Aunty = ककी = चाची,(कुडुख)
• bird -चिड़िया– ओड़ा (कुडुख)
• Blackberry = जामुन – जमबू (कुडुख)
• Boy= कुक्को = लड़का (कुडुख)
• Brinjal = बैंगन – भेटांगो (कुडुख)
• Buffalo टाली= भैस (गोंडी),
• Bull कोन्दा = बैल (गोंडी),
• Cat =जंगली बिल्ली–बंडो (कुडुख) बेरखा-(घरेलु बिल्ली) (कुडुख) बंडो (जंगली बिल्ली) (कुडुख)। बंडो को कुरुख आदिवासी लोग मार के खाते हैं बहुत टेस्टी माँस होता है उसका। बेरखा (घरेलु बिल्ली ) को नहीं खाते हैं ।
• Cat= बिल्ली =बिलाल(गोंडी),
• Child = होन _बच्चा(हो),
• Child = होन _बच्चा(हो),
• Chortle ठहाका – केड़े ते लान्दा (हो),
• Chortle ठहाका – केड़े ते लान्दा (हो),
• Cloud = बादल= रिमिल(हो),
• Cloud = बादल= रिमिल(हो),
• Cooked rice =भात – मंडी (कुडुख) vegitable =सब्जी – अमखी (कुडुख) दाल – दाली (कुडुख
• Cooked rice =भात – मंडी (कुडुख) vegitable =सब्जी – अमखी (कुडुख) दाल – दाली (कुडुख
• Country = देश_दिशुम(हो),
• Cow = मुड़ा=गाय, अड़मी=भैंस, येटी=बकरी (गोंडी)
• Curd दही जमे कियाना=.दही जमाना (गोंडी)
• Dance Arena आखरा = अखरा(हो),
• Dance नृत्य = सुसुन(हो),
• Dark= अन्धेरा= नुबा (हो),
• Daughter in law = खेड़ो= पुताहू (कुडुख),
• Earth = धरती= ओते(हो),
• Father = बबस = बाप (कुडुख), एम्बस = मेरा बाप(कुडुख), निम्बस = तेरा बाप, तम्बस = उसके पिताजी (कुडुख)
• Father = बबस= पिताजी(कुडुख), आपु-मुण्‍डारी
• Father = बाप = आपु (हो), अपुन्ज = मेरा बाप (हो), अपुम = तेरा बाप, (हो), अपुते = उसका बाप(हो),
• Fire = आग = सेंगेल(हो), चिचची (कुडुख)
• Firewood= काठी= हनासा(हो), कंक (कुडुख)
• Frog = मेंडक= पन्ने (गोंडी),
• Fruit names= गोन्डी फलों के नाम:- आम =मर्का भेलवा = कोहका चार = सडेका बेर = रेन्गा गुल्ली= गाड़ान्ग उमर = तोया जानवरों /अन्य जीव के नाम कोन्दा = बैल गाय = मुड़ा/ टाली भैस = अड़मी बकरी = येटी… Ghee – पालनी=घी, कोर्रोप=छाच, कोर्रोप कड़ी=कड़ी (गोंडी)
• Girl = कुकोय = लड़की(कुडुख)
• Good Afternoon=Daow Lohadi,
• Good Evening=Daow Putbari,
• Good Morning=Daow Pairi,
• Good Night= शुभरात्रि (हिंदी) दाव माखा (कुडुख) तब आज के लिए हो गया=होले एन्ना गे मंजा केरा (कुडुख) =तिसिंग लिगिड होबायना (हो)
• Grandfather अजास = दादा
• Grandmother = अजी = दादी,
• Hair =बाल- चुटि (कुडुख),
• Hand pump=हकडु, होकडो (कुडुख),
• Happy = खुशी = राँसा (हो),
• Hearth = चुल्हा = इटुल्ल(हो),
• Hello – नमस्कार, नमस्ते ,अभिनंदन ,हैल्लो = मोजरा नन्दन (कुडुख),
• Hen = मुर्गी =कोर्र्र (गोंडी),
• Ho words हो शब्‍द –
• Home= घर= ओवा (हो), घर-आंगन=ओवा दुवार (हो)
• House=घर –“ओआ” (हो)
• How = कैसे हैं –केम छो (गुजराती भीली)। हु करे हे=क्‍या कर रहे हो। किकम हो=कैसे हो, केर जवानो= कब जाने वाले हो।
• Husband = मेतस= पति,
• Lamp = दिया- डिबरी(हो),
• Lamp = दीपक = डिबरी (हो),
• Laugh = हँसी = लान्दा (हो),
• Light = उजाला= इदांग (हो),
• Milk हिंदी .दूध = पाल (गोंडी, तमिल), .दूध दुहना = पाल पीरीना (गोंडी)
• Milk= पाल कासिह्ताना =दूध गरम करना !
पाल आरसिह्ताना=दूध ठंडा करना !
• Moon = चाँद =चांडु (हो),
• Mother = अयो= माँ, (कुडुख), आयो, एंगा=मॉं (मुण्‍डारी)
• Mother = माँ = आयो (कुडुख) एंगयो = मेरी माँ, निंगयो = तेरी माँ , तंगईयो = उसकी माँ (कुडुख)
• Mother =एंगा = माँ (हो)। एंगन्ज = मेरी माँ (हो), एंगम = तेरी माँ (हो)।
• Music Instrument नगाड़ा = दामा,
• Music Instrument मान्दर= दुमंग(हो),
• New = नया = नामा (हो),
• Noon = दोपहर= तारा सिंगी(हो),
• Old = पुराना = पपारी (हो),
• Peace शांति – सुकु ते(हो),
• Pitcher = घड़ा =चाटु(हो),
• Play = खेल = इनुंग (हो),
• Rain = बरसात = गामा (हो),
• Rice =चावल = दाका (गोंडी) ।
• Sad= उदास = होन जी(हो),
• Salt = नमक= बिलुँग – (खड़िया), बेक (कुरूख)
• Sing = गीत गाना = दुरंग(हो) डंडी = (कुडुख)
• Sister in law = साड़ी = साली (कुडुख),
• Sky = आकाश = जा रिमिल (हो),
• Sleep = नींद (हिंदी), झुमरा (संबलपुरी) I am feeling sleepy= मुझे नींद आ रही है,
• Sleep= मते झुमरा लागुछे (संबलपुरी)। ईञ दुदडुम दिञा (संताली) कृपया इसका अर्थ हिंदी में बताऍं
• घुसरे कियाना =मथना(गोंडी)
• Making butter = नोनी टन्डीना =.मक्खन निकालना (गोंडी)
• Ghee – पालनी=घी, कोर्रोप=छाच, कोर्रोप कड़ी=कड़ी (गोंडी)
• Dance Arena आखरा = अखरा(हो),
• Dance नृत्य = सुसुन(हो),
• Dark= अन्धेरा= नुबा (हो),
• Daughter in law = खेड़ो= पुताहू (कुडुख),
• Earth = धरती= ओते(हो),
• Horse= घोडा = कोडा (गोंडी),
• Jungle = जंगल_बीर(हो),
• Jungle = जंगल_बीर(हो),
• Making butter = नोनी टन्डीना =.मक्खन निकालना (गोंडी)
• Man = आलस = आदमी (कुडुख),
Mango = आम – टटखा (कुडुख)
Mango आम =मर्का गोन्डी, भेलवा = कोहका चार = सडेका बेर = रेन्गा गुल्ली= गाड़ान्ग उमर = तोया जानवरों /अन्य जीव के नाम
• Mice ओसगा (बड़ा चूहा)- (कुडुख) इसको भी खाते है कुरूख लोग। चिरमाको, (झुंड में रहने वाले माध्यम साईज चुहे) (कुडुख)। गोड्डो-(अकेला रहने वाला चूहा) कुडुख।
• Mice चोट्टो ( छोटा चूहा) – (कुडुख)। ओड़ाह (मुंडारी– में छोटा चूहा या घर ??)
• Monkey बंदर = कोवे (गोंडी),
Mother = एंगते = उसकी माँ (हो)।

