माँ तू कैसी है स्वर्ग में ?

                                                                         नेह अर्जुन इंदवार

माँ तू कैसी है ?

आशा करती हूँ

तू स्वर्ग में सुखी होगी,

मेरी चिट्ठी तुम्हें मिलती तो है न माँ !

 

 तुम्हारी दुलार की बहुत चाहत होती है माँ,

         छाती में लटक कर खूब रोने को दिल करता है,

मैं यहाँ अकेली हूँ,  तू भी वहाँ अकेली होगी,

हम साथ में क्यों नहीं रह सके माँ ?

आखिर तुम मुझे अकेले छोड़ क्यों चली गई स्वर्ग ?

क्या स्वर्ग हमारे गाँव से भी सुंदर है ?

 

गाँव की टेडी-मेढी पगडंडी,

महुआ-कुसुम और सखुआ के झूंड,

चरईओं के चेरे-बेरे, बकरियों के पीछे छौर में चलते गाय-बैल,

भैंस पर चढे. बिरसा और मंगरा की शरारत,

शनियारो, भिखनी और साँझो की

पगडंडियों पर गुँजती जतरा के गीत,

बहिंगा लहसुआ होने तक धान के बाली,

आंगन में चेंगना साथ दाना चुगती मुर्गी,

आखरा में मांदर बजाते सोमरा,

और लहरा के नाचती दीदी और नानी बुढ़िया,

क्या स्वर्ग में भी बंसुरी बजते हैं माँ ?

 

माँ, मैं खूब मन लगा कर पढ़ती हूँ,

तुमने कहा था न  “मेरी तरह न रहना बेटी अनपढ़”, 

क, ख, ग वर्णमाला मैंने जल्द ही खत्म कर ली थी,

हर साल नयी कक्षा आती है माँ,

नयी किताबें, नये अध्याय, नयी बातें,

कुछ आती है समझ में, कुछ निकल जाते सर से उपर,

समाज, परिवार, दुलार, “नेह” जल्दी सीख गई मैं,

जानवर और इंसान के पाठ भी याद कर लिया मैंने,

इंसान तो समझ में आता है माँ,

मुश्किल क्यों होता है इंसानियत के पाठ में। 

 

अपना, पराया, अपनापन और दूसरापन,

प्यार से मुस्काती निगाहें,

पीठ पीछे चलती टेढ़ी नजरें,

सीधे शब्दों में उलटे अर्थ,

व्यंग्य वाण के कहावतें,

कहते सब, हतभागी लड़की तू,

क्यों, कब मैं हतभागी बन गयी माँ,

बहुत मुश्किल होती है माँ बातें समझना।

सुनते हैं स्वर्ग जैसा सुंदर शहर भी होते हैं। 

 

भाषा संस्कृति और चाल-चलन

सब होता है अलग बोली भी शहर में।

झालो, गोरेती, और सालो

और भी कई मेरी सहेली गई थी शहरों में।

बहुत बदल गई हैं माँ वे, नये कपड़ों में,

तेल, क्रीम, मेकअप और मोबाईल,

मुझे दिखाती है और  कहती हँसती हैं”, 

तेरी किस्मत में नहीं ये सब चीजें,” 

क्या स्वर्ग भी शहर जैसी है माँ ?

 

फैशन से कैसे बदल जाते हैं आदमी माँ,

क्या मेकअप बदल देता है उन्हें दिल से,

जवान होकर चले जाते शहरों में वे,

और लौट नहीं आते फिर कभी गाँव,

क्या सचमुच गाँव इतनी बूरी है ? 

क्या स्वर्ग से भी सुंदर शहर है माँ ?

 

माँ, मैं जल्दी बड़ी होना चाहती हूँ

 स्वर्ग-शहर सब देखना चाहती हूँ,

तुम क्यों मुझे छोड़ चली गई माँ जल्दी,

तुम्हारी क्या-क्या मजबूरी रही होंगी माँ,

सब कुछ जानना, सोचना चाहती हूँ,

जिंदगी क्या स्वर्ग और शहर सा सुंदर हैं ? 

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हाथी और आदिवासी गति

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             नेह अर्जुन इंदवार    
डुवार्स की वादियों में मानव और जंगली जानवरों के बीच कई दशकों से मुठभेड जारी है। हर सप्‍ताह कहीं न कहीं कोई अभागा जानवरों के हमलों से मारा जा रहा है। कहीं जंगली हाथियों का झूंड गॉव में हमला कर रहा है, तो कहीं अपने दैनिक कार्यों में मग्‍न लोगों पर जानवरों के हमले हो रहे हैं। इसी कड़ी में कुछ दिन पहले हुई मुठभेड भी शामिल है, जिसमें एक दांतिला हाथी ने डुवार्स के नगराकाटा–चालसा जंगल में एक ट्रेन को रोक लिया था और गुस्‍से में ट्रेन की ओर बढते हाथी से बचने के लिए ट्रेन के ड्राइवर ने ट्रेन को बैकगीयर में डालकर पीछे सरका लिया था।

