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“आदिवासी” शब्द को विवादास्पद बनाने की एक नयी मुहिम

नेह इंदवार

आदिवासियों की रूढ़ हो चुकी पहचान “आदिवासी” शब्द को विवादास्पद बनाने की एक नयी मुहिम शुरू हुई है। मूल रूप से गैर आदिवासियों और विशेष कर आरएसएस जैसी संस्थाओं द्वारा यह शुरू की गई है। आरएसएस का नाम सीधे-सीधे लेने का मुख्य कारण उनके द्वारा स्थापित वनवासी कल्याण केन्द्र है, जो आदिवासियों और देशवासियों के दिमाग में वनवासी शब्द को ठूँसने के लिए अब तक अरबों रूपये खर्च कर बैठा है। उनके द्वारा पहले सोचा गया होगा कि आदिवासी तो अशिक्षित हैं, सदियों से बेनाम हैं। इसलिए उन्हें कोई भी नाम दे दिया जाए वे उसे स्वीकार कर लेंगे। फिलहाल वे आदिवासी शब्द को अपने परिचय के लिए स्वीकार करके अपने मूलदेश (भारतीय उपमहादेश) में अपने अधिकार की बातें कर रहे हैं। इसलिए उन्हें आदिवासी शब्द से किसी भी तरह दूर किया जाए और कोई दूसरा नाम दे दिया जाए।
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इसी चिंतन धारा में रहते हुए बनवासी या वनवासी नाम को आदिवासियों के बीच फेंका गया। लेकिन शिक्षित हो रहे आदिवासियों ने इसे अपमानजनक शब्द कहते हुए सिरे से ही नकार दिया है । लेकिन वनवासी नाम को आदिवासियों के बीच प्रचलित करने के लिए और उसके दिमाग में डालने के लिए खरबों रुपया तक खर्च कर दिए गए। सैकड़ों आदिवासियों के माईंडवाश करने के खेल के तहत उन्हें पैसा और पद दिए गए। आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, भाषाई, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक स्पर्धा, संघर्ष, लड़ाई और रणनीति से अन्जान लोग उनके फेरे में पड़ गए और वे अपने को वनवासी कहने लगे। दूसरों को भी वनवासी शब्द को अपनाने के लिए प्ररित करने लगे। कई राज्यों में आदिवासी समुदाय अपनी समुदाय और गोत्र के नाम की जगह अपने नाम के साथ “राम” “ओराम” जोड़ने लगे।
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आदिवासी शब्द के उच्चारण मात्रा से ही बोध होता है कि आदिवासी भारतीय उपमहादेश के मूल निवासी हैं। इसलिए आदिवासियों को आदिवासी शब्द से दूर करने के लिए बहुत कोशिशें की जा रही थी। हिंदी में आदिवासी शब्द का साधारण अर्थ है वह समुदाय जो आदिकाल से इस धरा का मूलनिवासी है। आस्ट्रेलिया में 65 हजार वर्ष पुरानी मानव बस्ती के चिह्न पाए गए हैं। https://www.nytimes.com/…/humans-reached-australia-aborigin… वैज्ञानिक खोजों के अनुसार मानवों का मूल पूर्वज अफ्रिका के अपने मूल स्थान से ही दुनिया में छितराए। यदि अफ्रिका से मानव आस्ट्रेलिया गए होंगे तो वे एशिया के रास्ते से ही गए होंगे। एक लाख पूर्व विश्व के महादेश आज जितने दूर नहीं थे। भारतीय महादेश में भी तब से ही इंसानों ने बसना शुरू किया था। राखीगढ़ी में मिले 4500 वर्ष पुराने कंकाल के अध्ययन में वैज्ञानिकों को आर्य जीन नहीं मिला। उस जीन में भारतीय आदिवासियों के जीन के लक्षण मिले हैं। अर्थात् आदिवासी समुदाय आर्यों के आने के 40-50 हजार वर्ष पहले से भारतीय उपमहाद्विप में रह रहे हैं और उन्हें आदिवासी कहना सर्वथा उचित है। आज भारत में रहने वाले आदिवासी या गैर आदिवासी सभी भारतीय हैं। लेकिन आदिवासी अपने मूलनिवासी होने के इतिहास से भावनात्मक जुड़े रहना चाहते हैं और इस स्थिति से उन्हें पदच्यूत करने के लिए कुछ लोग षड़यंत्रों में रत हो रहे हैं।
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जब आदिवासी अनपढ़ थे, दूर दराज के क्षेत्रों में रहते थे तो उन्हें किसी परिचय के शब्द की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन जब वे शिक्षित हुए और एक परिचय के शब्द की जरूरत हुई तो उन्होंने सटीक ढंग से आदिवासी शब्द को चुन लिया है। शब्द चुनने में उनसे कोई गलती नहीं हुई। आदिवासी शब्द से मिलता जुलता शब्द भी हैं, लेकिन आदिवासी कहने से ही एक क्षण में भारत के मूलनिवासी समुदाय का भान होता है।
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पाँचवी अनुसूची, पाँचवी अनुसूची में आदिवासी अधिकार, आदिवासी दिवस आदि कुछ ऐसे नाम-मुद्दे हैं जो आदिवासियों को दूसरे नव-आंगतुकों से अधिक प्राकृतिक अधिकार देता है। आरक्षण का विरोध करने वालों के लिए देश में आदिवासियों का विशेष अधिकार भी आंख की किरकिरी बनी हुई है। इसी क्रम में वे आदिवासियों को आदिवासी शब्द से दूर करने के लिए षड़यंत्र करने में लग गए हैं। इस क्रम में वे आदिवासी शब्द को ही घटिया, असभ्यता, अशिक्षित, कमजोर आदि का पर्याय (शब्द) साबित करने की कुचेष्टा में लग गए हैं।
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यह तो गनीमत रही है कि आजाद देश में आदिवासियों को पढ़ने लिखने की सुविधा प्राप्त हुई और वे अपने बारे में सोचने लगे और दूसरों की कुदृष्टि, कुचेष्टा और षड़यंत्र को समझने लगे हैं। आदिवासियों ने अपना असली परिचय नियत कर लिए हैं। वे अपने को आदिवासी अर्थात् इस देश के सबसे पुराने, मूलवासी घोषित कर लिए हैं और इसका पुरातात्विक सबूत भी सामने आ रहे हैं। अब आदिवासी दूसरों के द्वारा फेंके गए शब्दों से अपना परिचय नहीं गढ़ रहा है। अब उन्हें पता चल गया है कि वह इस धरा का मूल निवासी है और इस मूल निवासी को इंगित करने के लिए हिंदी का आदिवासी शब्द सबसे उचित और सटीक शब्द है। आदिवासी शब्द का वरण कर लेने के कारण आज भारत के सबसे प्राचीन समुदाय आदिवासी के नाम पर अपनी पहचान कायम कर लिया है।

प्राचीन समुदाय ने वनवासी शब्द को पूरी तरह खारिज कर दिया है। खरबों रुपए खर्च करने वालों के लिए यह एक बड़ी हार थी। लेकिन वे अपनी बेइज्जत भरी हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।

पिछले 1 साल से वनवासी शब्द को रोकने की कवायद एकदम कम हो गई है। आप वनवासी शब्द बड़े शहरों के सेठों को बेवकूफ बनाकर उनसे पैसा झटकने का शब्द रह गया है। हाल ही में वनवासी शब्द को सामने रखकर कई बड़े शहरों में हिन्दू अरबपतियों से कई करोड़ रुपए झटक लिए गए हैं। उनसे कहा गया कि वे वनवासियों को हिन्दू बनाने और उन्हें वनवासी परिचय से आबद्ध कर देने के लिए इन पैसों का उपयोग करेंगे। वनवासी शब्द से मिली बेइज्जतपूर्ण हार से तिलमिलाए लोगों ने अब आदिवासी शब्द की जगह अनुसूचित जनजाति शब्द को थोपने के लिए कवायद शुरू कर दिए हैं।

लेकिन अनुसूचित जनजाति शब्द का उत्पादन और उम्र दोनों ही बहुत कम है। आदिवासी शब्द की मांग को संविधान सभा में नहीं माना गया। तब आदिवासियों में इने गिने शिक्षित थे और जातिवादी-वर्णवादी विचारों से संचालित देश में उनके अधिकारों का सम्मान करने के लिए या कराने के लिए कोई महौल उपलब्ध नहीं था। लेकिन विचारणीय बात तो यह है कि यह शब्द सिर्फ उनके लिए प्रयोग में होता है जिन्हें आरक्षण मिलता है। कई समुदायों को आरक्षण से निकाल दिया गया है और कई को हाल फिलहाल आरक्षण दिया गया है। तो क्या जिस दिन किसी का अनुसूचित जनजाति का आरक्षण खत्म हो जाएगा, उस दिन उसका समुदाय का नाम भी बदल जाएगा ? जब किसी समुदाय को आरक्षण दिया जाएगा, क्या उस दिन से वे अपने पुराने नाम को त्याग देंगे और अनुसूचित जनजाति नाम धारण कर लेंगे ? जब आरक्षण खत्म हो जाएगा तो इस शब्द की क्या अहमियत होगी ? अनुसूचित जनजाति शब्द को आदिवासी शब्द के साथ जुड़े मूलनिवासी के भावनाओं का लोप करने और प्रथम निवासी होने के दावों को भोथरा और विलुप्त करने के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है। अनुसूचित शब्द आदिवासियों के असली पहचान को खत्म कर देगा। पुनः जिस दिन आरक्षण खत्म हो जाएगा, उस दिन समुदाय का अस्तित्व और नाम भी खत्म हो जाएगा। मतलब वह पूँछ कटा बंदर बन जाएगा। तब वे ना घर के रहेंगे ना घाट के। ना तो उनका इतिहास बचेगा और न दावा और न अधिकार।