गोन्डी में फलों के नाम और उसके हिंदी भावार्थ —-
आम =मर्का, भेलवा = कोहका, चार = सडेका, बेर = रेन्गा, गुल्ली= गाड़ान्ग, उमर = तोया,

जानवरों /अन्य जीव के नाम—
कोन्दा = बैल, गाय = मुड़ा/ टाली, भैस = अड़मी, बकरी = येटी, खरगोश= मोलोल, कुत्ता = नैय, बिल्ली =बिलाल, बंदर = कोवे, घोडा = कोडा, सांप =तरास, मेंडक= पन्ने, मुर्गी =कोर्र्र, मोर्गा = गोगोटाल, मुर्गी का बच्चा =चिवाल, मछली = मीन,

घरेलू समान :- झाडू = कैसार, खाट/चारपायी = कटूल, रस्सी =नोडे, तव्वा = टाटा(रोटी),
मिट्टी के बर्तन = अड़काँग थाली (bhojan)= धन्या, लोटा = चर्रू, हसिया =सठाड़,
तला.=सिर, चुटी=.बाल, कन्क=आ्ख, कव्वी=कान, मसोर=नाक, करवी=गाल, सिलवी=होट, वन्जर=जिब, पल=दात, घेची=गला, कई=हाथ, ननी=कमर, मोडि=नभी,

