आदिवासी –कौन

                                                                                मिनजू तिरकी, सताली चाय बागान

इतिहास के अनुसार मानव जाति का जन्म मूलतः अफ्रिका में हुआ । इसे हजारों वर्षो पूर्व तक मानव जाति आदिवासी जीवन जीती रही, अर्थात् उनका जीवन जंगल एवं प्रकृति पर निर्भर था । इसी अवस्था में ही मानव जाति दुनिया के कोने कोने तक पहुँची तथा इसमें विविधता उत्पन्न हुई । आज की मानव संस्कृति की विविधता की नींव इसी आदिवासी अवस्था में ही पड़ी ।

          मानव संस्कृति की, परंपराओं की, विविधता की प्रमुख धरोहर तो खेती के रूप में पाली गई है । इस धरोहर को आदिवासियों ने पाला पोसा और सुरक्षित रखा । उन्होंने इसे आजादी, गुलामी और शोषण में भी पाला है, क्योंकि आदिवासी परंपराओं में कुछ संरक्षणयोग्य विशिष्टताएँ हैं । आदिवासी जीवन छोड़, खेती करने वाली पहली संस्कृति सिंधु नदी घाटी संस्कृति थी ।

          कालांतर में यह नष्ट हुई उस पर आर्य कबीलों ने आक्रमण किए, जिससे आदिवासियों को जंगलों में आश्रय लेना पड़ा । यहीं से आदिवासियों की सामाजिक दुर्दशा का प्रारंभ हुआ।

          राष्ट्र की सांस्कृतिक रचना में इन आदिम जनजातियों का केवल योगदान ही नहीं अपितु मातृभूमि की रक्षा में इनका सर्वस्व त्याग भी बहुत बड़ा है । अंग्रेजों के शासन के विरूद्ध विद्रोह करके मातृभूमि को दासता से मुक्त करने के लिए स्वतंत्रता की बलिवेदी पर भी चढ़ने वाले वीर भी आदिवासी थे ।

          आज “आदिवासी” शब्द के उच्चारण से प्रश्न खड़ा होता है – प्रत्येक सदी से छला, सताया, नंगा किया गया, वनो जंगलों में जबरन भगाया जाता रहा, एक असंगठित मनुष्य जो एक विशेष पर्यावरण में अपने सामाजिक तथा सांस्कृतिक मूल्यों को जान की कीमत पर संजोए, प्रकृतिनिष्ठ, प्रकृतिनिर्भर, कमर पर बित्ते भर कपड़े लपेटे, पीठ पर आयुध लेकर भक्ष्य की खोज में मारा-मारा भटक रहा है ।

          वर्तमान में आदिवासी शब्द का प्रयोग विशिष्ट पर्यावरण में रहने वाले, विशिष्ट भाषा बोलने वाले, विशिष्ट जीवन पद्धति तथा परंपराओं से सजे, जंगलों पहाड़ों में जीवन यापन करते हुए अपने कार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों को संभालकर रखने वाले मानव समूह का परिचय देने के लिए किया जाता है, और बहुत बड़े पैमाने पर उनके सामाजिक दुःख तथा नष्ट हुए संसार पर दुःख प्रकट कर दिया जाता है । उन्हें वनवासी या वन्यजाति, जंगली, वनपुत्र या भूमिपुत्र भी कहा जाता है ।

          अनेक समाज वैज्ञानिकों और विचारकों ने ”आदिवासी कौन“ विषय पर चर्चा के बाद उद्धृत किया है कि – एक विशेष पर्यावरण में रहने वाले, विशिष्ट भाषा बोलने वाले, विशिष्ट जीवन पद्धति, सामान सांस्कृतिक जीवन यापन करने वाले परंतु अक्षर ज्ञान रहित मानव समूह – अर्थात् आदिवासी

          भारतीय संविधान में उन्हें अनुसूचित जनजाति या शिड्यूल्ड ट्राइब्स के रूप में संबोधित किया है । वास्तव में आदिवासी आर्यो के पूर्व का मानव समूह है । कुछ विचारकों ने उन्हें ”अबाॅरिजनल“ कर संबोधित किया है ।

          इस देश में अधिकतर अनुसूचित जनजातियों को आदिवासी कहते हैं । माना जाता है कि आदिवासी भारतीय प्रायद्वीप के सबसे प्राचीन व मूल निवासी हैं । आर्यों के अतिक्रमण के समय आदिवासी पहले से ही इस भारतीय उप महाद्वीप में रह रहे थे । युद्ध में परास्त होने के पश्चात् उन्हें या तो दास बना दिया गया या जंगलों / पहाड़ों में पलायन करना पड़ा । इस प्रकार जो भी आदिवासी समुदाय आक्रमण से बच निकले वे अपनी अलग संस्कृति और पहचान कायम रखने में कामयाब रहे । आदिवासियों की दृष्टि में कोई व्यक्ति या समुदाय तभी भूमि से जुड़ता है, जब वह अपने पूर्वजों से लेकर पीढ़ी दर पीढ़ी उस जमीन पर बसा हुआ हो । आदिवासियों का ज्ञान, अध्यात्म और धर्म व्यवस्था भी प्रकृति से उसके गहरे संबंधों पर ही आधारित है ।

          भारत के कुछ 28 राज्यों में अलग-अलग आदिवासी समूह या अनुसूचित जनजातियाँ हैं । इन आदिवासी समुदायों की जनसंख्या भी भिन्न-भिन्न हैं । मुख्य रूप से संताल, भील, उराँव, मुण्डा, खड़िया, हो, गोंड, अंदमानी आदिवासी आदि हैं । उत्त्र पूर्वी क्षेत्र में अरूणाचल प्रदेश, मिजोरम, असम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा, मेघालय में भी आदिवासी समूह हैं । मध्यप्रदेश /छत्त्ीसगढ़, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उड़िसा राज्यों में अधिकता है । पूरे देश में करीब 75 आदिम जनजातियाँ निवास करती हैं । जनगणना में भी अधिकतर सूचनाएँ संकलित नहीं होती है ।

          सरकारी नीति अनुसार अनुसूचित जनजातियों के लिए उच्च शिक्षा या सरकारी नौकरियों में आरक्षित स्थान उपलब्ध होने के कारण अब कई समूह भी आरक्षण की माँग कर रहे हैं । इसके विपरीत आदिवासी समुदायों को मान्यता न देना या सूची से निकाल देना भी एक पहलू है । किसी आदिवासी समुदाय को अनुसूचित जनजाति के रूप में स्वीकार करने न करने के पीछे राजनैतिक दबाब भी काम करते हैं।

          आदिवासियों की अपनी भाषा, संस्कृति एवं धर्म है, जिन्हें नकारा गया है । आदिवासियों में लोककला का स्थान महत्वपूर्ण है, एवं आदिवासी जीवन की जीवंतता की निशानी है । आदिवासियों के धर्म भी प्रकृति से जुड़े हुए हैं । आदिवासियों का धर्म सरना/आदिधर्म है, किन्तु भारत के प्रमुख धर्मों सिख, ईसाई, हिन्दू, इस्लाम से अलग । फिर भी यह देखा गया है कि आदिवासी भी अपने सरना/आदिधर्म के अलावा प्रतीक स्वरूप अन्य देवी/देवताओं की प्रतिमा/फोटो आदि रखते हैं तथा उसी अनुरूप धर्म अनुष्ठान शादी/विवाह की रस्में पूरी करते हैं ।