इसी रूट में कुछ दिन पहले एक बार दो हाथी और दूसरी बार सात हाथी ट्रेन से टकरा कर मारे गए। आमतौर से इसे एक सामान्य घटना मान लिया गया है, कि ट्रेन पटरी पार करते हुए ये हाथी मारे गए। हाथी को तुलनात्‍मक रूप से एक बुद्धिमान जानवर माना गया है। सामान्‍य परिस्थितयों में पत्तियों को खाकर पेट भरने वाले शाकाहारी हाथी अन्‍य जानवर अथवा प्राणी पर हमला नहीं करते। लेकिन पिछले एक दशक से डुवार्स के जंगलों के हाथी हिंसक हो गए हैं और अक्‍सर जानमाल की खबरें मिलती रहती है।

चाय उद्योगतंत्र के अधीन चाय की खेती के लिए आदिवासियों ने उन्‍नीसवीं सदी में डुवार्स–तराई के विशाल भूभाग में फैले घने जंगल को काटा और साफ किया। साफ किए गए इन्‍हीं हजारों वर्गमील क्षेत्र में अंग्रेज और भारतीय उद्योगपतियों ने सैकडों चाय बागान बनाया। बीसवीं सदी के पाँचवे दशक तक भी जलपाईगुड़ी जिले के विभिन्‍न भागों में बड़े और घने जंगल बचे हुए थे। यद्यपि जिले के डुवार्स इलाके में अनेक चाय बागान बस चुके थे, लेकिन जंगली जानवरों के लिए पर्याप्‍त जगह छोड़ी गई थी और जानवरों का आबादी के क्षेत्र में विचरण करने के कुछ ही विवरण मिलते हैं। जंगली हाथी कभी–कभी बागान बस्तियों में निकल आते थे, लेकिन जानमाल की हानि नहीं करते थे। मांदर, नगाडे और ढोलक बजाने और इंसानों की अजीब कोलाहल सुनकर जंगलों की ओर भाग जाते थे। केले के बागान और धान के खेत उनके प्रिय जगहें होतीं थीं।

सत्‍तर अस्‍सी के दशक में जब हम छोटे थे और रात को शोर सुनते थे कि गॉंव में हाथी आया है, तो हम भी अंधेरे में भाग कर हाथी देखने के लिए दौड़े जाते थे। हमारे लिए हाथी भगाना एक आनंददायक मौका होता था और हम हाथियों के बिल्‍कुल करीब जाकर उन्‍हें ‘’भगाने’’ का आनंद लिया करते थे। हमें इस बात का डर नहीं होता था कि विशालकाय जानवर गुस्‍से में पीछे मुडकर हमें कहीं रौंद न दे। तब हाथी हिंसक नहीं होते थे, वे हमारे शोर से कभी–कभार ही बिलचित होकर दो चार कदम भागते थे, नहीं तो अक्‍सर अपनी शानदार मस्‍त चाल से ही चल कर जंगल की ओर चले जाते थे।
मैं तब ग्‍यारह साल का था। असम से हाथी शावक पकड़ने के लिए महावतों का एक दल अपने पालतु हाथियों के साथ हमारे बागान आया हुआ था। एक सुबह किसी ने बताया कि हाथी शावक को पकड़ने के लिए महावतागण अपने हाथियों के साथ जंगल की ओर गए हैं। मैं भी अपने फुफेरे भाई शंकर तिर्की के साथ उनके साथ जाना चाहता था। सुबह हम उनके ठहरने के स्थान पहुँचे तो पता चला वे तो भोर को ही जंगल के लिए निकल चुके हैं।   उनके अलसुबह ही चले जाने पर हमें निराशा हुई, लेकिन हम हार नहीं मानने वाले थे। जिद्दी बच्चे थे और आव देखा न ताव गाना गाते हुए एक दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर जंगल की ओर चल पडे। अभी जंगल में कुछ ही दूर गए थे कि झरने (पझरा) के पानी से बना छोटा सा वन्‍य तालाब साफ दिखाई देने के बदले भरपूर मटमैला दिखाई दिया। हमें लगा हाथियों का झूँड यहॉं से नहा कर जंगल के अंत:भाग में चला गया है। हम गाना गाते हुए बीस पच्‍चीस कदम आगे ही बढ़े थे, कि हमारे बाऍं ओर का एक झाडी लरज कर नीचे गिर गया। हम उस झाडी को ध्‍यान से देख पाते उससे पहले ही दाऍं ओर का एक झाडी भी उसी अंदाज से हिल गया। हम एक सेकेंड के सौंवे भाग में ही देख चुके थे कि हमारे दोनों ओर हाथियों का झूँड बैठा हुआ है। हाथियों के झूँड को देखकर हमारे गाने तो बंद हो ही चुके थे, होश भी ठिकाने आ चुके थे। कहॉं तो हम हाथियों को पकड़ कर उनकी सवारी करने के ख्‍वाब लिए जंगल आए थे और अब तो हमें एक पल में जिन्‍दगी के यथार्थ समझ में आ गया था। एक क्षण के लिए तो ऐसा लगा भागना बेकार का प्रयास होगा, अब चल कर हाथियों के हाथों ही वीरगति को प्राप्‍त कर लेते हैं। लेकिन दिमाग के किसी कोने ने भागने का आदेश दिया और हम सिर पर पॉंव रख कर ऐसे भागे कि यदि ओलंपिक की दौड़ में होते तो प्रथम ही आते। आज कहना चाहूँगा कि यदि हाथी जरा भी हिंसक होते तो उस दिन हम किसी भी तरह से बच नहीं पाते। हाथियों का झूँड हमारे रास्‍ते के दोनों ओर बीस पच्‍चीस गज की दूरी पर पझरा के पानी में स्‍नान करके आराम फरमा रहे थे। वह दृष्‍य किसी फिल्‍मी बैकग्राउण्‍ड दृश्‍य की तरह आज भी नजरों से अक्‍सर गुजरती है।

