पेड़ो के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी।

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♡. पेड़ धरती पर सबसे पुरानें living organism हैं, और ये कभी भी ज्यादा उम्र की वजह से नही मरते.
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♡. हर साल 5 अऱब पेड़ लगाए जा रहे है लेकिन हर साल 10 अऱब पेड़ काटे भी जा रहे हैं.
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♡. एक पेड़ दिन में इतनी ऑक्सीजन देता है कि 4 आदमी जिंदा रह सकें.
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♡.देशों की बात करें, तो दुनिया में सबसे ज्यादा पेड़ रूस में है उसके बाद कनाडा में उसके बाद ब्राज़ील में फिर अमेरिका में और उसके बाद भारत में केवल 35 अऱब पेड़ बचे हैं.
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♡.दुनिया की बात करें, तो 1 इंसान के लिए 422 पेड़ बचे है. लेकिन अगर भारत की बात करें,तो 1 हिंदुस्तानी के लिए सिर्फ 28 पेड़ बचे हैं.
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♡. पेड़ो की कतार धूल-मिट्टी के स्तर को 75% तक कम कर देती है. और 50% तक शोर को कम करती हैं.
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♡. एक पेड़ इतनी ठंड पैदा करता है जितनी 1 A.C 10 कमरों में 20 घंटो तक चलने पर करता है. जो इलाका पेड़ो से घिरा होता है वह दूसरे इलाकों की तुलना में 9 डिग्री ठंडा रहता हैं.
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♡. पेड़ अपनी 10% खुराक मिट्टी से और 90% खुराक हवा से लेते है. एक पेड़ में एक साल में2,000 लीटरपानीधरती से चूस लेता हैं.
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♡. एक एकड़ में लगे हुए पेड़ 1 साल में इतनीCo2सोख लेते है जितनीएक कार 41,000 km चलने परछोड़ती हैं.
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♡. दुनिया की 20% oxygen अमेजन के जंगलो द्वारा पैदा की जाती हैं. ये जंगल 8 करोड़ 15लाख एकड़ में फैले हुए हैं.
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♡. इंसानो की तरह पेड़ो को भी कैंसर होती है.कैंसर होने के बाद पेड़ कम ऑक्सीजन देने लगते हैं.
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♡. पेड़ की जड़े बहुत नीचे तक जा सकती है. दक्षिण अफ्रिका में एक अंजीर के पेड़ की जड़े 400 फीट नीचे तक पाई गई थी.
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♡. दुनिया का सबसे पुराना पेड़स्वीडन के डलारना प्रांतमें है.टीजिक्कोनाम का यह पेड़ 9,550 साल पुराना है. इसकी लंबाई करीब 13 फीट हैं.
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♡.किसी एक पेड़ का नाम लेना मुश्किल है लेकिन तुलसी, पीपल, नीम और बरगद दूसरों के मुकाबले ज्यादा ऑक्सीजन पैदा करते हैं.

संकलित.

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खाली पेट न खाएँ लीची, यह जानलेवा हो सकती है

हाल ही में भारतीय और अमेरिकी डाक्टरों की एक टीम ने अपनी संयुक्त जाँच में पाया कि खाली पेट लीची खाने से पेट में methylenecyclopropylglycine (MPCG) केमिकल जमा हो जाता है और इससे हाइपोग्लाइसेमिया या लो-ब्लड शुगर की समस्या हो जाती है।

उत्तर बिहार के लीची क्षेत्र मुजफ्फरपुर में हर साल होने वाले बच्चों की मौत प्रशासन और मेडिकल साईंस के लिए एक पहेली बनी हुई थी। भारत सराकर के अधीन राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र और संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के रोग नियंत्रण और निषेध सेंटर ने इस विषय पर संयुक्त जांच की और इसके बाद इस नतीजे में पाया गया कि खाली पेट लीची खाने से बच्चों की मौत हो रही है।

लीची में methylenecyclopropylglycine (MPCG) केमिकल प्राकृतिक रूप में मौजूद होता है और खाली पेट खाने के कारण से बच्चों को दिमागी बुखार होता और दौरे पड़ने लगते हैं।  प्रसिद्ध मेडिकल पत्रिका ‘द लैनसेट’ में इस विषय पर रिपोर्ट प्रकाशित की गई है। रिपोर्ट के अनुसार अक्सर बच्चे रात में बिना भोजन किए सो जाते हैं। इससे शरीर में हाइपोग्लाइसीमिया या लो-ब्लड शुगर की समस्या आती है। सबेरे खाली पेट लीची खाने से कुपोषित बच्चों में यह समस्या बढ़ जाती है।