          इनका धार्मिक स्थल खुला आकाश है, जहाँ कहीं भी अपनी उपासना आराधना कर सकते हैं । आदिवासी संस्कृति एवं प्रकृति में एक गहरा आत्मीय रिश्ता है, तभी प्रकृति प्रदत्त् पेड़-पौधों को जीवन से जोड़ लिया है । हिन्दू, इस्लाम, सिख और ईसाई धर्मों के अनुयायी आदिवासियों की धार्मिक आस्थाओं को अलग ही दृष्टि से देखते हैं । कुछ आदिवासी समूहों ने धर्म परिवर्तन भी कर लिया है । धर्मांतरण के पश्चात् भी उन्हें निचले दर्जे का माना जाता है । ईसाई मिशनरी भी धर्मांतरण पर आए आदिवासी समूहों को अलग दृष्टिकोण से देखती है । हिन्दू धर्म में भी अलग-अलग विचारधारा के कारण धर्मांतरण के पश्चात् ऊहापोह की स्थिति बनी रहती है तथा आदिवासियों को एक अलग ही नीच जाति समझा जाता है ।

          अधिकतर देखा गया है कि कोई भी विकसित जाति अपने से कमजोर जाति को दबाने के लिए ऐसा वातावरण तैयार करती है कि बदलती परिस्थितियों में उस कमजोर जाति के लोग हीन-भावना से ग्रसित हो अपनी भाषा, संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज व जीने के ढंग आदि को हीन भाव से देखते हैं । फलतः उनका आत्मविश्वास, आत्मगौरव, स्वाभिमान टूटता जाता है । आज आदिवासी समाज पतन की इसी स्थिति में है, क्योंकि आदिवासियों के स्वाभिमान को अनेक तरीकों से कुचला गया और कुचला जा रहा है।

          सर्वप्रथम भाषा के विषय में बताना चाहूँगा, कि विकसित भारतीय भाषाओं को सीखने के क्रम में एक आदिवासी बच्चा दोहरे मानसिकता से गुजरता है, पहला वह अपनी मातृभाषा सेे कटता है तथा दूसरी ओर विकसित भाषा सीखने के क्रम में अपनी मातृभाषा से पृथक उच्चारण, व्याकरण आदि को आत्मसात करने में देरी करता है । इस प्रकार वह शिक्षा के क्षेत्र के साथ प्रतियोगिता में भी पीछे रह जाता है । भले ही वर्तमान में उपलब्ध नौकरियों के कारण शहरों में रहने वाले बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं । किन्तु ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले बच्चों की स्थिति अच्छी नहीं कह सकते । ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित स्कूलों में हिन्दी माध्यम से शिक्षा दी जा रही है, अतः स्थिति अच्छी है, फिर भी प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर बहुत कुछ करने की आवश्यकता है । आश्चर्य होगा कि झारखंड के आदिवासी भी मूल मातृभाषा में कम ही संवाद करते हैं यद्यपि वहाँ आदिवासी भाषा की शिक्षा लागू है ।

          पश्चिम बंगाल के तराई एवं डुवार्स क्षेत्रों में बंगलाभाषी, नेपाली तथा बंगलादेश से आए हुए लोगों के कारण मिश्रित भाषा बोलने वालों की अधिकता हो गई । प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में पश्चिम बंगाल में बंगला माध्यम से पढ़ाई होती है, जो राजकीय भाषा है । हिन्दी माध्यम से कुछ ही प्राथमिक स्कूल/हाईस्कूलों में शिक्षा दी जाती है । हिन्दी माध्यम के शिक्षक भी मिश्रित भाषा के कारण सही तरीके से उच्चारण भी नहीं कर पाते हैं । हिन्दी माध्यम स्कूलों में भी बंगलाभाषी शिक्षक नियुक्त हो रहे हैं । नौकरी के कारण शहरों में रहने वाले लोग भी अपने बच्चों से घरों में भी अपनी मातृभाषा में संवाद नहीं करते, जिससे बच्चे भी मूल भाषा से विरत रहते हैं ।

          जहाँ तक पढ़ी-सुनी या देखने-जानने वाले लोग आदिवासियों के विषय में अधिकतर अधूरी जानकारियों को लेकर उनके खान-पान, नाच-गान तक ही सीमित हैं । उनके खाने-पीने को लेकर चटकारे लिए जाते हैं । सामूहिक नाच-गान में सिर्फ अर्द्धनग्न स्त्रियों को लेकर बयानबाजी करते हैं । अंडामन-निकोबार की आदिवासी समूहों के फोटो खींचे जाते हैं और बस्तर के आदिवासियों के समूह-गृह की चर्चाएँ होती हैं । पूर्वोत्त्र के आदिवासियों के साथ हो रही घटनाओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता ।

          किन्तु इन सबके पीछे जो सामूहिक एकता एवं चेतना, सांस्कृतिक आधार, सामूहिक जीवन की आधारशिला का मर्म छुपा है उसे समझने की कोशिश नहीं की है ।

          पश्चिम बंगाल में डुवार्स/तराई क्षेत्र के आदिवासियों को ”बोका मानुष“ याने बेवकूफ मनुष्य समझा जाता है । मैं 29 दिसम्बर, 2013 के सिलीगुड़ी से प्रकाशित दैनिक जागरण की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा, कि कैरियर ओरिएण्टेड प्रोडक्शन हाऊस के तत्वाधान में प्रोडक्शन मैनेजर श्री चिन्मयदास व पटकथा लेखक श्री गौरवघोष व श्रीकुमार ने पश्चिम बंगाल के तराई-डुवार्स के ग्रामीण परिदृश्य व गरीब आदिवासी समाज तथा उनकी संस्कृति पर आधारित फिल्म ”ओईपोका“ की शूटिंग कर रहे हैं । आपको यह जानकार शायद आश्चर्य हो या न हो, ”पोका“ का शाब्दिक अर्थ कीड़ा है और ओईपोका अर्थात् दीमक या घून लगाने वाला कीड़ा । बंगला में ओईपोका (Termite-Ant like insect destructive to timber/white ant)

          आप इससे महसूस कर सकते हैं कि आदिवासियों को कीड़े-मकोड़े समझा जाता है। इसकी वजह उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों की मानसिकता है । आदिवासी अन्य लोगों की नकल तो करते हैं पर अच्छाई को अपना नहीं पाते । शराब और हँड़िया पीकर जीवन बर्बाद कर रहे हैं । बच्चों की शिक्षा भी इससे अछूता नहीं है ।

          इसी प्रकार विभिन्न राज्यों की विभिन्न आदिवासी समूहों या अनुसूचित जनजातियों की लगभग यही स्थिति है । विकास की शब्दावली में वे विभिन्न स्तरों पर हैं ।

          भारतीय उपमहाद्वीप अत्यंत समृद्ध और विविधताओं से भरपूर है । इसकी भाषा, संस्कृति और धर्म अपने आप में अनोखी है । भारत में लगभग 427 आदिवासी समूहों की पहचान की गई है । इनमें आदिवासी-जन ही भारत के मूल निवासी हैं । वे जंगलों को अपना घर बनाकर वहीं निवास करते हैं । आज भी बहुत सारे आदिवासी समूह घुमन्तू की तरह जंगलों में आजीविका तलाशते हैं और अस्तित्व की रक्षा के लिए भटकते रहते हैं ।

          आज आदिवासी समाज कई विडम्बनाओं का शिकार है । सबसे बड़ी विडम्बना तो यह है कि उसके पास लिखित दस्तावेज का अभाव है, इस कारण आदिवासियों को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई है ।

          आज जो परिस्थिति उभरकर सामने आई है, उसमें आदिवासियों की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान के प्रसंग में कुछ अनुकूल वातावरण बनते जा रहे हैं तथा सरकारी स्तर भी कुछ अच्छे कदम उठाए जा रहे हैं । आदिवासी समाज और परम्परा को समझने के लिए इतिहास और समाजशास्त्र की दोहरी जानकारी जरूरी है ।

          आज का आदिवासी समाज परंपरा के ऐसे संतुलन के लिए बेचैन है, जिसमें वह अपनी पहचान कायम रख सके और विकास की दौड़ में भी पीछे न रहे, बल्कि वह एक क्रांतिकारी विकल्प बने ।