जब आदिवासी समाज अनुसूचित जनजाति शब्द को भी ठुकरा दे रहा है, तो षड़यंत्र के रंग-रूप को बदल दिया जा रहा है। नये पैंतरे के साथ नयी चाल चली जा रही है। संताल, उरांव मुंडा, गोंडी भील शब्द तो अलग-अलग समुदाय का नाम है। इन शब्दों से इनके प्राचीन काल के मूल निवासी होने का कोई स्थायी पहचान नहीं झलकता है। यह ब्राह्मण, जाट, ठाकुर आदि की तरह जाति और समुदाय की पहचान बताने वाले शब्द हैं। इन शब्दों से किसी समुदाय का प्राचीन या आवार्चीन होने का कोई पता नहीं चलता है। लेकिन आदिवासी शब्द पहचान, इतिहास और अधिकार का परिचय देता है। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि भारत में करीबन 3000 से अधिक समुदाय और जाति है, लेकिन कोई किसी ब्राह्मण, वैश्य, ठाकुर का नाम बदलने की चेष्टा नहीं कर रहा है। उनकी दिलचस्पी सिर्फ आदिवासियों के नाम को बदलने में है। आखिर आदिवासियों के साथ उनकी क्या जाती दुश्मनी या दोस्ती है ? जिन्हें सभ्यातों, संस्कृतियों, भाषाओं के संघर्ष के इतिहास और साहित्य के बारे मालूम नहीं है, उनके लिए यह मसला बहुत साधारण विषय लगता है, लेकिन यह साधारण विषय या मुद्दा नहीं है।
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बहुत हैरानी होती है जब शहरों में रहने वाले आदिवासी भी आदिवासी शब्द को बदलने या कहें आदिवासी शब्द से छुटकारा पाने के लिए छटपटाते देखे जाते हैं। वास्तविक बात क्या है ? या तो वे आरक्षण पाने वाले नकली आदिवासी हैं या जिनकी माँ गैर आदिवासी हैं या जिनकी कार्य और ज्ञान अक्षमता के लिए आदिवासी कह कर उन्हें अपमानित किया जाता है और वे आदिवासी शब्द से छुटकारा पाने के रास्ते तलाशते हैं या फिर वे आदिवासी शब्द के लिए दिए जा रहे नकरात्मक अर्थ और परिभाषा को ही असली अर्थ और परिभाषा समझ लिए हैं और दूसरों के द्वारा किए जा रहे हमलों से बचने में असमर्थ हैं। व्यक्तिगत समस्या को सामाजिक और राजनैतिक समस्या बनाना बहुत गलत है।

आदिवासी शब्द से चिढ़ने वाले जानते हैं कि आदिवासी शब्द के लुप्त हो जाने पर आदिवासियों का प्राचीनता और प्राचीन समुदाय होने के दावे और इतिहास भी धीरे धीरे जनमानस और साहित्य से लुप्त हो जाएगा। गैर आदिवासी तो चाहते हैं कि आदिवासी “आदिवासी'” शब्द को अपनी पहचान बताना बंद करें। इनसे उन्हें बहुत कोफ्त होती है। वे अपने आपको बाहरी मानने के लिए विवश हो जाते हैं। आदिवासी शब्द आदिवासी समुदाय को इस भारतीय धरा पर उपस्थित सभी तरह के संसाधनों में अपना प्रथम हक और दावा करने का अधिकार देता है। सामुदायिक नाम (संताल, मुंडा, कोल, भील, गोंड, उराँव, पहाडिया आदि) तो अपने साथ रहेगा ही लेकिन यह प्राचीनतम समुदाय होने के दावे को ज्यादा पुख्ता नहीं कर पाएगा। क्योंकि समुदाय के नाम के साथ संस्कृति, भाषा, क्षेत्र आदि तो जुड़ा हुआ है, लेकिन प्राचीनता का बोधमय भावना जुड़ी हुई नहीं है। हर नयी पीढ़ी का सामान्य ज्ञान और सामान्य जानकारी उपलब्ध साहित्य और सूचनाओं के आधार पर बनता है। भविष्य की पीढ़ियों के लिए आदिवासी शब्द अन्जाना नाम होगा तो वे उस शब्द से भावनात्मक रूप से न तो अपने को जोड़ पाएँगे और न ही अपनी अस्तित्व को। आदिवासी अभी तक मीडिया साहित्य और रिकॉर्ड रखने के मामले में फिसड्डी साबित हुआ है। दूसरे लोग कालांतर में ऐसी साहित्य और रिकार्ड बना लेंगे, जहाँ आदिवासी शब्द ढूँढने में भी नहीं मिलेगा। जैसे हम आज अपनी भाषाओं से दूर हो जा रहे हैं वैसे ही अपने परिचय के शब्द से भी दूर हो जाएँगे और एक दिन उसे हम अनावश्यक मान लेंगे और अपने आप को तथाकथित मुख्य धारा में कहीं गुम कर लेंगे। जब आदिवासी शब्द के साथ जुड़े इतिहास, जानकारी, संस्कृति आदि ही नहीं रहेंगे तो आने वाली आदिवासी पीढ़ियों को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं चलेगा। कल आने वाली पीढ़ी अपने हक अधिकार और उत्तदायित्व की बात भी नहीं कर पाएगा।
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मूल बात यही है कि आदिवासी शब्द का कोई विकल्प नहीं है। Native Indian या Indigenous शब्द को अपनाने की सलाह भी धोखात्म और कपटपूर्ण है। मुद्दई किसी भी तरह से समाज को आदिवासी शब्द से दूर लेकर कहीं अंधेरे में धकेल देने की कामना में रत हैं।
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आदिवासी शब्द को हटाने के चाहने वालों की मनोकामना कभी पूरी नहीं होगी क्योंकि आज आदिवासी शिक्षित हो गया है और अपने अधिकारों, इतिहास, आत्म सम्मान के प्रति जागरूक भी।

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आदिवासी समाज को दौरे से क्या मिलने वाली है ?

           नेह इंदवार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी  दिनांक 29 अक्तूबर 2018 से तीन दिन की उत्तर बंगाल दौरे पर हैं। खबरों के अनुसार इस दौरे में ममता दीदी डुवार्स भी जाएँगी, वहाँ रूकेगीं, एक जनसभा को भी संबोधित करेंगी और नवंबर के प्रथम दिन को सिलीगुड़ी स्थित उत्तर बंगाल सचिवालय सुकन्य में पश्चिम बंगाल ट्रइब्स एडवायजरी कौंसिल (टीएसी) की बैठक की अध्यक्षता भी करेंगी।
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देश में लोकसभा के लिए आम चुनाव होने वाले हैं। उत्तर बंगाल के अलिपुरद्वार, कोचबिहार, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग लोकसभा चुनाव क्षेत्र में आदिवासियों की जनसंख्या चुनाव को पूरी तरह प्रभावित करने वाली संख्याबल मौजूद है। सवाल है कि चाय बागानों और इत्तर क्षेत्र में रहने वाला आदिवासी समाज को इस दौरे से क्या मिलने वाली है?
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क्या ममता दीदी आदिवासी समाज के मूलभूत समस्याओं को सुलझाने लायक कोई कदम की घोषणा करने वाली है? चाय बागानों में रहने वाले मजदूरों को न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत अधिसूचित सम्मानजनक और न्यायपूर्ण मजदूरी की आवश्यकता है। ममता सरकार मजदूरी के मामले को 2015 से ही लटकाते आ रही है। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2016 में भी चाय बागान मजदूरों के हाथों कुछ नहीं आया। लेकिन आदिवासी और नेपाली मजदूरों की दयाशीलता देखिए उन्होंने ममता दीदी की वादों पर विश्वास करते हुए उन्हें अपना बहुमूल्य वोट थमा दिया। लेकिन मजदूरों को न तो अब तक न्यूनतम वेतन मिला न ही चाय बागानों में अपने आवास के लिए आवासीय पट्टा। चाय बागान के मजदूरों के वोटों से जीते जनप्रतिनिधि न तो न्यूनतम मजदूरी की बातें विधानसभा के अंदर करते हैं और न बाहर। मजदूरों को अपने आवास के अधिकार प्रदान करने वाले पट्टे की बातें तो डुवार्स तराई के विधायक भूल कर भी नहीं करते हैं। आखिर तृणमूल को वोट देने का क्या फायदा मिला? सवाल यह भी है कि आखिर इन विधायकों की आवाज को कौन दबाता है या ये वास्तव इनकी नेतृत्व क्षमता गुँगे और बहरे वाली हैं और स्थिति के बारे अपनी जिम्मेदारियों का इन्हें कोई एहसास नहीं है? 
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आदिवासी समाज को मिले करम त्यौहार की छुट्टी से आदिवासियों (या कहें मजदूरों) की आर्थिक हालत बदल जाती तो कितना अच्छा होता? कार्तिक उराँव कालेज में भी आदिवासियों को सिर्फ छह प्रतिशत आरक्षण ही प्राप्त है। यहाँ नौकरी कितनों को मिली ? आदिवासी उप-योजना (ट्राईबल सबप्लान) के पैसे से बने कालेज में आदिवासियों को एडमिशन और नौकरी में प्राथमिकता नहीं मिलती है। आखिर विकास का यह कैसा खेल है?
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2013 की सर्दियों में मालबाजार की एक विशाल रैली, जहाँ ममता दीदी को ऊराँव वीरांगना सिनगीदई का खिताब दिया गया था, में ममता दीदी ने घोषणा की थी कि आदिवासियों के विकास के लिए डुवार्स और तराई में पोलिटेक्निक और आईटीआई बनाया जाएगा और उन्हें व्यवसायी बनाने के लिए प्रत्येक ब्लॉक के बाजार में बिल्डिंग बना कर आदिवासियों को दुकान आवंटित की जाएगी, ताकि वे बिजिनेस के गुर सीख सकें। उन्हें डाक्टर, इंजीनियर, आईएएस बनाने के लिए कोचिंग सेंटर बनाए जाएँगे। उन्हें घर बनाने के लिए आवास पट्टा दिए जाएंगे। लेकिन सभी घोषणाएँ हवा हवाई हो गई है।
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डुवार्स और तराई के 90 प्रतिशत आदिवासी शिक्षित बेरोजगार हैं। उन्हें रोजगार मूलक प्रशिक्षण देना समाज के लिए बहुत लाभदायक होगा। रेजा कुली का काम करने वाले आईटीआई और पोलिटेक्निक कालेज में पढ़ कर सम्मानजनक आय प्राप्त करने के लिए अच्छे रोजगार पा सकते हैं। लेकिन आदिवासियों विकास की बात करने वाली ममता सरकार ने इस विषय पर आदिवासियों को सिर्फ ठगती रही है और धोखा देते रही है।
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आदिवासी विकास के लिए मिले 20 करोड़ रूपयों को आदिवासी विकास के लिए कार्य करने का दावा करने वाले नेताओं ने प्रशिक्षण संस्थान – आईटीआई और पोलिटेक्निक बनाने के लिए खर्च नहीं किया, बल्कि “गरीब आदिवासियों” के घर बनाने में खर्च कर दिए। लगता है सरकार ने गरीबों को इंदिरा आवास देने से मना कर दिया था (?)। इस पैसे से समाज के सामूहिक विकास के लिए आदिवासी नेतागण कार्यक्रम न बना सके और न ही समाज को स्वावलंबी बनाने के लिए रूपये खर्च कर सके। मतलब जिस तरह ममता बनर्जी ने आदिवासी बेरोजगारी को दूर करने और आर्थिक और सामाजिक बदलाव करने के लिए कोई कार्यक्रम नहीं बनाया, वैसे ही तथाकथित विकास के लिए कार्य करने के दावा करने वाले आदिवासी नेताओं ने भी नहीं किया। वे ऐसा करके खुश भी हैं। वे फालतू के कार्यक्रमों में रूपये खर्च करके अपनी पीठ थपथपाते हैं। 

