नये विचारों का सृजन

                                   वाल्टर कांडुलना

पिछले कुछ सालों से देख रहा हूँ, विशेषकर फेसबुक और अन्य सोशल मंचों में, हम आदिवासी अपने समाज को कोई नवोवेषित विचार नहीं दे पा रहे हैं।  ले-दे के एक-दो विषय-वस्तुओं के इर्द-गिर्द ही हमारे पोस्ट घूमते नजर आते हैं।

इस बीच पिछले कई सालों में शंख और कोयल की नदियों में काफी पानी बह चुका है। 

1) आदिवासी कौन है ? आदिवासी की पहचान (आइडेंटिटी) क्या है ? इस अपनी पहचान की खोज के बहाने किसको समावेश (include) करें और किसको बहिष्कृत (exclude) करें इस पर संभवतः सबसे ज्यादा चर्चा किये जा रहे हैं। जो कि सरना-ईसाई की बहस में परिणत होकर बगैर किसी निष्कर्ष (conclusion) के (अ)समाप्त = open ended ही रुक जाता रहा है। यह किस चीज़ की ओर इशारा करती है ?
कहीं हमारी धारणाएं किन्हीं आयातित विचारों के परिणाम तो नहीं हैं !

नये विचार- फोटो-मनोजआर्यन

2) राजनीतिक तौर पर आदिवासी क्या किसी राष्ट्रीय पार्टी का अंधभक्त (वोट बैंक) बन कर ही अपने अस्तित्व या वजूद (existence) को बचा सकते हैं ? इस पर भी आपस में काफी नोक-झोंक , कटाक्ष और व्यंग-तीर चलते रहे हैं।
अपनी-अपनी पार्टियों में हमारे आदिवासी नेता या कुछ हद तक हम फेसबूकिये भी किसी मुद्दे पर जैसे जमीन के मुद्दे पर या हमारे संवैधानिक अधिकारों के मुद्दे पर <आदिवासी दृष्टिकोण> क्यों नहीं रख पाते हैं ? यहाँ भी हमारी अपनी कोई मौलिक “विचार धारा” धरातल पर उतरी नजर नहीं आती है। क्या हम दूसरों के <<विचारों>> पर “जिंदाबाद” या “मुर्दाबाद” के नारे लगाने को अभिशप्त हैं।

हम क्या-क्या कर सकते हैं :-

1) संसार में व्याप्त वर्तमान विचारों के बासीपन और अपनी पूर्व-धारणाओं, पूर्वाग्रह के मिथकों से हमें निकलना पड़ेगा। यह कोई वन टाइम एक्सरसाईज (one time exercise) नहीं है, बल्कि यह एक सतत चलने वाली प्रक्रिया (continuous process) है।  महत्वपूर्ण यह है कि हम अपने विचारों के साथ कितना जीते हैं और अपने समाज के प्रति कितना ईमानदार हैं।

2) नित नई सोचों और खोजों के साथ नए-नए प्रयोग किये जा रहे हैं। अपने क्षेत्र में या अपनी रूचि के विषय में मैं समाज को क्या नई चीज दे सकता हूँ ? उदाहरण के लिए यदि मैं एक शिक्षक /प्रोफेसर हूँ तो क्या मैं ऐसी तकनीक इजाद कर सकता हूँ, जिससे कि आदिवासियों के ग्रामीण माहौल को भी कैसे शिक्षण-प्रशिक्षण (education& training) के सहायक (conducive) कैसे बनाया जा सकता है।

3) परम्परागत आदिवासी शासन प्रणाली को क्या वर्तमान डेमोक्रेटिक सिस्टम में insert किया जा सकता है और अगर हाँ, insert किया जा सकता है तो इस शासन प्रणाली को हम insert कैसे करेंगे. क्या हमें इसके लिए रिसर्च नहीं करना चाहिए ?

4) हमारी अपनी आदिवासी ethos & psyche के आधार पर हम अपने आदिवासी समाज की उन्नति/आर्थिक उन्नति के लिये क्या-क्या नए योजनाएँ (प्रोजेक्ट और मॉडल) बना सकते हैं और उन्हें कैसे अपनी शासन प्रणाली में व्यवस्थित और समाहित (synchronize) कर सकते हैं।

5) अभी जो भी NGOs बन रहे हैं अथवा चल रहे हैं वे basically सरकारी योजनाओं की रकम को निकालने के नाल (siphon) मात्र हैं।

6) संविधान में आदिवासियों की सुरक्षा और संवर्धन के लिए सबसे ज्यादा प्रावधान दिए गए हैं, परन्तु फिर भी हमारी वर्तमान स्थिति-परिस्थिति हर क्षेत्र में चाहे शिक्षा का हो, या आर्थिक दशा का हो या सामाजिक हो या राजनीतिक हों, बेहद बुरी है।
क्या कभी हमने इसके कारणों की समीक्षा की है ?

हमने तो आज तक सिर्फ दूसरों पर दोषारोपण करना ही सीखा है।

आइये, नए विचार (mind-set) बनाएँ, नए (+)ve विचार (आइडियाज) लाएँ और कुछ नया कर दिखाएँ।
Ideas rule the World.
विचार ही संसार पर शासन करते हैं। विचार ही संसार में बदलाव लाते हैं। आईए हम समाज में नये-नये विचारों को लाएँ और उसे समाजोपयोगी बनाएँ। *

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हमारी सोच से अधिक आम हो सकता है  एलियन जीवन

     यह कहना है सूक्ष्मजीव जीवाश्म का अध्ययन कर रहे  वैज्ञानिकों का

 

ब्रह्मांड में एलियन जीवन हमारी सोच से ज्यादा आम हो सकता है। ऐसा कहना है उन वैज्ञानिकों का जिन्होंने सबसे पुराना ज्ञात सूक्ष्मजीव जीवाश्म (fossil microorganisms) का विश्लेषण किया है। इस अध्ययन के अनुसार धरती पर जीवन 3.5 अरब साल पहले शुरू हुआ था।

अमेरिका के कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स और विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने पाया कि जिन दो प्रजातियों का अध्ययन उन्होंने किया उनमें से एक आदिम प्रकार के प्रकाश संश्लेषण की क्रिया करता था और दूसरा मीथेन गैस का उत्पादन करता था और दो अन्य मिथेन का सेवन करके उससे अपने कोशिका के दीवार (झिल्ली) का निर्माण किया करता था।

पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया से प्राप्त सूक्ष्मजीव  3.465 अरब वर्ष पुराना हैं। इस बात के साबूत प्राप्त हो जाने पर कि पृथ्वी के इतिहास के अत्यंत प्रारंभिक काल में ही विविध समूह के जीव (जीवाणु) विकसित हो चुके थे, यह इस अनुमान को मजबूत करता है कि  ब्रह्मांड में कहीं और भी जीवन मौजूद हो सकता है।  पृथ्वी पर जीवन बहुत तेजी से पैदा हुआ था। लेकिन यह पृथ्वी से बाहर कहीं और पैदा नहीं हुआ होगा, ऐसी सोच रखना उचित नहीं होगा।

 UCLA के प्रोफेसर जे. विलियम शाफ कहते हैं   आदिम प्रकाश संश्लेषण, मीथेन उत्पादक, मीथेन उपयोगकर्ता, मतलब 3.465 अरब साल पहले से ही  पृथ्वी पर जीवन विविध रूप में मौजूद था; यह स्पष्ट है। 

PNAS जर्नल में प्रकाशित लेख के प्रमुख लेखक प्रोफेसर  जे. विलियम शाफ लिखते हैं ये प्रथम डेटा है, जो पृथ्वी के इतिहास के उस काल में मौजूद बहुत ही विविध जीवन को दिखाते हैं, जबकि हमारे पिछले शोध ने दिखाया है कि 3.4 अरब साल पहले भी सल्फर के उपयोगकर्ता थे” 

अंतरिक्ष के आंगन में बिखरे खरबों सितारे

वे कहते हैं यह अध्ययन हमें बताता है कि पृथ्वी में जीवन काफी पहले ही शुरू हो चुका था और यह पुष्टि करता है कि आदिम जीवन के लिए अपने से अधिक उन्नत सूक्ष्मजीवों में विकसित होना मुश्किल नहीं था।”

प्राचीन जीवाश्मों में संरक्षित सूक्ष्मजीवों में किए गए यह अध्ययन अब तक का सबसे अधिक विस्तृत अध्ययन है।

अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी जिसे secondary ion mass spectroscopy (SIMS) कहा जाता है,  के द्वारा सूक्ष्मजीवों का विश्लेषण किया, जो कार्बन –12 से कार्बन –13 आइसोटोप के अनुपात का पता लगाता है। इस सूचना से वैज्ञानिक इस बात को निर्धारित करने के लिए उपयोग कर सकते हैं कि सूक्ष्मजीव ने जीवन कैसे जीया था। ये जीवाश्म उस काल में निर्मित हुए थे जब वातावरण में बहुत कम ऑक्सीजन था।

 तब तक उन्नत प्रकाश संश्लेषण विकसित नहीं हुआ था।

 2 अरब वर्ष पहले वायुमंडल में तेजी से वृद्धि होने के पहले करीब आधा अरब साल (करीब २.५ अरब साल) पहले ऑक्सीजन पृथ्वी पर प्रकट हुआ था।  

 ऑक्सीजन इन सूक्ष्मजीवों के लिए जहरीली हुआ होता, और उन्हें मार डाला होता । आदिम प्रकाश संश्लेषण पृथ्वी पर काफी दुर्लभ हैं क्योंकि वे केवल उन स्थानों पर मौजूद होते हैं जहां प्रकाश होता है लेकिन कोई ऑक्सीजन नहीं होता है। – आम तौर पर पृथ्वी में जहां कहीं भी प्रकाश होता है वहाँ कहीं भी प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन होता है

 वैज्ञानिकों द्वारा विश्लेषण करने वाले चट्टानों का अस्तित्व भी उल्लेखनीय है। पृथ्वी की सतह पर उजागर चट्टान का औसत जीवनकाल लगभग 200 मिलियन वर्ष है।

 इस अध्ययन से पूरे ब्रह्मांड में आदिम जीवन स्वरूप की उपस्थिति का सबूत मिलता है। ब्रह्मांड में उन्नत जीवन की उपस्थिति  की संभावना भी अधिक है। हालांकि वह शायद कम है।        – नेह

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झारखण्ड चुनाव-2019 की राजनीतिक बिसात

                                  वाल्टर कांडुलना 

झारखंड की वर्तमान बीजेपी की सरकार “विकास” को मुख्य मुद्दा कहती है। लेकिन प्रचार के स्तर पर मोदीजी के भाषण “मित्रो,आपको मंदिर चाहिए कि मस्जिद?” के उलट यहाँ झारखण्ड की राजनैतिक-जमीन को बीजेपी धर्म और धर्मान्तरण के पिच में तब्दील कर रही है। मतलब यहाँ धर्म के खेल के रणनीति और पैंतरे होंगे। यहाँ हिन्दू- मुसलमान के उलट सरना-ईसाई के मैच होंगे, बोलिंग होंगे और कैच होंगे। घर-वापसी और संस्कृति विरूपण की गुगलियाँ फेंकी जाएँगी।
फिलहाल सरना आदिवासी और सरना धर्म के बारे एक दो सिद्धांतों के बॉल फेंकी जा रही है। लेकिन चुनाव के नजदीक आते-आते सरना के बारे में नए-नए सिद्धांत परोसे जायेगे।
जैसे सरना आदिवासी लोग वनाश्रम और तपस्या के लिए जंगलों में गए ऋषियों की संतान ही है।

संभव है कुछ इस प्रकार के नए नारे भी फेंके जायेंगे :

सरना-सदान एक हैं।
सरना-सनातन एक हैं।
सरना-ईसाई में ब्रेक हैं।

फिलहाल धर्मान्तरण के छिट-पुट लेकिन आधारहीन, असिद्ध आरोपों के सिवाय फिजा में और कुछ नहीं है। पर चुनाव के पहले धमार्न्तरण से संबंधित मामले / उदाहरण से न्यूज़-पेपर पट जाएँगे। प्रचार माध्यमों, अखबारों, टीवी बहसों में इसकी बाढ़-सी आ जाएगी, जिसमें सभी प्रतिभागी सरकार के और बीजेपी के पक्षधर होंगे। झारखंड से प्रकाशित अखबारों का बीजेपी समर्थक होना कोई नई बात नहीं है, क्योंकि ये अखबार दिकु विचारधारा से ही ओतप्रोत हैं। झारखंड में आदिवासी और दिकु हितों में टकराव जगजाहिर है। इन अखबारों का आदिवासी हित के विरोध में खबरें प्रकाशित करने का लम्बा इतिहास भी रहा है।
इन सारी कयावदों का एक ही उद्देश्य है — किसी भी तरह ईसाई-आदिवासियों को सरना-आदिवासियों से अलग-थलग कर दो, ताकि इनके बीच उत्पन्न सामाजिक कडुवाहट से आदिवासी वोट एकजुट ना हो सके और आदिवासी वोट के बिखराव से फिर के बीजेपी और उसके समर्थन से राजनीति करने वालों की जीत सुनिश्चित की जा सके। चुनावी जीत में एक-एक वोट मायने रखता है। यदि आदिवासी वोट एकजुट हो जाएँ तो उन उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित है, जो पाँचवी अनुसूची के क्षेत्र में आदिवासी हितार्थ नीतियों की वकालत करते हैं और उसके लिए आदिवासी हित में नीतियाँ बनाने की वकालत करते हैं।

लेकिन आदिवासी समाज को सतही धार्मिक झगड़ों में उलझा कर उन्हें उनकी जड़ों से जुड़े हुए मुद्दों से अलग-थलग करने की चाल बड़ी सिद्दत से चली जा रही है। सच पूछ जाए तो सभी राजनीतिक पार्टियों ने झारखण्ड की ‘आदिवासी जनता’ की उपयोगिता को सिर्फ वोट देने तक ही सीमित कर दिया है, जिसे एक commodity की भांति बेचा-ख़रीदा जा सकता है। लेकिन यह सिर्फ वोट की नीति नहीं है, बल्कि सामाजिक समरसता में जिंदगी जीता आदिवासी समाज को हमेशा के लिए खंड-खंड करने की लम्बी षड़यंत्र का भी यह एक अहम हिस्सा है।
एक ओर बीजेपी और हिन्दुत्व पार्टियों के विकास की छद्म मुद्दे है, जो अब तक आदिवासियों के लिए विनाश ही साबित होते रहे हैं तो दूसरी ओर आदिवासियों के लिए क्या मुद्दे हैं ?
यह जानना जरूरी है कि झारखण्ड के क्षेत्रीय और बृहद आदिवासी समाज के जमीनी, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, भाषाई या समुचित विकास के मुद्दे क्या-क्या हैं ?