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सीधे न्यायिक मजिस्ट्रेट दर्ज करें बयान

बलात्कार पीड़िता मामले में व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बलात्कार पीड़िताओं का बयान पुलिस अधिकारियों की बजाय सीधे एक न्यायिक मजिस्ट्रेट रिकार्ड करे ताकि लंबी प्रक्रिया को संक्षिप्त किया जा सके । न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा (सेवानिवृत) और न्यायमूर्ति वी गोपाल गौड़ा की पीठ ने कहा कि जाँच अधिकारी जहाँ तक संभव हो पीड़िता को नजदीकी महिला मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या महिला न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास ले जाये ।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश में क्या है

  • सूचना मिलते ही जाँच अधिकारी को पीड़िता को किसी मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के पास ले जाने के संबंध में तत्काल कदम उठाएँ ताकि उसका बयान दर्ज हो ।
  • बयान की एक प्रति तत्काल जाँच अधिकारी को इस निर्देश के साथ मिले कि आरोप पत्र दायर किए जाने तक इसकी सामग्री का खुलासा नहीं होगा ।
  • जाँच अधिकारी तारीख और समय को दर्ज करें, जहाँ उसे बलात्कार की घटना के बारे में जानकारी मिली, किस तारीख को वह पीड़िता को न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास ले गया ।
  • अगर पीड़िता को मजिस्ट्रेट के पास ले जाने में 24 घंटे से अधिक का विलंब हुआ है तो जाँच अधिकारी को केस डायरी में उसका कारण दर्ज करना होगा, उसकी प्रति मजिस्ट्रेट को सौंपे ।
  • आदेश की प्रति सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों, महानगरों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस आयुक्तों को भेजा जाए ।
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क्या फिर धोखा होगा चाय मजदूरों के साथ ?

                                                                                                                                                                                                                                     नेह अर्जुन इंदवार  

मजदूरों का वेतन समझौता के कई दौर का वार्ता हो चुका है । लेकिन कोई तार्किक परिणति पर नहीं पहुँचा जा सका है । मजदूर संघ 323 रूपये मजदूरी की मांग कर रहे हैं और मालिक संघ वर्तमान 95 रूपये में 21 रूपये वृद्वि देने का प्रस्ताव दे रहे हैं । इन वार्ताओं में कोई निर्णायक बात छन कर नहीं आ रही है । मजदूर संघ भारी महंगाई में एक सम्मानजनक, जीवन यापन करने लायक तथा काननून मान्य मजदूरी की मांग कर रहे हैं, लेकिन मालिक पक्ष चाय उद्योग के खास्ता आर्थिक दशा का रोना रोते हुए सिर्फ थोड़े से मजदूरी बनाने की सामर्थ्य की बातें कर रहें हैं । ऐसे ही घटनाक्रम हर वेतन वार्ता में होता रहा है और अंत में मजदूरों के लिए नाममात्र की मजदूरी मिलती रही है ।

पिछले दो दशक में कई बार चाय मजदूरों का वेतन समझौता हो चुका है और हर बार मजदूर संघ अन्य उद्योगों में लागू वेतनमानों के अनुसार अपनी बात वार्ता के हर दौर में रखते रहे हैं । लेकिन कई बार के वार्ता के बाद वे अन्य उद्योंगों में लागू वेतनमान की तो बात ही अलग, पश्चिम बंगाल और असम सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मजदूरी के सबसे निचले स्तर के वेतनमान तक को हासिल नहीं कर पाते हैं और वे मजदूरों के पक्ष की ओर से महज कुछ रूपयों के बढ़ोतरी को स्वीकार करते हुए वेतन समझौते में हस्ताक्षर कर देते हैं।

चाय मजदूरों का यह वेतन या मजदूरी भारतवर्ष के संगठित क्षेत्र में मिलने वाला सबसे कम वेतन होता है । तुर्रा यह कि मजदूर संघ इसे अपनी कामयाबी के रूप में अनपढ़ और मजबूर मजदूरों के बीच में प्रचारित करते हैं और वाहवाही लूटने की कोशिश करते हैं । मजदूरों के पक्ष में आंदोलन करने वाले मजदूर संघों का यह रवैया निश्चिय ही हैरानी करने वाला है । बात यहीं आकर रूकती नहीं, ऊपर से वे बढ़ती के नाम पर मजदूरों से चंदा भी उघाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वे मजदूर संघ वास्तव में मजदूरों की वास्तविक प्रतिनिधित्व करते हैं ? क्या वे मजदूरों के स्वार्थ की रक्षा करने में समर्थ हैं ? यदि वे मजदूरों की स्वार्थ रक्षा में सफल नहीं रहते हैं तो क्यों वे मजदूरों के पास जाकर इसकी सफलता का श्रेय लेने की कोशिश करते हैं ? वे कम मजदूरी के समझौता करने के बजाय क्यों वे इसे किसी संवैधानिक निकाय यथा लेबर कोर्ट, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के हवाले नहीं करते हैं ? कई सवाल हैं, कई बातें हैं जिन पर मजदूरों को जवाब मिलनी चाहिए । एक अहम सवाल है कि क्या ये मजदूर संघ एक सम्मानजनक मजदूरी दिलाने में सक्षम है ?

मजदूरों के स्वार्थ में गठित मजदूर संघों ने चाय उद्योग से जुड़े समाज के हित के विरोध में इतने समझौते (Compromise) कर लिए हैं कि आज भारत वर्ष में पश्चिम बंगाल और असम के चाय मजदूर सबसे बेचारे समाज के रूप में अपनी पहचान बना लिए हैं। चाय उद्योग में इतना कम वेतन मिलता है कि कोई भी परिवार सम्मानजनक जीवन जीने के बारे सोच नहीं सकता है । चाय मजदूरों का आय का एकमात्र साधन मजदूरी है और इस मजदूरी के निर्णय में मुख्यरूप से मजदूर संघ ही करते हैं । कम वेतन के सवाल पर चाय उद्योग से जुड़े हुए मजदूर संघों ने वेतन मामले को लेकर कभी किसी संवैधानिक निकाय या कोर्ट में नहीं गए । क्यों ? भारतवर्ष में मजदूर संघों द्वारा वेतन समझौते नाकाम रहने पर कोर्ट के शरण में जाने के अनेक दृष्टांत मौजूद है । एक शोषणमूलक वेतन समझौतों को क्यों मजदूरों पर लादा जाता है यह एक शोध का विषय नहीं है । यह चाय बागानों के मजदूरों के बदहाल स्थिति को देखकर एक साधारण सा आदमी भी कह सकता है । चँूकि मजदूरों को मिलने वाली तमाम सुविधाएॅं और सम्मानजनक वेतन मजदूर संघों के क्षमता पर ही निर्भर करता है, उसके तोलमोल की क्षमता पर प्रशनवाचक निगाएॅं जाना स्वाभाविक है ।

चाय मजदूरों का वेतन समझौता जहाॅं मजदूरों केे लिए जीवन मरन का प्रश्न होता है । वहीं सरकार और चाय बागान मालिकों के लिए मजदूरी बढ़ाने का यह महज एक प्रक्रिया । राज्य सरकार, जिसका प्रतिनिधित्व श्रम मंत्रालय करता है, हर नियम कानून को धता बता कर, खुद कानून तोड़कर खुद एक ऐसे समझौता का हिस्सा बनता है, जो उन्हीं के द्वारा बनाए गए, घोषित किए गए और नोटिफाइड किए गए राज्य न्यूनतम कानून का मखौल उड़ाता है । श्रम मंत्रालय के इस प्रकार के हिस्सेदारी पर न तो चाय बागान मजदूरों के बल पर विधायक और सांसद बने जनप्रतिनिधि विधानसभा और संसद में कोई प्रश्न पूछते हैं न ही वे अन्य किसी प्रकार के विकल्प को प्रस्तुत करके सरकार का ध्यान आकृष्ट करते हैं । क्यों मजदूरों के पक्ष में बोलने वाले और आवाज उठाने वाले संस्था शोषणमूलक वेतन समझौते को किसी कोर्ट में चेलैंज नहीं करते हैं ? आखिर मजदूरों के हित चिंतक कौन हैं ? हर बार मालिक पक्ष अपने दमदार तर्को और कम से कम पैसे चुकाने के अपने इरादे पर अटल रहता है और हर बार कम पैसे में वेतन समझौते करके मजदूर संघों ने अपनी अक्षमता और विफलता का प्रदर्शन किया है ।