आज डुवार्स के जंगल में पेड ऐसे काटे जा रहे हैं, जैसे किसानों के द्वारा अपने बैलों को खिलाने के लिए रोज घास काटी जाती है। जंगली सूअर, सियार, हिरण, खरगोश, जंगली भैंस, चीता आदि अक्‍सर ही जंगल में सूखी लकडियॉं इकट्ठा करते झारखण्डी, राभा, बोडो और गोर्खा महिलाओं और पुरूषों को दिखाई देते रहते थे। क्‍योंकि जंगलों में इन समुदायों की महिलाऍं ही वनोपज के लिए रोज ही जंगलों की खाक छानती थीं। लेकिन लकड़ी चोर और लकड़ी तस्‍करी में लगे लोगों ने अब जंगल को उजाड़ कर रख दिया है। अब जानवर तो जंगलों में दिखाई ही देने बंद हो गए हैं। कुछ जानवर नेशनल पार्क में तब्दील जलदापाडा, गोरूमारा, चिलापाता, जंयती, राजाभातखावा आदि जंगलों में बचे रह गए हैं, लेकिन दौलत के भूखे शहरी सुटेटबुटेट जानवर उन्‍हें भी खत्‍म करने के लिए दिन रात षड़यंत्र रचने में अपनी उर्जा व्‍यय कर रहे हैं। आजकल मैना, गोरैया, पांडुकी आदि भी बहुत कम मात्रा में दिखाई देती हैं। मोर की चिंहूक की आवाज तो जंगलों में शायद ही सुनाई देती है।

डुवार्स में आज जनसंख्‍या बेतहासा बढ़ चुकी है। मानवीय कार्यकलापों से इकोलॉजी में बहुत अंतर आ चुका है। कभी थोड़ी सी बारिश होने पर जंगलों में पझरा फूटता था। जंगल किनारे हम मिट्टी को काट कर एक दो फूट के नन्‍हें तालाब बना कर पझरा पानी को इकट्ठा करके ‘’मेरा तालाब -तेरा तालाब’’ खेलते थे। जंगल के काफी अंदर जाकर हम पेड़ पर चढ़ कर जानवरों की आवाजों की नकल निकालते थे और जानवरों से ऑंखमिचौली खेलने की कोशिश करते थे। हमें जंगली जानवरों का भय नहीं सताता था। हम उन्‍हें शर्मिले ही समझते थे और साथ में एक लाठी अथवा डालियॉं काटने के लिए एक झोरनी (लम्‍बा छूरा) ही साथ रखते थे। कभी–कभी हम मीलों तक जंगल में सैर करते थे। हमारी सुरक्षा हमारे सादरी और हिन्‍दी फिल्‍मी गाने किया करते थे, जिसे हम जंगल दौरे पर पंचम स्‍वर में गाते थे। जंगली जानवरों के कान और ऑंखें बहुत तेज होती हैं, वे हमारी आवाज सुन कर ही घनी झाडियों में दुबक जाते थे। जंगल  में उनके खाने पीने की चीजों की कमी नहीं थी। आदमी पर हमले सिर्फ बाघ ही किया करते थे वह भी आदमी के द्वारा उन्‍हें नुकसान पहुँचाने के इरादे से हमले किए जाने पर।

कभी शांत रहने वाले जंगली पशु आज मानवीय स्‍वार्थपूर्ण गतिविधियों के कारण त्रस्‍त हैं। अपनी स्‍वार्थ की पूर्ति के लिए मानवों ने वन्‍य प्राणियों के प्राकृतिक अधिकारों पर निरंतर हमला बोला है और इसी मानवीय हमलों से अजीज आ चुके वन्‍य प्राणी आज मनुष्‍य के प्रति हिंसक भावना विकसित कर चुके हैं। कभी आदमी को देखकर झाडियों और जंगलों में छुप जाने वाले शर्मिले जानवर आज आदमी को देखते ही उनपर हमला बोलने लगे हैं। चूँकि जानवर मानव की तरह तीक्ष्‍ण बुद्धि के नहीं होते हैं और मानव के तकनीकी शक्तियों को समझ नहीं पाते हैं, इसी कारण वे इस पृथ्‍वी से मानव के द्वारा मिटाए जा रहे हैं।