ममता सरकार और आदिवासी नेताओं को डर है कि यदि इन पैसों को आदिवासी बेरोजगारों के प्रशिक्षण के लिए खर्च कर दिया गया तो लाखों आदिवासी प्रशिक्षित होकर अपने पैरों पर खड़े हो जाएँगे। वे अधिक कमाने लगेंगे। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी, वे गरीबी के चक्र से बाहर निकल जाएँगे। उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ कर साहब बन जाएँगे तो उन्हें कौन पूछेगा ? फिर बागान में कौन पत्ता तोड़ेगा ?
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आदिवासियों का आर्थिक और सामाजिक विकास कदापि न हो, इसके लिए ममता सरकार, आदिवासी एमएलए, आदिवासी एमपी और आदिवासी नेतागण मिल कर अनेक काम कर रहे हैं। वे नहीं चाहते हैं कि आदिवासियों का वास्तविक विकास हो।
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आदिवासी नेतागण को मालूम है जनता एक दिन नाचने गाने और पूजा करने के लिए करम पूजा की छुट्टी मिलने पर गद्गद हो जाते हैं। कुडुख भाषा को मान्यता मिलने पर सभी नाचने लग जाते हैं। सिर्फ छह प्रतिशत आरक्षण मिलने वाले कालेज की स्थापना से जनता नेताओं का जय जयकार करते नहीं थकती हैं। नेतागण इस कामयाबी का गाना हर मिटिंग में साल भर बजाते रहते हैं और कहते हैं देखो मैंने आदिवासी विकास के लिए तुम्हारे लिए करम की छुट्टी, कालेज और भाषा मांग दिया है, अब तो खुश रहे और ममता दीदी को आंख बंद करके वोट दो।
भाईयों और बहनों दीदी ने हमलोगों को सरकारी पद दिया है और साल में कई करोड़ रूपये भी मनमाने ढंग से खर्च करने के लिए मिलता है। यह अलग बात है कि हम उन पैसों को ऐसे दिखावटी और सिंबोलिक कार्यक्रमों में खर्च करेंगे, जिससे तुम्हारा आर्थिक और सामाजिक विकास न होने पाए। तुम्हें 351 रूपया हाजिरी न मिले, तुम गरीब मजदूर ही बन कर जीवन जीयो, तुम्हारा समाज बेरोजगार रहे और गरीब रहे, तुम्हें स्वास्थ्य सेवा न मिले, तुम्हे आवास का पट्टा न मिले, इसके लिए हम दिन रात काम कर रहे हैं। 
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हमें सिर्फ तुम्हारा वोट चाहिए इसके बदले में हम नकली डाक्टरों को चाय बागानों में बैठाएँगे। बागानों में तुम्हें दीन हीन बना कर रखेंगे। नकली सर्टिफिकेट से आदिवासी आरक्षण पाने वालों पर कोई कदम नहीं उठाएँगे। तुम्हारी जगह दूसरे लोग आदिवासी सीट पर नौकरी पाएँ इसकी व्यवस्था करेंगे। आदिवासी आरक्षण से तुम आफिसर न बनो इसके लिए हमलोग काम करेंगे। टीएसी की बैठक होने वाली है, लेकिन इस बैठक में हम आदिवासी आर्थिक और सामाजिक दशा बदलने के लिए कोई निर्णय नहीं करेंगे। आखिर तुम्हारी औकात ही क्या है? तुम्हारी औकात सिर्फ हमें वोट देने का है, बाकी हम जो चाहेंगे वह करेंगे। 

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आदिवासी समाज का जमींदार

“आदिवासी नेतादेर तोप” (कृपया खबर कटिंग नीचे देखें) शीर्षक से प्रकाशित खबर से डुवार्स तराई के किसी जागरूक आदिवासी का उदासीन रहना संभव नहीं है। डुवार्स तराई में नेतागण कैसे आदिवासी समाज का जमींदार बन कर उसे अपनी बपौती संपत्ति समझते हैं यह इस अखबारी कटिंग से एकदम स्पष्ट हो चला है। आदिवासी विकास परिषद के राज्य स्तरीय नेतागण डुवार्स तराई और यहाँ की सामाजिक और राजनैतिक गतिविधियों को अपने पॉकेट की बीडी का बंडल समझते हैं। जब चाहे उसे सुलगाया और जब चाहे आधे कश खींच कर सड़क पर फेंक दिया।
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आदिवासी विकास परिषद एक सामाजिक संगठन है और इसके अध्यक्ष सैकड़ों बार चिल्ला चिल्ला कर कह चुके हैं कि यह एक सामाजिक संगठन और इसके सदस्य किसी भी राजनैतिक पार्टी में रह सकते हैं और राजनैतिक कार्यकलापों में भाग ले सकते हैं। लेकिन आज इसी संगठन के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष कह रहे हैं कि आदिवासी विकास परिषद ममता बनर्जी के दहिना हाथ है और यूनाईटेड फोरम ऑफ आदिवासी ओर्गनाईजेशन के अधिकांश नेतागण आदिवासी विकास परिषद् के बहिष्कृत नेता हैं और उनका डुवार्स तराई के मूल आदिवासी समाज से कोई संपर्क नहीं है।
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आदिवासी विकास परिषद के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पदों पर साँप की तरह दशकों से कुंडली मारे महाशयों का यह बयान कितना सामाजिक है ? वे डुवार्स और तराई के आम आदिवासियों को बताने का कष्ट करेंगे कि उनका यह बयान सामाजिक बयान है या राजनैतिक ? यदि राजनैतिक बयान है तो वे बताएँ कि परिषद के संविधान में इस संगठन को राजनैतिक संगठन में तब्दिली करने के लिए कब और कहाँ परिवर्तन किया गया है और इस परिवर्तन के पक्ष में कितने लाईफ मेंबरों ने अपनी सहमति दी है ?
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कृपया वे बताएँ कि वे चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड और मान्यता प्राप्त किसी राजनैतिक पार्टी के चुने हुए पदाधिकारी हैं या किसी रजिस्टर्ड सामाजिक संस्था के चुने हुए नेता ? डुवार्स और तराई के आदिवासी जानना चाहते हैं कि वे ममता बनर्जी के दहिना हाथ बनने के लिए कब समाज से अनुमति प्राप्त किए हैं और इस विषय पर सार्वजनिक रूप से समाज को कब सूचित किया है ?
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एक आदिवासी नेता नैतिक, सामाजिक और कानूनी रूप से कितने भोले, अन्जान, अज्ञानी और अपराधी हो सकते हैं ? इसका यह एक बड़ा उदाहरण है। इन नेताओं के कारण समाज को कितनी शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है क्या इन्हें इसकी जरा भी इल्म है ? इन लोगों के बयान को क्या समझा जाए ? एक सामाजिक नेता का राजनैतिक बयानबाजी या एक राजनैतिक नेता का समाज को बेवकूफ बनाने की घटिया चाल ?
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मैंने भी इस संगठन के लिए कभी अपना योगदान दिया है और इन नेताओं के द्वारा बिना चिंतन किए सामाजिक सदस्यों के बारे घोर विरोधी भावनाओं का सार्वजनिक प्रदर्शन और बयानबाजी से मुझे भी बहुत कष्ट पहुँचा है।