• Song गीत= दुरंग(हो),
• Star तारा=इपिल(हो),
• Storm = आंधी _होयो दूदगार(हो),
• Tiger = बाघ (हिंदी) किरो (खड़िया), लकड़ा – बाघ ((कुडुख),
• Timber = लकड़ी _ साहन(हो),
• Timber = लकड़ी = सान(हो), कंक (कुडुख)
• Tomato = टमाटर – भिजरी . (कुडुख)
• Tree = पेड – मन (कुडुख)
• Tree = पेड – मन (कुडुख)
• Tree = पेड़ _ दारू (हो),
• Turmeric = हल्दी – बालका (कुडुख)
• Village = ग्राम_हातु(हो),
• Hand= हाथ = कई (गोंडी),
• Eye = आंख=कन्क(गोंडी),
• Cheek =गाल =करवी (गोंडी),
• Ear =कान कव्वी (गोंडी),
• Coat =खाट/चारपायी=कटूल(गोंडी),
• Stirring=मथना= घुसरे कियाना (गोंडी)
• Throat =गला= घेची (गोंडी),
• Hair =बाल चुटी (गोंडी),
• Broom = झाडू = कैसार(गोंडी),
• Head=सिर तला. (गोंडी),
• तव्वा = टाटा(रोटी) (गोंडी),
• Plate =थाली (bhojan)= धन्या(गोंडी),
• Waist= =कमर( ननी (गोंडी),
• Teeth =दाँत = पल (गोंडी),
• Fish = मछली = मीन(गोंडी),
• Nose =नाक = मसोर (गोंडी),
• Earthen pot = मिट्टी के बर्तन = अड़काँग(गोंडी),
• Navel =नभी= मोडि (गोंडी),
• Cock = मोर्गा = गोगोटाल(गोंडी),
• Rope =रस्सी=नोडे(गोंडी),
• Lotah = लोटा = चर्रू(गोंडी),
• Tongue =जीब वन्जर (गोंडी),
• सिलवी=होट(गोंडी),
• हसिया =सठाड़ (गोंडी),

पेड़ _ दारू
लकड़ी _ साहन
हवा_ होयो
आग_सेंगेल
छाया_उमबुल
आंधी _होयो दूदगार
होन _बच्चा
गड्डा_लोहोर
पहाड़_बुरु
जंगल_बीर
ग्राम_हातु
देश_दिशुम
कुछ बाद में ………………………..

Oil= तेल _सुनुम / Salt-=नमक_ बुलुंग
Turmeric= हल्दी_ससँग /
Cloth= कपडा_लिजाह/
Shirt =कमीज_सोनोह
Bull goat =बैल-बकरी_ओरिह मेरोम् ।
Goat =(ram) भेड़ _मिंडी
Fox= सियार _तुयु / कुल्ला_बाघ /
इसमें हसा दाह पार्टी और नगुरि मुंडा भाषा में थोडा अन्तर मिलता है सुधार कर पढ़ें ।
Abraham Hamsoy
Snake =धमना सांप _जमडु बिंग।

Snake नाग सांप _ पांडु बिंग ।
अजगर _ बुरु बिंग । करेंत _चिति बिंग । हुरहुरिया_लोयोंग सोन्द्रो । आगे सीखते जाइये…..
Abraham Hamsoy
Mango= आम_ऊली /
Banana= केला_कादल /
Jamun= जामुन_कूदा /
Munga=मुनगा_जोकि सोटी /
Tomato= टमाटर_जोलबेटा ,गोल्बेटा
तमिल मे दाँत को पल बोलते हैं और कुडुख तथा गोंड मे भी पल बोलते हैं ।

Kurukh Translation for “Food-Fruits n Vegetables”
1-mandi (मण्डी) = boiled rice(पका चावल)
2-amkhi (अमखी)= cooked vegetables(पका सब्जी) अमखी शब्द का प्रयोग हर जगह किया सकता है।
उदाहरण : १: एना एंदरा अमखी रई
( आज कौन सी सब्जी है )
२: एंदरा अमखी होवा गे कादाय बाजार
( क्या सब्जी लेने जा रहे हो बाजार )
३: निमहय गुसन एंदरा अमखी कमरकी रई
( आपके यहाँ क्या सब्जी बना हुआ है)
3-daali (दाली)= pulses(दाल)
4-beck (बेक) = salt(नमक)
5-isung (ईसुंग) = oil(तेल)
6-gulle (गुल्ले) = (Gur in Hindi)(गुड़ )
7-alua (अलुआ)= potato(आलू)
8-bhijri(भिजरी) = tomato(टमाटर)
9-maircha(मर्चा) = chilli(मिर्च )
10-balka (बालका)= turmeric(हल्दी )
11-pallkhanja (पलखांजा) = kukumber(खीरा)
12-kubi(कुभी) = cabbage(पत्तागोभी)
13-bhetango (भेटांगो)= brinjal(बैगन)
14-konhda (कोंहडा)= pumpkin
15-murai (मुराई)= raddish(मूली)
16-tetaali (तेताली)= tamarind(इमली)

 

कुछ हो शब्द—प्रस्तुतकर्ता-Ramrai Soy 03/02/2017 

*हिन्दी शब्द “हो” शब्द*
1. Order- आदेश – आँदे

2. Arrogant- अंहकार – एरेंगा
3. Engine- इंजन – गुनिर
4. unanimous -एकमत – मिड् मोहत्
5. Hard -कठिन – आँटो
6. Herbalist – कविराज – केवाँ
7. कोड़िया – टोहको
8. Sensation, anarchy-खलबली – उकेल-बुकेल
9.   Bale –गठरी – पोड़ोम
10. Pride- arrogance- घमंड – पोटानि
11. Movie-चलचित्र – पटिक्का
12. lash -चाबुक – जाँटो
13. Letter- चिट्ठी – निकुल
14. A bit/little- तनिक – मिटिः
15. Bag-थैली – बोगोलि
16. (Married) Couple- दम्पति – कुलगिया
17. Cry-दुहाई – हहारि
18. Use-प्रयोग – क्रुइड्
19. Question-प्रश्न – कोनोः
20. Family-परिवार – कुल हगेया
21. Examination-परीक्षा – बिड़उ
22. Rape-बलात्कार – लाम्बि, हेड्
23. Mixed- मिश्रित – सेल्लमिषा
24. Development-विकास – बेरेड्
25. Swayamvar marriage-स्वयंवर विवाह – षुकन आँदी
26. Closing/Concluding-समापन – बगुड़ि
27. Admirable-सराहनीय – सहराव
28. normal/usual-सामान्य – सदयः
29. Coin-सिक्का – डेबुवा
30. Irrigation- सिंचाई – तासिर