‘जल-जंगल-जमीन’ और ‘जान’ –
(क) इनसे सम्बंधित कानून हैं सीएनटी/एसपीटी कानून, झारखण्ड भूमि अधिग्रहण कानून 2017, पेसा कानून और इसी पेसा कानून पर बनने वाला पेसा विनियम तथा पूर् भारत के पाँचवी अनुसूची क्षेत्र में लागूयोग्य समता जजमेंट।
(ख) डोमिसाइल
(ग) आरक्षण
(घ) पांचवीं अनुसूची
आदिवासियों के ये सभी मुद्दे <संवैधानिक> मुद्दे हैं। याने अपने अधिकार या हक से सम्बंधित मुद्दे हैं, जिन्हें सरकार ने हड़प लिया है या कहें इसे छुपा दिया है और कभी भी नीतिगत मामलों पर इन विषयों पर कोई बात नहीं करती है। सरकार और बीजेपी के आदिवासी नेतागण भी कभी इन मुद्दों पर कोई बात नहीं करते हैं। मतलब वे भी आदिवासी हित के विरूद्ध कार्यशील हैं और इसका मुख्य कारण उनका व्यक्तिगत स्वार्थ है। वे सामाजिक हित से अधिक अपना व्यक्तिगत हित को ही सर्वोपरि रखते हैं। इसलिए उन्हें आदिवासी हित में कार्य करने वाले जन प्रतिनिधि नहीं कहा जा सकता है।
२०१९ के लोकसभा का चुनाव जीतने के लिए सरकार का जोर होगा : “सुशासन” पर। परन्तु सरकार अपने सुशासन के डंडा आदिवासी की “जान,” उसकी “आजीविका” और उसके “अस्तित्व” पर ही चलायगी।
हजारों सालों से आदिवासी समाज की मिल्कियत में रहने वाले आदिवासी भूमि को हड़पने के लिए सरकार ने पहले ही भूमि अधिग्रहण कानून बना लिया है और आदिवासियों के ग्राम सभा को निष्प्रभाव करने का इंतजाम कर लिया है।
इसलिए सरकार और सतारूढ़ पार्टी कभी भी आदिवासी हित के मुद्दों को नहीं उठाएगी। आदिवासियों का हित संविधान में दिए गए प्रावधानों के अंदर सुदृढ़ रूप से रूपांकित है। लेकिन वे इन रूपांकित प्रावधानों पर कभी भी बात नहीं करेगी। अपने आदिवासी विरोधी तत्व होने की बातों को छुपाने के लिए वे धर्म की बातों को खूब हवा देगी। क्योंकि धर्म की बातों से सरना आदिवासी भावुक हो जाते हैं और वे थोक के भाव में बीजेपी को वोट दे देते हैं। जबकि अक्सर देखा गया है कि बीजेपी के उम्मीदवारों और गैर बीजेपी पार्टियों के उम्मीदवारों में सामाजिक और धार्मिक रूप से कोई भी अंतर नहीं होता है।
बीजेपी एक दिकु मानसिकता की पार्टी है, जिसने आदिवासी मुख्यमंत्री की जगह रोजगार की खोज में एक भिन्न प्रांत से झारखंड आए व्यक्ति को मुख्यमंत्री बना कर आदिवासी राज्य के सिद्धांतों पर कुठराघात किया। बीजेपी सरकार ने पाँचवी अनुसूची में आदिवासियों को मिले संवैधानिक अधिकारों पर हमला किया। भूमि संबंधी ग्राम सभा के अधिकारों पर हथौड़ा चलाया। गैर झारखंडियों के नाम पर झारखंड के शिक्षा संस्थानों का नाम रखा। आदिवासी भूमि हड़पा। झारखंड के प्रशासनिक ढाँचों में बाहरी लोगों के लिए द्वार खोल दिया। आदिवासियों और स्थानीय निवासियों की जगह बाहरी लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाए। एक रूपये की दर पर नकली कंपनियों को झारखंड में जमीन दिया। समता जजमेंट, पेसा कानून पर नियमावली बनवाने से परहेज किया। ऐसे विषयों की लम्बी फेरहिस्त है, जिसके द्वारा आदिवासी समाज के असली विकास को कुंद करने की सारी कोशिशें की गईं।
२०१९ में होने वाला लोकसभा का चुनाव आदिवासियों के लिए बहुत अहम साबित होगा। इसके साथ विधानसभा का चुनाव भी अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। इन चुनावों में आदिवासियों के एक-एक मत को आदिवासी अस्तित्व को बचाने के लिए उपयोग किया जाना बहुत महत्वपूर्ण है। यदि दिकु पार्टियों का नारा आदिवासियों के लिए “विनाश” साबित हुए विकास के लिए होगा तो आदिवासियों का मुद्दा होगा : “स्वशासन” जिसे भारत के संविधान ने आदिवासियों को दिया है।
संघर्ष इन्ही विपरीत ध्रुवों वाले मुद्दों, विचारधारा और कार्यक्रम के बीच होगा।
सरकार अपने मुद्दे को अपने सारे संसाधनों के जरिये हाईलाइट करेगी। कुछ दिनों के लिए प्रचार और विज्ञापनों से सारा झारखण्ड स्वर्गिक और चांदनीमय बना दिया जायेगा।
लेकिन हमें और आपको अपने मुद्दों को, अपने अस्तित्व के विषय को आदिवासी के मन-शरीर में और घर-गाँव में डालना पड़ेगा।
सिर्फ फेसबुक में लिखकर अपने मन को तसल्ली देने से काम नहीं चलेगा। आज आदिवासी मीडिया की कमी के कारण आदिवासी समाज के शिक्षित वर्ग फेसबुक के माध्यम से ही अपने विचारों को व्यक्त करते हैं। लेकिन जमीन की लडाई लड़ने के लिए सोशल मीडिया से बाहर आकर जमीन पर भी उतरना पड़ेगा।
आप अपने बौद्धिक तर्क और ताकत के साथ सरकार की हर चाल को काटने के लिए तैयार रहें।

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मडुवा, मक्कई के व्यावसायिक दाने

                          महेश्वर मुंडा 

दो  साल पुरानी बात है । मैं एक महानगर  के Big bazar में गया । वहाँ मेरी नजर एक पॉकेट पर पड़ी । वह रागी  (मड़ुवा) के आटे की थी । मैंने उसे उठाया । 1/2 के.जी. का दाम 70 रुपया था।

दाम देख के मैं हैरान रह गया । बचपन में रागी से बनी रोटी खूब खाया । गाँव में सिर्फ हमारे घर में ही “जंती”/जांता था । “जंती” दाल , रागी , ज्वार , बाजरा आदि पीसने या टुकड़ा करने के काम में लाया जाता है । यह आटा चक्की का देसी और बेसिक रूप है।

गाँव में हर कोई हमारे घर ही रागी / ज्वारी पीसने आता था और जाते-जाते  एक कटोरी में आटा छोड़ जाता था।

1990 के समय स्कूल में भूगोल विषय की किताब में पढ़ा था कि रागी / मड़ुवा , ज्वार , बाजरा निम्न कोटि के अनाज हैं अर्थात् यह गरीबों का अनाज है और इसमें पौष्टिकता अधिक नहीं है। 

हैरान इसीलिए हुआ कि जब रागी निम्न कोटि का अनाज है, तो इसका दाम गेंहू के आटे से ज्यादा क्यों ? बहरहाल, दाम ज्यादा था, फिर भी बचपन याद आया तो मैंने दो किलो खरीदा और घर जाकर रोटी बनाया और खाया । Google मारा तो रागी के गुणों के बारे मिल गया ।

उसके बाद मैं दो महीने बाद Reliance के स्टोर्स में गया । वहाँ भी रागी मिला । दो-तीन बार वहाँ से रागी का आटा लिया तो वहाँ कांउटर  पर बिल बनाने वाली लड़की ने पूछा , “सर , ये क्या है और इसे कैसे पकाया जाता है ?”

Finger millet

अब हम मुद्दे पे आते हैं । आज हमारे आदिवासी लोगों की गरीबी या कहें बुरी हालत का एक कारण यह है कि बहुत सी चीजों के लिए आत्मनिर्भर हो सकते थे, उनके लिए भी हम बाजार पर निर्भर होना शुरू कर दिए हैं। अपने आस पास सहज रूप से उपलब्ध चीजों को छोड़ कर हम बाजार में बेची जाने वाली खाद्य वस्तुओं पर निर्भर होने लगे हैं । उदाहरण के तौर पर :
1 – रागी (Finger millet , मुण्‍डारी में कोदे )। इसकी खेती के लिए झारखंड की मिट्टी उपयुक्त है । इसकी खेती आसान भी है, कम बारिस में भी इसकी खेती संभव है। इसके पत्ते चट्टाई बनाने के काम भी आते हैं। फिर भी हम गेंहू के आटे खरीदने लगे । रागी से बने बिस्कुट / cookies के दाम देखिये –  250 ग्राम के 50 रुपए । सोचिए।

2 – मक्कई (जोंरा / maize ) – इसकी खेती भी धान की अपेक्षा आसान ही है । शहरों में “भूट्टा” खाने के लिए लोग दौड़ पड़ते हैं। 20-30 रुपया प्रति बूटा देते हैं। आप सभी मल्टीप्लेक्स जाते हैं। पोपकोर्न खाते हैं , मुट्टी भर पॉप्कॉर्न के लिए 100 रुपया देते हैं।
3 – हममे से बहुत से लोगों ने गोंदली भात खाया होगा । गोंदली को mundari में गुलूड़ू कहते हैं । यह फसल भी अब गायब सा हो गया । इ

सी के जैसे अन्य फसल “एड़ी / बेंडे ” भी अब इतिहास बन गए । शायद इसे ही Foxtail millet कहते हैं।

4 – Sorghum / ज्वारी की भी खेती कम होने लगी।
5 – Pearl Millet (बाजरा ) भी कम ही होता है , जबकि chotanagpur की मिट्टी में इन millets की खेती हो सकती है ।
6 – हम सब बाजार से आज 150 रुपया प्रति लिटर के हिसाब से सरसों या refined oil खरीदते हैं । जबकि छोटा नागपुर के इलाके में सरसों / सुरगुजा / सूरजमुखी की खेती हो सकती है।
7 – अरहर / मसूर / मूंग दाल आज कल 120 – 150 रु केजी खरीदते हैं । जबकि छोटानाग्पुर में कुलथी / उरद / रहड़ की खेती हो सकती हैं। 

ये सिर्फ उदाहरण हैं ।

मुख्य बात यही है कि हम आकर्षक विज्ञापनों के झांसे में क्यों आते हैं ? और अपने गाँव या घर के प्रोडक्टस / उत्पाद को छोड़कर महंगे दिकु उत्पाद के पीछे क्यों भागते हैं ? जिन फसलों की खेती हमारे खेतों में हो सकती है, उनकी खेती हम छोड़ क्यों रहे हैं ?

बाबा रामदेव टीवी में आके बोल देगा कि पतंजलि का केश तेल , cosmetic , सरसों तेल, आटा, चावल, बिस्कुट, मुल्तानी मिट्टी , beauty cream शुद्ध है और बेहतर है और हम यूँ ही मान लेते हैं !!””

I know many of us, among us, are very emotional and possessive over such Treasures of Jharkhand.
Its a good sign that many Jharkhandi know it and have a Love for Jharkhand for its Precious SOIL, and they love Jharkhand for its own sake.

सवाल है कि हम अपने झारखण्ड की ऐसी सभी अमूल्य और बेशकीमती माटी और यहाँ की सभी प्राकृतिक चीजों को बचाने/बचाये रखने के लिए क्या कर रहे हैं?

दुनिया सिर्फ भावनाओं से तो नहीं चलती। 

इसके लिए जागरूकता के साथ साथ आधुनिक कांसेप्ट के प्लानिंग, संगठन, प्रयास और मार्केटिंग की भी आवश्यकता है.

Can anyone lead in this particular field/entrepreneurship?

यह हम आदिवासियों के नयी पीढ़ी के मैनेजमेंट एक्सपर्ट्स, engineers की innovative सोच, administrative organisers और हमारे सोशल वैज्ञानिकों के लिए  यह एक बहुत बड़ी चुनौती है.

हम कब तक बंगलौर-बॉम्बे की ओर भागते रहेंगे और देशी-विदेशी कंपनियों की सेवा करते रहेंगे ?

यंग गाईज़ थिंक ओवर इट.