ये नेतागण जिन आदिवासी नेताओं को संगठन से बहिष्कृत बता रहे हैं, क्या वे उनका भारतीय नागरिकता, राजनैतिक और सामाजिक और लोकतांत्रिक अधिकारों को छीन कर उन्हें अधिकारविहीन कर चुके हैं ? वे बताएँ कि उन्होंने कब-कब इन नेताओं के अधिकारों को कानून की किस धारा और आदिवासी सामाजिक बहिष्कार परंपराओं के अधीन उन्हें अधिकार विहीन किए हैं ?
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क्या समाज की भलाई के लिए कार्य करने का एकमात्र ठेका समाज ने आदिवासी विकास परिषद को दिया है ?
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क्या आदिवासी विकास परिषद को समाज ने ठेका दिया है कि वे जब चाहें समाज को अपने मन माफिक किसी भी राजनैतिक नेता और पार्टी का वोट बैंक घोषित कर दें और खुद को 20 लाख आदिवासियों के वोट के एक मात्र कर्ताधर्ता घोषित करे दें ? आखिर युनाईटेड फोरम ऑफ आदिवासी ओर्गानाईजेशन के नेताओं या कार्यकर्ताओं के राजनैतिक और सामाजिक हक का अपहरण कौन किया है ? कौन हैं उनके अधिकारों का अपहरणकर्ता ? क्या यह अपहरण नैतिक और कानूनी रूप से मान्यता पूर्ण हैं ?
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ठीक है मान लेते हैं कि उन नेताओं को कोई हक नहीं है कि वे आदिवासी समाज का नेतृत्व करें या उनके हित में कोई अच्छा कार्य करें और राज्य के सत्ताधारी पार्टियों के संग कोई बातचीत करें। लेकिन पहले आप बताएं कि आपने अब तक समाज के उन्नत्ति के लिए क्या-क्या काम किया है ?
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आपलोग TAC में शामिल थे, TAC के माध्यम से क्या क्या काम किया गया ? इस मीटिंग में लिए गए कौन-कौन से निर्णय से आदिवासी समाज की स्थिति में भारी परिवर्तन आया ? कितने आदिवासियों को राज्य सरकार में नौकरी मिली ? कितने रोजगार मूलक प्रशिक्षण संस्थाओं की स्थापना हुई ? हिन्दी कालेजों में कितने आदिवासी को नौकरी मिली ? कितने प्रतिशत बच्चों को उन कालेजों में आदिवासी आरक्षण से प्रवेश मिला ?
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डुवार्स और तराई के चाय मजदूरों के न्यूनतम वेतन के लिए आपने कौन सा आंदोलन किया ? प्रोग्रेसिव ट्रेड यूनियन के अध्यक्ष के रूप में आपने न्यूनतम वेतन की मांग के लिए कौन से फर्मूला के तहत कितना न्यूनतम वेतन का प्रस्ताव दिया है ? क्या यह प्रस्ताव असम के चाय बागानों के लिए प्रस्तावित रू. 351.33 से कम दिया या अधिक दिया ?
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क्या आपके प्रस्ताव में मजदूरों के वेतन के साथ डीए की भी मांग शामिल है ? यदि डीए की भी मांग शामिल है तो आप बताएँ कि Consumer Price Index Number for Industrial Workers के तहत कौन से वर्ष को बेस करके आपने मजदूरों के लिए डीए की मांग की है ? मजदूरों के एरियर के भुगतान के लिए आपने कौन सी तारीख को अंतिम तारीख मानने के लिए अपने प्रस्ताव में मांग किया है ?
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आपने मजदूरों को आवास पट्टे के हक के लिए कितनी भूमि की मांग की है ? क्या आपने मजदूरों के हक के लिए परिषद की ओर से कोई आंदोलन किया है ? यदि आंदोलन किया है तो बताएँ कि आपके आंदोलन के फलस्वरूप सरकार से क्या क्या प्रस्ताव प्राप्त हुए हैं ? आपने कभी 6वीं अनुसूची के तहत डुवार्स तराई में स्वायतत्ता की मांग रखी थी फिर पटल कर पाँचवी अनुसूची की मांग रखी है। आखिर आपके ठेकेदार संगठन में इतनी कन्फ्यूजन क्यों है ? चलिए मान लेते हैं कि सरकार ने आपको स्वायतत्ता दे दिया, अब बताएँ कि यह स्वायतत्ता आदिवासी समाज के किन क्षेत्रों में लागू करेंगे ?
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आपने कुड़ुख, संताली, मुण्डारी, सादरी भाषा के लिए करोड़ो रूपये देने की बात रखी है, बताएं कि इन भाषाओं के कितने विशेषज्ञ आपके अधीन कार्यरत्त हैं ? क्या भाषा के लिए करोड़ो रूपये के लॉलीपॉप दिखा कर आप समाज में एक नयी लड़ाई छिड़वाना चाहते हैं ? क्या एक शांतिप्रिय समाज में भाषा के नाम पर आदिवासियों के एक दूसरे से लड़ाना चाहते हैं ?
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विकास परिषद को लेकर आदिवासी परियोजनाओं को देखने के लिए सरकार ने एक मॉनिटरिंग समिति का गठन किया था, आप बताएँ आपलोगों ने कौन-कौन सी योजनाओं का मॉनिटरिंग किए और उन परियोजनाओं में कितने भ्रष्टाचार की बातों को आपलोंगों ने सरकार को बताया ? मॉनिटरिंग के फलस्वरूप आदिवासी विकास के लिए सरकार को आपने क्या-क्या नये सुझाव दिए और बजट की सही इस्तेमाल के लिए आपने क्या-क्या सतर्कता के उपाय बताया ?
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सरकार से आपलोंगों को अब तक 20 करोड़ रूपये मिले। परिषद बताएं कि इन पैसों से कितने सामाजिक दूरगामी कार्य किए गए ? कितने भाषाई स्कूल बनाए गए, कितने रोजगारमूलक प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना की गई ?
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कभी परिषद के पीछे लाखों आदिवासी अपना सर्वस्व स्वाहा करने के लिए तैयार रहते थे। लेकिन अब दस लोग भी उनके पीछे नहीं है। परिषद बताए कि क्यों लाखों की संख्या में उनके समर्थक उनसे अलग हो गए और आज उनकी मीटिंग में सौ से भी कम लोग हाजिर होते हैं। आखिर उनके नेताओं के कार्यकलापों से आम आदिवासी का क्यों मोहभंग हो गया ?
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आज परिषद के पास महज कुछ सौ समर्थक हैं, लाखों लोग परिषद के नेताओं के बारे नकरात्मक बातें करते हैं और उन्हें समाज का सर्वमान्य नेता और संगठन मानने से इंकार करते हैं, ऐसे में वे सत्ताधारी पार्टी को आदिवासी वोट का ठेकेदार होने के नाम पर कब तक बेवकूफ बनाएंगे ?
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क्या परिषद के नेतागणों को लगता है कि ममता बनर्जी का दहिना हाथ होने के उनके सार्वजनिक बयान पर तृणमूल कांग्रेस पार्टी बेवकूब बन जाएगी और उन्हें ही वे आदिवासी समाज के वोटों का एकमात्र ठेकेदार मानते रहेंगे ?
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आप बताएँ कि आदिवासी समाज के हित के लिए अलग-अलग संगठन जब एक साथ आए हैं और एक साथ मिल कर सरकार से आदिवासी हित के लिए मंत्रणा करना चाहते हैं तो आप लोगों को क्यों तकलीफ होती है ? क्या आपकी नेतृत्व में इतना मददा नहीं है कि तमाम संगठनों को लेकर आदिवासी हित में आप एक रणनीति तैयार करें और समाज हित में सभी के सहयोग को सुनिश्चित करें ?
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क्या किसी संगठन का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बन जाने का मतलब दूसरे आदिवासी संगठनों के काम में अड़चन डालना ही रह गया है ? क्या नये संगठनों के कार्यकलापों से आपकी कुर्सी की पैर हिलने लगे हैं ? आप बताएँ कि समाज की एकता को सार्वजिनिक रूप से तार-तार करने और दूसरे समाज के नजरों में छिन्न-भिन्न दिखाने के लिए समाज आपके साथ क्या सलूक करे ?