बहुत कुछ ऐसा ही अशिक्षित और भोले–भाले होने के कारण आदिवासियों के साथ भी घट रहा है। उनके खेत खलिहान लूटे जा रहे हैं, उन्‍हें उनके ही घरों के आसपास के मामूली नौ‍करियों जैसे आंगनवाड़ी–रसोईया और शिशु शिक्षक जैसे रोजगारों से भी वंचित किया जा रहा है। कभी डुवार्स के अस्‍सी प्रतिशत खेल खलिहानों को जोतने वाले आदिवासी आज अपने अधिकांश खेत खलिहानों से हाथ धो बैठे हैं। देश के दूसरे राज्‍यों और पडोसी देशों से आए हुए नवआगंतुकों ने छल–कपट से आदिवासियों के खेत–खलिहानों को एक बार लूटना शुरू किए तो बस लूटते ही चले गए। वे ऐसे आदिवासियों को चुनते हैं, जिनके पास प्रयाप्त भूमि होती है और जो नशापान करना भी पसंद करते हैं। उनसे दोस्ती करके उन्हें नियमित नशापान कराया जाता है। फिर उनके चारित्रिक पसंद को जानकर उन्हें अन्य ऐब का भी शौकिन बनाया जाता है। पहले उन्हें नशेड़ी और फिर कर्जदार बनाया जाता है। इन्हीं तिकड़मों के सहारे आज भी रोज कहीं न कहीं खेत खलिहान लूटे जा रहे हैं। आदिवासियों के खेतों को कहीं ट्राइबल लैंड के नाम पर पहाडी ट्राइबल के नाम पर स्‍थानांतरित किए जा रहे हैं तो कहीं ट्राइबल डिपाटर्मेंट के सहयोग से ननट्राइबल में बदला जा रहा है। अनेक खेत–खलिहान आज भी कागजों में ट्राइबल के नाम पर ही हैं, लेकिन उस पर कब्‍जा किन्‍हीं गैर आदिवासी का है।

अनपढ़ आदिवासी, सरकारी और तथाकथित ‘’आदिवासी चिंतकों’’ के सह और सहयोग से किए जा रहे इस अन्‍याय और चालाकी के खेल को उस वन्‍य प्राणी की तरह असहाय होकर देख रहा है, जो अधिक बलशाली होने के बावजूद मानवीय तकनीकी को समझ नहीं पाने के कारण अपना अस्त्वि गँवाते जा रहे हैं। आम आदिवासी को जमीन स्थानानंतण के कानून की जानकारी नहीं है। जिन्हें थोड़ी बहुत जानकारी है, उन्हें सरकारी नियमों के दावपेंच की जानकारी नहीं है। जैसे वन्य प्राणी अपने जीने खाने के सिवा और कोई चालाकी सीख नहीं पाते हैं, वैसे ही आदिवासी भी राज्य के कानूनी दॉंवपेंच और दूसरों के चालाकी को समझ नहीं पाते हैं।

आज डुवार्स के वन्‍य प्राणी खूँखार होकर जंगल में पेट न भर पाने के कारण मानव बस्तियों में घुसे जा रहे हैं और मानव से मुठभेट होने पर उन पर हमला कर रहे हैं। सरकार इन हमलों में घायल होने वाले को कुछ आर्थिक मदद देकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर रही है। शरीर की गंभीर व्‍याधि का इलाज करने के बदले चेहरे पर टेल्‍कम पावडर लगा कर चेहरे पर लाली लाने की इन कोशिशों से स्थि‍ति में कोई सुधार नहीं होगा और यह मर्ज भविष्‍य में तीब्र गति से बढता ही रहेगा। गॉंव की गरीब जनता को पॉंच, दस, पचास या अधिकतम एक लाख रूपये देकर न तो वन्‍य प्राणी को वन से बाहर आने से रोका जा सकेगा और न ही गॉंव वालों को इन हमलों से सुरक्षा ही दी जा सकेगी।

वन्‍य प्राणियों की तरह ही आज डुवार्स–तराई के आदिवासी भी पक्षपात, अन्‍याय, चालाकी और अपने बापदादाओं के द्वारा छोडी गई एक मात्र जीविका के साधन खेत–खलिहानों की लूट और सरकारी दमन से अत्‍यंत क्षुब्‍ध और आक्रोशित है। आदिवासियों के सामाजिक और आर्थिक समस्‍याओं को भी सरकार टेल्‍कम पावडर लगाकर दर्द और व्‍यथा को छुपाने और नकली चमक दिखाने की भरपूर कोशिश कर रही है। आदिवासियों के रहमुनाई का दावा करने वाले नेतागण और कार्यकर्ता भी कास्मेटिक उपायों के पीछे अपनी उर्जा गँवा रहे हैं। सरकार भी उनकी कल्‍पनाशीलहीनता, दूरदृष्टिहीनता की सीमा को गहराई से जानती है और उन्‍हें इन्‍हीं सब बातों में उलझा कर रखती है, ताकि वे नई कल्‍पानाशीलता और दूरदृष्टि सम्‍पन्‍न होकर दूर की कोई कौड़ी न मांग लें।