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नासा का एलियन शोध पर बड़ी घोषणा की संभावना

                 

केप्लर टेलिस्कोप

                                                                                                     नेह अर्जुन इंदवार

 

अंतरिक्ष में किसी ग्रह में एलियन (पृथ्वी के बाहर के प्राणी) की उपस्थिति संबंधी अपने शोध के क्रम में किसी बड़ी घोषणा करने की किसी संभावना से लगातार इंकार करने के बाद अब जाकर अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) ने प्रेस  नोट जारी करके 14 दिसंबर 2017 गुरूवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने की घोषणा की है। प्रेस कांफ्रेस को उन वैज्ञानिकों द्वारा संबोधित किया जाएगा, जो केप्लर स्पेस टेलीस्कोप (Kepler space telescope) द्वारा खोजे गए हजारों ग्रहों के अध्ययन में शामिल थे।

केप्लर अंतरिक्ष में तैनात एक वेधशाला है, जो नासा द्वारा दूसरे सितारों की परिक्रमा कर रहे पृथ्वी के आकार के ग्रहों की खोज के लिए  7 मार्च 2009 को अंतरिक्ष में  लॉन्च किया गया था । इसका नामकरण खगोल विज्ञानी जोहान्स केप्लर के नाम किया गया है। जोहान्स केप्लर का जन्म 27 दिसंबर, 1571 को हॉली रोमन साम्रज्य जर्मनी के डर स्टेड, वुर्टेमबर्ग में हुआ था। विज्ञान के प्रति अपनी झुकाव के कारण लुथेरन परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने फॉर्मूला ऑफ कॉनकॉर्ड पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था और जिसके कारण उन्हें लुथेरान चर्च के धर्म संस्कारों से बाहर कर दिया गया था। उन्होंने कैथोलिक धर्म को अपनाने से भी इंकार कर दिया था, जिसके कारण यूरोप में चले 30 वर्षीय धर्मयुद्ध में उनके पास आश्रय के लिए कोई जगह नहीं बची थी।

केप्लर टेलिस्कोप को आकाशगंगा के हमारे क्षेत्र के एक हिस्से का सर्वेक्षण करने के लिए तैयार किया गया है जो कि पृथ्वी-आकार के परग्रह (exoplanet) को या तारों के समीप हैविटेबल क्षेत्र में ग्रहों को खोजता है और अनुमान लगाता हैं कि आकाशगंगा में कितने करोड़ सितारों में ऐसे ग्रह हैं। केप्लर में एकमात्र वैज्ञानिक साधन एक फोटोमीटर है, जो एक निश्चित दृश्य के क्षेत्र में 145,000 से अधिक मुख्य क्रमित सितारों की चमक को निरंतर मॉनिटर करता है। इन आंकड़ों को पृथ्वी पर प्रसारित किया जाता है, फिर उनके मेजबान तारे के सामने पार करने वाले परग्रह के कारण प्रकाश में आए आवधिक धुंधलापन का पता लगाने के लिए विश्लेषण किया जाता है।

अब तक,  केपलर अंतरिक्ष दूरबीन ने 2500 से अधिक ग्रहों की सफलतापूर्वक पहचान की है और 2000 से भी ज्यादा का अभी अध्ययन किया जाना है । केप्लर ने कई ग्रहों को तथाकथित “गोल्डिलाक्स जोन” में अपने संबंधित मातृ स्टार का चक्कर लगाते हुए पाया है जो तरल पानी के प्रवाह के लिए उपयुक्त रूप से गर्म है।

प्रस्तावित प्रेस कॉन्फ्रेंस शायद उन ग्रहों में से किसी एक से संबंधित विशेष खोज की घोषणा करने के लिए किया जा सकता है।  

शोध के दौरान  दूरबीन (टेलिस्कोप) ने कई पृथ्वी-आकार के ग्रहों को रहने योग्य ज़ोन (habitable zone) पर पाया है, और शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि उनमें से कुछ में जीवन को समर्थन दे सकने लायक स्थिति होने की संभावना है।”

नासा के अधिकारियों के अनुसार, यह चौंकाने वाली खोज “Google द्वारा समर्थित मशीन सीखाई (Machine Learning) को उपयोग करते हुए की गई है।.”

नासा के वैज्ञानिक वर्तमान में नई वेब स्पेस टेलीस्कॉप (Webb space telescope) पर काम कर रहे हैं, जो 2019 में छोड़े जाने के लिए निर्धारित है। दूरबीन का मुख्य उद्देश्य अंतरिक्ष में पृथ्वी की तरह के परग्रहों की खोज करना है।

इस घोषणा के पूर्व,  जून 2017 के महीने में एक गुमनाम हैकिंग ग्रुप “एनोनिमस“ ने यू ट्यूब में अपने एक पोस्ट में संकेत दिया था कि पृथ्वी के बाहर जीवन की खोज संबंधी किसी शोध के निष्कर्ष पर नासा एक घोषणा करने वाली है। यू ट्यूब के उक्त वीडियों में किए गए दावे ने ऑनलाईन दुनिया में खलबली मचा दी थी। तब नासा के मुख्य वैज्ञानिक थॉमस ज़ुर्बुचेन ने 26 जून  2017 को  सोशल मीडिया ट्यूटर में इसका खंडन करते हुए @Dr_ThomasZ. के नाम से  लिखा था कि “कुछ रिपोर्टों के विपरीत, नासा से परग्रही जीवन के बारे में कोई घोषणा लंबित नहीं है।”

@Dr_ThomasZ. के नाम से ट्यूटर में दिए अपने एक दूसरे पोस्ट में उन्होंने लिखा था “क्या हम ब्रह्मांड में अकेले हैं ? हालांकि हम अभी तक नहीं जानते हैं,  लेकिन हमारे पास आगे बढ़ने वाले मिशन हैं जो कि मूलभूत सवालों का जवाब दे सकते हैं।”

गुमनाम ग्रुप द्वारा अपलोड ‘वीडियो, हैक किए गए दस्तावेजों पर पूर्णतः केंद्रित नहीं था, बल्कि अमेरिकी कांग्रेस (प्रतिनिधि सभा)  की “विज्ञान, अंतरिक्ष, और प्रौद्योगिकी उप समिति”  की सुनवाई के दौरान ज़ुर्बुचेन द्वारा अप्रैल 2017 में दी गई गवाही पर आधारित थी। https://science.house.gov/legislation/hearings/full-committee-hearing-advances-search-life   12-मिनट के उक्त वीडियो में कुछ अन्य विषयों पर भी कामेंट था, जिनमें स्टार ट्रैपिस्ट -1 (Star TRAPPIST-1) के चारों ओर चक्कर काटते धरती के आकार के सात ग्रह, कई यूएफओ दर्शन, शनि ग्रह के चंद्रमा एन्सेलेडस के दक्षिण ध्रुव के झरनों में हाईड्रोजन की खोज, बृहस्पति के उपग्रह यूरोपा से निकलते जल वाष्प के टुकड़े आदि घटनाएँ भी शामिल थीं। 

TRAPPIST-1 के चक्कर काटते सात ग्रह

अब नासा ने महत्वपूर्ण शोध निष्कर्ष को दुनिया के सामने रखने की घोषणा कर दी है तो उसका इंतजार किया जाए। लेकिन यूएफओ पर लगातार निगाहें रखने वाले ग्रुप्स के कई महत्वपूर्ण खोजों को नासा द्वारा लगातार साधारण और आधारहीन कहने के इतिहास के कारण कोई निश्चित निष्कर्ष की घोषणा की जाएगी, इसकी कम ही आशा रखी जा रही है। ऐसे ग्रुप लगातार यह आरोप लगाते रहे हैं कि विश्व सरकार के हितों का पोषण करने के लिए नासा महत्वपूर्ण शोध के निष्कर्षों पर पर्दा डालने का काम करता आ रहा है, जो मानवीय सभ्यता के वैज्ञानिक विकास में बाधक बन रहे हैं।  

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पारसी सोना खदान की लीज रद्द नहीं हुई तो होगा नेशनल हाईवे जाम

नेह अर्जुन इंदवार 

दो वर्ष पूर्व छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार-भाटापाड़ा जिले में स्थित बाघमारा (सोना खान) की नीलामी के बाद झारखण्ड के तमाड़ स्थित परासी सोनाखान की नीलामी ने आदिवासी क्षेत्रों में खलबली मचा दी है। संविधान के पाँचवी अनुसूची के प्रशासनिक क्षेत्रों में स्थित इन बहुमूल्य खानों की नीलामी में कई कानूनों के खुल्लमखुला उल्लंघन का आरोप लग रहे हैं। झारखंड के आदिवासी  मुद्दों को प्रमुखता से उठाने वाले राजनैतिक पार्टियों ने सरकार से मांग की है कि तमाड़ के परासी सोनाखान की नीलामी को रद्द किया जाए। ऐसा नहीं करने पर वे वृहद स्तर पर आंदोलन करने के लिए तैयार हैं।  

झारखण्ड, ओडिसा, छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में देश के अधिकतर प्राकृतिक खनिज पदार्थ मिलते हैं। इन राज्यों के अधिकतर जिले संविधान की धारा 244 (1) अंतर्गत अनुसूचित जिले घोषित किए गए हैं और इन इलाकों में पेसा कानून का पालन करने की अपेक्षा की जाती है। पेसा कानून में आदिवासियों के ग्राम सभा को कई अधिकार हासिल है और आदिवासी इलाकों में खनन कार्य के लिए ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य है। इसी कानूनी धाराओं  तथा वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने ओडिसा के नियमगिरी पहाड़ों पर ग्राम सभा की अनुमति लेने का आदेश दिया था कि ग्राम सभा का आयोजन करके स्थानीय निवासियों से यह पूछा जाए कि वे खनन चाहते हैं या नहीं।   

15 सालों से जियोलॉजिकल विभाग झारखण्ड के विभिन्न जिलों में बहुमूल्य खनिज पदार्थों के लिए सर्वे कर रहा था । उसके अनुसार झारखण्ड के तमाड़ क्षेत्र में  7.47 मिलियन टन सोने के भण्डार मौजूद है। यहाँ की मिट्टी में प्रति टन 0.5 ग्राम सोना मिल सकते हैं।

वहीं सिंहभूम के आनंदपुर तालुका के पहाड़डीहा, रूंगीकोचा और टेंटाडीह गाँवों में 1.6 मिलियन टन सोने का भंडार है जिसकी मिट्टी में प्रति टन 12.2 ग्राम बहुमूल्य धातु मिलने की बात कही गई है।

पहाड़डीहा क्षेत्र में कई अन्य बहुमूल्य पदार्थ भी मौजूद है, जिनमें अनुमान के अनुसार चाँदी (1.16 टन), ताँबा (232.4 टन), शीशा  (581 टन), जिंक (1,859 टन), निकल  (2,905 टन) और क्वार्ज (1.16 मिलियन टन) मौजूद  है।

छत्तीसगढ़ के बाघमारा में स्थित सोने खान की नीलामी प्रक्रिया में लंदन स्थित कारपोरेट घराना वेदांता कंपनी के हाथ लगी थी। जिसकी नीलामी में कोलकाता की रूंगटा ब्रादर्स ने भी भाग लिया था। बाघमारा की नीलामी में छत्तीसगढ़ की दो लाख से भी कम की पूँजी की एक स्थानीय कंपनी भी शामिल हुई थी।

झारखण्ड में पेसा कानून का अनदेखा करके ग्राम सभा की अनुमति प्राप्त किए बिना परासी सोने के भंडार की नीलामी किए जाने पर बवाल मचा हुआ है। समझा जाता है कि सोने की खनन से बड़ी संख्या में गाँववासी विस्थापित होंगे।  आदिवासी जन परिषद ने परासी सोना खान के आवंटन के विरोध में मंगलवार  5 दिसंबर 2017 को राँची में राजभवन के समक्ष धरना आयोजित  किया था। परासी में खनन से विस्थापित होने वाले किसानों की एक बड़ी संख्या इस धरने में शामिल थी और वे नीलामी रद्द नहीं होने पर राँची जमशेदपुर राजपथ को जाम करने के साथ झारखंड बंद करने की घोषणा भी की है।

आदिवासी हितों की लड़ाई लड़ने वाले जन संगठन राज्य में समता जजमेंट लागू करने की मांग करu रहे हैं और इसके लिए जनसंघर्ष करने की घोषणा की हैॆ। उल्लेखनीय है कि विभिन्न परियोजनाओं के कारण देश में बड़ी संख्या में आदिवासी विस्थापित हुए हैं और सरकार द्वारा उनका पुनर्वास ढंग से नहीं किए जाने के कारण खाते पीते किसान विपन्न जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो जाते है। कड़वे अनुभव से पीड़ित आदिवासी  अपने इलाके में होने वाले किसी भी संभावित विस्थापित से भयभीत हो जाते हैं।   

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विश्व सरकारों के उड़न तश्तरी दर्शन

                                नेह अर्जुन इंदवार

क्या आप एलियन में विश्वास करते हैं ? प्राप्त विश्वसनीय रिपोर्टों के अनुसार यूनाइटेड किंगडम (यू.के.) की सरकार को एलियन पर निश्चित रूप से विश्वास है, और वे नहीं चाहते कि आम जनता इसके बारे में जानें।

2010 में सार्वजनिक रूप से जारी किए गए फाइलों में दर्ज विवरणों के अनुसार यू.के. सरकार यूएफओ (अज्ञात उड़ंत वस्तु या आम भाषा मेंं उड़न तश्तरी)  दिखाई देने के बारे में न केवल संदेह करती थी वरन वे उन्हें बहुत गंभीरता से ले रही थी।  बीबीसी के मुताबिक, खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों को मिला कर बनाई गई एक समिति के वरिष्ठ खुफिया अधिकरीगण यूएफओ दर्शन पर तैयार साप्ताहिक रिपोर्टस् के साथ चर्चा के लिए नियमित बैठकें किया करते थे। सबसे दिलचस्प बात यह है कि प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल का आग्रह था कि देश की आबादी को सामूहिक रूप से आतांकित होने से बचाने के लिए यूएफओ की पूरी जांच को छुपाया जाना चाहिए।