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चाय मजदूरों का शोषण-संघर्ष गाथा : 13

प्रोविडेंट फंड कार्यालय ने अलिपुरद्वार, जलपाईगुड़ी और कुचबिहार जिलों के ऐसे चाय बागान, जो मजदूरों से पीएफ का रूपया तो काटते हैं लेकिन उसे पीएफ कार्यालय में जमा नहीं करते हैं, पर कार्रवाई करते हुए 90 करोड़ रूपये जमा करवाया है। यह एक स्वागतयोग्य कदम है।
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एक रिपोर्ट के अनुसार चाय मजदूरों का पीएफ बकाया कुल राशि 150 करोड़ से अधिक है। इसका मतलब यह है कि अभी भी पीएफ विभाग को ऐसे बागानों से 60 करोड़ रूपये वसूलना है। चाय बागानों में मजदूरों का वेतन बहुत कम होता है, जाहिर है कि यह राशि कुछ सौ या हजार मजदूरों का बकाया राशि नहीं है, बल्कि यह लाखों मजदूरों की बकाया राशि होगी। विभाग ने 51 चाय बागानों के 1192 बैंक अकाऊंट को एटैच किया है और बागान पारिचालकों के विरूद्ध 503 मामले दायर किया गया है। 82 चाय बागानों के विरूद्ध फौजदारी मामला भी दाखिल किया गया है।
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यह स्पष्ट है कि इतनी बड़ी मात्रा में पीएफ का बकाया कोई एक दो महीने या साल का नहीं है। यह लम्बे समय से चल रहा था और इस अपराधिक कृत्य में पीएफ कार्यालय, जिला प्रशासन और कई मजदूर संघ भी इसमें शामिल रहे होंगे, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।
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हजारों चाय मजदूर रिटायर हो जाते हैं, लेकिन रिटायरमेंट में उन्हें न पीएफ का पैसा मिलता है और न ही ग्रेज्युएटी का। अनपढ़ मजदूरों को सही कानूनी रास्ता दिखाने के बजाए मजदूर संघ गाहे बगाहे दो चार सौ रूपये बागान से दिला देते हैं और मजदूर इसे अपना किस्मत समझ कर चुपचाप बैठ जाता है और बुढ़ापे में जिल्लत की जिंदगी जीता है।
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मजदूरों के बोनस के लिए हड़ताल करने वाले मजदूर संघ ने कभी भी पीएफ और ग्रेज्युएगी पर कानूनी कार्रवाई करने और अपराधियों को जेल भेजने के लिए कोई आंदोलन नहीं किया। चवन्नी टाईप के अर्धशिक्षित नेतागण जिन्हें चाय बागानों के घाघ मालिकों की चालाकी के बारे जरा भी भान नहीं होता है, अक्सर मजदूरों की ओर से नेतागिरी करते हुए दिखाई देते हैं। और अपनी नाकामियों के कारण मजदूरों की जिंदगी को नर्क में बदलने में अपनी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
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यह ध्यान देने वाली बात है कि अभी इतनी बड़ी कार्रवाई क्यों की जा रही है और इसका प्रतिफल भी इतना बड़ा क्यों मिल रहा है ? देश में पीएफ और ग्रेज्युएगी के कानून काफी सख्त है, सही कानूनी कार्रवाई की जाए तो इसके पैसों के बंदरबाँट करने वालों को कई सालों के लिए जेल की कोठरियों में कैद करवाया जा सकता है।
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लेकिन चाय बागान के ट्रेड यूनियनों में बगडोर ऐसे बाहरी लोगों के हाथों में हैं जिन्हें मजदूरों के शोषण, बीमारी, मौत से कुछ लेना देना नहीं है। जो चाय बागानों में लोकल लीडर हैं, उनकी स्थिति ऐसी है वे स्थानीय राजनैतिक पार्टियों के बिन खरीदे गुलाम हैं। कोई बता रहा था कि एक सप्ताह पूर्व आदिवासी संगठनों का सामूहिक बैठक बुलाई गई थी, संयोग से बैठक किसी राजनैतिक पार्टी के कार्यालय के पास था। और गुलामगिरी का स्तर ऐसा कि अपने ही समाज के बैठक में जाने के लिए पार्टी आफिस को लांघ कर जाने में लोगों की नानी मर रही थी। ऐसे गुलाम लीडरों का होना मतलब खुजली की बीमारी का खाज में बदलना है।
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क्या राजनैतिक पार्टी कोई माफिया है और किसी सामाजिक बैठकों में जाने से उसने कोई प्रतिबंध लगाया है ? किसी पार्टी ने कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है, बस गुलाम मानसिकता ने उन्हें ऐसा करने को प्रेरित किया है। इन्हीं गुलाम लीडरों के कारण ही पीएफ और ग्रेज्युएगी को हड़पने वालों की एक फौज डुवार्स और तराई में कार्यरत्त हैं जो बुढ़े मजदूरों का खून दिन दहाड़े चूस रहे हैं और ये लीडर टूकुर टूकुर देख रहे हैं। कानून के मुताबिक किसी भी गैर-पारिवारिक लोगों को किसी भी व्यक्ति का पीएफ और ग्रेज्युएटी से संबंधित किसी भी बैंक पास बुक को अपने पास अनधिकृत रखने का अधिकार नहीं है। यदि किसी के पास ऐसे कागजात पाए जाते हैं तो उसे कानूनी कार्रवाई करा कर गिरफ्तार कराया जा सकता है।
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कोई बता रहा था कि मजदूरों को अपने बैंक खातों से पैसा निकालने के लिए भी भडुवा एजेंटों की मदद लेनी होती है, नहीं तो उन्हें बैंक से पैसे नहीं मिलते हैं। आखिर ये मजदूर संघ किस मर्ज की दवा हैं ? एससी एसटी एक्ट, शोषण और उनके अधिकारों के लिए लड़ने की बातें करने वाले आदिवासी हित की बातें करने वाले सामाजिक संगठनों की इसमें क्या भूमिकाएँ हैं ? क्या वे बैंकों के आला अधिकारियों से मिल कर इसके लिए बातें नहीं कर सकते हैं ? या उनके दिमाग में समस्याओं को दूर करने के लिए कोई आईडिया ही नहीं आता है ?
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डुवार्स तराई में शोषण के जाल फैलाने वालों में मजदूर संघों की बड़ी भूमिका है। चवन्नी नेताओं की लम्बी कतारें हैं, जो खूद मजदूरों के शोषण में हाथ बँटाते हैं और अपना क्षुद्र लाभ के लिए किसी भी मजदूरों को लूटने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। नहीं तो क्या कारण है कि वर्षों बाद पीएफ कार्यालय कानूनी कार्रवाई कर रही है और करोड़ो रूपये पीएफ आफिस में जमा हो रहे हैं। जब तक मजदूरों के हित के लिए बनी कानूनों का सहारा नहीं लिया जाएगा, मजदूरों का भला नहीं होने वाला है।
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न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत सम्मानजनक वेतन भी तभी मिलेगा, जब मजदूरी का मामला कोर्ट में जाएगा। कितनी विडिम्बना की बात है कि कोई भी अब तक मजदूरी को लेकर कोर्ट में जाने की कोई बात नहीं करता है। जब कुछ उत्साही लोग कोर्ट में जाने की तैयारी कर रहे हैं तो उसमें सहायता करने के लिए भी मजदूरों की दिन रात बातें करने वालों की धिग्गी बंध जाती है।

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चाय मजदूरों के संघर्ष और शोषण गाथा– 12