लीची एक मौसमी फल होने के कारण इसके सेवन के कई फायदे भी हैं।  इसमें प्रति 100 ग्राम में 66 कैलोरी होती है। इसमें क्लोस्ट्रॉल बनने के वसा नहीं होते हैं और काफी मात्रा में फाइबर, विटामिन्स और एंटी ऑक्सिडेंट होते हैं। 

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व्यापार कैसे किया जाए ?

                                                                                                                                                                                         नेह अर्जुन इंदवार 

आदिवासी समाज में व्यापार या व्यवसाय न के बराबर किया जाता है । जहाँ आदिवासियों की 10 हजार आबादी है वहाँ भी आदिवासी व्यापार करते हुए नहीं पाए जाते हैं और ऐसी आबादी वाली बस्ती में भी गैर आदिवासी ही दुकान चलाते हुए व्यापार करते पाए जाते हैं । सवाल उठता है, कि क्यों आदिवासी अपने ही गाँव-घरों के आसपास भी व्यापार नहीं करता है ? क्या उनमें व्यापार करने की योग्यता नहीं होती है ? क्या उनमें व्यापार करने के लिए आत्मविश्वास नहीं होता है, या पूँजी नहीं होती है ? क्या आदिवासी को व्यापार का फंडा मालूम नहीं होता या वह व्यापार को फालतू का काम समझता है ?

सवाल है कि व्यापार क्या है? दुकानदारी क्या है और इसे चलाने का फंडा क्या है ? कई लोग व्यापार के फंडे को नहीं समझते हैं और कई लोग इसलिए व्यापार नहीं करते कि वे इसे चलाने के लिए आवश्यक समझदारी नहीं रखते । कई लोग इसलिए भी व्यापार नहीं करते क्योंकि वे व्यापार के दम पर आगे बढ़ने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास नहीं रखते और अपने सीमित अनुभव के आधार पर व्यापार के बारे एक निश्चित पैमाने पर अपनी सोच को बाँध कर रख लेते हैं । मसलन, इस जगह पर व्यापार या दुकानदारी नहीं चलेगा, दुकानदारी के लिए किसी खास जगह या बाजार के बीच दुकान होनी चाहिए, किसी खास इलाके में खास चीज ही बिकती है ।

यदि किसी जगह पर किसी एक का दुकान बहुत चल रहा है तो उन्हें लगता है उस दुकान पर बिकने वाली चीजों के अलावा दूसरी चीजें वहाँ नहीं बिकेगी। कई लोगों को लगता है कि आदिवासी बहुत हिसंगा वाले होते हैं, वे उनके दुकान से माल लेने के बदले मोदी के दुकान से माल ले लेंगे । सामाजिक ढर्रे के बाहर कुछ नया करने वाले आदिवासियों से समाज के लोग सही ढंग से व्यवहार नहीं करते हैं । पास -पड़ोसी या लोगों में मन में अपने समाज के किसी नये व्यवसायी या उद्यमी के लिए प्रशंसा के भाव के बदले हिसंगा का भाव ज्यादा पैदा होता है । तरह-तरह के पूर्वाग्रह, बेतुके, असंगत, तर्कहीन और गैर संभावना वाले विचार आते हैं । यह कुछ सीमा तक सही हो सकता है, लेकिन पूरी तरह ऐसी ही स्थिति होगी यह तो कोई कह नहीं सकता है । कई लोग व्यापार को किस्मत की बात कहते हैं, तो कई लोग किसी भी तरह की नौकरी को व्यापार से अधिक अच्छा मानते हैं । कहते हैं हाथों की लकीर से हाथों की मेहनत वजनदार होती है । कई लोगों को लगता है कि बिना पढे़-लिखे व्यापार या दुकानदारी नहीं की जा सकती है ।