डुवार्स के जंगलों में वास करने वाले वन्‍य प्राणियों के लिए सरकार के पास कोई पुख्‍ता परियोजना नहीं है, न ही वह इस समस्‍या को सुलझाने के लिए गंभीर है। इसी तरह वह आदिवासियों की समस्‍याओं को भी सुलझाने में गंभीर नहीं है। सरकार की उदासीनता, जानबुझकर समस्‍याओं को न सुलझाने की नीयत की दोहरी मार आदिवासी समाज को पड़ रही है। आदिवासियों के हाथों बचे थोड़े से खेतों में लहलहाते धान को खाने के लिए हाथी रात में चले आते हैं। खेत के धान, सब्‍जी बारी के केले खाने के साथ साथ हाथी थोडा मस्‍त होने के लिए हँडिया की गंध सूंघ कर आदिवासी गॉंवों की ओर चल पड़ते हैं। कच्‍चे मकानों को रौंद डालते हैं और सामने आने वाले मनुष्‍य को भी देखते ही अपने रोष की भावना को व्‍यक्‍त कर डालते हैं। हाथियों के गुस्से से शिकार हुए लोगों की गणना की जाए तो उनमें आदिवासियों की संख्या ही अधिक होगी।

डुवार्स के आदिवासी एक ओर सरकारी सहमति से हो रही लूट, पक्षपात और अन्‍याय से जुझ रहे हैं, वहीं सरकारी सहमति से बसाए गए विशाल बाहरी जनसंख्‍या के कारण सिकुड़ते प्राकृतिक संसाधानों की कमी से जुझते वन्‍य प्राणियों के हमलों से भी त्रस्‍त हो रहे हैं। स्‍पष्‍ट रूप से दोहरी मार पड रही है समाज में।

सरकारी और संचार माध्‍यमों द्वारा यह कहा जा रहा है कि रेल पटरी पार करते हुए एक साथ सात हाथी ट्रेन के धक्‍के से मारे गए। लेकिन यह अर्द्धसत्‍य है। हाथियों के कान बहुत तेज होते हैं। मालगाडी की गड़गडाहट पॉंच किलोमीटर दूर से उन्‍हें सुनाई पड़ सकती है। विशाल ट्रेन को सामने से आते देखकर वह पटरी पार करने के लिए शायद ही तैयार होंगे। एक हाथी इसके कुछ दिनों पहले ही ट्रेन से मारा गया था, जिसे शायद दूसरे हाथी ने अपनी ऑंखों से देखा लिया था। उन्‍हें मानव के तकनीकी ज्ञान के बारे कुछ मालूम नहीं। लेकिन ट्रेन से अपने झूँड के साथी को मरते हुए देख कर इतना तो समझ आ ही गया होगा कि कोई तेज और विशालकाय ‘जानवर’ उन्‍हें मार डाला है। शायद उसी का बदला लेने के लिए वे मूक जानवर एक साथ ट्रेन से भिड़ गए और उन्‍हें अपनी जान गँवानी पडी। विशेषज्ञगण  शायद इन बातों को समझते भी होंगे। कभी अहिंसक रहे जानवर आज कितने हिंसक हो चुके हैं, इस घटना से सहज ही पता चल जाता है।

आदिवासी समाज एक शांतिप्रिय समाज है। सामुहिकता की उनकी भावना में सभी के लिए जगह और भावना है। इन ‘सभी’ में मनुष्‍य और प्राकृतिक दोनों ही शामिल हैं। लेकिन आज उनके साथ जो छल किया जा रहा है, उससे वह बहुत व्यथित है। यही व्यथा को कुछ तत्वों ने हिंसक मोड़ देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा है। डुवार्स और तराई में अभी भी आदिवासी शांत है। जरुरत इस बात की है कि उसके साथ हो रहे अन्याय, छल–कपट, पक्षपात, चालाकी को रोका जाए। देर होने पर शांत आदिवासी भी वन्य हाथियों की तरह हिंसक हो सकते हैं। देश के कई भागों में आदिवासियों को हिंसा की दीक्षा दी जा रही है। उनके हाथों में हाथियार थमाया जा रहा है। उन्हें विशाल हिंसक जानवर बनाकर देश को रौंदने का जरिया बनाया जा रहा है। यह निश्चय ही वेदनापूर्ण स्थिति है।