नेह इंदवार

  • हाल ही में कोहिनूर बागान बंद हो गया ।
  • 25 मार्च 2018 को बंद कोहिनूर चाय बागान को त्रिपक्षीय समझौता के आधार पर खोला गया था। इसे खोलने के लिए सरकारी पक्ष ने पहल किया था और पुराने मालिक की जगह नया मालिक खायेरबाड़ी टी कंपनी को बागान सौंप दिया गया और वह बागान खोल कर चलाने लगा। बागान में बकायदा चाय की फैक्ट्री भी है, लेकिन नये मालिक ने इसे हाथ नहीं लगाया और बागान से पत्ती तोड़वा कर बाहर बेचने लगा।
  • खायेरबाड़ी टी कंपनी को बागान हस्तांतरण होने के पहले भी पुराने मालिक के समय 18 अक्तूबर 2015 को यह चाय बागान बोनस विवाद के नाम पर बंद कर दिया गया था और उसके तीन महीने के बाद 16 जनवरी 2016 को बागान खोला गया था। लेकिन बागान शांति पूर्ण कार्य नहीं पाया और 25 मार्च 2018 को बंद हो गया था।
  • बागान बंद करने, उसे कुछ दिनों के लिए खोलने का खेल डुवार्स और तराई के क्षेत्र में खूब खेला जा रहा है। सुरेन्द्रनगर के चाय बागान सुरेन्द्रनगर, धरनीपुर, रेडबैंक, बंदापानी, ढेकलापाड़ा, डायना, मधु, बीरपाड़ा, गेरगेंदा, लक्षीपाड़ा, तुलसीपाड़ा, हंटापाड़ा, धुमसी, डिमडिमा, केरन, रायपुर, पानीगटा से लेकर कुल 23 बागान इस बंद होने और खोलने के मैदान बने हुए हैं।
  • कभी इन्हें चुनाव के पूर्व खोला जाता है और कभी चाय के पौधों में नयी पत्ता आने के पूर्व खोला जाता है। अक्सर देखा जाता है कि बागान को बोनस के पूर्व या कलम कटिंग के पूर्व विभिन्न बहाना लगा कर बंद कर दिया जाता है। बागान बंद होने के साथ-साथ मजदूर का मजदूरी बकाया, बोनस बकाया, राशन बकाया, ग्रेज्युएटी बकाया, प्रोविडेंट फंड बकाया आदि मारा जाता है और श्रम दफ्तर एक बना बनाया प्रेस विज्ञप्ति जारी करता है कि बागान मालिकों फिर से बागान खोलें इसके लिए सरकारी स्तर पर प्रयास चल रहा है।
  • श्रम दफ्तर कभी यह नहीं कहता है मजदूरी, बोनस, राशन, ग्रेज्युएटी, प्रोविडेंट फंड बकाया के लिए मालिक को 15 दिन 30 दिन का अल्टीमेटम नोटिस दिया गया है, यदि इतने दिनों के अंदर वह बकाया नहीं चुकाता है तो उसके विरूद्ध एफआईआर दायर किया जाएगा या मजदूरों का कॉआपरेटिव बना कर बागान को सरकारी विभाग की देखरेख में चलाया जाएगा।
  • पैसे कमाने के इस खेल के कारण मजदूरों के पास बेरोजगारी और भूखमरी की स्थिति आ जाती है। पीने के पानी की सप्लाई बंद हो जाती है। बेरोजगारी से खाना पीने से साथ बच्चों की पढ़ाई बंद हो जाता है। लम्बे समय तक बेरोजगारी से अकाल की स्थिति आ जाती है और इसका आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक रूप से दूरगामी प्रभाव पड़ता है। पेट पालने के लिए लोगों को दूर शहरों में रोजगार की खोज में निकल जाते हैं, और वहाँ की कष्ट भरी जिंदगी में विलीन हो जाते हैं।
  • किसी भी कर्मचारी या मजदूर का काटा गया प्रोविडेंट फंड को प्रोविडेंट फंड कार्यालय में जमा न करना एक आर्थिक और क्रिमिलन अपराध है। ऐसा अपराध करने वाले के विरूद्ध में श्रम मंत्रालय पीएफ कार्यालय के साथ समन्वयन करके अपराधी को जेल भेजने के लिए कार्रवाई कर सकता है। लेकिन डुवार्स-तराई और हिल्स के चाय बागानों में ऐसी कार्रवाई होते हुए कभी नहीं देखा जाता है।
  • श्रम दफ्तर के घुसखोर अधिकारीगण कभी भी मजदूरों के हक में कोई काम नहीं करते हैं यह तो एक खुला रहस्य है, लेकिन चाय मजदूरों से चंदा लेकर अपना घर परिवार चलाने वाले नेतागण भी कभी चाय बागान के आर्थिक, सामाजिक और क्रिमिनल अपराधियों को जेल भेजने के लिए कोई कवायद नहीं करते हैं। आखिर चाय मजदूरों के हितों की रक्षा कौन करेगा ? चाय बागानों के शिक्षित नौजवान भी ट्रेड यूनियन वालों के ही भरोसे में रहते हैं, वे अपने ज्ञान के इस्तेमाल से स्थिति से निपटने की कोई कोशिश नहीं करते हैं।
  • बंद चाय बागानों को नये मालिकों द्वारा खोलने और बंद करने के खेल के पीछे कई शातिर चालाकी छुपी होती है। फिलहाल चाय अंचल में हरी पत्तियोँ की खरीद करके कई बॉट लीफ फैक्ट्ररी चल रही है। कई चाय फैक्ट्री वाले चाय बागान भी उत्पादन और प्रोफिबिलिटी बढ़ाने के लिए हरी पत्तियाँ खरीदते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कई उद्योगपति या व्यापारी चाय बागान खोलने के लिए सामने आते हैं और पत्ती उत्पादन के सीजन में पत्ती बेच कर बागान चलाते हैं।
  • उनकी नजर चाय बागानों के बड़े-बड़े पुराने पेड़ों पर भी होती है। इसके साथ ग्रेज्युएटी, प्रोविडेंट फंड, बोनस के गबन पर भी होती है। ऐसे लोग बोनस से ठीक पहले बागान बंद करने के बहाने ढूंढ़ते हैं। सबसे बड़ी आश्चर्य की बात है कि इस तरह के ट्रेंड और अर्थ लोलुपता से बचने के लिए न तो प्रशासन और न ही ट्रेड यूनियन कोई रास्ता सुझाते हैं।
  • जिस तरह तथाकथित उद्योगपतियों की अर्थ लोलुपता बढ़ रही है और बागानों के माध्यमों से अधिकतम लाभ कमाने और लूट करने की चलन बढ़ रही है, उससे बचने के लिए मजदूरों को नये रास्ते निकालने होंगे। मजदूरों के 150 करोड़ से अधिक का बकाया प्रोविडेंट फंड को अभी तक जमा नहीं किया गया है, इसका गबन करने वालों के विरूद्ध में सरकार कोई भी पुख्ता कार्रवाई नहीं कर रही है।
  • रिटायरमेंट के समय दिया जाने वाला ग्रेच्युएटी के लिए भी मजदूरों के महीने मजदूरी से एक भाग काटा जाता है ऐसा देखा गया है। नियमों के अनुसार तीन महीने के समय सीमा में मजदूरों को ग्रेज्युएटी मिलनी चाहिए, लेकिन उन्हें वर्षों तक नहीं मिलता है। इन गैरकानूनी कार्यों से मजदूरों को बचाने की जरूरत है।
  • चाय बागान के खोलने और बंद करने और पुऩः खोलने के खेल में शामिल कंपनियाँ किसी भी बंद बागान चालू के लिए सामने आने पर वह त्रिपक्षीय समझौता में यह भी लिखे कि वह किसी भी प्रकार के गैरकानूनी कार्य नहीं करेगा और न ही मजदूरों को आर्थिक नुकसान पहुँचाएगा। किसी भी तरह के आर्थिक हानि से मजदूरों को बचाने के लिए समझौते के समय ही बागान के मजदूरों की संख्या के अनुपात में कई करोड़ रूपये सिक्यूरिटी फंड सरकार के पास जमा करेगा। इस फंड को सुनिश्चित किए जाने पर किसी कंपनी द्वारा अचानक बागान छोड़ कर चले जाने की स्थिति में उस पैसे से बागान के मजदूरों के प्राप्य वेतन, ग्रेज्यूएटी का भुगतान किया जा सकेगा। उस रूपये से बकाया प्रोविडेंट फंड का भी भुगतान किया जा सकता है। इस तरह के सिक्युरिटी फंड के जमा होने पर अनेक अप्रिय घटनाओं और विवादों से बचा जा सकता है।
  • ऐसा फंड रहने से तमाम तरह के बकाया बिल्स का भुगतान किया जा सकता है। ऐसा फंड रहने पर उदंड मालिकों के मनमानी व्यवहार से भी बचा जा सकता है। बागानों में नियम कानूनों को ताक पर रख कर बागान से भाग जाने वाले मैनेजर और किसी चाय बागान में काम न कर सके इसके लिए भी नियम बनने चाहिए। ऐसे बागानों के डायरेक्टरों के Director Index Number को रद्द करने के लिए तथा ऐसी कंपनियों के द्वारा किसी भी नये बागानों के अधिग्रहण पर लगाम लगाने के लिए भी कार्रवाई की जाए। चाय बागान में काम करने वाले कल्याण अधिकारियों से श्रम द्फ्तर रिपोर्ट मांगे कि चाय बागानों में कल्याण के कार्यों की स्थिति क्या है ?
  • ऐसे फंड के सृजन और मालिक मैनेजरों पर दंडात्मक कार्रवाई नियम बनाने की मांग पर मालिक पक्ष आनाकानी करेगा, लेकिन यदि ट्रेड यूनियन सरकार से मजबूती से ऐसी मांग करेंगे तो सरकार फाऊलाई रूपये देने की जगह ऐसे फंड के सृजन के लिए सहमत हो सकेगी। जब तक ऐसे बागान मालिकों के मनमानी पर लगान नहीं होगी, वे मजदूरों के साथ गुलामों की तरह व्यवहार करते रहेंगे।

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चाय मजदूरों की न्यायपूर्ण मजदूरी का संघर्ष गाथा-11