                                          चाय उद्योग से जुड़े मजदूर आंदोलन अब तक एक कमजोर आंदोलन के रूप में ही अपनी पहचान बनाया है । चाय मजदूर संघों के शीर्ष पदों में कहीं भी चाय मजदूर मौजूद नहीं है, बल्कि इनमें राजनैतिक दलों के बाहरी पदाधिकारी ही दशकों से काबिज हैं । स्थानीय समितियों में स्थानीय मजदूर जरूर हैं लेकिन वे सिर्फ खानापूर्ति के काम करते हैं। उन्हें मजदूरों के लिए बने विभिन्न कानून, उन कानूनों के लिए बने केन्द्र और राज्य सरकार के नियम, विनियम, आदेश, मजदूर मामलों के बारे अदालतों के निर्णय, मजदूरों के पक्ष में बने कंपनी, बीमा, ग्रेज्युटी, प्रोविडेंट फंड, राशनिंग, पानीय जल, विद्यतिकरण,  पंचायती व्यवस्था और उसका क्रियान्वयन तथा उसमें मजदूरों, आम गरीब व्यक्तियों के लिए बने कानूनी संरक्षण, बीपीएल कार्ड धारिकों के लिए दिए जाने वाले छूट और कानूनी, आर्थिक और सामाजिक सहायता, आम अदालतों में उपलब्ध कानूनी सहायता, स्वास्थ्य संबंधी केन्द्रीय और राज्यस्तरीय नियम कायदे, बच्चों और महिलाओं के लिए चलाए जा रहे विकास योजनाओं, दलित और आदिवासी उत्पिड़न निवारण कानून, घरेलु और व्यावसायिक हिंसा, बागान, फैक्टरी, अस्पताल कानूनों में समय-समय पर हुए बदलाव और संशोधनों के बारे कोई मुक्कमल जानकारी और ज्ञान नहीं है । न तो इन स्थानीय नेताओं को मजदूर संघ प्रशिक्षित करता है और न ही थोक में उनके वोट को प्राप्त करने वाले राजनैतिक पार्टियाॅं । कई मायने और कई बार ये मजदूर संघ सिर्फ खानापूरी की कार्रवाई करते हैं । इन कार्रवाईयों का वास्तविक लाभ मजदूरों को नहीं मिल पाता है ।

मालिक पक्ष द्वारा मजदूरों के शोषण की बातें सभी करते हैं। लेकिन मजदूर संघ अपने सदस्य मजदूरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं और उन्हें कितना सम्मान देते हैं यह एक विचारनीय प्रश्न है । मजदूर आंदोलन के नाम पर बने संघों में कभी किसी नेता का चुनाव गुप्त मतदान के द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से किए जाने का कोई उदाहरण आमतौर से दिखाई नहीं देता है । वे मासिक या वार्षिक कार्यो, चंदें की आमद, उसका खर्च और बैंक में रखे पैसों का कोई लेखाजोखा हजारों मजदूरों के आम सभा में नहीं देते हैं ।

मजदूर संघों का परिचय ऐसा नहीं है कि मालिक पक्ष मजदूर संघों के बारे कोई डर रखे और हर मामले को कानून में दिए गए प्रावधानों के अनुसार क्रियान्वित करें । बागान प्रबंधकों पर करोड़ों रूपये प्रोविडेंट फंड और ग्रेज्युटी के पैसे बकाया का आरोप है। लेकिन किसी मजदूर संघ ने नियम कानूनों का सहारा लेकर आरोपियों पर कार्रवाई करवाने का दबाव नहीं डाल पाया है । बागानों में बिजली, सड़क, अस्पताल, क्वार्टर आदि का खास्ता हाल है, लेकिन मजदूर संघ किसी भी मामले को कानूनन लागू करवाने में सफल नहीं है । मजदूर संघों की असली ताकत कहाँ है ? डुवार्स तराई के मजदूर संघ क्यों मजदूरों के हक में रहे कानूनों का न्यायालयों का सहारा लेकर उपयोग नहीं करता है ?

वेतन समझौता एक पैकेज होता है । मालिक संघों का कहना है कि वे फ्रिंज बेनेफिट देते हैं, जिसे जोड़कर वे जितना वेतन देते  हैं वह न्यूनतम वेतन के बराबर बैठता है । यह फ्रिंज बेनेफिट क्या है ? बागान श्रम कानून के अनुसार चाय उद्योग को दिए गए अधिकतर सुविधाएँ सरकारी आर्थिक मदद से दी गई है । बागानों में सुधार लाने के लिए केन्द्र सरकार ने कुछ साल पूर्व ही 500 करोड़ का अनुदान देता है । इसके साथ टी बोर्ड हर साल करोडों रूपये बागानों के उन्नति के लिए खर्च करता है ।

मजदूर आवास बनाने के लिए केन्द्र और राज्य सरकार अनुदान देते हैं । लेकिन अनेक बागान ऐसे अनुदान के बावजदू मजदूर आवास के लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाएँ हैं । जो आवास है, वर्षों से उसका मरम्मत नहीं किया जाता है । लोग जीर्णशीर्ण मकानों में रहने के लिए अभिशप्त हैं । कई पीढ़ी से एक ही मकान में रहने के कारण अनेक मजदूर उसे अपना घर समझते हैं और अपने ही पैसे से उसका न सिर्फ मरम्मत करते हैं बल्कि रखरखाव भी करते हैं ।

अस्पताल बनाने के लिए सरकारी अनुदान मिलता है । टी बोर्ड और अन्य संस्थाएँ एम्बुलेंस के लिए मदद उपलब्ध कराता है । लेकिन इन मदद का उपयोग अधितर बागान प्रबंधन नहीं करता है । मजदूर संघ भी इसके लिए कोशिश नहीं करता है । कितने बागानों में एम्बुलेंस है यह गिनने में अधिक परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं होगी । जिला स्वास्थ्य विभाग इसके बारे आंकड़े उपलब्ध कर सकता है । बागान प्रबंधन ज्वलनी लकड़ी, राशन आदि कुछ ऐसे फ्रिंज बेनेफिट देते हैं जिसे नकद ही दिया जाए तो उसका कुछ फायदा मजदूरों को मिलेगा । राशन का पैसा लेकर मजदूर सरकारी राशन दुकान से बेहतर क्वालिटी के आटा और चावल खरीद सकते हैं । अधिकतर मजदूर आदिवासी होने के कारण सरकार आदिवासी इलाके में लागू किए गए आदिवासी विकास योजना के अन्तर्गत दिए जाने वाले सस्ते खाद्य पदार्थ का लाभ ले सकते हैं । बागान प्रबंधन को राशन के अधिकतर खेप फूड कार्पोरेशन आॅफ इंडिया जैसी सरकारी कंपनियों से मिलती है, जो निश्चय ही बाजार दर से कम होता है । मजदूरों को राशन के बदले नकद पैसे मिले तो वे स्थानीय बाजार से या सीधे बस्ती के बाजारों या किसानों से सीधे कम दाम में चावल आदि खरीद सकते हैं ।