डुवार्स–तराई के सुरम्य वादियों में सिर्फ कुछ हाथी ही हिंसक हो चुके हैं। लेकिन जानमाल की हानि बहुत हो रही है। इस सुरम्य वादियों में हाथियों और आदिवासियों दोनों को ही शांतिपूर्ण जीवन जीने का प्राकृतिक और कानूनी अधिकार प्राप्त है। वे जीवन जीयें और शांत रहें, इसके लिए जरुरी है कि उनके अधिकारों और अस्तित्व का सम्मान किया जाए। यह अतिआवश्यक है कि देश और समाज द्वारा पूर्ण रुप से उनकी समस्या को सुलझाने के लिए ईमानदारीपूर्ण प्रयास किया जाए। हाथियों की तरह आदिवासियों का भी संयम जवाब दे दे तो वह निश्चच ही इऩ वादियों के लिए सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दिन होगा।

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चमरा ऊराँव और आदिवासी परंपरा

चमरा ऊराँव और आदिवासी परंपरा

                                                                                                                                                                                          नेह अर्जुन इंदवार 

           जंगली हाथियों ने चमरा उरॉंव का घर दो साल पहले ही उजाड दिया था । वे घर में रखे चावल दाल तथा अन्‍य खाद्यपदार्थ भी  खा गए। किसी तरह 65 वर्षीय वृ्द्ध चमरा उरॉंव ने भाग कर रात में अपनी जान बचायी थी। लेकिन दो वर्ष बीत जाने के बावजूद अभी तक उन्‍हें वन विभाग ने कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी।

नियमानुसार वन विभाग ऐसे लोगों को तुरंत क्षतिपूर्ति देता है, जिन्‍हें जंगली हाथी नुकसान पहुँचाते हैं। अकेले जीवन गुजर बसर करने वाले गरीब चमरा पिछले दो वर्षों में अपने घर की मरम्‍मत नहीं करवा पाए हैं  और आज वे  भीषण सर्दी ठिठुरता हुआ रात काटते हैं। बीरपाड़ा के पास रंगालीबाजना, चापागुडी मौजा के डिपालाइन में रहने वाले श्री चमरा उरॉंव किसी तरह मजदूरी करके अपना पेट तो भर लेते हैं, लेकिन इतना पैसा नहीं बचा पाते हैं कि वे अपने मकान की मरम्‍मत करवा सकें। श्री चमरा उरॉंव के पास बीपीएल (बिलो पॉवर्टी लाइन) राशन कार्ड था जिसके आधार पर उसे सरकार से इंदिरा आवास के नाम पर एक रूम मिला हुआ था। लेकिन मकान बनने के दो महीने बाद ही हाथियों का झुंड गॉंव में आया और घरों को तहस नहस करके चला गया।

विगत दो वर्षो तक उन्‍हें क्‍यों क्षतिपूर्ति नहीं दी गई इस विषय पर वन विभाग के अधिकारी सुरंजन सरकार कहते हैं वे यहॉं नये आए हैं वे देखेंगे कि क्‍यों चमरा उरॉंव को क्षतिपूर्ति नहीं मिली। इस गाँव में रहने वाले अधिकतर रहीवासी आदिवासी हैं और मजदूरी करके जीवन निर्वाह करते हैं।

आदिवासी समाज बहुत बदल गया है। युग बीतने के साथ तो समाज बदलता ही है। लेकिन आदिवासी समाज में निरंतर हो रहे बदलाव प्राकृतिक और स्‍वभाविक बदलाव नहीं है। यह बदलाव देश में विकास के नाम पर हो रहे उथल-पथल का साइट इफेक्‍ट अधिक और समाज के द्वारा सहर्ष चुना गया कम है। आदिवासी समाज में व्‍यक्तिगत जीवन सुखमय जीवन का एक पहलू होता था। अर्थात व्‍यक्ति यदि सुखी है तो वह व्‍यक्तिगत जीवन में एकांतिक जीवन जी सकता था। लेकिन दुख में समाज हमेशा उसके दुख को बॉंटने के लिए तत्‍पर रहता था। समाज कौटोंबिक परिवारों में बॉंटा हुआ जरूर होता था लेकिन एकता और सामुहिकता की भावना उनमें स्‍वभाविक रूप से व्‍याप्‍त होती थी। चाहे फसल की कटाई हो चाहे फसल की बुआई। मदइत के सहारे पूरे गॉंव में हर तरह के पारिवारिक और सामाजिक कार्यो को सभी मिल कर पूरा कर लेते थे। बच्‍चों के पालन-पोषण और देखरेख अथवा युवक युवतियों के सामाजिक प्राशिक्षण की बातें हो, सभी मिल कर करते थे। किसी में यह भावना नहीं होती थी कि ये बच्‍चे फालना के हैं इसलिए हमें उसे नजरांदाज करने हैं। बडों की इज्‍जत गॉव समाज में सभी करते थे। एक बुजुर्ग सभी के बडा, आजा अथवा नाना होता था।
किसी  एक आदमी के बीमार पड़ने पर सभी उसके दावा दारू में भले व्‍यकितगत रूप से हाथ नहीं बटा रहे होते लेकिन परोक्ष रूप से सभी उसके लिए दुखी होते थे और उसके खेती बारी को बारी-बारी से मदद करके फसल उगाने में सहायता करते थे। किसी मजबूर आदमी की मजबूरी को समाज कभी भी न तो मजबूर आदमी की व्‍यक्तिगत मजबूरी समझता था न ही कभी उनकी मजबूरी का लाभ उठाने के लिए कोई नीचता के स्‍तर पर उतरता था। झारखण्‍ड के गॉंवों में गॉंव हमेशा स्‍वनिर्भर होते थे और बहुत कम चीजों के लिए वे गॉंव के बाहर निर्भर रहते थे। गॉंव बृहद रूप में एक परिवार ही होता था।