नेह इंदवार

· पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा चाय मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी निर्धारण के लिए बनी सलाहकार समिति में मजदूरों की ओर से शामिल ज्वाईंट फोरम ने 23 अगस्त 2018 को कोलकाता में आयोजित बेठक में मजदूरों के लिए राशन सहित न्यूनतम मजदूरी 239 रूपये प्रतिदिन का प्रस्ताव दिया है। इसके अलावा कपड़े, इंधन (जलावनी लकड़ी), सामाजिक अनुष्ठान आदि के पैसे कितने हों, इसे निर्धारित करने के लिए ज्वाईंट फोरम ने सरकार को ही जिम्मेदारी सौंप दी है। अखबारों के हवाले से कहा गया है कि फोरम के एक संयोजक श्रमिक नेता नेता जियाऊल आलम ने दावा किया है कि सरकार ने फोरम के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। दावा यह भी किया गया है कि श्रममंत्री मलय घटक ने इस प्रस्ताव को विधि-मान्य के तहत माना है।
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यह मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी हासिल करने के लिए गठित ज्वाईंट फोरम के द्वारा बार-बार घोषित 250 रूपये की मांग से कम है साथ ही 239 रूपये दैनिक की मांग कब से लागू होगी यह भी स्पष्ट नहीं है। यदि यह मांग 2014 के अप्रैल से लागू होगी तो अन्य राज्यों, तथा पश्चिम बंगाल में अन्य क्षेत्रों में लागू की गई न्यूनतम वेतन के आसपास होगी। यदि इसके साथ राशन, कपड़े, ज्वालनी लकड़ी, आवास आदि के लिए निर्धारित शुल्क को भी जोड़ दिया जाएगा तो यह करीब 270-290 के करीब होना चाहिए जो, मजदूरों के द्वारा मांगी जा रही 350 रूपये से कम लेकिन 250 रूपये से कुछ अधिक होगा।
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आमतौर से मजदूरी के लिए जोड़तोड़ की वार्ता (Negotiations for wage) में हमेशा बाजार भाव से पचास प्रतिशत तक ऊँची मांग रखी जाती है, ताकि वार्ता के दौर में यह अपने आप Equilibrium के स्तर पर आ जाए। इस दृष्टि से ज्वाईंट फोरम को 2014 के मूल्य सूचकांक के अनुसार एक अलग मांग और वर्तमान के मूल्य सूचकांक के अनुसार दूसरी अलग मांग रखनी चाहिए थी।
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उल्लेखनीय है कि असम सरकार ने चाय मजदूरों के लिए 351 न्यूनतम मजदूरी के लिए प्रस्ताव दिया है। यह सर्वज्ञात है कि भारत में पश्चिम बंगाल के उत्पादित चाय का औसत मूल्य दूसरे राज्यों से अधिक होता है। इसलिए भी उन्हें दूसरे राज्य यहाँ (Assam पढ़ा जाए) से अधिक मजदूरी मिलनी चाहिए।
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यदि मजदूरों के लिए न्याय पूर्ण मजदूरी के लिए गठित ज्वाईंट फोरम ही बाजार दर से कम की मांग रखेगा तो सरकार क्यों न्याय पूर्ण मजदूरी देने के लिए अपनी ओर से प्रस्ताव देगी ? यदि ज्वाईंट फोरम की मांग वर्तमान वर्तमान बाजार दर से रखी गई है तो यह किसी भी तरह से मानने योग्य नहीं है। इससे मजदूरों के साथ अन्याय होने की पूरी संभावना नजर आ रही है। ज्वाईंट फोरम की बातों से यह भी पता नहीं चल रहा है कि मजदूरों को मजदूरी के साथ डीए भी मिलेगा या नही ? ज्वाईंट फोरम में लाल पार्टी के साथ गेरूआ पार्टी (बीजेपी) भी शामिल है। वहीं सबूज या हरा पार्टी (तृणमूल कांग्रेस) की सूर अलग है और वह मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन का दर क्या होनी चाहिए पर चुप्पी साध रखी है और वह सरकारी घोषणाओं का स्वागत गान करने में व्यस्त रहती है। लगता है मजदूरों को इस बार भी न्यायपूर्ण मजदूरी नहीं मिल पाएगा। मजदूरों के मजदूरी के नाम पर हमेशा की तरह इस बार भी अंदरूनी खाने में कई षड़यंत्र चल रहे हैं।
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मजदूरी निर्धारण के साथ मजदूरों को अपने आवास का पट्टा भी मिलना चाहिए। इसके साथ मालिकों द्वारा प्रोविडेंट फंड के नाम से काटे गए, लेकिन प्रोविडेंट फंड कार्यालय में जमा नहीं किए गए 150 करोड की भी बातें की जानी है। चाय मजदूरों के आवास के लिए केन्द्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा दिए गए फंड के बावजूद 95,835 मजदूरों को पक्का आवास नहीं मिलने की बात भी शामिल की जानी है। 89 चाय बागानों में मजदूरों को अभी तक ग्रेज्युटी नहीं मिली है उस पर भी बात करनी थी और प्रोविडेंट फंड और ग्रेज्यूटी के गबन के आरोप में क्यों बागान संचालकों को जेल नहीं भेजा जाना चाहिए और ऐसे चाय बागानों के डायरेक्टरों के डीन (Director Index No.) को खारिज करने की कार्यवाही क्यों नहीं चालू की जाए, पर बात करनी थी। डुवार्स तराई में लाभ कमाने वाली चाय कंपनियाँ CSR (Company Social Responsibility) के पैसों को क्यों चाय बागानों में खर्च नहीं कर रही है, यह भी एक मुख्य मुद्दा है। यह पैसा कई करोड़ों में होता है। लेकिन कंपनी इसका लाभ चाय बागानों के मजदूरों को नहीं देती है।
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लालपार्टी के जमाने पर बडे-बड़े कमरेडों ने चाय बागानों के मजदूरों को नाममात्र की मजदूरी देकर उन्हें पिछड़ा, गरीब, अनपढ़ और बेचारा बनाने रखने की भरपूर कोशिश की और वे अपने षड़यंत्र में कामयाब भी रहे। आज चाय मजदूर भारत में सबसे कम आय प्राप्त करने वाला समाज बन गया है। महा-आर्थिक शोषण के कारण ही World Health Organization के BMI (Body Mass Index) में चाय बागानों के 40% लोगों के स्वास्थ्य को 18.5 से भी कम पाया गया है। ऐसा कम BMI आंकड़ा अकाल से जुझते लोगों का होता है। यदि आज भी लालपार्टी के नेतागण चाय मजदूरों के हित को बाजार में बेचेंगे तो मजदूरों का क्या होगा ? लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्षी पार्टियों को लोकतंत्र और जनता के अधिकारों और हितों का रक्षक समझा जाता है। लेकिन यदि विपक्षी पार्टियाँ सत्ताधारी पार्टियों और उनके नेताओं के साथ व्यक्तिगत स्वार्थवस मिल जाएँगे तो जनता के अधिकारों का गंभीर हनन होगा। यदि चाय बागानों के मजदूरों के साथ इस बार भी अन्याय होगा, तो न्याय पाने का एकमात्र रास्ता मौलिक अधिकारों का रक्षक हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ही है। 2010 में The Plantation Labour Act 1951 में हुए संशोधन के अनुसार अब एक मजदूर भी चाहे तो किसी भी अन्याय और अपराध के लिए लेबर कोर्ट, हाईकोर्ट जा सकता है। हाईकोर्ट में मजदूरी का मामला चले जाने पर हाईकोर्ट एक-एक कण का विश्लेषण करेगा, यह तय है।
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अब ज्वाईंट फोरम में शामिल नहीं हुए ट्रेड यूनियनों को ज्वाईंट फोरम के आत्मघाती कदमों से लाभ उठाना चाहिए और उन्हें आगे बढ़कर मजदूरों के हित में 350 रूपये से अधिक की मांग 5 सिंतबर तक सरकार के पास जमा कर देनी चाहिए। आज चाय बागान का मजदूर अपने अधिकारों के लिए जागरूक हो चुका है। जो भी उन्हें ठगने का काम करने की कोशिश करेगा, वह डुवार्स तराई में सर उठा कर नहीं रह सकता है। मजदूरी का संघर्ष नागरिकों का मौलिक अधिकार, सम्मान और जीने की अधिकार का संघर्ष है। इसमें कहीं कोई समझौता कभी नहीं हो सकता है। मजदूरों के हित से टकराव करने वाले पूरी दुनिया को यह बात जान लेनी चाहिए।

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डुवार्स तराई में चल रही मजदूरी ठगी धारावाहिक-9