 

बीबीसी द्वारा संदर्भित फाइलों में हजारों पृष्ठ हैं, जिनमें से कुछ रिकार्डस् (फाईलों) पर दावा किया गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ड्वाइट डी आईजेनव्हर से अपनी मुलाकात के दौरान चर्चिल ने यूएफओ दर्शन को छुपाने (कवर-अप)  करने का आदेश दिया था। इन हजारों फाईलों में 1995 से लेकर 2003 तक की रिपोर्ट में ड्रॉइंग, रिपोर्ट, पत्र और चित्र के साथ सार्वजनिक पूछताछ और संसदीय कार्यवाही के कागजात भी शामिल हैं। दिलचस्प और संभवतया  आश्चर्यजनक रूप से, बीबीसी के अनुसार टेलीविजन शो “द एक्स फाइल” की लोकप्रियता के कारण, 1996 में यूएफओ के दर्शन की खबरें बहुत बढ़ी । उस समय के आसपास, यूएफओ के दर्शन हर हफ्ते एक बार होना आम बात थी। उन दिनों यू.के. में कहा जा रहा था कि सभी यूएफओ मुठभेड़ों की जांच के लिए मुलडर और स्कॉलि (टेलिविजन शो “द एक्स फाइल” के अनुसंधानकर्ता पात्र) को यू. के. में बुलाया जाना चाहिए।  

रिकार्ड के अनुसार यह भी दावा किया गया था कि पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतें कहीं आगे न बढ़ जाएँ, इसलिए सोवियत संघ ने यूएफओ की जांच के लिए संसाधनों का आबंटन भी किया था, यह भी दावा किया गया था कि जरूरत होने पर वे यूएफओ के साथ बातचीत भी कर सकते हैं।

ऐतिहासिक रूप से रूस के क्षेत्र यूएफओ दर्शन से भरा हुआ है, लेकिन रिपोर्टों को गुप्त रखा गया है और सरकार इसके बारे में बात नहीं करती। नियमित रूप से लोग इसके बारे में बात करते थे, हालांकि-जैसे 1978 में, पेट्रोज़ावोडस्क में हजारों लोगों ने कुछ घंटों तक लगातार यूएफओ को अपनी आंखों से देखा था। सीआईए ने स्वाभाविक रूप से रूस की यूएफओ समस्याएं दर्ज की हैं।

                          वाशिंगटन में सिनेटरों की यूएफओ सुनवाई

29 अप्रैल 2013 को संयुक्त राज्य अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन के नेशनल प्रेस क्लब में यूएफओ षड्यंत्र सुनवाई (UFO Conspiracy Hearing) का आयोजन किया गया था, जिसमें अमेरिकी कांग्रेस के पांच पूर्व सदस्यों, एक पूर्व सीनेटर को इस घटना को गंभीरता और विश्वसनीयता देने के लिए बुलाया गया था, जिनके लिए प्रत्येक प्रतिनिधि को 20,000 डॉलर का भुगतान किया गया । सुनवाई में अमेरिकी सरकार से दशकों से एलियनों के द्वारा पृथ्वी पर किए जा रहे यात्रा से संबंधित संभावित गुप्त दस्तावेजों को सार्वजनिक करने की मांग की गई।

पूर्व राजनेताओं की समिति के समक्ष गवाही देने के लिए विशेषज्ञ गवाहों को शपथ दिलायी गई और उनके बयान दर्ज किए गए। कार्यक्रम को यूएफओ पर नजर रखने वाले दुनिया भर के उत्सुक लोगों के लिए लाइव वीडियो लिंक के माध्यम से और एक साथ स्पैनिश, अरबी, हिंदी, जापानी और मंदारिन अनुवादकों के समूह द्वारा कवरेज प्रदान किए गए थे। यहां तक कि मुस्लिम नेता लुई फर्राखान ने भी एक दर्जन सुरक्षा गार्ड के साथ सुनवाई स्थल का दौरा किया।

लगभग 100 प्रतिनिधियों से भरा उद्घाटन सत्र में चर्चा करने वाले लोगों में से किसी ने भी इस बात से इंकार नहीं किया कि एलियन के पृथ्वी यात्राओं को सरकारों द्वारा आम जनता से छुपायी जा रही है।

2011 में, व्हाईट हाउस ने इस विषय पर दायर एक याचिका पर औपचारिक रूप से जवाब में कहा था कि इस तरह की कोई कवर-अप नहीं की जा रही है। ” ऐसा कोई भी प्रमाण नहीं है कि हमारे ग्रह के बाहर कोई भी जीवन मौजूद है, या उपस्थित किसी परग्रही प्राणी से संपर्क किया गया है, या मानव जाति के किसी भी सदस्य उससे जुड़े हुए हैं,” व्हाइट हाउस ने जवाब दिया। “इसके अलावा, यह सुझाव देने के लिए कोई विश्वसनीय जानकारी नहीं है कि किसी भी सबूत को जनता की आंखों से छिपाया जा रहा है।”

लेकिन सरकार के उस आधिकारिक हस्तक्षेप बयान ने केवल उन लोगों के बीच नाराजगी को बढ़ाने का कार्य किया, जो एलियंस पर एक विशाल सरकारी साजिश में विश्वास करते हैं।

एक गवाह रिचर्ड डोलन, जिसने इस विषय पर कई पुस्तकें लिखी हैं, के अनुसार दो प्रमुख कांस्पाईरेसी  वेबसाइट द्वारा हर साल 10,000 से अधिक अलग-अलग यूएफओ देखने की सूचना दी जाती है। लिंडा मॉलटन होवे, एक पूर्व वृत्तचित्र निर्माता  ने कहा कि एलियंस “डायनासोर से पहले” से ही पृथ्वी पर आते रहे हैं। उन्होंने कहा, “हम ऐसे विकसित प्रौद्योगिकी वाले एलियन के बारे बात कर रहे हैं जो “अंतरिक्ष और समय” को मन चाहे रूप से मोड़ लेते हैं।

जिन नेताओं ने समिति की स्थापना की,  उन्हें सामने आने वाले गवाहों की जांच करने के लिए केवल पांच मिनट दिए गए। लेकिन उन्होंने अपनी मौजूदगी और $ 20,000 “मानदेय” का बचाव किया। 

कैलिफोर्निया के डेमोक्रेट सदस्य लिन वूल्सी ने कहा, “अगर मुझे लगता है कि यह मेरी प्रतिष्ठा के लिए हानिकारक है, तो मैं नहीं आया होता।” “मैं यहां हूं क्योंकि मुझे पारदर्शिता में विश्वास है।

मैरीलैंड की टी पार्टी रिपब्लिकन के रॉस्को बर्टलेट, जो दस बार कांग्रेस की सदस्य रहे और जिन्होंने सदन की सशस्त्र सेवाओं के उप-समिति की अध्यक्षता की, ने कहा, “एलियन बाइबिल विरोधी नहीं हैं।  सीनेटर माइक बजेल, जो 22 साल के लिए अलास्का का प्रतिनिधित्व करने वाला डेमोक्रेट थे, ने कहा: “यह सोचना मानव अहंकार की पराकाष्टा होगी कि ब्रह्मांड में एकमात्र संवेदनशील प्राणी इंसान हैं। 

शीतयुद्ध के अंत के बाद भी दृढ़ता  से कवर-अप जारी रहने के लिए गवाहों ने कई कारण दिए। भौतिकी में दो डिग्री रखने वाले स्टैंटन फ्राइडमैन ने कहा: “अगर पोप और इंग्लैंड की महारानी  कुछ ऐसी घोषणा कर दे, तो क्या होगा ? युवा लोग खुद को टेरैन के रूप में देखेंगे और राष्ट्रों के प्रति अपनी निष्ठा खो देंगे।

केवल एक राजनीतिज्ञ, डेमोक्रेट कैरोलिन किलपेट्रिक मिशिगन, ने, “छद्म सुनवाई” की प्रक्रिया के बारे में शिकायत की, उन्होंने पूछा कि समिति ने पहले से क्यों लिखित सबूत प्राप्त नहीं की ?

                                                               

                          अमेरिकी  राष्ट्रपति का एलियंस मुलाकातें 

एंथनी बॉन्ड द्वारा लिखित और डेली मेल ऑनलाइन में 15 फरवरी 2012 को प्रकाशित एक आलेख के अनुसार पेंटागन के एक पूर्व परामर्शदाता (former Pentagon consultant) ने दावा किया है कि अमेरिकी  राष्ट्रपति ड्वाइट डी आईजेनव्हर ने अंतरीक्ष से आए एलियंस के साथ तीन गुप्त बैठकों की थीं।  

उक्त दावे के अनुसार  पूर्व-राष्ट्रपति ने तीन अलग-अलग अवसरों पर न्यू मैक्सिको एयर फोर्स बेस में एलियंस (अंतरिक्ष से आए प्राणियों) से मिले थे ।  राष्ट्रपति ड्वाइट डी आईजेनव्हर और एफबीआई के अधिकारियों ने ‘टेलिपाथिक संदेश’ भेजकर बैठकों का आयोजन किया था।

सार्वजनिक व्याख्याता और स्थापित लेखक तिमोथी गुड के अनुसार 1954 में संयुक्त राज्य अमेरिका के 34 वें राष्ट्रपति, न्यू मैक्सिको में एक दूरदराज के हवाई अड्डे पर एलियंस से मिले थे, कहा गया है कि राष्ट्रपति ड्वाइट डी आईजेनव्हर और अन्य एफबीआई अधिकारियों ने ‘टेलिपाथिक संदेश’ भेजकर अंतरिक्ष प्राणियों के साथ बैठक का आयोजन किया था।

हालांकि साजिश सिद्धांतकारों (Conspiracy theorists) ने कुछ महीनों तक ये बातें कहते रहे थे, कि कमांडर-इन-चीफ और दूसरे ग्रह के लोगों के बीच की बैठकें हुई थीं। लेकिन आधिकारिक रूप से इसकी पुष्टि किसी ने नहीं की थी, और इसे तब आधारहीन अफवाह माना गया जा रहा था। 

लेकिन एलिएंस मिटिंग के बारे  किसी प्रमुख अकादमिक द्वारा सार्वजनिक रूप से दावा (पुष्टि) करने वाले  पहले व्यक्ति अमेरिकी कांग्रेस और पेंटागन के पूर्व परामर्शदाता श्री तिमोथी गुड बने।

बीबीसी 2 के पत्रकार फ्रैंक स्किनर के करेंट अफेयर (टीवी) कार्यक्रम  “Opinionated” में बोलते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया भर में अनेक सरकारें कई दशकों से एलियंस के साथ नियमित संपर्क में रही है।

उन्होंने कहा, ‘एलियंस ने पूरे विश्व में हर तरह के हजारों लोगों के साथ औपचारिक और अनौपचारिक संपर्क किया है।’

यह पूछे जाने पर कि क्यों एलियंस बराक ओबामा की तरह किसी ‘महत्वपूर्ण’ (व्यक्ति) के पास नहीं जाते, उन्होंने कहा: ‘ठीक है, मैं आपको निश्चित रूप में बता सकता हूं कि 1954 में राष्ट्रपति ड्वाइट डी आईजेनव्हर ने एलियंस के साथ तीन मुठभेड़/मुलाकात (three encounters), की थी, जो न्यू मैक्सिको के हॉलीमन एयर फोर्स बेस सहित कुछ अन्य एयर फोर्स बेस में हुई थी।’ उन्होंने कहा कि वहाँ ‘कई गवाह’ मौजूद थे।

1953 से 1961 तक राष्ट्रपति रहे ड्वाइट डी आईजेनव्हर, को अन्य ग्रहों पर जीवन होने के एक मजबूत विश्वासी के रूप में जाना जाता है।

संयुक्त राज्य सेना के पूर्व पांच सितारा (Five starred) जनरल, जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यूरोप में मित्र देशों की सेना (ओं) की कमान संभाली थी, वह भी यू.एस. अंतरिक्ष कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक था। माना जा रहा है कि वे ‘’मिटिंग” में गवाह के रूप में मौजूद रहे होंगे।

कहा जाता है कि परग्रही प्राणियों के साथ राष्ट्रपति की बैठक तब हुई थी, जब अधिकारियों को बताया गया था कि वे फरवरी 1954 में कैलिफोर्निया के पाम स्प्रिंग्स में छुट्टी पर थे।

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Eisenhower

प्रारंभिक बैठक ‘नॉर्डिक’ सदृष्य रंग रूप वाले एलियनों के साथ हुई थी, लेकिन अंततः ‘ग्रे’ एलियन नामक एक प्रजाति के साथ एग्रीमेंट ‘हस्ताक्षरित’ किया गया था।

श्री गुड ने आगे कहा ‘हम जानते हैं कि 90 प्रतिशत तक के सभी यूएफओ रिपोर्टस् को पारंपरिक शब्दों में समझाया जा सकता है। हालांकि, मैं कहूंगा कि दुनिया भर में करोड़ों लोगों ने वास्तव में असली चीज़ देखी है।’

2010 में रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी किए गए वर्गीकृत दस्तावेजों के मुताबिक, विंस्टन चर्चिल ने यूएफओ की सूचनाओं और विवरणों को गुप्त रखा जाने का आदेश दिया था।

कहा जाता है कि विंस्टन चर्चिल ने ड्वाइट डी आईजेनव्हर के साथ “यूएफओ दर्शन से कैसे निपटा जाए” विषय पर चर्चा की थी।

 

                रूसी प्रधान मंत्री ने बुद्धिमान परग्रही जीवन की मौजूदगी की पुष्टि की

2008 से 2012 तक रूस के तृतीय राष्ट्रपति रहे और वर्तमान में रूस के प्रधानमंत्री दिमित्री मेडवेडेव ने एक साक्षात्कार में कहा था– मैं आपको प्रथम और अंतिम बार बताता हूँ – राष्ट्रपति के पास एक परमाणु सूटकेस के साथ एक फ़ोल्डर होता है, जो अति गोपनीय है। इसे रूसी गुप्तचर सेवा के द्वारा तैयार किया जाता है। यह हमारे देश में एलियंस के नियंत्रण की देखरेख  करता है। राष्ट्रपति के सेवाकाल पूरे होने के बाद एक छोटे से परमाणु सूटकेस और दो फ़ोल्डर्स को नए राष्ट्रपति को स्थानांतरित कर दिया जाता है। कितने एलिएंस हमारे बीच हैं, यह मैं कह नहीं सकता क्योंकि इससे भारी अफरा तफरी शुरू हो सकती है।

उन्होंने एक रूसी वृत्तचित्र का भी जिक्र किया और कहा यदि इस आप विषय में रुचि रखते हैं तो “द मेन इन ब्लैक” देखें। मैं हॉलीवुड फिल्म “द मेन इन ब्लैक” की बात नहीं कर रहा हूँ।

इन बयानों से क्या निकर्ष निकाल सकते हैं?