बागान मजदूरों को काॅमर्शियल बिजली के कनेक्शन देता है और सिर्फ दो तीन बल्ब के लिए उनके वेतन से एक चैथाई से अधिक पैसा काट लेता है । मजदूर संघों ने कभी इस विषय पर बिजली विभाग के नियम कायदों को मजदूरों को बताने का कष्ट नहीं किया । क्योंकि मजदूर संघों का नेतृत्व खुद इन नियम कायदे से वाकिफ नहीं हैं, न ही वे इस विषय को हमेशा के लिए समाधान करने के लिए कभी कोई निर्णायक आंदोलन किया । वे कभी इस बात पर बागान प्रबंधन को कटघरे में खडे़ नहीं किया कि वह बिजली के नाम पर कैसे मजदूरों का आर्थिक शोषण कर रहा है । बिजली के कनेक्शन फ्रिंज बेनेफिट  के अन्तर्गत आता भी नहीं है । बागान प्रबंधन को सिर्फ घरों में वायरिंग करने, घरों तक बिजली के खंबे डाल कर बिजली के तार लाने का ही प्रबंध करना है । उसका काम घरों में काॅमर्शियल बिजली की आपूर्ति करना नहीं है । यदि बागान निशुल्क बिजली की आपूर्ति करता है तो वह मीटर लगाए बिना बिजली दे सकता है । लेकिन बिजली के शुल्क के लिए उसे हर घर में मीटर लगाना अनिवार्य है । बागान प्रबंधन को बताना चाहिए कि बागान प्रबंधकों के घरों में लगने वाले बिजली का बिल कितना होता है और उसका भुगतान कौन करता है ? मैनेजर बंगलों और मजदूरों के घरों में जलने वाले बिजली का तुलनात्मक गणना करने से कुल लागत और उसके लिए मजदूरों के वेतन से काटे गए पैसे का हिसाब निकाला जा सकता है ।

पश्चिम बंगाल के सभी चाय बागानों में पंचायत व्यवस्था को लागू किया गया है । पंचायत व्यवस्था के अन्तर्गत मजदूरों को सस्ती बिजली मिल सकती है। राजीव गाॅंधी ग्रामीण विद्युतिकरण के अन्तर्गत मजदूरों को राहत पहुँचाया जा सकता है। लेकिन हर बात में आंदोलन करने वाले मजदूर संघ कई दशक बीत जाने के बावजूद इस विषय पर कोई नया रास्ता निकाल नहीं सके हैं । कुटीर ज्योति कार्यक्रम के अन्तर्गत हर बीपीएल परिवार के मकान का विद्युतिकरण का पूरा खर्च निशुल्क इस योजना के अन्तर्गत किया जाता है । लेकिन मजदूरों की हित की बात करने वाले मजदूर संघों ने बागान प्रबंधन के द्वारा दो तीन बल्ब के लिए 300 से 500 रूपये वेतन से बिजली के नाम पर काटने के विरोध में क्या आंदोलन किया और उसकी क्या परिणति हुई ? मजदूर संघ क्यों बिजली आॅडिट की मांग सरकार से नहीं करता है ?

प्लानटेशन लेबर एक्ट के अन्तर्गत विनियमित और राज्य सरकार के द्वार विहित फ्रिंज बेनेफिट मुक्कम्मल रूप से मजदूरों को मिलता ही नहीं है तो उस फ्रिंज बेनेफिट को वेतन समझौते का हिस्सा कैसे बनाया जा सकता है ? सरकार गरीबों को इंदिरा आवास आदि उपलब्ध करा रही है। सस्ती बिजली और राशन भी दे रही है । ज्वलीनी लकड़ी दुर्लभ होते जा रहा है और इसके बदले गैस कनेक्शन लिए जा रहे हैं । बागान अस्पताल का खस्ता हाल के बारे पश्चिम बंगाल श्रम विभाग के सर्वे में सब कुछ बाहर आ गया है, ऐसे में फ्रिंज बेनेफिट के तहत बागान अस्पताल की बात करना और उसके भरोसे इलाज कराना बेमानी बात है । जब फ्रिंज बेनेफिट की चीजें मजदूरों को काननू और नियम अनुसार उपलब्ध ही नहीं हो पाता है और श्रम विभाग चाय बागानों के विरूद्व कोई कार्रवाई नहीं कर सकता है तो मजदूर वेतन समझौते में फ्रिंज बेनेफिट की बातों को शामिल किसलिए की जाती है ?

यह बहाना करना कि प्लानटेशन लेबर एक्ट के अन्तर्गत रखे गए प्रावधान के कारण इसे अलग नहीं किया जा सकता है, बहुत बेमानी है । प्लानटेशन लेबर एक्ट में बच्चों की स्कूली पढ़ाई की बात थी, जिसे सरकार ने अलग कर दिया है । ग्रुप हाॅस्पिटल की बात थी वह नदारद  है । एमबीबीएस डाक्टर और प्रशिक्षित नर्स सिर्फ गिने चुने बागानों में हैं । यदि न्यूनतम वेतन कानून अधिनियम 1948 के पृष्टों से वेतन को निकाल कर उसे त्रिपक्षीय समझौते के अन्तर्गत रखने के लिए सरकार कार्रवाई कर सकती है तो फ्रिंज बेनेफिट के नाम पर हो रहे मजदूरों के शोषण को रोकने के लिए सरकार पहल क्यों नहीं कर सकती ? फ्रिंज बेनेफिट मजदूरों का शोषण करने का एक जरिया बन गया है । इन फ्रिंज बेनेफिट के बदले सरकार चाय बागानों से बमेे ले और चाय बागान क्षेत्रों में उस पैसे से ढाॅंचागत विकास करे ।

वेतन समझौता एक कानूनी समझौता होता है जिसमें किसी भी पक्ष को जबरन हस्ताक्षर नहीं करवाया जा सकता है । मजदूर संघ मजदूरों का हितैशी संस्था होती है । इन संस्था को मजदूरों के हित में ही निर्णय लेना चाहिए । यदि मालिक पक्ष सरकार द्वारा नोटिफाइड न्यूनतम मजदूरी से कम मजदूरी देना चाहता है तो मजदूर संघों को किसी भी हालत में ऐसे समझौता में हस्ताक्षर नहीं करना चाहिए । यदि कई मजदूर संघ इसमें हस्ताक्षर कर देते हैं और कई दूसरे संघ हस्ताक्षर नहीं करते हैं तो यह समझौता लागू नहीं किया जा सकता है और हस्ताक्षर नहीं करने वाला संघ इसके विरोध में कोर्ट में जा सकता है । श्रम न्यायालय ऐसे समझौते को रद्द घोषित कर देगा और वह विशेषज्ञों को मिला कर अलग मशीनरी इसके लिए बना सकता है ।

निरंग पझरा समझौते वार्ता की प्रक्रिया से वाकिफ रहे कई महानुभावों से बातचीत की । इन महानुभावों का विश्वास है कि मजदूरों को अधिक से अधिक 140-150 रूपये मिल सकता है, इससे अधिक नहीं । निरंग पझरा को इस तरह के बयान से बहुत हैरानी हुई । आज की कमरतोड़ महंगाई में एक संगठित क्षेत्र के मजदूरों को इतनी कम बढ़ोतरी की उम्मीद नहीं है । उन्हें तो 250 से अधिक अर्थात् 323 रूपये की उम्मीद बंधाई जा रही है । यह 323 रूपये आज की महंगाई और सरकारी नियम कायदे के अनुसार न्यायसंगत है । इससे कम परिश्रमिक पर समझौता मजदूरों के साथ न सिर्फ अन्यायकारी होगा, बल्कि इससे कम मजदूरी के समझौते चाय उद्योग के लिए भी अशुभ होगा ।