 

मुण्डारी शब्द  Ramesh Munda-09/02/2017

  1. Bow- अअः – धनुष
  2. Bow and arrow- अआसार – तीर-धनुष
  3. Evening, night – अयुब -संध्या, रात
  4. leafy vegetable, vegetal – अड़अः – साग
  5. House – ओड़अः – घर
  6. Deep- ईकिर – गहरा
  7. Star – इपील – तारा
  8. Rice beer- इलि – हाँडिया  

मुण्डारी – हिन्दी प्रस्तुति – श्रीमती सुशीला होरो, मुंबई
कटा – पैर । कदल – केला । करकंद – दतवन । कुपुल – मेहमान । कोएं – भिखारी । नना – दीदी । जरगि – वड्र्ढा ऋतु। जिया – दादी । जिलु – माँस । निदिर – दीमक । दिरि – पत्थर । दोरोब – रूपया-पैसा । पचरि – दीवाल । परकोम – चारपाई । पुकरि – तालाब ।                   

कुँड़ुख – हिन्दी
अड़ख़ा – साग-भाजी । इंजो – मछली । कुल्ला – छतरी, छाता। कंक – लकड़ी, जलावन । पइय्याँ – ठण्डक, सर्दी । पपला – तितली । परता – पहाड़, पर्वत । बीड़ी – सूर्य, सूरज । बीनको – तारा, सितारा । बेचना – खेलना, नाचना । मेद – शरीर, बदन ।रिझ – सुख, आनंद, खुशी । पोक – चींटी । सेड़ो – बहू, पुत्रवधु । हीड़ी – नजदीक, पास, करीब ।

हो – हिन्दी प्रस्तुति – घनश्याम केराई, राँची ।
सिम – मुर्गी । साण्डी सिम – मुर्गा । मुताः – लोटा । आरसी – आईना । चऊली – चावल । मेरोम – बकरी । सदोम – घोड़ा । कुला – बाघ । जोनो – झाड़ू । ती – हाथ । होमो – बदन । बो – सिर । हाकू – मछली । अः – सब्जी । बिंग – साँप ।                                                         

खड़िया – हिन्दी (खड़िया व्याकरण एवं संक्षिप्त शब्दकोश)
काडोङ – मछली । किड़ोऽ – बाघ । कुंड़ऽ – बच्चा । बुआङ – साँप । मारदा – घोड़ा । तेनतोन – इमली । मोघेर – काला। मोहरा – खिड़की । राँगा – जाड़ा । मुसा – आज । मेसोन – एक बार । साहा – मौसम, समय । होसोड़ – झूठा । सोङगोल – जलावन की लकड़ी । गामना – कहना, बतलाना ।                                                                               

संताली – हिन्दी– प्रस्तुति – श्रीमती रेणुका टुडू, मुंबई
डोडो – इमली । घारोंङ – परिवार । ओड़ाक – घर द्वार । पेड़ा – मेहमान । इपील – तारा । बोहोक – सिर । मोचा – मुँह । डाटा – दाँत । लूतूर – कान । रोड़ – बोलना । पुथी – पुस्तक । मीक – एक । बारया – दो । पेया – तीन । सिम संडी – मुर्गा मुर्गी ।
 

सादरी हिन्दी
मुरूक – बहुत । पाहें, मुदा – लेकिन । डहर – रास्ता । फिटिंग – शिखर । डरगुहा – डरपोक । अनसा – बोरियत । अथी – क्या कहते हैं । निरंग – साफ । कचिया – रूपया ।
दोकरा – छुट्टा पैसा । छौवा – बच्चा । मैंया – बहन, बेटी । कोकरो – मुर्गा । दोना, पतरी – पत्ते के बाटी, थाली ।

आदिवासी भाषाओं को बचाने. उसका सटिक अर्थ अंग्रेजी अर्थ सहित प्रस्तुत करने का यह एक छोटा सा प्रयास है। आप भी इसमें अपना योगदान दे सकते हैं। योगदान करने वालों के नाम और तारीख सहित उसे यहाँ प्रस्तुत किए जाएँगे। गलतियों पर भी आप अपनी टिप्पणी दे सकते हैं, हम उसे भी यहाँ शामिल करेंगे। सम्पादक-नेह अ इंदवार ।

उपरोक्त शब्दों और उनके अर्थों के प्रस्तुतकर्ता Abraham Hamsoy, Pankaj Besra Gond, जयप्रकाश केरकेट्टा‎, Dilpawan Tirkey, Bhil Kumar, Ramrai Soy हैं।

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जुझता चिराग

कहानी                                                                                                                                                                         ओलिवा अ. इंदवार