तत्कालीन रूसी राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेडेव ने कई दिलचस्प टिप्पणियां की थी,  उनमें से एक तथ्य यह है कि राष्ट्रपति को अपने कार्यकाल की शुरुआत में हमारे ग्रह पर मौजूदगी रखने वाले एलिएंस प्राणियों पर वर्गीकृत जानकारी दी जाती  है। इस से हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि इस विषय से निपटना राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री की जिम्मेदारी और काम नहीं हैं। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री केवल देशों के “गुप्त सेवा” से ब्रीफिंग प्राप्त करते हैं। दिलचस्प है,  मेदवेडेव 2008 से 2012 तक राष्ट्रपति रहे,  मेदवेदेव से पूर्व, 2000-2008 तक व्लादिमीर पुतिन राष्ट्रपति थे। इसलिए उन्हें कुछ समय से लिए गुप्त बातों के बारे खूब ‘पता’  रहा होगा। अधिक संभावना है कि प्रमुख ‘गुप्तचर सेवा’ समूहों के प्रमुख, जो एजेंसियों में अपने पूरे कॅरिअर के दौरान कार्यतर रहते हैं, वे राष्ट्रपति की तुलना में अधिक जानकार होंगे, क्योंकि राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तो बहुत कम अवधि के लिए कार्यरत होते हैं।

सीआईए के भूतपूर्व जासूस एडवर्ड जोसेफ स्नोडेन ने संयुक्त राज्य अमेरिका से भागने के बाद अपने एक प्रथम सार्वजनिक खुलासे में कहा था कि अमेरिका में ब्लैक बजट कार्यक्रम का संचालन प्रशासन के शक्तिशाली लोग करते हैं और वे किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होते हैं।  इस खुलासे से उच्च पदों पर विराजे स्थायी अधिकारियों के अत्यंत प्रभावशाली होने का अनुमान लगाया गया। कनाडा के पूर्व रक्षा मंत्री, पॉल हेलिअर ने काले बजट परियोजनाओं में जाने वाले अरबों डॉलर का संकेत दिया था जिसमें कांग्रेस और राष्ट्रपति को जानबूझकर अंधेरे में रखा गया था।

गुप्त दस्तावेजों तक पहुँच रखने वाले प्रभावशाली और शक्तिशाली व्यक्तियों के ये बयान जिसमें अमेरिकी नेशनल सिक्युरिटी एजेंसी, रूसी नेवी भी शामिल हैं, हजारों यूएफओ फाइलों और दस्तावेजों के सार्वजनिक होने के बाद आए हैं।

एक और दिलचस्प टिप्पणी यह ​​थी कि प्रधान मंत्री मेदवेडेव ने इस तथ्य का संकेत दिया था कि राष्ट्रपति को  परमाणु सूटकेस प्राप्त होता है। कई ऐसे सबूत भी हैं जो दिखाता है कि यूएफओ से आने वाले एलिएंस दुनिया भर में कई वर्षों तक परमाणु मिसाइलों को निष्क्रिय करते रहे हैं और व्यापक रूप से छिड़ने वाले किसी भी भयानक परमाणु युद्ध को टालते रहे हैं।

सबसे अंत में लेकिन बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि मेदवेडेव बताते हैं कि गोपनीयता का एक कारण यह है कि एलियंस के बारे बातें सार्वजनिक होने पर दुनिया में आतंक फैल सकता है। इसीलिए जिम्मेदारी से बंधे लोग यूएफओ और परग्रही प्राणियों के बारे गोपनीयता बरकरार रखना चाहते है क्योंकि वे आबादी को डरना नहीं चाहते हैं।

दिमित्री मेडवेडेव

दूसरी तरफ, बहुत से ऐसे लोग हैं जो यूएफओ की गोपनीयता के पीछे के भय के तर्क के परे जा कर कहते हैं कि इनमें से कुछ चिंता तकनीकी प्रभाव, एलिएंस के पृथ्वी में आने  और मानवता को नए अवधारणाओं के प्रति सोचने के लिए समय देने आदि कई कारण शामिल  हैं। यह भी कहा जाता है धरती पर हमारे वर्तमान सामाजिक, धार्मिक ‘सत्ता संरचना’ या वित्तीय और आर्थिक ढांचा को खतरा हो जाएगा और मौजूदा वैश्विक मुद्रा, व्यापार, राजनैतिक संबंध, आर्थिक और शासन ढांचे से बेपनाह लाभ लेने वाले सत्ता, प्रतिष्ठान और समाज बर्बाद हो जाएँगे और समाज में भारी उथलपुथल मच जाएगी।

लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि बदलाव के लिए सभ्यता के पास चुनाव करने का समय आ गया है। हमारी पृथ्वी पर भारी पर्यावरण असंतुलन,  प्रदूषण, क्षुद्र ग्रहों से टक्कर, परमाणु युद्ध आदि कई खतरे मंडरा रहे हैं, जिनसे पृथ्वी के नष्ट हो जाने और मानवीय सभ्यता तथा खरबों अन्य प्राणियों की वजूद खत्म हो जाने का डर बढ़ गया है। विकास की प्रक्रिया से गुजर रही सभ्यता को किसी दयालु एलियंस सभ्यता से हमारी मानवीय वजूद और खरबों अन्य प्राणियों  बचाने के लिए एकमत होने की जरूरत आन पड़ी है।।

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क्या है सरना धर्म ?

                                                नेह अर्जुन इंदवार
सरना धर्म क्या है ? यह दूसरे धर्मों से किन मायनों में जुदा है ? इसका केन्द्रीय आदर्श और दर्शन क्या है ?

अक्सर इस तरह के सवाल पूछे जाते हैं। कई सवाल सचमुच जिज्ञाषा के पुट लिए होते हैं और कई बार इसे शरारती अंदाज में भी पूछा जाता है, कि गोया तुम्हारा तो कोई धर्मग्रंथ ही नहीं है, इसे कैसे धर्म का नाम देते हो ? लब्बोलुआब यह होता है कि इसकी तुलना और कसौटी किन्हीं किताब पर आधारित धर्मों और उसकी कट्टरता के सदृष्य बिन्दुवार की जाए।

सच कहा जाए तो सरना एक धर्म से अधिक आदिवासियों के जीने की पद्धति है जिसमें लोक व्यवहार के साथ आध्यमिकता या अध्यात्म भी जुडा हुआ है। आत्म और पर-आत्मा या परम-आत्म का आवधारणा और इसका आराधना लोक जीवन से इतर न होकर लोक और सामाजिक जीवन का ही एक भाग है। धर्म यहॉं लोक जीवन से अलग और विशेष स्वरूप और स्थल में आयोजित कर्मकांडीय गतिविधियों के उलट जीवन के हर क्षेत्र में सामान्य गतिविधियों में गुंफित रहता है।

सरना अनुगामी प्राकृतिक को ज्यों के त्यों पूजन करता है। वह प्राकृतिक से अलग उसके किसी कृत्रिम स्वरूप या प्रतीक का निर्माण नहीं करता है। वह घर के चुल्हा, बैल, मुर्गी, पेड, खेत खलिहान, चॉंद और सूरज सहित सम्पूर्ण प्राकृतिक प्रतीकों का उसके प्राकृतिक रूप में ही पूजन करता है। वह पेड काटने के पूर्व पेड से क्षमा याचना करता है। गाय बैल बकरियों को जीवन सहचार्य होने के लिए धन्यवाद देता है। पूरखों को निरंतर मार्ग दर्शन और आशीर्बाद देने के लिए भोजन करने, पानी पीने के पूर्व उनका हिस्सा भूमि पर गिरा कर देते हैं। धरती माता को प्रणाम करने के बाद ही खेतीबारी के कार्य शुरू करते हैं। उनके लिए खेत-खलिहान उत्पादन या आय प्राप्त करने का महज एक साधन नहीं है, बल्कि वह उसे अपने परिवार और समाज का अविभाज्य/अपरिहार्य  (inalienable) अंग मानता है। खेतों की पूजा और आराधना करना सरना के लिए एक अनिवार्य पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्य और उतरदायित्व है।

आदिवासियों ने सदियों से अपने धर्म को कोई नाम नहीं दिया था। नामकरण तो तब अनिवार्य हो जाता है, जब एक से अधिक चीजें एक जगह होंती हैं और उसमें अंतर करने के लिए दोनों के नाम अलग-अलग किए जाते हैं। आदिवासी इलाकों में हजारों साल से दूसरा कोई धर्म नहीं था, इसलिए जब दूसरे धर्म इन इलाकों में आए तो पहचान के लिए एक नाम रखना जरूरी हो गया और पूजा स्थल (सरना स्थल) के आधार पर प्रकति पूजा पद्धति को सरना धर्म का नाम दे दिया गया। यह बीसवीं सदी के उस काल में हुआ जब प्रकृति का आराधना करने वालों के लिए एक नाम रखना जरूरी हो गया था, क्योंकि तब अनेक धर्म या आराधरा पद्धति का आगमन आदिवासी समाज में हो गया था। इसलिए इस नाम के साथ किसी प्राचीनता का शोध करना उचित नहीं है।

सरना धर्म में पूजन पद्धति की परंपरा प्राचीन काल से है, लेकिन यह कहीं भी रूढ नहीं है। इसका एक कारण समाज में धर्म के प्रति कट्टरता की भावना का लोप होना है। कोई भी सरना लोक और परलोक के प्रतीकों में से किसी का भी पूजन कर सकता है और किसी का भी न करे तो भी वह सरना ही होता है। कोई किसी एक पेड की पूजा करता है तो जरूरी नहीं कि दूसरा भी उसी पेड की पूजा करे। दिलचस्प और ध्यान देने वाली बात तो यह है कि जो आज एक विशेष पेड़ की पूजा कर रहा है जरूरी नहीं कि वह कल भी उसी पेड की पूजा करे। यहॉं पेड किसी मंदिर, मस्जिद या चर्च की तरह रूढ़ नहीं है। वह तो विराट प्रकृति का खरबों प्रतीक में से सिर्फ एक प्रतीक है और हर पेड़ प्रकृति का जीवंत -प्रतिनिधि-प्रतीक है, इसलिए किसी एक पेड़ को रूढ़ होकर पूजन करने का कोई मतलब नहीं। अमूर्त शक्ति की उपासना के लिए एक मूर्त प्रतीक की सिर्फ आवश्यकता-वस किसी पेड़ का पूजन करता है।

सरना धर्म किसी धार्मिक ग्रंथ और किताब का मोहताज नहीं है। किताब आधारित धर्म में अनुगामी को नियमों के खूँटी से बॉधा गया होता है। जहॉं अनुगामी एक सीमित दायरे में अपने धर्म की प्रैक्टिस करता है। वह दायरे से बाहर नहीं जा सकता है। जहॉं वर्जनाऍं हैं, सीमा है, खास क्रिया क्रमों को करने के खास नियम और विधियॉं हैं, जिसका प्रशिक्षण खास तरीके से दिया जाता है। किताब में लिखित सिद्धांतों, नियमों की रखवाली करने वाले प्रशिक्षित धार्मिक सैनिकों की बाड़ होती है, जो उसके अनुयायियों को अपने धर्म में चिपका कर रखने की वह सारे क्रियाकर्म करते हैं  जिससे वे बाहर न जा सकें। नयी आवधारणाओं पर शोध न कर सकें और उसे न अपना सकें ।  नियमों को न मानने या भंग करने पर अनुयायी को दण्डित किया जाता है। ध्यान देने की बात है कि किताब आधारित धर्म में दण्डित देने की व्यवस्था है लेकिन उसे बाहर निकालने की व्यवस्था नहीं है। क्योंकि वहाँ  धार्मिक वर्चस्व के लिए जनसंख्या का उपस्थित रहना जरूरी है, ताकि उन पर धार्मिक रूप से शासन किया जा सके।