आज तक मजदूरों को बहला फूसला कर कम मजदूरी देकर उनसे जीतोड़ श्रम कराया जाता रहा है । लेकिन राज्य और केन्द्र में सत्तासीन हुई नयी सरकार और व्यवस्था ने मजदूरों को एक न्यायपरक वेतन समझौता होने का भरोसा जतलाया है । लेकिन सब कुछ निर्भर करता है चाय मजदूरों के हित की प्रतिनिधित्व कर रहे उन मजदूर नेताओं पर, जिन्हें समझौते पर हस्ताक्षर करना है । पिछले तमाम समझौतों में मजदूर संघों ने अपने कमजोर दाॅंवपेंच और मोलभाव करने की कमजोर शक्ति से मजदूरों को न सिर्फ निराश किया है, बल्कि उन्हें घोर गरीबाी में जीने के लिए मजबूर किया है । आज बागानों में यदि मजदूर भूख से मरने के लिए मजबूर है तो उसका आधा दोष सिर्फ ऐसे मजदूर संघों पर जाता है, जो मजदूरों के प्रति अपने कर्तव्य को जिम्मेदारी के साथ नहीं निभा सकें हैं और मजदूरों के आशाओं पर कुठाराघात किया है ।

यह समय की मांग है कि मजदूर संघ अपने पूरी क्षमता से मजदूरों को पूरी मजदूरी देने के लिए अपनी पूरी क्षमता लगा लगाएॅं । नया मजदूर वेतन समझौता को शोषण का एक नया हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए । यदि वेतन वृद्धि समझौता में सम्मानजनक निर्णय में नहीं पहुॅंचा जा सकता है तो इसे देश के सम्मानीय अदालतों में लाया जाना चाहिए जो देश के आम नागरिकों के अधिकारों का संरक्षक है । 323 रूपये की गणना यदि वैज्ञानिक ढंग से तमाम पहलुओं को दृष्टिगत रखते हुए किया गया है तो इस मामले में मजदूर संघों को अपना इरादा अटल रखना है, अपनी पूरी सामर्थ्य लगाना है । तमाम आशाओं के फूल खिला कर मजदूरों से किए गए वादे से कम वेतन पर वेतन समझौते करने से मजदूर नेतागण मजदूरों की नजरों से गिर जाएॅंगे। यह लेख निरंग पझरा पत्रिका के जुलाई-अगस्त 2014 के अंक में प्रकाशित हुआ था।   This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 18, 2016. All rights reserved

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आदिवासी विकास पॉंचवी अनुसूची के रास्‍ते

नेह अर्जुन इंदवार

आदिवासी समाज युगों से ही एक आजादी पसंद समाज रहा है। वह न तो किसी राज्‍य शक्ति के अधीन कभी रहा था, न ही कोई राज्‍य शक्ति उसके सामाजिक, आर्थिक और सांस्‍कृतिक मूल्‍यों का नियंत्रक था। उस पर वह प्राकृतिक पूजक ही नहीं बल्कि स्‍वाभाव से भी प्राकृतिक जीवन जीने की कला का हमेशा कायल रहा है। वह कभी भी किसी आप्रकृतिक विचारधारा, सांस्‍कृतिक मूल्‍य और सिद्धांत के साथ जीवन जीना नहीं सीखा।

हर मानव स्‍वतंत्र पैदा होता है, लेकिन सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्‍कृतिक और धार्मिक समूह उस पर अपना नियंत्रण स्‍थापित करने का प्रयास जारी रखता हैं, क्‍योंकि बहुसंख्‍यक मानव ही उनकी सत्‍ता और शक्ति का स्रोत होता है। उत्‍पादन, वितरण और खपत पर मानव समूह का ही नियंत्रण होता है। इसीलिए मानवीय समूहों पर प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष नियंत्रण करके ही सभी शक्तियॉं अपनी सत्‍ता को बनाए रखती है।

युगों से आदिवासी समाज को किसी पराए सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक नियमों के तहत बंधने का कोई भी प्रयास पसंद नहीं था। आम आदिवासी दर्शन में समाज को जो कुछ भी प्राप्‍त था, वह सब कुछ प्राकृतिक का दिया हुआ, नैसर्गिक देन था। इसी प्राकृतिक विचारधारा से ओतप्रोत वह न तो जमींदारी प्रथा और न ही अंग्रेजो के द्वारा लादी गई मालगुजारी प्रथा को स्‍वभाविक ढंग से स्‍वीकार किया। भूमि, खेत खलिहान, जंगल, जल, नदी, पहाड, जीवन जीने की मर्जी आदि को प्राकृतिक (ईश्‍वर) का दिया हुआ मानता रहा है और कोई राजा, साम्राज्‍य अथवा किसी शासकीय सत्‍ता को कभी भी इसका मालिक नहीं माना। इन्‍हीं विशेषताओं के कारण आदिवासी समाज को एक स्‍वच्‍छंद, स्‍वतंत्रता पसंद जीवन का स्‍वामी माना गया है। गैर आदिवासी या बाहरी सामाजिक शक्तियॉं चाह कर भी प्रत्‍यक्ष रूप से अपने जीवन दर्शन को उन पर उनकी मर्जी के बगैर थोपने में नाकामयाब रहीं हैं।

सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में भारत के सभी आदिवासी क्षेत्रों में अंग्रेजों की राजसत्‍ता को आदिवासियों ने हथियारबंद चुनौती दिया था। जमींदारों और अन्‍य एजेंटों के माध्‍यम से अंग्रेज अपने शोषण-आधारित राज्‍य व्‍यवस्‍था, जीवन-दर्शन को उन पर लाद रहे थे। आदिवासी समाज से इन सभी का तीब्र विरोध किया गया।

1772-80 का पहाडिया विद्रोह, 1780-85 का तिलका माझी के नेतृत्‍व में संताल विद्रोह, 1795-1800 का तमाड और मुण्‍डा विद्रोह, 1798 का वीरभूम, बांकुडा का चौर विद्रोह, 1798-99 का मानभूम में भुमिज विद्रोह, 1800-02 में तमाड के दुखन मानकी के नेतृत्‍व में मुण्‍डा विद्रोह, 1819-20 में भुखन सिंह मुण्‍डा के नेतृत्‍व में हुए मुण्‍डा विद्रोह, 1832-33 में भागीरथी, दबाई गोसाईं और पटेल सिंह के नेतृत्‍व में हुए खेरवार विद्रोह, 1833-34 में वीरभूम के गंगा नारायण के नेतृत्‍व में भुमिज विद्रोह, 1855-60 के संथाल विद्रोह इसके उदाहरण हैं। उन्‍नीसवीं सदी के दौरान एक पैसे का मोल बहुत था और आदिवासी विद्रोह से अंग्रेज कितने हैरान परेशान या डरे हुए थे कि संथाल विद्रोह के नायक सिद्धू और उसके भाई कान्‍हू को पकडने के लिए उन्‍होंने दस हजार रूपया इनाम घोषित किया था। 1856-57 में बुधुबीर उरॉंव विद्रोह, 1870-80 में तेलंगा खडिया के नेतृत्‍व में हुए विद्रोह, 1874-99 को भगवान बिरसा मुण्‍डा के नेतृत्‍व में उठे उलगुलान आंदोलन, 1914 में गुमला के जतरा उरॉंव (भगत) के नेतृत्‍व में हुए टाना भगत आंदोलन, 1919 में डुवार्स के तेभागा-टाना भगत आंदोलन आदि में लाखों आदिवासियों ने अपने स्‍वतंत्रता और स्‍वराज को बचाए रखने के लिए बलिदान दिया।