बस से उतरकर मैं इधर-उधर देखने लगी, कोई मुझे रिसीव करने आया होगा। पर कोई दिखाई नहीं पड़ा। दिसंबर का महीना था, पाँच बजते ही अंधेरा छाने लगा था, सर्द हवा चल रही थी, हड्डी कंपाने वाली। मैंने सुन रखा था कि शाम होते ही जंगली हाथियों का जबरदस्त आतंक रहता है इस चाय बागान में। फोन पर अपने आने की सूचना दी तो थी मैंने, पर शायद ऐन मौके पर कुछ काम आ पड़ा होगा। दो दिन की छुट्टी लेकर मैं अपनी सहेली नीता से मिलने आयी थी। वह बागान के स्वास्थय केंद्र में नर्स है और उसके मिस्टर स्कूल टीचर। दो बच्चे हैं उनके, दोनों कोलकाता में पढ़ाई कर रहे हैं। सासू माँ भी है।

        काफी देर तक कोई दिखाई नहीं दिया तो मुझे घबराहट होने लगी। डुवार्स के अधिकतर चाय बागानों की तरह ही यह बागान भी तीन ओर से जंगल से घिरा है और कोई साधन उपलब्ध नहीं हो तो बस से उतर कर दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।

        मैंने फोन लगाया, नीता ने जवाब दिया  ”अनु जरा वहीं इंतजार करना, हमारी गाय बच्चा देने वाली है, जो अभी तक जंगल से घर नहीं लौटी है, घर में माँ है, मिस्टर मीटिंग में गये हैं, सो गाय ढूंढने के लिए आयी हूँ, साॅरी थोड़ा सा लेट होगा, मैंने रोहित बाबू को तुम्हें रिसीव करने के लिए भेजा है, अभी पहुँचता होगा।“

        मैं वहीं एक चाय की छोटी सी दुकान के पास रखी बेंच पर बैठकर इंतजार करने लगी और आसपास के लोगों को देखने लगी, जो ठण्ड और गहराते अंधेरे के कारण अपने-अपने घर लौटने की जल्दी में थे। करीबन आधे घंटे के बाद  एक लड़का मेरे पास आया, और बोला –

“बड़ी माँ अकेली आयी हैं ?”  

और प्रणाम करने के लिए झुका।

        ”अरे इतना बड़ा हो गया रोहित बाबू, पहचान में नहीं आ रहे हो। खुश रहो,“ कहते हुए उसे जरा ध्यान से देखा।

रोहित साइकिल लेकर आया था, सामान वगैरह साइकिल में डालकर हम चलने लगे। रोहित नीता के पड़ोस में रहता है अपनी दादी और पिताजी के साथ। एकाध बार नीता उसे साथ लेकर हमारे घर आयी थी, तब काफी छोटा था। मुझसे अच्छा हिलमिल गया था। चलते-चलते मैंने रोहित से पूछा – घर में सब कैसे हैं? दादी कैसीं हैं? पिताजी क्या कर रहे है? थोड़ी बहुत जानकारी थी उसके बारे।

रोहित ने कहा – “आपको पता नहीं बड़ी माँ, दादी तो पिछले महीेने ही गुजर गयी, और मैं अकेला रह गया हूँ।”

एकपल को तो मैं कुछ कह नहीं पायी, फिर पूछा – “पिताजी तो हैं न, ऐसे क्यों बोल रहे हो?”

रोहित ने उदास भरे आवाज में कहा –  उम्म —- पिताजी ——- 

तभी नीता लगभग दौड़ती हुई आ गयी और गले मिलकर बोली – “माफ करना रे, क्या करेंगे सब तरफ दौड़ना पड़ता है।” उसने शिकायत भरे लहजे में कहा। पाँच-दस मिनट के बाद हम घर पहुँच गये। सालों बाद मिलना हुआ था, बीते दिनों की ढेर सारी बातें, नीता मेरी बचपन की सहेली है।

        शहर के पास के एक बागान में हम साथ-साथ बड़े हुए स्कूूल खत्म होने पर मैं काॅलेज के लिए बाहर चली गयी और वह नर्सिंग के लिए कहीं और। फिर नीता की शादी इस बागान में हो गईं। नीता से मिलने दो बार पहले भी यहाँ आई थी और उसने अपने पड़ोसियों से परिचय कराया था।

        चारों ओर घना अंधेरा छा गया था। सिर्फ घरों में एक दो लाइट जल रहीं थीं। घर के पास ही कहीं झींगुरों की चीं-चीं आवाजें आ रही थीं। कुत्ते भी कभी कभार जोर से भौंकने लगते। मैं डर जाती कहीं हाथियों का झूँड न आ जाए। 

शहर में प्रकाश की चकाचैंध में अंधेरापन कभी महसूस नहीं होता है, लेकिन यहाँ गहन अंधेरा और रात का एहसास  सिरहन पैदा कर रहा था। कितना अंतर है शहर और गाँव की जिंदगी में। बचपन में बिना लाइट के गाँव में हम कहीं भी निर्भय होकर चले जाते, लेकिन शहरी जिंदगी ने अब अंधेरे से डरना सीखा दिया है। पहले दिमाग में अंधेरा कोई डर पैदा नहीं करता था, लेकिन अब अंधेरा और झींगुरों की आवाज डर पैदा देता था । लगता है पूरा पृथ्वी ही एक न खत्म होने वाला सुनसान जगह है। 