किताब या पोथीबद्ध धर्म के इत्तर सरना धार्मिकता के उच्च व्यक्तिगत  स्‍वतंत्रता की गारंटी देने वाला धर्म है। जहॉं सब कुछ प्राकृतिक से प्रभावित है और सब कुछ प्रकृतिमय है। कोई नियम, वर्जनाऍं नहीं है। कोई केन्द्रीय अवधारणा नहीं है, जिसे मानना अनिवार्य है। आप जैसे हैं वैसे ही बिना किसी कृत्रिमता के सरना हो सकते हैं और प्राकृतिक ढंग से इसे अपने जीवन में अभ्यास कर सकते हैं। जीवंत और प्राणमय प्रकृति, जो जीवन का अनिवार्य तत्व है, आप उसके एक अंग है। आप चाहें तो इसे मान्यता दें या न दें। आप पर किसी तरह की धार्मिक बंदिश नहीं है। जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक आप किसी धार्मिक जंजीर से बंधे हुए नहीं हैं। आपके जन्म, शादी और मृत्यु के किसी भी संस्कार में धार्मिक रूप से आप पर नियंत्रण नहीं किया जाता है, न ही किसी संस्कार को करने के लिए किसी धार्मिक ऑथारिटी से अनुमति प्राप्त करने की जरूरत है।

आप प्रकृति के प्रति अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति कहीं भी कर सकते हैं या कहीं भी न करें तो भी आपको कोई मजबूर नहीं करेगा, क्योंकि हर व्यक्ति की भक्ति की शक्ति या शक्ति की भक्ति की अपनी अवधारणाऍं हैं। एक समूह का अंग होकर भी आपके ”वैचारिक और मानसिक व्यक्तित्व” समूह से भिन्न हो सकता है। अपने वैयक्तिक आवधारणा बनाए रखने और उसे लोक व्यवहार में प्रयोग करने के लिए आप स्वतंत्र है। यही सरना धर्म की अपनी विशेषता और अनोखापन है। मानवीय वैचारिक स्वतंत्रता की ऐसी उर्वरा भूमि अन्य धर्म में मिलना मुश्किल है।

यह किसी रूढ बनाए या ठहराए गए धार्मिक, सामाजिक या नैतिक नियमों से संचालित नहीं होता है। आप या तो सरना स्थल में पूजा कर सकते हैं या जिंदगी भर न करें। यह आपके व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भरपूर सम्मान करता है। आप चाहें तो अपने बच्चों को सरना स्थल में ले जाकर वहॉं प्रार्थना करना सिखाऍं या न सिखाऍं । कोई आप पर किसी तरह की मर्जी को लाद नहीं सकता है। प्रत्येक धर्म में धार्मिक संस्कारों की एक सूची होती है, जिसे करना उसके अनुयायी के लिए अनिवार्य है, लेकिन सरना में ऐसी किसी भी तरह के बंधन, नियंत्रण और निर्देशन कहीं नहीं है। आप यहाँ पर परम स्वतंत्र रूप से धार्मिक या अधार्मिक हो सकते हैं। धर्मनिरपेक्षता की आत्म ही सरना धर्म से प्रेरित है।

आप धार्मिक, सामाजिक और ऐच्छिक रूप से स्वतंत्र हैं। आपको पकड कर न कोई प्रार्थना रटने के लिए कहा जाता है न ही आपको किसी प्रकार से मजबूर किया जाता है कि आप धार्मिक स्थल जाऍं और वहॉं अपनी हाजिरी लगाऍं और कहे गए निर्देशों का पालन करें । सरना धर्म के कर्मकांड करने के लिए कहीं किसी को न प्रोत्साहन किया जाता है न ही इससे दूर रहने के लिए किसी का धार्मिक और सामाजिक रूप से तिरस्का्र और बहिष्‍कर किया जाता है। सरना धर्म किसी को धार्मिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक रूप से नियंत्रित नहीं करता है और न ही उन्हें अपने अधीन रखने के लिए किसी भी तरह के बंधन बना कर उन पर थोपता है।

सरना बनने या बने रहने के लिए कोई नियम या सीमा रेखा नहीं बनाया गया है। इसमें घुसने के लिए या बाहर निकले के लिए आपको किसी अंतरण अर्थात (धर्मांतरण) करने की जरूरत नहीं है । कोई किसी धार्मिक क्रियाकलाप में शामिल न होते हुए भी सरना बन के रह सकता है उसके धार्मिक झुकाव या कर्मकांड में शामिल नहीं होने या दूर रहने के लिए कोई सवाल जवाब नहीं किया जाता है। सरना धर्म का कोई पंजी या रजिस्टर नहीं होता है। इसके अनुगामियों के बारे कहीं कोई लेखा जोखा नहीं रखा जाता है, न ही किसी धार्मिक नियमों से संबंधित जवाब के न देने पर नाम ही काटा जाता है।

सरना अनुगामी जन्म से मरण तक किसी तरह के किसी धार्मिक सत्ता के निर्देशन, संरक्षण, प्रवचन, मार्गदर्शन या नियंत्रण के अधीन नहीं होते हैं। उसे धार्मिक रूप से आग्रही या पक्का बनाने की कोई कोशिश नहीं की जाती है। वह धार्मिक रूप से न तो कट्टर होता है और न ही धार्मिक रूप से कट्टर बनाने के लिए उसका ब्रेनवाश किया जाता है। क्योंकि ब्रेनवाश करने, उसे धार्मिकता के अंध-कुँए में धकेलने के लिए कोई तामझाम या संगठन होता ही नहीं है। इसीलिए इसे प्राकृतिक धर्म भी कहा गया है। प्राकृतिक अर्थात् जो जैसा है वैसा ही स्वीकार्य है। इसे नियमों ओर कर्मकांडों के अधीन परिभाषित भी नहीं किया गया है। क्योंकि इसे संकीर्ण परिभाषा से बांधा नहीं जा सकता है।

जन्म, विवाह मृत्यु सभी संस्कारों में उनकी निष्ठा का कोई परिचय न तो लिया जाता है न ही दिया जाता है। हर मामले में वह किसी आधुनिक देश में लागू किए गए सबसे आधुनिक संवैधानिक प्रावधानों (समता का अधिकार, जीवन और वैचारिक धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार जैसे मूल अधिकारों की तरह) का सदियों से व्यक्तिगत और सामाजिक स्वतंत्रता का उपभोग करते आ रहा है। उसके लिए कोई पर्सनल कानून नहीं है। वह शादी भी अपनी मर्जी जिसमें सामाजिक मर्जी स्वयं सिद्ध रहता है, से करता है और तलाक भी अपनी मर्जी से करता है। लड़कियॉं सामाजिक रूप से लडकों की तरह की स्वतंत्र होतीं हैं। धर्म उनके किसी सामाजिक या वैयक्तिक कार्यों में कोई बंधन नहीं लगाता है।

सरना बनने के लिए किसी जाति में जन्म लेने की जरूरत नहीं है। वह उरॉंव, मुण्डा, हो, संताल, खडिया, महली या चिक-बडाइक या कोई भी समुदाय, कहीं के भी आदिवासी, मसलन, उडिसा, छत्तीसगढ, महाराष्ट्र, गुजरात या केरल के हो सकते हों, जो किसी अन्य किताबों, ग्रंथों, पोथियों आधारित धर्म को नहीं मानता है और जिसमें सदियों पुरानी जीवन यापन के अनुसार जिंदगी और समाज चलाने की आदत रही है सरना या प्राकृतिक धर्म का अनुगामी कहा जा सकता है। क्योंकि उन्हें नियंत्रित करने वाले न तो कोई संगठन है, न समुदाय है न ही उन्हें मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से नियंत्रण में रखने वाला बहुत चालाकी से लिखी गई धार्मिक किताबें हैं। कोई भी आदमी सरना बन कर जीवन यापन कर सकता है क्योंकि उसे किसी धर्मांतरण के क्रिया कलापों से होकर गुजरने की जरूरत नहीं है।

सरना धर्म में सरना अनुगामी खुद ही अपने घर का पूजा पाठ या धार्मिक कर्मकांड करता है। लेकिन सार्वजनिक पूजापाठ जैसे सरना स्थल में पूजा करना, करम और सरहूल में पूजा करना, गॉंव देव का पूजा या बीमारी दूर करने के लिए गॉंव की सीमा पर किए जाने वाले डंगरी पूजा वगैरह पहान करता है। पहान का चुनाव विशेष प्रक्रिया जिसे थाली और लोटा चलाना कहा जाता के द्वारा किया जाता है। जिसमें चुने गए व्यक्ति को पहान की जिम्मेदारी दी जाती है। लेकिन अलग अलग जगहों में पृथक ढंग से भी पहान का चुनाव किया जाता है। चुने गए पहान पहनई जमीन पर आर्थिक अलंबन के लिए खेती बारी कर सकता है या जरूरत न होने पर उसे चारागाह बनाने के लिए छोड सकता है। यहाँ भी सरना किसी रूढ़ीवादी संकीर्ण विचारों से अनिवार्य रूप से बंधित नहीं है।

उल्लेखनीय है कि सरना पहान सिर्फ पूजा पाठ करने के लिए पहान होता है और उसका पद रूढ या स्‍थायी नहीं होता है। वह समाज को धर्म का सहारा लेकर नियंत्रित नहीं करता है। वह हमेशा पहान की भूमिका में नहीं रहता है, न ही उसका कोई विशिष्ट पोशाक या मेकअप होता है। वह सिर्फ पूजा करते वक्त ही पहान होता है। पूजा की समाप्ति पर अन्य सामाजिक सदस्यों की तरह ही सामान्यं सदस्य होकर समाज में रहता है और सबसे व्यवहार करता है। वह पहान होने पर कोई विशिष्टता प्राप्त नागरिक नहीं होता है, न ही विशिष्ट सम्मान और व्यवहार की अपेक्षा करता है।

अन्य धर्मो में पूजा करने वाला व्यक्ति न सिर्फ विशिष्ट होता है बल्कि वह हमेशा उसी भूमिका और पोशाक और मेकअप में समाज के सामने आता है और आम जनता को उसे विशिष्ट सम्मान अदा करना पडता है। सम्मान नहीं अदा नहीं करने पर धार्मिक रूप से ”उदण्ड” व्यक्ति को सजा दी जा सकती है, उसकी निंदा की जा सकती है या व्यक्ति के धार्मिक अधिकारों को छीना जा सकता है। पहान धार्मिक कार्य के लिए कोई आर्थिक लाभ नहीं लेता है। वह किसी तरह का चंदा भी नहीं लेता है, न ही किसी प्रकार के पैसे इकट्ठा करने में सहभागी बनता है। वह अपनी जीविकोपार्जन स्वयं करता है और समाज पर आश्रित नहीं रहता है। सरना धर्म में परजीविता का कोई स्थान नहीं है।

कई लोग अन्जाने में या शरारत-वश सरना धर्म को हिन्दू धर्म का एक भाग कहते हैं और सरना आदिवासियों को हिन्दू कहते हैं। लेकिन दोनों धर्मो में कई विश्वास या कर्मकांड एक सदृष्य होते हुए भी दोनों बिल्कुल ही जुदा हैं। यह ठीक है कि सदियों से सरना और हिन्दू धर्म का सह-अस्तित्व रहा है। इसलिए कई बातें एक सी दिखती है। नाम वगैरह आदि में एकरूपता दिखता है। लेकिन नाम से कोई किसी और धर्म का नहीं हो जाता है। एक भूभाग में रहने वाले समाजों के बीच इस तरह के समानता का होना आश्‍चर्य की बात नहीं है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि आदिवासी सरना और हिन्दू धर्म के बीच विश्वास, सिद्धांत और आदर्श के मामलों में 36 का आंकडा है और वे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से एक दूसरे के विरोधी रहे हैं।

आदिवासी मूल्य, विश्वास, अध्यात्म हिन्दू धर्म से बिल्कुल जुदा है इसलिए किसी आदिवासी का हिन्दू होना मुमकिन नहीं है। हिन्दू धर्म कई किताबों पर आधारित है और उन किताबों के आधार पर चलाए गए विचारों से यह संचालित होता है। याद कीजिए इन किताबों का आदिवासी समाज के लिए कोई महत्व नहीं है, न ही उसका समाज पर प्रभाव है। इन किताबों के लिए आदिवासियों के मन में सम्मान भी नहीं है न ही हिकारत। इन किताबों में आत्मा, पुर्नजन्म, सृष्टि और उसका अंत, चौरासी कोटी देवी देवता, ब्राह्मणवाद की जमींदारी और मालिकाना विचार आदि केन्द्र बिन्दु है। हिन्दू धर्म में तमाम देवता राजा या वर्चस्ववादी रहे हैं जो एक दूसरे से युद्ध करते हुए रक्तपान करने वाली मानसिकता का पोषण करता है। आदिवासी कभी किसी के उपर वर्चस्व जमाना नहीं चाहा। हिंन्दू धर्म जातिवाद का जन्मदाता और पोषक है और सामांतवाद और मानवीय शोषण, आर्थिक ठगी को यहॉं धार्मिक मान्यता प्राप्त है। आज भी हिंदू शोषण और भेदभाव को हिंदू धर्म की जड़े मानते हैं। आदिवासी समाज सच्चे रूप में एक समाजवादी समाज हैं वहीं हिन्दू में बड़े छोटे का न सिर्फ सिद्धांत कायम है, बल्कि छोटे हो दीनहीन और घटिया समझने के मानसिकता केन्द्रबिन्दु में हैं। यहॉं हिन्‍दू धर्म सरना धर्म के उलट रूप में प्रकट होता है। ब्राहणवाद और जातिवाद से पीडित यह जबरदस्ती बहुसंख्यक, कर्मवीर और श्रमशील लोगों को नीच और घटिया घोषित करता है और लौकिक और परलौकिक विषयों की ठेकेदारी ब्राह्मण और उनके मनोवैज्ञानिक उच्चता का बोध कराने के लिए बनाए गए नियमों को सर्वोच्चता प्रदान करता है। हिंदू समाज में न्यायपू्र्ण सामाजिक व्यवस्था को नकारा गया है। यहाँ शोषण करने, अपने से तथाकथित रूप से कमजोर लोगों के साथ अन्याय को उचित माना गया है। यह वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और मानवीय रूप ये अत्यंत अन्यायकारी और घ़ृष्टातापूर्ण है। इंसानों को अन्यायपूर्ण रूप से धार्मिक भावनाओं के बल पर, जानवरों की तरह गुलाम बनाने, ठगने के हर औजार इन किताबों में मौजूद है। आदिवासियों को दीन-हीन नीच समझने या मनवाने के षड़यंत्र के रूप में आज के विकासमय समय में भी हिंदू धर्म संगठन उन्हें वनवासी शब्द से संबोधित करने का हर मौका को काम में लाते हैं। आदिवासियों को भारतीय धरती पर न्यायपूर्ण स्थान देने के बदले वे उनके साथ अन्याय करने के लिए खरबों रूपये व्यय कर रहे हैं। क्योंकि उनके धार्मिक अवधारणा में ही ऊँच-नीच और न्याय-अन्याय गुंफित है।