उन्‍होंने अंग्रेज और उनके एजेंटों के वजूद को मिटाने के लिए अपना सर्वस्‍व न्‍यौछावर कर दिया था।
जमींदारी प्रथा और प्रशासन के माध्‍यम से आदिवासी अंचलों और समुदायों को नियंत्रित करने का प्रयास आदिवासी समाज की सार्वभौमिकता के लिए एक गहरा धक्‍का था। वे हैरान थे कि ये कैसे लोग और सिस्‍टम हैं जो हम आदिवासियों, हमारी अस्मिता और समाज को अपने नियं‍त्रणाधीन रखने का सजो सामान समझते हैं। ये लोग किस तरह और कैसे प्राकृतिक या ईश्‍वर का स्‍थान लेने का प्रयास कर रहे हैं। आदिवासी समाज में युगों से समता और समानता की भावना और मूल्‍य गहरे मन:स्थिति में पैठ चुकी थी। वे अपने को न तो किसी से ऊँच या श्रेष्‍ठ समझते थे न ही किसी को अपने से कमतर। दो मानव के बीच असमानता की भावना समाज में दूर-दूर तक नहीं थी। समाज में धर्म, संस्‍कृति, भाषा, खेती-पद्धति, शादी-विवाह, पर्व-त्‍यौहार, नृत्‍य-गीत, हॅसी-मजाक या शिकार जैसे सामूहिक कार्यो में कभी ऊँच-नीच, भेदभाव की परंपरा का विकास नहीं हो पाया। लेकिन पक्षपातीय भावनाओं और कमजोरों के शोषण पर आधारित सिद्धांत के द्वारा समाज को नियंत्रित करने की बाहरी दुर्गुणों को समाज हमेशा अस्‍वीकार किया और गैर-आदिवासी मूल्‍यों को थोपने की कोशिश करने वालों के प्रति समाज प्रतिहिंसक हो उठने तक अपनी भावना को प्रकट किया।

अपने जीवन पद्धति, स्‍वशासन और स्‍वतंत्रता के प्रति अत्‍यंत संवेदनशील आदिवासियों के हिंसक प्रतिरोधी आंदोलनों को ध्‍यान में रखते हुए अंग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों के लिए शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक (The Scheduled District Act of 1874 (Act XIV of 1874) बनाया। शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक के लिए ब्रिटिश शासन व्‍यवस्‍था के तहत सेंट्रल और प्रोविंसियल लेजिस्‍लेटिव को कानून बनाने का हक नहीं था। लेकिन गवर्नर-इन-कौंसिल को हक था कि वह सेंट्रल और प्रोविंसियल कौसिलों के द्वारा पारित किसी भी कानून को शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक में लागू करने का आदेश दे सकता था, किन्‍तु गवर्नर जनरल के द्वारा उक्‍त कानून के किसी भाग के अपवाद और संशोधन (subject to such exceptions or modifications as the Governor thinks fit) की अनुमति होने के बाद। Montague-Chelmsford Reforms treated में इन्‍हीं क्षेत्रों को Backward Tracts कहा गया और भारत सरकार अधिनियम 1919 को इन क्षेत्रों में लागू करने से रोका गया ।

भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बढ रहे असंतोष को कुंद करने के लिए बनाए गए सुधारवादी कानूनों को आदिवासी क्षेत्रों में लागू नहीं किया। अंग्रेजों का मत था कि अगडी भारतीय समुदाय सुधारवादी कानूनों की आड में पिछडे आदिवासी क्षेत्रों में शोषण करेंगे और उससे उपजे असंतोष की भावना से ब्रिटिश शासन को नुकसान पहॅुंचेगा। लेकिन कुछ समय उपरांत इन क्षेत्रों (शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिकों) को दो भागों में बॉट कर कुछ भागों में आंशिक रूप से सुधारवादी कानूनों को लागू किया गया। इन्‍हीं दो भागों को भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत साइमन कमिशन के सुझाव के अनुसार Excluded Areas and Partially Excluded Areas कहा गया और प्रस्‍ताव दिया गया कि इन क्षेत्रों का प्रशासन प्रांतीय सरकार से लेकर भारत सरकार के हाथों में दिया जाए। इन क्षेत्रों में गवर्नर जनरल की विशेष अनुमति के सिवा कोई भी साधारण कानून, अपवादों और संशोघन के शर्तो के सिवाय, लागू नहीं होता था। इन क्षेत्रों में किसी भी कानून को तब तक लागू नहीं किया जा सकता था, जब तक कि स्‍वयं गवर्नर जनरल अपने विवेकाधीन शर्तो के सहित अनुमति न दें। इन्‍हीं क्षेत्रों में ही देश की आजादी के बाद पॉचवी अनुसूची के प्रावधानों को लागू किया गया । उत्‍तरपूर्वी राज्‍यों को छोडकर देश के अन्‍य हिस्‍सों में बसने वाले अनुसूचित जनजाति के सांस्‍कृतिक, सामाजिक, प्राकृतिक, राजनैतिक, आर्थिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए संविधान की धारा 244 (1) के उपबंध बनाए गए।

शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक बना कर आदिवासियों को साधारण कानून से मुक्‍त रखने का प्रमुख कारण था कि प्रगतिशील समाजों पर शासन करने के लिए बनाए गए कानून और उसके नियम काफी दुरूह, जटिल और विभिन्‍न प्रकार से व्‍याख्‍या पर आधारित होते हैं। उन कानूनों और नियमों के सहारे कानून की बारीक जानकारी रखने वाले समाज या समूह उन्‍हें अपने शोषण का माध्‍यम बना सकते हैं। शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक बना कर एक ओर उन्‍हें कानूनी दॉव पेंच और मुकादमेबाजी के वातावरण से बचाया गया, दूसरी ओर उन्‍हें इसके माध्‍यम से स्‍थानीय शासन स्‍वयं चलाने के लिए ऑटोनोमस दिया गया।
Gazette of India, 1881,Pt.I p.74 के अनुसार The Scheduled Districts Act, 1874 (14 of 1874), के द्वारा जलपाईगुडी जिला के पश्चिम जलपाईगुडी और पश्चिमी डुवार्स को शिड्यूल्‍ड डिस्ट्रिक के रूप में घोषित किया गया था। उल्‍लेखनीय है कि रंगपुर जिला के उत्‍तरी भाग और पश्चिम डुवार्स (वर्तमान डुवार्स अंचल) (असम के ग्‍वालपाडा आदि कुछ जिले कभी पूर्वी डुवार्स के रूप में जाने जाते था) को मिला कर 1869 में जलपाईगुडी जिले का गठन किया गया था। तब तक डुवार्स तराई में अनेक चाय बगान बन चुके थे और यहॉं छोटानागपुर, संथाल परगाना के मजदूर स्‍थायी रूप से बस गए थे। उल्‍लेखनीय है कि शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक एक्‍ट 1874 के द्वारा ही छोटानागपुर डिविजन के हजारीबाग, रॉंची, पलामू, मानभूम, परगना ढालभूम और सिंहभूम के कोल्‍हन क्षेत्र को भी शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक के रूप में घोषित किया गया था। तब बिहार और उडिसा राज्‍य ब्रिटिश बंगाल का ही हिस्‍सा था और छोटानागपुर के जिले और जलपाईगुडी जिला आदि ब्रिटिश बंगाल प्रांत का ही भाग था। उन्‍नीसवीं सदी में छोटानागपुर (रॉंची, हजारीबाग) संथाल परगाना के आदिवासी काम की खोज में किसी अन्‍य प्रांत में नहीं गए थे, बल्कि अपने ही प्रांत अर्थात तत्‍कालीन बंगाल के अन्‍य जिले अर्थात् जलपाईगुडी और दार्जिलिंग में काम करने आए थे। दूसरे शब्‍दों में बंगाल के आदिवासी मूल रूप में बंगाल के ही वासिंदे हैं और आदिवासी धर्म, भाषा, संस्‍कृति आदि बंगाल की मिट्टी की पैदाइश है।
भारतीय शासन व्‍यवस्‍था के विकेन्‍द्रीकरण, आदिवासी समाजों की विशिष्‍ट पहचान और सांस्‍कृतिक सम्‍पदा को बचाए रखने, उनके सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक हितों की रक्षा करने के लिए संविधान निर्माताओं ने देश के आदिवासी क्षेत्रों को दो हिस्‍सों में बॉंटा। Excluded and Partially Excluded Areas को अनुच्‍छेद 244 (1) (पॉंचवी अनुसू‍ची) तथा अनुच्‍छेद 244 (2) छटवीं अनुसू‍ची) (ट्रायबल क्षेत्र) के प्रावधानों के अन्‍तर्गत उन्‍हें स्‍वायतता प्रदान किया गया।