किन्‍तु आज गॉंव और समाज की बात छोड दीजिए आज तो परिवार में ही एकता की भावना नहीं होती है। व्‍यक्ति केि‍न्‍द्रत स्‍वार्थ आधारित व्‍यक्तिवाद ने आज पूरे आदिवासी समाज को अपने आगोश में ले लिया है। आज हर चीज के लिए आदिवासी समाज दूसरे समाज पर निर्भर है। क्‍योंकि साम्‍यवाद की भावना दिलों से खत्‍म होती जा रही है।  विकासवाद ने आदिवासी स्‍वनिर्भरता को खत्‍म कर दिया है और हम आज आदिवासीयत से दूर होते जा रहे हैं। आज समाज में लाखों चमरा उरॉंव हैं जिन्‍हें पढा-लिखा तबका जरा सी मदद पहॅुचा के उनके साधारण जीवन में सुख की दो घडी दे सकता है। लेकिन चमरा उरॉंवों को उनके आस पडोस में रहने वाले आदिवासी शिक्षित मदद पहुँचाने में तत्‍पर नहीं होते हैं और तमाम नियमों और कानूनों के बावजूद उन्‍हें सहज रूप से प्राप्‍त होने वाली सहायता नहीं पहॅुच पाती है।

शिक्षा से समाज में सुबह के उजाले की किरण की जगह दोपहरी की ऐसी किरणे मिल रही है जिनकी तपीश हमें जला रही है।रोज सुबह निकलने वाला सूरज हमेशा पुराना वाला सूरज नहीं होता है वह अपने साथ नयी रोशनी लेकर आता है। नयी सुबह की नई रोशनी से आदिवासी गॉंव भी अछूते नहीं रहे और गॉवों से ग्रामीण शहरों और कस्‍बों में जाने लगे और वहॉं से वापसी में वे अपने साथ कुछ रूपये पैसे और नये कपडे ही नहीं बल्कि नयी सोच, नयी विचारधारा, परंपरा और आचार-व्‍यवहार भी लाने लगे। सामूहिक जीवन पद्वति में जीवन जीने वाले आदिवासी कस्‍बों, शहरों और नगरों में जाकर व्‍यक्ति-केि‍न्‍द्रत, स्‍वकल्‍याण के विचारों से वाकिफ होने लगे,  उसे अपनाने लगे और इसे वे अपने गॉंवों में भी परांपरा की तरह सींचने लगे।


व्‍यक्ति-केि‍न्‍द्रत विचारधारा ने समाज को बुरी तरह से झकझोर दिया है। आज सामुहिकता की भावना की जगह व्‍यक्तिगत स्‍वार्थ की भावना ने ले लिया है। कभी छोटे-मोटे झगडे से लेकर बडी-बडी लडाईयों को गॉंव के पंचायत अथवा पडहा पंचायत आदि में सुलझाया जाता था, लेकिन आज मामूली कहासुनी भी पुलिस और कचहरी तक पहॅुचती है। शहरों में जा कर बस जाने वाले गॉंव वालों को भूलते जा रहे है। वहीं गॉंव वाले भी शहरों में बस जाने वालों के साथ न सिर्फ शहरी के रूप में ही व्‍यवहार करते हैं, बल्कि उन्‍हें खेती-बारी के हक से भी जुदा समझते हैं। पैसे आधारित सोच ने तमाम सामाजिक विचारों को स्‍वार्थ आधारित विचारों में बदल दिया है। आज कोई चमरा उरॉंव बुढापे में कष्‍ट का जीवन जीता है तो समाज में कहीं कोई हलचल नहीं मचता है। कोई पडोसी सामने आकर उन्‍हें न तो दिलासा दिलाता है न ही उन्‍हें अपनी सामर्थ्‍यता के अनुसार कोई मदद पहुँचाता है। जो पढे-लिखे हैं वे अपनी ही दुनिया में खोए हुए अपने जीवन स्‍तर  को और उँचा उठाने में व्‍यस्‍त हैं।

समाज को नेतृत्‍व देने का दावा करने वाले अपनी रूतबा को बढाने और अपने लक्ष्‍य को पाने में ही लगे हुए हैं।आदिवासी समाज भारत के अन्‍य सम-सामयिक समाजों में सिर्फ आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछडी हुआ है। सामाजिक रूप से आदिवासी समाज अभी भी अनेक समाजों से आगे और समृद्व है। अभी भी आदिवासी समाज में समाज की कीमत पर अपनी झोली भरने, अपने धनबल पर अन्‍याय और अनैतिक कार्य करने वालों को मान्‍यता नहीं मिलता है। न ही अन्‍य भारतीय समाजों में व्‍याप्‍त कुरीतियों को अपने समाज में स्‍थान देता है।