किसी समुदाय या मानव को नीच और अन्याय का पात्र समझने की धार्मिक नियम, परंपरा और लोक व्यवहार सरना समाज में मौजूद नहीं है। सरना समाज में जातिवाद और सामांतवाद दोनों ही नहीं है। यहॉं सिर्फ समुदाय है, जो न तो किसी दूसरे समुदाय से ऊँच है न नीच है। सरना धर्म के समता के मूल्य और सोच के बलवती होने के कारण किसी समुदाय के शोषण का कोई सोच और मॉडल न तो विकसित हुई है और न ही ऐसे किसी प्रयास को मान्यता मिली है। प्रथमदृष्ट में सरना धर्म की तरह ऊँच गुणों से संपन्न और कोई धर्म है ऐसा नहीं प्रतीत नहीं होता है।

कई लोग आदिवासियों के हनुमान महादेव और प्राकृतिक के अन्य प्रतीकों के पूजन को हिन्दू धर्म से जोडकर इसे हिन्दू सिद्ध करना चाहते हैं। लेकिन सरना वालों ने कहीं इसका मंदिर न तो खुद बनाए हैं न ही सामाजिक धर्म और पर्वों में घरों में इनकी पूजा की जाती है। सरना किंवदती में भी ऐसी कथा नहीं मिलती है। किसी सरना गीत और लोक कथा में भी ऐसी कोई घटना नहीं मिलती है, जिससे सिद्ध हो कि हिंदू महादेव और हनुमान ही आदिवासी देवता भी हैं। ऐतिहासिक रूप से अभी तक कुछ स्पष्ट नहीं हो पाया है लेकिन अनेक विद्वान हनुमान और महादेव को प्रागआदिवासी मानते हैं। महादेव का सामान्य अर्थ महा अर्थात् बड़ा होता है। हजारों सालों से एक ही धरती पर निरंतर साथ रहने के कारण दोनों के बीच कहीं अंतरण हुआ होगा। लेकिन आदिवासी हिन्दू नहीं है यह स्पष्टं है। हिंदू धर्म मुसलमान और ईसाई धर्म की तरह वर्चस्ववादी, विस्तारवादी, घमंडवादी, दूसरों पर अपने विचारों को जबरदस्ती थोपने वाला धर्म है, यही कारण है कि यह मानवीय हिंसा में विश्वास करने वाला धर्म के रूप में दूसरे विस्तारवादी धर्म के साथ अपना नाम लिखा लिया है। आदिवासी गाँवों में हिंदू देवी देवताओं के तस्वीरों का मुफ्त वितरण, आदिवासी गाँव अंचलों में मंदिरों का निर्माण, आदिवासी बालकों का अपने स्कूल में शिक्षा दान देकर आदिवासी मूल्य और संस्कृति को नष्ट करने के लिए उन्हें एजेंट के रूप में इस्तेमाल आदि करना,गरीब आदिवासियों का मंदिरों में ब्राह्मण द्वारा समूहिक विवाह कराना, आदिवासियों को आदिवासियों के माइंडवाश करने की प्रक्रिया में शामिल करना, घोर हिंदू बने लोगों को आदिवासियों का राजनैतिक नेता बनाना, उन्हें पद और पैसे का लोभ से पाट देना आदि बातें हिंदू धर्म को ईसाई और मुसलमान धर्मों की तरह हटधर्मी और विस्तारवादी धर्मों की पंक्तियों में बैठा दिया है। ईसाई धर्म का आदिवासियों के बीच प्रचार शुद्ध धार्मिक सिद्धांत नहीं रहा है, बल्कि उसे शिक्षा और सेवा की आड़ में किया गया। यदि शुद्ध धार्मिक सिद्धांत के माध्यम से ईसाईयत का प्रचार किया जाता तो वह आदिवासी सोच-विचार और अवधारणा के विपरीत होने के कारण स्वीकार्य नहीं होता। लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य की आवश्यकता ने इसे स्वीकार्यता दिलाया है।

हाल ही में कुछ सरना लोग जो खुद को सरना के रूप में परिचय देते हैं और हिन्दुत्‍व, क्रिश्चिनि‍टी, इस्लाम के ऊपरी आवरण से प्रभावित हैं। इन लोगों ने सरना को परिभाषित करने, उसका कोई प्रतीक चिन्ह, तस्वीर, मूर्ति,  मठ, पोथी आदि बनाने की कोशिश की है जिसे निहायत ही आईडेंटिटी क्राइसिस से जुझ रहें लोगों का प्रयास माना जा सकता है। इन चीजों के बनने से सरना धर्म के वैश्विक मूल्यों में हृास होगाऔर इसके अनुठापन खत्म होगा। इन चीजों की अनुपस्थिति ही सरना धर्म को दूसरे धर्मों से अलग एक विशिष्ट मूल्य और प्राकृतिक आवधारणा वाला बनाया है।

सरना धर्म में विचार, चिंतन की स्वतंत्रता उपलब्ध है। सरना वालों को किसी कट्टर सिद्धांतों को मानने का कोई निर्देशन भी नहीं है, न ही नये विचारधारा पर चिंतन करने की मनाही है। अपने धार्मिक चिंतन को एक रूप देने के लिए ऐसा करने वाले भी स्वतंत्र हैं । लेकिन ऐसे परिवर्तन को सरना धर्म का अनुयायी कहना, एक मजाक के सिवा कुछ नहीं है। क्योंकि इनके विचारों में नयी धारा नहीं है। बल्कि दूसरे धर्म के उपरी आवरण की नकल करने का प्रयास है। सरना किसी मूर्ति, चिन्ह, तस्वी्र या मठ का मोहताज नहीं है। लेकिन ऐसा करने में यह भी दूसरे धर्म की धार्मिक बुराईयों का शि‍कार हो जाएगा और यह अन्य धर्मो के सदृष्यर उनका एक कार्बन कॉपी बन के रह जाएगा। सरना धर्म के विरोधी तो ऐसे कार्यकलापों को प्रोत्साहित करना पसंद करेंगे, क्योंकि इससे सरना धर्म का कद घटेगा, वहीं वे अपने धर्म की कमियों को सही साबित करने के लिए सरना को भी कई आवधारणों के गुलाम धर्म साबित करने में कामयाब होंगे। मूर्ति, तस्वीर, मठ आदि के रास्ते सरना धर्म में एक बाजार, वर्चस्व, प्रभाव जमाने की बुराईयां आ जाएगी। ऐसी बुराईयाँ केन्द्रीय विचारधारा को नष्ट करके उसे एक साधारण धर्म बना देता है, जिसमें आर्थिक पक्ष सबल हो जाता है।

यदि सरना-दर्शन के शब्दों में कहा जाए तो यह सब चिन्ह आपनी आईडेंटिटी गढने, रचने और उसके द्वारा वैयक्तिक पहचान बनाने के कार्य हैं । जिसका इस्तेमाल, सामाजिक कम राजनैतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक साम्राज्य् गढने और वर्चस्व स्थापित करने के लिए एक हथियार के रूप में किया जाता रहा है। ऐसे चीजों का अपना एक बाजार होता है और उसके सैकडों लाभ मिलते हैं। लेकिन सरना दर्शन, सोच, विचार, विश्वास, मान्यता से बाजार का कोई संबंध नहीं है। धार्मिक क्रिया कांड में सिर्फ मिट्टी के दीए और छोटे मोटे मिट्टी भांड तथा पत्तों, पुआलों का उपयोग किया जाता है। मिट्टी के छोटे दीया, भांड, घडा आदि हजारों साल से स्थानीय लोगों के द्वारा ही निर्मित होता रहा है और इसका कोई स्थायी बाजार नहीं होता है। न ही इसका कोई सबल आर्थिक पक्ष होता है।

कु्ल मिला कर यही कहा जा सकता है कि सरना एक अमूर्त शक्ति को मानता है और सीमित रूप से उसका आराधना करता है। लेकिन इस आराधना को वह सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक औजार के रूप में नहीं बदलता है। वह आराधना करता है लेकिन उसके लिए किसी तरह के शोशेबाजी नहीं करता है। यदि वह करता है तो फिर वह कैसे सरना ?  लेकिन किसी मत को कोई मान सकता है और नहीं भी, क्यों कि व्यक्ति के पास अपना विवेक होता है और यह विवेक ही उसे अन्य प्राणी से अलग करता है,  विवेकवान होने के कारण अपनी अच्छाईयों को पहचान सकता है। सभी कोई अच्छाईयॉं, कल्याणकारी पथ खोजने के लिए स्वतंत्र हैं। इंसान की इसी स्वतंत्रता की जय-जय-कार हर युग में हर तरफ हुई है।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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आदिवासी उपयोजना

                                                                                  घनश्याम बिरूली, राँची 

                                          Tribal Sub plan (आदिवासी उपयोजना) के मुख्य उद्देश्य

1) आदिवासियों के गरीबी उन्मूलन और बेरोजगारी को दूर करना।

2)आदिवासियों के लिए उत्पादक परिसम्पत्तियों का निर्माण ताकि निरंतर विकास की प्रक्रिया जारी रखा जा सके।

3) आदिवासियों को पर्याप्त शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं प्रदान की जा सके ताकि मानव संसाधन का विकास हो।

4) हर तरह के शोषण और उत्पीड़न से आदिवासियों को शारीरिक और आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना।

TSP (Tribal Sub plan) सरकार द्वारा तय की गई वार्षिक या पंचवर्षीय योजना का एकीकृत हिस्सा है और इसके अंतर्गत बनाये गये प्रावधान Non divertable और Non lapsable हैं और इसका उद्देश्य आदिवासियों के आर्थिक और सामाजिक विकास में जो विषमताएं हैं उसे निर्दिष्ट समय सीमा में पाटना है । मगर इस क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती है कि राज्य के विभिन्न विभाग उपर्युक्त प्रावधानों का उल्लंघन करते आये हैं । जिन पैसों का आदिवासियों के विकास के लिए उपयोग होना है उसका अन्य उद्देश्यों के लिए खर्च होता है और ये एक मजाक बन कर रह गया है। ये सरकार की व्यवस्था और इच्छाशक्ति पर भी एक बड़ा प्रश्न चिन्ह है।

संबंधित विभागों द्वारा इसके खर्च का निरीक्षण और मूल्यांकन नहीं के बराबर होता है और दोषियों को इन अनियमितताओं के लिए उत्तरदायी भी नहीं बनाया जाता है।

इस मामले में उल्लंघन के कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं :-
– ओडिशा में TSP के फंड का आदिवासियों के हित के कार्यों के लिए होना चाहिए परन्तु उसका उपयोग मूलभूत संरचना (रोड, बिल्डिंग आदि) के लिये उपयोग किया जा रहा है।

– वार्षिक योजनाओं के TSP बजट में आदिवासी जनसंख्या के मुकाबले कम पैसों का प्रावधान किया जा रहा है जो इससे संबंधित दिशानिर्देशों का उल्लंघन है।

– TSP बजट का फोकस प्रशिक्षण, शिक्षा और समुचित अवसर प्रदान कर आदिवासी नेतृत्व ( सामुदायिक नेतृत्व) के विकास एवं सशक्तीकरण पर होना चाहिए।

– वार्षिक योजनाओं के अन्तर्गत TSP के स्कीम तथा कार्यक्रमों के क्रियान्वयन हेतु कोई निर्दिष्ट लक्ष्य और समयसीमा तय नहीं किये जाते।
-सरकार की ओर से TSP के क्रियान्वयन क्षेत्र में तय मानदण्डों के आधार पर आदिवासी समूहों के सामाजिक और आर्थिक स्थिति का कोई सर्वे नहीं किया जाता और दीर्घकालीन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए कोई योजना या रूपरेखा तैयार नहीं की जाती।

-आखिर में, आदिवासियों के विकास से जुड़े हुए विभाग, विभिन्न योजनाओं के लिए आवश्यकता से कम खर्च करते हैं।

विदित हो कि संविधान के अनुच्छेद 275(1) के तहत देश के केंद्रीय फंड में से आदिवासी विकास मंत्रालय के जरिए TSP का फंड आबंटित किया जाता है। सभी प्राप्त रेवेन्यू, लिए गए ऋण तथा सरकार द्वारा प्राप्त ऋणों की अदायगी के पैसे केन्द्रीय फंड में जमा होती है, इसलिए सभी समुदायों और सभ्य समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि इसका निरीक्षण करें और समयोचित सुझाव या शिकायत दर्ज करें।

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जीवन में कैसे प्राप्त करें आर्थिक आजादी

                                                                                                       नेह इंदवार

जिंदगी में सभी स्वस्थ समृद्ध और सफल बनने की कामना करते हैं। जिंदगी में सफलता प्राप्त करने के रास्ते में सभी चलना चाहते हैं। लोग चाहते हैं वे इस संबंध में अनिवार्य बातों से परिचित हों ताकि वे सही रास्ते में चल कर जीवन में अपनी इच्छाओं की मंजिल तक पहुँच सकें। जीवन में जो भी व्यक्ति स्वस्थ, समृद्ध और सफल होना चाहते हैं उनके लिए एक सरल सूत्र है –

वह है —- “अधिक कमाएं, खर्च कम करें और जितना संभव हो उतनी बचत करें।”

यह एक बहुत अच्छा सूत्र है और निश्चित रूप से मंजिल में पहुँचने के लिए रास्ता दिखाता है ।

मूल रूप में यह सब होता कैसे है ?