आइए, दुकानदारी और व्यापार के कुछेक फंडों के बारे बातें करते हैं —

दुकानदारी या व्यवसाय करने के लिए मूल रूप में तीन चीजों की जरूरत होती है। पहला है, आदमी की इच्छाशक्ति और इसके प्रति झुकाव । दूसरा, पूँजी की उपलब्धता और तीसरा, दक्षता अर्थात दुकानदारी, व्यवसाय के लिए आवश्यक व्यावहारिक ज्ञान । कई कहते हैं, उनके पास इसके लिए व्यावहारिक ज्ञान नहीं है । कई कहते हैं, उनके पास पूँजी नहीं हैं । कहते हैं, पूँजी बिना व्यवसाय करने के बारे सोच भी नहीं सकते हैं । मूल रूप से तीन चीजें इच्छा या व्यापार के प्रति झुकाव, दक्षता और पूँजी अर्थात् Attitude, skills and capital चाहिए। 

इन तीन में से महत्वपूर्ण है इच्छाशक्ति । सर्वप्रथम तो दुकानदारी के लिए व्यक्ति के पास इच्छा होनी चाहिए । बिना इच्छा के आदमी व्यापार तो क्या जिन्दगी में कुछ भी नहीं कर सकता । इच्छा हो, तो हुनर अपने आप आ जाता है । जब एक बार हुनर आप के पास आ जाता है और इच्छा भी अपनी जगह कायम रहती है, तो पूँजी Capital बहुत बड़ी चीज नहीं रह जाती है । लाखों व्यापारी हैं जो अपनी तीव्र इच्छाशक्ति, रवैया, मेहनत के बल पर बिना हुनर और पूँजी के कामयाब व्यापारी बने हैं ।

रिलांयस इंडस्ट्री के संस्थापक स्वर्गीय धीरूभाई अंबानी एक स्कूल टीचर का बेटा था, उसके पास पूँजी के नाम पर सिर्फ एक साइकिल हुआ करता था। लेकिन अपनी तीव्र इच्छाशक्ति, मेहनत के बल पर सिर्फ 25 वर्षों में ही भारत का सबसे कामयाब और सबसे धनी उद्योगपति बन दिखा दिया, कि दुनिया में सफलता के लिए कमर कस कर आगे बढ़ने वालों को दुनिया किसी भी तरह रोक नहीं पाती है । इच्छाशक्ति के सामने हर चीज बौनी हो जाती है। व्यक्ति की तीव्र इच्छाशक्ति के बल पर अन्य चीजें खुद चल कर उनके पास आती है। दूसरे शब्दों में इच्छाशक्ति एक अदृश्य चुंबक है, जो अन्य चीजों को अपने पास खींच लाती है।

कई लोगों को लगता है कि व्यापार करने, दुकानदारी करने के लिए शिक्षा की बहुत जरूरत है, यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, लेकिन हर मामले में यह सही हो, यह जरूरी नहीं । आप अपने आसपास देखिए, आपके पड़ोस का कामयाब दुकानदार कितना पढ़ा लिखा है ? आप किसी भी बाजार या हाट में जाइए और व्यवसायियों से पुछिए कि वे कितने पढ़े-लिखे हैं ? भारत की आजादी के समय भारत के दो भागों में बंटने के कारण लाखों लोग सिर्फ अपने पहने हुए कपड़ों में रिफ्यूजी बनने के लिए मजबूर हुए, लेकिन वे नयी जगह में जाकर व्यवसाय और दुकानदारी के बल पर आज कहाँ से कहाँ पहुँच गए हैं । उन्हें भी लगता रहा होगा कि उनके पास न तो दुकानदारी का हुनर है, न ही पूँजी और न ही अनुभव । लेकिन समय आदमी को हुनर भी सीखा देता है और अनुभव, जिंदगी तथा व्यवसाय को नये अंदाज में देखने के लिए नयी दृष्टि देता है ।

नये लोगों को लाखों-करोड़ों की पूँजी भी नहीं चाहिए होती है, क्योंकि वे इतने भारी भरकम जिम्मेदारी को उठा नहीं सकते हैं । उन्हें तो छोटा सा एक दुकान ही धीरे-धीरे सभी चीजों को सिखाता है और अनुभवी बनाता है । एक छोटा दुकान ही एक बड़ा स्कूल और विश्वविद्यालय बन जाता है । दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति रहे बिल गेट्स मैट्रिक तक भी पढ़े-लिखे नहीं थे, उसके पास इतना पैसा भी नहीं था कि वे कोई बड़ा व्यवसाय शुरू करते, उसने अपने ही घर में एक छोटा-सा व्यवसाय शुरू किया और फिर समय के साथ अपनी मेहनत के बल पर उसे बड़ा बनाने में लगे रहे । शुरूआत में उसके साथ काम करने वाली एक सेकेट्री कहती हैं –