        नीता खाना बनाते हुए कभी इस रूम में तो कभी उस रूम में आती-जाती तो वार्तालाप में विराम लग जाता, लेकिन फिर बचपन, जवानी और बच्चों की बातें  इधर-उधर से निकलती और हम पुरानी बातों में खो जाते। रात काफी हो चला था। नीता के मिस्टर भी आ चुके थे मीटिंग से, खान-पान से निपटने के बाद हम बिस्तर में आ कर बैठ गये, फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया।

        इसी बीच मुझे रोहित की बातें याद आयी, मैंने नीता से रोहित के बारे पूछा। नीता ने बताया –  रोहित के दादा जी पहले चाय बागान में सब-स्टाफ थे, दादी जी भी बागान में काम करतीें थी, अच्छा-खासा परिवार था, तीन बच्चे थे, दादा-दादी ने सबको हाॅस्टल में रखकर पढ़ाना चाहा, पर सभी बच्चे आधी-अधूरी पढ़ाई करके छोड़ दिए। बड़ा लड़का मनोज बागान में ही कुछ छोटा-मोटा काम करने लगा। दादा जी ने उसकी शादी कर दी। शादी के बाद वह नये लाइन में टाली का घर बना कर वहीं रहने लगा। घर से उसका नाता धीरे-धीरे कम होने लगा। 

        मनोज से छोटी थी बेटी सोनिया, लाडली थी माँ-बाप की, जिद करके बागान की कुछ लड़कियों के साथ दिल्ली चली गयी काम करने। वहीं किसी गैर आदिवासी लड़के  के साथ रहने लगी। जब सोनिया गर्भवती हो गयी तो वह लड़का उसे छोड़कर भाग गया। बिन ब्याही माँ बन चुकी सोनिया के पास बागान वापस आने से सिवा कोई चारा नहीं था। वह अपना बच्चा लेकर घर आ गयी।       

        माँ-बाप को बेटी की अवस्था से बहुत दुःख हुआ। समाज में बिन व्याही लड़की का माँ बनना परिवार के लिए बेहद कष्टकारी होता है। बेटी के साथ हुए धोखेबाजी में बेटी की बेबसी को समझ कर, माँ ने तो मन को समझा ली थी। लेकिन उसके पिताजी को अपने मानसम्मान पर आई चोट ने अंदर तक तोड़ दिया था। उन्होंने बाहर निकलना और लोगों से मिलना जुलना भी बंद कर दिया था। सिर्फ अपने काम के सिलसिले में बाहर निकलते नहीं तो अपने आप को घर में कैद कर लेतेे। सबसे छोटा बेटा रवि था। दीदी की हालत से उसे भी बहुत शर्मिंदगी का अहसास होता था। वह भी घर छोड़ कर काम की खोज में राजस्थान चला गया।

        कद-काठी अच्छी थी, बात-व्यवहार भी अच्छा था। काम भी जल्द ही मिल गया। उसके काम से उसके मालिक बहुत खुश थे, ईमानदारी से अपना काम करता था। साल में   एकाध बार बागान माँ-बाप से मिलने आ जाता था। वह बागान की एक लड़की को पसंद करता था, पर माँ-बाप को लड़की पसंद नहीं थी, रवि ने उन्हें मनाने की बहुत कोशिश की पर वे नहीं माने, तो वह लड़की को लेकर राजस्थान चला गया। लड़की भी उसके मालिक के यहाँ छोटा-मोटा काम करने लगी। दोनों खुश थे, सालभर बाद गोद में नन्हा मेहमान भी आ गया। गोल-मटोल सा, उन्होंने प्यार से उसका नाम रखा, रोहित।

        जिंदगी खुशहाल चल रही थी। रोहित के आने के बाद वे  माँ-बाप से मिलने बागान आये, प्यारे-से रोहित को देखकर  दादा-दादी गिला-शिकवा भूल गये। कुछ दिन साथ रहने के बाद वे वापस जाने को हुए तो दादी जी ने बहू और रोहित को जाने से रोकना चाहा, घर पर कोई नहीं था, दादा-दादी की रिटायर की उम्र हो चली थी। सोनिया बागान में अपने बच्चे के साथ जहाँ जाती, लोगों की छींटाकस्सी सुननी पड़ती और हिकारत भरी निगाहों का सामना करना पड़ता। दो वर्ष के बाद वह फिर से बागान को अलविदा करके दिल्ली चली गई थी।

        माँ ने अपने बुढ़ापा का वास्ता देकर बेटी को अन्जाने लोगों के बीच, असुरक्षित जगह पर जाने से रोकने की बहुत कोशिश की। लेकिन बेटी को अपना दुख अपनी माँ के दुख से बड़ा लगा, और वह अपने बच्चे को लेकर हमेशा के लिए चली गई। । रवि भी बागान मेें रूकना नहीं चाहता था। वह फिर जल्द ही आने की बात कहकर परिवार सहित राजस्थान चला।