डुवार्स और तराई के आदिवासी चाय अंचलों में बसे हैं। उनकी बदहाली और विपन्‍नता किसी से छिपी नहीं हैं। वे दिहाडी आय पर सम्‍पूर्ण रूप से निर्भर हैं और इन्‍हीं रोजगार के साधनों पर प्रत्‍यक्ष अथवा अप्रत्‍यक्ष रूप से अंकुश रखकर आज आदिवासी समाज पर नियंत्रण रखा जा रहा है। उन्‍हें सीमित आय पर रहने के लिए मजबूर करके उनकी शिक्षा, संस्‍कृति, सामाजिक और अन्‍य आर्थिक कार्यकलापों पर सीधा नियंत्रण रखा जा रहा है। एक आजाद देश में गुलाम जनता कैसी होती है, उसका यह एक जीता जागता उदाहरण है। चाय अंचल के कल्‍याण के लिए टी प्‍लांटेशन एक्‍ट लागू किया गया है। लेकिन वह कागजों में सीमित है। डुवार्स तराई के 300 चाय बागानों में शायद ही कोई एक ऐसा बागान होगा, जिसमें टी प्‍लांटेशन एक्‍ट का उल्‍लंघन न किया गया हो। लेकिन आज तक किसी बागान या प्रबंधन के विरूद्ध कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। Employees provident Fund के अरबों रूपये के गबन में दिखावे के लिए भी कार्रवाई नहीं की गई। चाय बागानों में शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य का कोई पुख्‍ता प्रबंध नहीं, लेकिन लेबर कमिशन और प्रशासन ऑखें बंद किए बैठा है। ऐसा लगता है, राज्‍य सरकार के इन कल्‍याणकारी विभागों का विवेक भी चाय बागानों की तरह ही बदहाल है। मजदूरों को नेतृत्‍व प्रदान करने का दावा करने वाले श्रमिक संघ हर बार न्‍यूनतम वेतन से कम में वेतन समझौता करके अपनी काबलियत का प्रदर्शन करते रहे हैं। आदिवासी कल्‍याण के नाम पर करोडों रूपये बहा कर भी राज्‍य सरकार के दूरदर्शी विवेकवान प्रशासकगण आदिवासी क्षेत्रों में विकास की नदियाँ बहाने में नकाम रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में आदिवासी जनता आजादी के बाद ही दोयम दर्जे का व्‍यवहार पाती रही है। संविधान की पॉचवीं अनुसूची के अन्‍तर्गत 25 अगस्‍त 1953 को Tribal Advisory Council का गठन किया गया था। लेकिन Tribal Advisory Council ने आदिवासी हित में क्‍या-क्‍या निर्णय लिया या पश्चिम बंगाल के राज्‍यपाल को क्‍या-क्‍या परामर्श दिया, यह आज तक आदिवासी जनता जान नहीं पाई है। पश्चिम बंगाल में Tribal Advisory Council तो बना दिया गया, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों को स्‍वशासन देने के लिए कोई कदम नहीं बढाया गया और किसी भी आदिवासी क्षेत्र को शिड्युल्‍ड एरिया घोषित नहीं किया। इसका मतलब यही हुआ कि आदिवासी संस्‍कृति, भूमि, भाषा, समाज को शोषण से बचाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। जबकि राज्‍य के प्रशासन को संविधान द्वारा यह निर्देशन स्‍पष्‍ट रूप से दिया गया था। यदि आदिवासी क्षेत्रों को श्डियुल्‍ड एरिया घोषित किया जाता तो उनका हाल आज इतना खराब नहीं होता। संविधान में विशेष उपबंध रहते हुए भी आदिवासी समाज को सामान्‍य कानूनों के हवाले कर दिया गया। इसका प्रतिफल यह हुआ कि आदिवासी समाज शोषण के एक अंतहीन चक्र में फंस कर अपना सर्वस्‍व खोता रहा। ममता मुखर्जी की नई सरकार के द्वारा 14 मार्च 2012 को Tribal Advisory Council के नियम में संशोघन जारी किया गया, लेकिन अभी तक इसके गठन की घोषणा नहीं हुई है। आदिवासी समाज के हित में काम करने वाले करीबन सभी संगठनों को इस बात का पता है, लेकिन किसी भी संगठन ने अब तक इस बात को पुख्‍ता अंदाज में नहीं उठाया है। आदिवासी समाज को नेतृत्‍व प्रदान करने वाले पॉचवी अनुसूची के बदले वर्षो तक छटवीं अनुसूची की मांग करते रहे हैं। संविधान में उपयुक्‍त संशोधन के बिना कोई भी सरकार चाह कर भी छटवीं अनुसूची के उपबंधों को पश्चिम बंगाल के आदिवासी अंचलों में लागू नहीं कर सकती है। पता नहीं किसने छटवीं अनुसूची का राग छेड कर इतना समय और उर्जा का अपव्‍यय करवाया और भोलेभाले आदिवासी जनता को गलत ख्‍वाब दिखलाया।

एक समय था जब आदिवासी समाज किसी का गुलाम नहीं था। लेकिन आज तो सभी लोग आदिवासी समाज को अपना गुलाम बनाना चाहते हैं। गैर आदिवासी तथा अपने स्‍वार्थ में लिप्‍त ताकतें तो आदिवासियों को सामाजिक, सांस्‍कृतिक, भाषाई, आर्थिक और सामाजिक रूप से गुलाम बनाना ही चाहती हैं और बहुत हद तक वे कामयाब भी रहे हैं। लेकिन विडंबना की बात तो यह है कि अनेक आदिवासी भी अपने व्‍यक्तिगत लाभ के लिए उन्‍हें गुलाम बनाए रखना चाहते हैं। आज आदिवासियों के वोट, उनकी ताकत और एकता को अपने व्‍यक्तिगत व्‍यावसायों को सपोट करने, अपनी ठेकेदारी को मजबूती देने के लिए ही कई लोग आदिवासी समाज का नेता बनना चाहते हैं और वे इसमें कामयाब भी रहे हैं। ऐसे लोगों की दिली ख्‍वाहिश है कि आदिवासी जनता उनके कदमों के नीचे ही रहे।

भारत के अनेक राज्‍यों में पॉंचवी अनुसूची के प्रावधानों को लागू करके आदिवासी समाज को शोषण से बचाने के लिए संवैधानिक संरक्षा दी गई है। पश्चिम बंगाल में आदिवासियों की दशा और दिशा अत्‍यंत शोचनीय है इसमें दो राय नहीं है। पश्चिम बंगाल के आदिवासियों के कल्‍याणार्थ पॉंचवी अनुसूची के प्रावधानों के अन्‍तर्गत ट्राइबल एडवाजरी कौंसिल का गठन भी किया जाता है। संविधान में राज्‍यपाल को आदिवासियों का संरक्षक कहा गया है। आदिवासी समाज में निरंतर बढ रहे शोषण और उससे उपजे असंतोष को दूर करने के लिए आदिवासी अंचलों को शिड्युल्‍ड एरिया बनाना आज समय की मांग है। जो आदिवासियों का सच्‍चा हितैषी होगा वह इस मांग से असहमत नहीं होगा। 1874 में आदिवासी जनता को शोषण और अन्‍याय से बचाने के लिए शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक बनाया गया था। लेकिन आज तो आदिवासियों की हालत सर्वाधिक शोषित और वंचित है ऐसे में संविधान में उनके उपचार के लिए बनाए गए प्रावधान ही सच्‍चे रूप से आदिवासी जनता का उद्धार कर सकता है और यह उद्धार सिर्फ पॉंचवी अनुसूची को लागू करके ही हो सकता है।♠ This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 2016. All rights reserved

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