 हमें जानने की आवश्यकता है कि वास्तव में यह कैसे काम करता है ?

यह प्रक्रिया अपने आप में आपकी दैनिक आदतों से आपको बाहर निकालने का है। कुछ मामलों में यह असुविधाजनक और कष्टदायक हो सकता है, लेकिन अंततः यह आपको सफलता के रास्ते पर चलने के लिए प्रेरित करेगा और पुरस्कृत करेगा। आपको अपनी  जिंदगी के पुराने ढ़र्रे को तोड़ना होगा और धन-संपदा की अपनी धारणा में परिवर्तन करना होगा। आपको अपनी पुरानी गरीबी या मध्यवर्गीय मानसिकता को बदलने की जरूरत होगी और नई आदतों को अपनाने की आवश्यकता होगी। नई आदतें आपको स्थायी वित्तीय आजादी और समृद्धि के नये मंजिलों के लिए तैयार करेंगी।

अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपनी मंजिल की कल्पना करें और उसे फिल्म की तरह बार-बार मन में देखा करें। मंजिल की एक तस्वीर मन में बना कर रखें।

यदि आप महान चीजें हासिल करना चाहते हैं, तो आपको उसकी प्राप्ति के लिए एक स्पष्ट और विस्तारित योजना बनाने की आवश्यकता है। मन में ऐसी स्थिति विकसित करें जिसमें आपको मंजिल पर स्पष्ट रूप से धन प्राप्त होने के लक्ष्य नजर आए। बहुत सारे लोग अपनी सच्ची मानसिक और दैहिक क्षमता तक नहीं पहुंच पाते क्योंकि वे वास्तव में नहीं जानते कि वे चाहते क्या हैं या फिर वहां तक कैसे पहुंचें।

लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना अनिवार्य है

अपने साहस और विश्वास के माध्यम से अपनी योजना के हर बिंदू को देखें। अपनी योजना के विभिन्न तत्वों को निरंतर ध्यान से देखें, समीक्षा करें और प्रत्येक बार में कम से कम एक विकसित कारक या तत्व इसमें जोड़ें। आखिरकार जहां आप पहुँचना चाहते हैं वहाँ के लिए आप कदम-दर-कदम एक मार्गदर्शिका विकसित कर ही लेंगे। रास्ते के साथ-साथ आप अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए दृढ़ संकल्प और दृढ़ता का निर्माण भी करे लेंगे।

आप अपनी सामान्य सीमाओं से आगे जाने के लिए मेहनत करें।

एक मध्यम वर्गीय मानसिकता एक सहज,  आत्मसंतुष्ट अस्तित्व तलाशती है । ऐसी मानसिकता आपको लगातार कड़ी मेहनत के दर्द से दूर रखना चाहती है।

बेशक, ऐसे पारंपारिक रवैये में कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन याद रखें अपने आरामदायक सोफे के आराम-सुख से आप एक करोड़पति नहीं बनेंगे। यदि आपका लक्ष्य आपकी कल्पना में बसे मंजिल तक जाने का है तो हर समय पर असुविधा और अनिश्चितताओं का सामना करने के लिए आपको तैयार रहना होगा।  आपको अपने आरामदायक सामान्य सीमाओं के बाहर उखब-खबड़ परिस्थिति के लिए आदत बना लेनी चाहिए।

हर दिन दो चार ऐसी चीजें करें जो आपको असुविधाजनक लगे या जो कभी-कभी आपके मन में डर भी पैदा करता हो। अपनी शारीरिक और मनोवैज्ञानिक धीरज को बढ़ाएं, थोड़ा अस्थायी दर्द सहन करने के लिए तैयार रहने से, कठिन समय पर आवश्यक मानसिक धैर्य बनाए रखने में मदद मिलेगी। इससे आपको कठिन निर्णय लेने में मदद मिलेगी । ऐसे निर्णयों के बल पर ही आप साधारण जिंदगी को असाधारण जिंदगी में बदल सकते हैं।

एक साधारण जीवन शैली को अपनाएं ।

जब आप अपनी मानसिक और शारीरिक क्षमताओं पर सीमाएं डालते हैं, तो अपनी खर्च की आदतों पर सतर्क अंकुश रखना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सिर्फ मितव्ययीता मानसिकता को अपनाने से आपको और अधिक पैसा नहीं मिलेगा या आप अमीर नहीं बनेंगे, लेकिन विनम्रतापूर्वक दिखावा विहीन रहने के लिए सीखना भी समग्र वित्तीय स्थिरता और स्वतंत्रता प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण चरण है। अगर आप दौलत इकट्ठा करने का अवसर प्राप्त करने से पहले ही अपने धन को अनावश्यक रूप से उड़ाते हैं, तो आप केवल अपने आप को आर्थिक रूप से तोड़ने का काम ही करेंगे।

“एक मितव्ययी मानसिकता, अपनी आश्यकताओं पर खर्च करता है लेकिन एक असतर्क मानसिकता हर चीज को अपने लिए प्राप्त करना चाहता है। एक बार जब आप समझ लेते हैं कि अनावश्यक आवेग-भरी खरीदी से आपकी वित्तीय आजादी कम होती है, तो  उपभोक्तावाद पर आपका पूरा दृष्टिकोण ही बदल जाता है

किफायती मार्ग के नीचे कुछ सरल कदम उठाएं : पहले से तैयार सूची के साथ खरीदारी करें, खरीदारी करने से पहले ऑनलाइन सौदों की तलाश करें और इस्तेमाल किए गए आइटम खरीदें या मंहगी चीजें खरीदने से बचें।

अपने खर्च पर नज़र रखें और अधिकता के मदों पर कटौती करें।

पैसे के खर्च की आदतों पर सतर्कतापूर्वक ध्यान दें और इस बात का रिकार्ड रखें कि आपने एक-एक पैसे का खर्च कैसे किया। प्रत्येक महीने के खर्च को लिख कर महीने के बाद उसकी समीक्षा और विश्लेषण करें कि आपने कहाँ बिना मतलब खर्च किया और आप कहाँ पैसे बचा सकते थे।  आप जिन अनावश्यक चीजों पर खर्च कर रहे हैं क्या उसके बिना आपका काम नहीं चल सकता था ??  क्या आप ऐसे खर्च को समाप्त या कम नहीं कर सकते हैं ?? विलसिता या फैशन के नाम पर खर्च होने वाले पैसे को बचा कर आप अपना भविष्य संवार सकते हैं।

 

आप स्पष्ट कटौती की तलाश शुरू करें

ऐसे चैनल जिसे आप कभी नहीं देखते हैं के लिए आने वाले बिल.  ऐसे पत्रिका या अखबार की सदस्यता जिसे आप शायद ही कभी पढ़ते हैं,  जिम सदस्यता जिसे आप नियमित उपयोग नहीं करते हैं या जिन्हें घर पर कर सकते हैं। खाने पीने की ऐसी आदत जो हर महीने आपके पॉकेट पर भारी पड़ता है और जो स्वस्थ के लिए भी लाभदायक नहीं हैं, के खर्चों को काटें और हर महीने सिर्फ उसी पर व्यय करें जो आवश्यक हों। याद रखें आजकल खाने-पीने के समानों में विभिन्न केमिकलों का व्यवहार आम हो चला है, चाहे वह मुर्गा हो. दूध हो, सागसब्जियाँ या महंगे होटलों में बने खाद्य पदार्थ।

नया कौशल सीखें

एक सफल व्यक्ति बनने के लिए, आपको प्रतियोगी रूप से सामान्य विषयों के अच्छे जानकार बनने की जरूरत है। इसके लिए जरूरी है कि आप अपने में सतत सुधार लाते रहें, नयी सूचनाओं को प्राप्त करें, नये विषय पर अध्ययन करें और नयी कौशल सीखने के लिए समर्पित हों ।

 अपनी संभावनाओं को निरंतर विस्तारित रखें

कुछ नया सीखने के लिए हर दिन समय समर्पित करें। किताबें खरीदें या इंटरनेट देखकर जानें कि कैसे नई चीजों को आप जल्दी सीख सकते हैं। इंटरनेट में लाखों ऐसे पेज, वीडियो मौजूद हैं जिसे पढ़ कर या देखकर आप नयी चीजें सीख सकते हैं। इसके लिए आपको बेकार में समय जाया होने वाले काम, जैसे दिन भर सोशल साइट या टेलिविजन देखना, दोस्तों से उद्देश्यहीन बातें करना आदि कम या समाप्त करना होगा। नई चीजें सीखने की ललक आपको अन्य से आगे लेकर जाएगा और आपको अधिक योग्य और क्षमतावान बनाएगा।

एक अतिरिक्त नौकरी या व्यवसाय करें ।

अमीर लोग अपने धन का निर्माण करने के लिए एक काम पर भरोसा नहीं करते। वे हमेशा साथ में कुछ अन्य काम करते हैं और आय के एक से अधिक स्रोत बनाते हैं। एक से अधिक आय करने की क्षमता होने से अधिक धन बनाने की आपकी क्षमता भी बढ़ जाती है । अधिक पैसे आने से आपको अपने कौशल में अधिक वृद्धि करने में मदद मिलती है और यह आपके ज्ञान स्तर को विभिन्न क्षेत्रों में फैलाता है। अपनी शौक या रूचि के क्षेत्र को पैसा बनाने का रास्ता बनाएं।

क्या आपको फोटोग्राफी पसंद करते हैं ?  क्या आपमें संगीत, लेखन, कंप्यूटर, कला, शिक्षण या कोचिंग के लिए प्रतिभा है? आप इनमें से किसी भी क्षेत्र को चालू कर सकते हैं । आप फिलॉसफी, साइकोलॉजी और साइंस में हो रहे नित नयी जानकारी को सीख कर नयी पीढ़ी को कार्यशाला, लेखन, इंटरनेट के माध्यम से बाँट कर आय के नये स्रोत बना सकते हैं। आप छोटे दुकान से शुरूआत से कर सकते हैं। खाने पीने की आपूर्ति करके भी पैसे बना सकते हैं।

यदि आपके पास योग्यता है और नये काम सीखने की ललक हो तो आप नये-नये काम आसानी से कर सकते हैं। ऑनलाईन मार्कटिंग के लिए आप लेख लिख सकते हैं। किसी कंपनी के उत्पाद के प्रचार और बिक्री के लिए उनसे जुड़ सकते हैं। प्रोपर्टी मार्केट में एजेंसी ले सकते हैं। इसके लिए ऑनलाईन दुकान चला सकते हैं। यू ट्यूब चैनल चला सकते हैं। गाड़ी खरीद कर पर्याटन वालों को देकर आय कर सकते हैं। ऑनलाईन कंपनी कैसे काम करती है इसे अध्ययन करके अपने इलाके के चीजों को ऑनलाईन बेच सकते हैं।

हजारों ऐसे रास्ते हैं जिनके माध्यम से आप करोड़पति बन सकते हैं। लेकिन इसके लिए अपने चारित्रिक विशेषताओं पर हमेशा ध्यान लगा कर अपनी क्षमताओं, साख की समीक्षा करते रहें। आप पर लोगों का अटूट विश्वास आपको हमेशा आगे ले जाने में सहायक होगा। याद रखिए योग्यता के साथ एक अच्छा ईमानदार, और सर्वजन सुखाय स्वीकार्य चरित्र ही व्यक्ति को सफलता दिलाता है। सफलता मिलने में समय लगता है और लम्बे काल में आपकी ईमानदारी, लोगों के साथ आपके संबंध और उनके प्रति आपका रवैया ही लम्बे काल में आपके साथ रहता है। याद रखें बेईमानी और बेईमानी की चालाकी आपकी सफलता के रास्ते में रोड़ा बन कर आपको रोक देगा।

 बेईमान की बेईमानी तुरंत लोगों के नजरों से आ जाती है और वह बेईमान को नीचे गिरा देता है और सफलता के रास्ते पर बेईमान की  यात्रा समाप्त हो जाती है ।

लेकिन एक ईमानदार आदमी की साख ही उसे सफलता के द्वार तक लेकर जाती है। यह प्राकृतिक का नियम है और हम प्राकृतिक शक्तियों के द्वारा संचालित एक गुड़िया से अधिक नहीं है। प्राकृतिक उसका निरंतर सहायता करता है, जो प्राकृतिक नियमों के साथ जीवन को जीने में विश्वास करता है।

जिंदगी में शारीरिक और मानसिक स्वस्थ तथा आर्थिक समृद्ध और सफलता पाने के लिए  ऊपर लिखे सूत्र को जरूर याद करें मतलब “अधिक कमाएं, खर्च कम करें और जितना संभव हो उतनी बचत करें।” 

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