“मैं जब उनके यहाँ काम करने के लिए गयी तो मुझे अपने निर्णय पर पछतावा हुआ, कि मैं एक बहुत साधारण से व्यक्ति, जिनके पास न तो पूँजी थी, न ही अनुभव, के पास काम करने के लिए आई हूँ, मैं कई दिन काम करने के बाद वहाँ काम छोड़ने ही वाली थी।”

लेकिन बिल गेट्स के पास व्यवसाय के लिए बहुत तेज इच्छाशक्ति थी, वह जी-तोड़ मेहनत करने में विश्वास करता था और नये अवसर की तलाश में अपने काम को लगातार करता रहा और सिर्फ कुछ ही सालों में वह दुनिया का सबसे धनी और सफल व्यक्ति बन बैठा ।

आदिवासी इलाकों में अपने ही लोगों के बीच व्यवसाय करने, महज एक छोटे-से दुकान से ही शुरूआत की जा सकती है। दुकानदारी या व्यवसाय ऐसा काम नहीं होता है जहाँ कुछ दिन काम किया और फिर दूसरे काम की खोज में निकल पड़े । एक दुकान, जो सिर्फ चार-पाँच सामानों से शुरू होता है, और थोड़े ही समय में उस दुकान में सैकड़ों सामान आ जाता है । थोक सामानों के बिक्रेता अपनी गाड़ियों के माध्यम से छोटे-छोटे दुकानों में बाकी अर्थात् उधारी में सामान देते हैं और उसके बिक्री होने के बाद पैसे मांगते हैं, या बिक्री नहीं होने पर अपने सामान को वापस लेकर जाते हैं और दूसरे सामान बिक्री के लिए देते हैं ।

दुकानदार हर सामान से मुनाफा कमाता है, किसी में कम तो किसी में ज्यादा । लेकिन दुकानदार अपना मालिक खुद होता है, उसे किसी दूसरे के पास काम मांगने के लिए नहीं जाना होता है, न ही वह किसी के अधीन में काम करता है । यदि वह मेहनती होगा तो दिन दुनी रात चैगुनी कमाई कर सकता है । बस उसे अपने व्यापार को लोगों की आवश्यकता अनुसार बनाना होगा और उसके अनुरूप अपने व्यवहार को ढालना होगा । एक मिलनसार, हँसमुख और मीठी बात बोलने वाले दुकानदार से सामान लेना लोगों को अच्छा लगता है । दुकानदार को थोड़े ही दिनों में पता चल जाता है कि कौन सा सामान अच्छा है और कौन सा खराब । कौन सा सामान अधिक बिकता है और कौन सा सामान यूँ ही पड़ा रहता है। लोगों को किस तरह के सामानों की जरूरत अधिक होती है और किन सामानों के लिए वे अधिक पैसा चुकाने के लिए भी तैयार रहते हैं।

छोटे-मोटे पूँजी से शुरू करने वाले व्यवसाय के लिए तो आसपास ही बड़े थोक व्यापारी से माल मिल जाता है । बहुत ऐसे व्यापारी होते हैं जो एक साथ खुदरा व्यवसाय के साथ अधिक मात्रा में सामान लेने वालों को दस से लेकर तीस-पैंतीस प्रतिशत छूट देकर सामान बेच कर थोक व्यापारी के रूप में भी व्यवसाय करते हैं । कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलौर, अहमदाबाद, सूरत, दिल्ली, लुधियाना, सिलीगुड़ी, गुवाहाटी आदि कई बड़े शहर हैं जहाँ कई बाजारों में सिर्फ थोक के भाव में सामानों की बिक्री की जाती है । कोलकाता में बड़ा बाजार एक ऐसा ही बाजार है जहाँ थोक के भाव में सामान खरीद कर पूरे उत्तर पूर्व भारत के व्यवसायी अपना व्यवसाय करते हैं। इन बाजारों में हर सामान थोक के भाव में मिलते हैं। जो साड़ी, बाजार में चार सौ रूपये में बिकता है, वह यहाँ थोक के भाव में सिर्फ 150 से लेकर 200 रूपये में ही मिल जाता है । व्यापार के इच्छुक आदिवासी युवकों को इन बाजारों में आकर देखना चाहिए और नये आइडिया तथा अनुभव लेनी चाहिए । पूरे आदिवासी इलाकों में ही उपरोक्त शहरों से ही सारा सामान आता है और यदि दूसरे लोग व्यवसाय कर सकते हैं, तो एक आदिवासी क्यों नहीं कर सकता ?