नारी जाति को आदिवासी समान में जितना सम्‍मान और अधिकार मिलता है उतना और कहीं भी नहीं। शादी में दहेज मांगने का साहस करने वाले उँगली में गिने जा सकते हैं। खेती की भूमि सामूहिक और सामाजिक मानी जाती है। जाति और धर्म के रूप में किसी भी व्‍यक्ति के साथ सामाजिक रूप से कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। एक ही घर में एक भाई सरना और एक भाई ईसाई हो सकते हैं। वर्ग भेद न के बराबर है। चाहे कोई धार्मिक हो चाहे कोई अधार्मिक समाज इसकी कोई परवाह नहीं करता है। धार्मिक कटटरता  थोपने की तमाम कोशिशें बेकार हुई है। समाज को धार्मिक रूप से बॉंटने की कोशिशे भी सफल नहीं हुई है।

कुछ लोग आदिवासियों को दलितों से भी पिछडे और नीच साबित करने की बहुतेरे कोशिशें की लेकिन आदिवासी उच्‍च सामाजिक मूल्‍यों के कारण वे इस मामले में फिसडडी साबित हुए हैं। आदिवासी, समता स्‍वतंत्र और समरसता में प्राकृतिक रूप से विश्‍वास करता है। न तो किसी समाज को अपने से छोटा समझता है न ही किसी समाज को अपने से बडा। वर्तमान समय में जिन मूल्‍यों और विचारों को कानून और संविधान के द्वारा लोगों में प्रचारित किया जा रहा है वे तमाम बातें आदिवासी समाज में युगों से स्‍थापित हैं। चाहे वह पर्यावरण की बातें हो, प्रदुषण फैलाने की बाते हो या वह आदमी को अनचाहे आचार-व्‍यवहार और परांपराओं से बचाने की बातें हो। आदिवासी समाज हमेशा सर्वकल्‍याणकारी और सर्वजनहिताय बातों को ही अपने समाज में स्‍थान और मान्‍यता दिया है।

आदिवासी गॉंव जितने साफ-सुथरे और स्‍वच्‍छ होते हैं वैसे गॉंव भारत के और कौन से हिस्‍से में मिलते हैं इस बात की जानकारी पूरे भारत की यात्रा करने के बाद भी मुझे नहीं हुई। मेरे यह कहने से लोगों को आश्‍चर्य होता है कि आदिवासी परिवार तथाकथित ब्राहमण और  तथाकथित दलित को एक ही नजर से न सिर्फ देखता है, बल्कि समान रूप से व्‍यवहार भी करता है। सामाजिक रूप से न तो वह किसी व्‍यक्ति को जन्‍म के आधार पर छोटा समझता है न ही बडा।

भारतीय संविधान को लागू हुए साठ साल हो गए। तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद लोगों की जातिवादी विचारों और परंपराओं में कोई परिवर्तन नहीं आया है। लेकिन आदिवासी समाज इन्‍सान के बराबर होने की बातों को युगों से मान्‍यता देता आ रहा है।इन तमाम अच्‍छाईयों के बावजूद आदिवासी समाज आज टूट रहा है। टूटन की गति समय बीतने साथ तीब्रतर होते जा रही है। हम दूसरे समाज की अच्‍छाईयों को तो नहीं अपना रहे हैं, लेकिन बुराईयों को जरूर अपना रहे हैं। आदिवासी समाज की सामाजिक मूल्‍यों पर हम कोई बहस नहीं करते हैं। हमारी सामाजिक धरोहर, मूल्‍यों, विचारधारा, अच्‍छी सामाजिक परंपराओं, स्‍वतांत्रिक विचारों, समता के मूल्‍यों, भाईचारा, सामाजिक और धार्मिक खुलेपन को बचाए रखने के कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं।

​           हम दूसरे समाज की घार्मिक और साम्‍प्रादयिक भावनों को अपना कर अपने ही समाज में विभेद पैदा कर रहे हैं। य‍द्यपि इस तरह की बुराईयॉ अभी गहरी रूप में अपनी पैठ नहीं बना पाई है। लेकिन यदि हम सजग नहीं हुए तो दूसरे समाज में फैली व्‍यक्तिवादी परंपरा और विचारधारा आदिवासी समाज को खत्‍म कर देगी। समाज में दुख झेल रहे चमरा उरॉंवों ने हमें सोचने, विचार करने का एक मौका दिया है। यदि हम सामाजिक चेतना जगा कर विचार करेंगे तो हम अपने समाज को बचा सकते हैं। अपनी मूल्‍यों को बचा कर समाज में एकता और एक्‍य की भावना को बचा कर रख सकते हैं।​ This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 18, 2016. All rights reserved.

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