        रोहित के स्कूल जाने लायक हो जाने पर उसका दाखिला शहर के अच्छे स्कूल में हो गया। सबकुछ अच्छा चल रहा था, वे अपनी दुनिया में खुश थे। अचानक, उनकी जिंदगी में जोरदार तूफान आया, रोहित की माँ की तबियत खराब होती चली गयी, बहुत कोशिशों के बावजूद उसे बचाया नहीं जा सका। रवि खुद को सम्भाल नहीं पा रहा था, रोहित को क्या सम्भालता। जिन्दगी में गहरा अंधेरा छा गया। रवि के लिए सबकुछ खत्म हो गया था। एकदम टूट चुका था वह। रोहित को देखकर तो वह बच्चों की तरह रोने लगता। नटखट रोहित भी माँ के बिना चुप सा हो गया। खाना वगैरह सही न होने के कारण उसकी तबियत खराब होने लगी।  दादा-दादी तो दोनों बाप बेटे को सदा के लिए बुलाते लेकिन रवि बागान वापस नहीं आना चाहता था। लेकिन बाहर काम करना और एक छोटे बीमार बच्चे को संभालना बहुत मुश्किल था। कई महीने के बाद माँ के बार-बार बुलाने पर वह बच्चे को लेकर  बागान वापस आ गया ।

        दादा-दादी को पाकर रोहित की हालात में सुधार आने लगा। अब वह बागान में ही स्कूल जाने लगा, उसके बहुत सारे दोस्त भी बन गये। दादी का आंचल पकड़कर आगे-पीछे झूलता फिरता, रोहित खुश था। रवि काम का वस्ता देकर वापस चला गया। लेकिन उसका मन वहाँ लग नहीं रहा था, हरदम पत्नी की मासूम सूरत आँखों के सामने तैरती रहती। पत्नी के गम ने उसे शराबी बना दिया। काम पर भी उसका मन नहीं लगता, उसके मालिक रवि की मनोस्थिति से परिचित थे। उन्होंने उसे समझाने का बहुत प्रयास किया। पर शायद रवि एकदम हार चुका था। कुछ साल इसी तरह चलने के बाद वह वापस बागान आ गया।

        बाप रिटायर हो चुका था, उसके बदले रवि को बागान में काम मिला। काम तो करना ही था, रोहित की पढ़ाई-लिखाई जारी रखनी थी। हालात का मारा रवि शराबी तो बन ही चुका था, बागान में शराबियों की कमी नहीं थी, वह भी उनके साथ घूम-घूमकर शराब पीने लगा। काम में ज्यादा गैरहाजिरी होने के कारण तनख्वाह भी कम मिलने लगा, थोड़ा-बहुत जो मिलता उसे पीने में उड़ा देता। पैसे की किल्लत होती तो घर में परेशान करता।

        माँ ने रोहित की जिम्मेदारी बता कर बहुत समझाया, पर शायद अब रवि को कुछ कहना बेकार था। पिताजी कमजोर हो गये थे, कुछ दिनों बाद चल बसे।

        रोहित के बड़े बाबा मनोज की जिंदगी भी बागान मजदूर की तरह ही अभावों में बीत रही थी। वह जंगल से कभी लकड़ियाँ लाकर बेचता, तो कभी जंगल से होकर बहने वाली एक बड़ी सी नदी से मछली पकड़ कर बेचता। एक बेटी थी उसकी, जिसकी शादी जल्द ही हो गयी थी।

        एकदिन वह मछली पकड़ने गया था, मछली  पकड़ने में वह इतना मशगुल था, कि कब जंगली हाथी आकर उसे घायल कर गया पता ही नहीं चला। गिरता-पड़ता किसी तरह वह घर आया, पर तत्काल चिकित्सा की सुविधा न होने के कारण उसकी मौत हो गयी।

        फाॅरेस्ट विभाग ने उस पर गैर कानूनी रूप से जंगल में घुसने और मछली पकड़ने का आरोप लगा कर जंगली हाथी के शिकार लोगों को मिलने वाली क्षतिपूर्ति देने से मना कर दिया। बागान के नेताओं के पास घर वालों ने बहुत चक्कर लगाया, लेकिन उन्होंने फाॅरेस्ट विभाग के तर्को को ही दोहराते हुए मदद करने में अपनी असमर्थता जता दी।

        दादी भी रिटायर हो गयी। रोहित बड़ा हो रहा था, दादी को घर के सब काम में मदद करता, चपाकल से पानी लाता, खाना बनाता, घर की सफाई वगैरह सब करता। सीधा-सादा लड़का। बागान में सब उसकी प्रशंसा करते। घर का काम और पैसे की कमी रोहित की पढ़ाई पर असर दिखा रही थी, उसे स्कूल आने-आने के लिए बस का किराया सही ढंग से नहीं मिलने लगा, कभी किताब-कापी खरीदने के लिए तो कभी स्कूल की फीस जमा करने के लिए। चरमराती सी अवस्था थी।

        रवि तो पक्का मतलू बन चुका था, कभी-कभी पैसा न होने पर घर के सामानों को जा कर बेच डालता था। दादी और रोहित परेशान थे रवि से। अब घर का खर्चा चलाना मुश्किल हो गया था। रोहित को पढ़ने में खूब आनंद आता, वह पढ़ाई में तेज था। वह पढ़-लिख कर कुछ बनना चाहता था। लेकिन उसे पढ़ाई में सहायता करने वाला कोई नहीं था। और जैसे अक्सर होता है, बागान में काम करने वालों के बच्चे बीच में अपनी पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