नयी दुकानदारी, व्यवसाय या अन्य कोई व्यापार शुरू करने वाले के पास पूँजी की आवश्यकता होती है, लेकिन यह आवश्यकता इच्छाशक्ति के मुकाबले कम महत्व की होती है । इच्छाशक्ति रहने पर महज दो-चार सौ रूपये से भी व्यवसाय शुरू की जा सकती है। यह पूँजी व्यापार की शिक्षा देती है और इसी के बल आगे बढ़ना है, यह भी याद दिलाते रहती है । व्यापार में पूँजी बहुत तेजी से बढ़ती है । व्यापार में अधिक पूँजी की आवश्यकता पर व्यापारी या व्यवसायी को बैंक ऋण देने के लिए हमेशा तैयार रहता है। आदिवासी व्यवसायी आदिवासी विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत प्राप्त होने वाले ऋण के लिए भी कोशिश कर सकता है । इसमें सब्सिडी भी मिलता है, अर्थात् या तो आपको ऋण पर ब्याज कम देना होगा, अथवा ऋण के बीस से तीस प्रतिशत भाग को वापस करने की जरूरत भी नहीं होगी । लेकिन एक सच्चा व्यवसायी मुफ्त में मिलने वाले ऋण की बाट नहीं जोहता है ।

दुकानदार या व्यवसायी को स्थानीय सरकारी महकमे से लाईसेंस भी लेनी होती है । कई व्यापार करने के लिए लाईसेंस की जरूरत नहीं होती है । लेकिन लाईसेंस रहने पर बैंक से ऋण लेने में सुविधा होती है। बैंक में बचत खाता की जगह करेंट एकाउण्ट खोला जा सकता है, जिसमें आवश्यकता होने पर आॅवरड्राफ्ट की भी सुविधा मिलती है, अर्थात् आपके बैंक में आवश्यक फंड नहीं रहने पर बैंक आपको कुछ दिनों के लिए आपके अपने फंड से अधिक पैसे निकालने की सुविधा दे सकता है।

एक व्यवसाय या व्यापार में व्यक्ति को हमेशा अपने हित में कार्य करना होता है। वह अपने व्यापार का मालिक खुद होता है इसलिए उसे चैबीसों घंटे अपने दिमाग को उसी दिशा में रखना होता है, इससे व्यापारी अनावश्यक और फालतू आदतें, जैसे बिना मतलब के वक्त को बर्बाद करना या संगी- साथी के साथ घूमने-फिरने से बच सकता है। हँडिया-दारू पीने की आदत से भी छुटकारा पाया जा सकता है । एक व्यापारी के पास हमेशा पैसा होता है, वह उन पैसों से उन सामानों को सहज ही खरीद सकता है, जिसे कोई कम दाम में बेचना चाहता है । पैसा हमेशा पास में रहने से व्यक्ति को कई फायदा होता है, वह पैसे से पैसा पैदा करने के लिए अधिक मेहनत कर सकता है । इससे मानसिक क्लेश भी कम होता है, क्लेश कम होने से मन की शाँति भी रहती है । सबसे बड़ी बात होती है, वह अपनी मर्जी का मालिक खुद होता है और किसी के अंडर में काम करना नहीं होता है । एक बार व्यवसाय जम जाने पर वह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है और पूरे घर वाले इससे लाभांवित होते हैं। जबकि नौकरी में सिर्फ एक आदमी को नौकरी मिलती है और उसे एक दिन रिटायर भी होना पड़ता है, फिर उस नौकरी पर घर वालों का कोई हक भी नहीं होता है । लेकिन व्यापार में पूरे घर वालों का इस पर हक होता है और दूसरी तीसरी पीढ़ी को भी उसी व्यवसाय या व्यापार से आय आता रहता है ।

इस लेख को पढ़कर यदि आप अपने पैरों पर खड़ा होना चाहते हैं, तो आज ही इस विषय पर सोचना शुरू कीजिए। आदिवासी समाज में एक बिजनेसमैन बन कर आपकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ जाएगी और आपके स्वालंबन से समाज स्वयं स्वालंबित होगा ।   This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec, 2014. All rights reserved