        काश ! बागान के इस तरह के मजबूर बच्चों की मदद करने वाला कोई होता। हम कभी कभार कुछ मदद करते लेकिन हमारी भी अपनी मजबुरियाँ हैं। बच्चों के पढ़ाई में सब सैलरी निकल जाती है।  तमाम कोशिशों के वाबजूद भी रोहित पढ़ाई जारी नहीं रख सका, उसे बूढ़ी दादी की दवाई और तीन लोगों के खाने की जुगाड़ करने के लिए बागान में काम करना पड़ा। अब वह बागान का मजदूर बन चुका था।

        कभी-कभी रवि अपनी मनोज वाली भाभी के पास हालचाल जानने चला जाया करता था, दोनों दुखयारी अपना-अपना दुखड़ा सुनते-सुनाते कब एक दूसरे से अतंरंग संबंध बना लिए पता ही नहीं चला। माँ पहले ही रवि की आदतों से दुखी थी  अब तो जीना दुभर हो गया। वह एकदम बीमार सी रहने लगी।

        रोहित को कहती ‘‘मेरा समय आ गया,’’ रोहित मजाक में बात टाल देता, कहता ‘‘अरे दादी अभी तो मेरी शादी करानी है, इतनी जल्दी क्या है, जाने की’’। वह दादी को खुश रखने की कोशिश करता पर दादी का बूढ़ा शरीर कब तक साथ देता भला, कुछ दिनों के बाद दादी आखिर कर चल बसी। और रोहित अकेला रह गया। नीता के इतना बतलाने पर दिल दिमाग में रोहित की करूण आवाज गुँजने लगी। यही कहा था उसने मुझसे, ” बड़ी माँ मैं अकेला रह गया हूँ।“

        अरे सो जाओ, बहुत रात हो गयी है, बाकी बातें कल कर लेना। नीता के मिस्टर ने कहा। मैंने अपनी आँखे बंद कर ली, रोहित के बारे सोचते-सोचते पलकें भारी होती चली गईं।

    सबेरे सब काम निबटाकर मैं नीता से सवाल कर बैठी। दादा-दादी के रिटायरमेंट के पैसे का क्या किए ? नीता ने बताया – वही जो हर बागान में होता आ रहा है। प्रोविडेंड फंड दलालों का दल बूढ़े होते लोंगों को शराब पिलाकर उनके बैंक पासबुक को हथिया कर सारा पैसा हड़प लेते हैं। यहाँ के लीडरों को बहुत कुछ मालूम रहता है, वे अपने लोगों को मदद करने की जगह पैसों का बंटवारा कर लेते हैं। पुलिस और प्रशासन भी आदिवासियों के मामले में हाथ नहीं लगाती है। कुछ अच्छे लोग रिटायर्ड लोगों के लिए कुछ करना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें नियम कानून मालूम नहीं होने के कारण कुछ खास नहीं कर पाते हैं। अभी तो डुवार्स तराई में ऐसे ही लोगों की भरमार हो गई है। दादा-दादी का पी एफ पैसा मिलता तो शायद रोहित अपनी पढ़ाई जारी रखता।

        नीता की सासू माँ ने कहा – ”पड़ोस में रहने के कारण रोहित के दादा-दादी से हमारा अच्छा रिश्ता बन गया था। हम एक दूसरे की मदद किया करते थे। रोहित का अब तो कोई है नहीं। लेकिन बागान घर है और वह उस घर में अकेले ही रहता है। शादी हो जाने पर ही कोई उसका अपना होगा।“

        रोहित की बातें सुन कर मन विचलित हो गया था। मैं धीरे से उठी और रोहित के घर की ओर बढ़ गई। बाहर का गेट खुला हुआ ही था। सामने आँगन में रोहित बैठा था और रोटी के छोटे-छोटे टुकड़े करके  चारा खोज रहे मुर्गियों की ओर फेंक रहा था। मैंने रोहित से पूछा- ‘‘कितने मुर्गी पाले हो रोहित ?‘‘ रोहित ने मुझे देखा और कहा ‘‘ये तो पड़ोस की मुर्गियाँं हैं बड़ी माँ। अभी तक तो मैंने एक भी नहीं पाला है। लेकिन सोच रहा हूँँ, मैं भी कुछ मुर्गियाँ और बकरियाँ पालूँगा। मुर्गियाँ, बकरियाँ होंगी तो घर भरा-भरा लगेगा और बाहर जाऊँगा तो घर जल्दी लौटने में दिल भी लगेगा।“ उसने बहुत ही उदास स्वर में कहा। उसके मन में अकेलेपन का एक समंदर तैर रहा था। उसकी बातें मुझे भीतर तक कचोट गई। मैंने कुछ बोलना चाहा, लेकिन गले से आवाज नहीं निकल पाई। मैं अपने आँसू को छुपाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन रोहित को अहसास हो गया, वह अपने आँसुओं को छिपाते हुए मुर्गियों के ज्यादा करीब चला गया। This work is copyright © Oliva A. Indwar, Dec. 2014. All rights reserved.
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