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गर्भवती के शराब सेवन से गर्भस्थ शिशु पर बुरा असर

इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ पब्लिक हेल्थ ने जिला सुंदरगढ, ओड़िसा के आदिवासी क्षेत्रों में नमूना सर्वे करके पाया, कि गर्भवती रहने के दौरान शराब पीने वाले आदिवासी महिलाओं के बच्चे कम वजन के थे। कम वजन के बच्चों की प्रतिशत 40 से अधिक थी जिसे बहुत अधिक माना गया है। सर्वे में पाया गया, कि गर्भवती महिलाएँ भी अत्यधिक मात्रा में शराब पीती हैं जिसके कारण गर्भ में ही बच्चे के स्वास्थ्य में भारी असर होता है और जन्म के समय ऐसे बच्चों का वजन कम होता है । उल्लेखनीय है कि बच्चे के वजन को उनके स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाता है । कम वजन के बच्चे जन्म के समय ही मौत के शिकार हो जाते हैं या वे अस्वस्थ्य होते हैं ।

सुभाष संवई, डा0 देवराज मिश्र और डा0 संघमित्रा पती द्वारा किए गए अध्ययन “आदिवासी महिलाओं में गर्भकाल के दौरान शराब पीने की आदत” में पाया, कि जनसंख्या का पाँचवा हिस्सा अर्थात् सौ में से बीस महिलाओं नेे हँडिया या महुआ से बने शराब का सेवन किया ।

इन महिलाओं की अधिकतर संख्या को शराब से अपने बच्चे के सामान्य स्वास्थ्य पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव के बारे पता नहीं था। सिर्फ 30 प्रतिशत महिलाएँ शराब सेवन को त्यागने के बारे सोचा करती थी । इन महिलाओं के लिए हँडिया या शराब संस्कृति का एक भाग या दवाई था, न कि नशे का कारक । इसे किसी अनुष्ठान, पर्व-त्यौहारों या किसी सामाजिक अवसरों पर दिया जाता था और अन्य लोगों के अलावा गर्भवती भी इसे ले लेती थी ।

जन्म के समय शिशु का वजन कम होने से उनकी प्रतिरोधी क्षमता कम होती है और शिशु मृत्यृ तथा संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है । गर्भावस्था में शराब के सेवन से शिशु की शारीरिक विकृति का खतरा और सामान्य विकास के क्रम में व्यावधान का खतरा बढ़ जाता है । डा0 पती का कहना है कि आदिवासियों में उच्च प्रतिशत में कमजोर बच्चों का जन्म एक चिंताजनक बात है और जनता में गर्भावस्था के समय शराब सेवन के परिणाम के बारे जागरूकता फैलाने की जरूरत है ।

यह एक चिंताजनक स्थिति हैं क्योंकि शिशु मृत्यु के मामले प्रतिशत रूप से आदिवासी क्षेत्रों में अधिक है । सुंदरगढ़ जिले के साथ राज्य के अन्य आदिवासी बहुल जिलों में भी कमवजन के शिशुओं के जन्म की प्रतिशतता अन्य क्षेत्रों के मुकाबले ज्यादा है ।

निरंग पझरा  :  बच्चे किसी भी समाज के भविष्य होते हैं । उनका सुंदर स्वास्थ्य पूरे समाज की सुंदरता और स्वास्थ्य का मामला होता है । समाज में शराब से बहुत हानि हो रही है, लेकिन गर्भवती के शराब पीने से जिंदगी के प्रथम दिन से ही बच्चे को समस्या होती है, जो बच्चे के भावी जिंदगी के लिए अत्यंत हानिकारक होता है । समाज में सुंदर स्वास्थ्य बच्चों का जन्म बहुत महत्वपूर्ण है । बच्चा माँ के कोख से ही जब स्वास्थ्य रूप से जन्म लेता है, तो वह आमतौर पर सुंदरता और स्वास्थ्य जिंदगी पाता है । हर एक बच्चे को स्वास्थ्य जिंदगी पाने का हक है और माँ बाप ही उसे यह सौगात दे सकते हैं । इसलिए बच्चे के जन्म के पूर्व और बाद में भी शराब से दूरी बना कर रखने से ही घर में खुशियों की किलकरियाँ गूंजती है। ’’’

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