नेह अ इंदवार
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चाय बागान के मजदूरों को ठगने में पश्चिम बंगाल के नेताओं को महारत हासिल है। पश्चिम बंगाल का शासन और प्रशासन विशेष कर श्रम मंत्रालय के अफसरों को इस मामले पर विशेषज्ञता हासिल है। सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि सत्ताधारी पार्टियों द्वारा लगातार ठगे जाने के बाद भी चाय बागानों के स्थानीय नेतागण सत्ताधारी पार्टी के पूँछ से चिपके रह कर जिंदगी गुजारने में फक्र महसूस करते हैं।
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1. 2011 में पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन हुआ। माँ-मनुष-माटी की सरकार परिवर्तन और उन्नयन के नारों से सत्ता में आई। 2011 में ही चाय मजदूरों के लिए भी तीन वर्षीय त्रिपक्षीय वेतन समझौता किया गया। लाल पार्टियों के नेताओं के द्वारा ठगे गए मजदूरों की जिंदगी में परिवर्तन लाने के लिए समझौते में मजदूरी के साथ महंगाई भत्ता अर्थात् डीए (Dearness Allowance) दिए जाने का फैसला किया गया। लेकिन 7 साल गुजर गए। ठगी, धोखेबाजी और जुमलेबाजी में उस्ताद लोगों ने ऐसा चक्करघिनी चलाया कि आज तक मजदूरों को डीए नहीं दी गई। इस मुआ डीके की बात को 2015 में श्रम मंत्री द्वारा चालू किए गए अंतरवर्तीकालीन मजदूरी चालू करने के समय भी गोल कर दिए गए। इस डीए की बात को कौन गोल कर गए ? श्रम मंत्रीजी अपने ही मंत्रालय की बात को कैसे भूल गए ? क्या मंत्री महोदय ने इस संबंध में कोई होम वर्क भी किया था ? मंत्री महोदय तो श्रम मंत्रालय के सचिव और दूसरे नौकरशाहों के सहारे काम काम करते हैं। अब यह तय कौन करेगा कि डीए की बात को गोल करने में किनका हाथ है। मजदूरों के कल्याण की चिंता में रात-दिन एक करने वाले धाकड़ ट्रेड यूनियनिस्ट अर्थात् महान मजदूर नेताओं को भी डीए की बात याद आई या नहीं कौन जानता है? लेकिन हर महीना चंद देने वाले मजदूरों को हक है कि वे अपने महान नेताओं से पूछे कि उन्होंने इन सात वर्षों में इस विषय पर क्या-क्या पत्राचार किया ? लिखा पढ़ी किया और इसे अंतरवर्तीकलीन मजदूरी में अंतरकालीन लमसम भत्ते के रूप में क्यों नहीं दिलवाया?
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2. पश्चिम बंगाल सरकार की प्रमुख सुश्री ममता दीदी ने १२ जुलाई को उत्तरकान्य, सिलिगुड़ी में घोषणा की थी कि मजदूरों को न्यूनतम वेतन जल्द दिया जाएगा। इसके बाद सरकारी पक्ष ने घोषणा की कि 30 जूलाई को न्यूनतम मजदूरी की घोषणा कर दी जाएगी। लेकिन इस मामले को खींच कर 6 अगस्त ले जाया गया और कहा गया कि उस दिन घोषणा कर दी जाएगी। लेकिन 6 अगस्त को मंत्री महोदय उत्तरकान्य नहीं आए और अपने अफसरों को घोषणा के लिए भेजा। अफसर आए, मालिक पक्ष आया और मजदूर नेतागण भी आए। श्रम तफ्तर के अफसरों ने वहाँ कहा कि सरकार 172 रूपये न्यूनतम मजदूरी देगी। हाय रे शासन और प्रशासन! जब न्यूनतम वेतन के लिए गठित समिति ने किसी मान्य फर्मूला और फैसला पर हस्ताक्षर ही नहीं किया है, तो अफसर कैसे इस पर फैसला दे सकते हैं ? यदि इस पर विधि के द्वारा निश्चित की गई प्रक्रियागत कार्रवाई ही पूरा नहीं हुई है तो सरकार ने कैसे कह दिया कि 30 जूलाई को न्यूनतम वेतन की घोषणा की जाएगी ? कहते हैं प्रशासन नौकरशाही के कंधे पर सवार रहती है। अर्थात् प्रशासन का कार्य नौकरशाह ही करते हैं। मतलब नौकरशाह ने श्रम मंत्री और राज्य की मुख्यमंत्री को जुमलेबाज साबित करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखा। मुख्यमंत्री और मंत्री महोदय की बातों पर गहरा विश्वास करके मजदूर न्यूनतम वेतन की घोषणा या नोटिफिकेशन की आशा में प्रसन्नचित थे। लेकिन गरीबों की खुशियों पर कैसे तुषारापात किया गया, इसे तो सारे पार्यवेक्षक देख रहे हैं और दाँतों में ऊंगली दबा रहे हैं।
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3. मैने पहले ही अपने एक कामेंट-लेख में लिखा था कि विधि के अनुसार न्यूनतम मजदूरी के लिए इसके लिए बनी समिति के सदस्यों की आम सहमति होने, सभी के हस्ताक्षर होने के बाद इसे मंत्रालय और इसके लिए बनी बोर्ड में इसे प्रस्तुत करना होगा, वहाँ से यह कैबिनेट में जाएगा, और राज्यपाल के हस्ताक्षर होने के बाद ही नोटिफिकेशन के जरिए लागू किया जाएगा। एक बार सर्वसम्मति से तय हो जाने के बाद प्रत्येक छह महीने में इसे महंगाई दर अर्थात् डीए के बढ़ने-घटने के अनुसार प्रशासनिक कार्यालय आदेश के अनुसार बदला जाएगा। लेकिन उल्टा बांस बरेली की तरह इस मामले को बड़े बेढंगे ढंग से निपटाया गया। मजदूरी की घोषणा के लिए आए अफसर यह बताने में असफल रहे कि 172 रूपये की मजदूरी कौन से फर्मूला और आधारों पर आधारित है ? उधर ट्रेड यूनियन आंदोलन के लिए मैदान में उतर गए। बारिश के मौसम में उत्पादन मार खाने लगा। नेता, अफसर अपने काम में कितने बुद्धिमान हैं यह सारी दुनिया ने देख ली।
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4. मजदूरों के वेतन को लाल पार्टी के जमाने से जोड़ने वाले मंत्री और पार्टी अभी भी 7 वर्ष पीछे चल रहे हैं। यदि वे 7 साल के अनुभवी परिवर्तन और उन्नयन की सरकार होती तो वे भूल कर भी लाल पार्टी के जमाने की बात बार-बार मुँह में नहीं लाते। आखिर लाल पार्टी के जमाने की मजदूरी को बार-बार बोलने की जरूरत क्या है ? क्या वे भी लाल पार्टी की तरह ही 20-50 रूपये देकर मजदूरों को ठगने के लिए षड़यंत्र कर रहे हैं ? यदि नहीं, तो वे क्यों नहीं आज के राष्ट्रीय वेतन के औसत दर और सिद्धांतों पर मजदूरों की मजदूरी (300-350) तय की जाएगी नहीं बोलते हैं ? क्या उन्हें मालूम नहीं है कि चाय की सबसे कम कीमत पाकर कर भी केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक के चाय बागान मजदूरों को 300-500 रूपये मजदूरी दे रहे है। वे भी The Plantation Labour Act 1951 के प्रावधानों के तहत मजदूरों को सभी सामाजिक सुरक्षा का लाभ दे रहे हैं। आज मजदूर जानता है कि भारत में पश्चिम बंगाल के चाय की औसत कीमत बाजार में सबसे अधिक है।
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5. जब कोई पार्टी और सरकार बेईमानी में उतर जाती है तो वह जनता को पुराने जमाने में ले जाना चाहती है। वे बार-बार पुराने जमाने की बात को जानबुझ कर याद दिलाती है और जनता को मनोवै्ज्ञानिक रूप से शोषण के लिए तैयार करती हैं, ताकि जनता उनकी चालाकी को बड़ी उपलब्धी मान ले और उसे आंख बंद करके वोट दे। बीजेपी पार्टी भी अपनी असफलता के लिए बार-बार कांग्रेस के 60 साल को बेकार बताने में फालतू का ऊर्जा व्यय करती है।
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6. जो सरकार और पार्टी सच्चे प्रगतिशील मानसिकता की होती है वह कभी भी पलट कर पीछे नहीं देखती है न ही बीती बातों का रोना रोती है। “रात बीती बात बीती” की तर्ज पर वह आगे की बात सोचती है। वह आगे का नये इतिहास लिखने के लिए कमर कस लेती है।
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7. लेकिन चाय मजदूरों के मामले पर माँ मनुष और माटी की सरकार की सार्वजनिक सोच , व्यवहार और घोषणाएं इसे केन्द्र की जुमले सरकार से भी अधिक जुमलेबाज दिखा रही है। याद कीजिए जनता ने आपकी सरकार को परिवर्तन और उन्नयन के लिए विराट समर्थन दिया था। पलट कर 7 वर्ष पीछे देखने और लाल पार्टी के इतिहास की ओर लौटने के लिए नहीं दिया था।

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क्या सरकार करेगी 30 जुलाई को न्यूनतम वेतन की घोषणा

नेह अर्जुन इंदवार

पश्चिम बंगाल सरकार ने 30 जूलाई तक चाय मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन घोषणा करने का वादा किया है।
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लेकिन क्या सरकार यह वादा पूरी करेगी ? यदि करेगी तो मजदूरों को कितना न्यूनतम वेतन मिलेगा ? क्या मजदूरों को आवास के लिए लीज का अधिकार भी मिलेगा ?
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सबसे महत्वपूर्ण बात है, न्यूनतम वेतन मिलेगा तो वह कब से लागू होगा ? क्या वह पिछली तारीख अर्थात 2014 की जनवरी से मिलेगा ? क्योंकि 2014 से लागू होने वाले वेतन समझौते के समय से ही मजदूर न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत मजदूरी मांग रहे थे और तब उनके द्वारा तीन वर्षीय मजदूरी वेतन निर्धारण शर्तों को अपनी ओर से तोड़ कर, न्यूनतम मजदूरी के लिए आंदोलन किया गया, बागानों में हड़ताल किया गया और इसके समर्थन में सार्वजनिक बंद भी बुलाया गया था। तब मजदूरों ने किसी भी तरह से तत्कालीन समय में लागू तीन वर्षीय वेतन समझौते को मानने से इंकार कर दिया था।
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तब सरकार ने मजदूरों से न्यूनतम वेतन निर्धारण के लिए एक समिति बना दी थी। उस समिति के निर्णय को जनवरी 2014 से लागू किया जाना था। उल्लेखनीय है कि 2011 में हुए वेतन समझौता को 2011 के जनवरी महीने से लागू किया गया था। उस तीन वर्षीय समझौते की मियाद 31 दिसंबर 2013 को समाप्त हो गया था। नया वेतन समझौता अर्थात् नये फार्मेट में न्यूनतम वेतन को 1 जनवरी 2014 से लागू किया जाना था। तब सरकार ने कहा था कि जब तक न्यूनतम वेतन का निर्धारण नहीं हो जाता है, तब तक मजदूरों को “अंतरवर्तीकालीन मजदूरी” दी जाएगी। मतलब अभी अर्थात् दिनांक 1 जनवरी 2014 से जो मजदूरी दी जा रही है, वह अंतरवर्तीकालीन मजदूरी है न कि स्थायी। अंतरवर्तीकालीन का मतलब होता है temporary or for time being or interval time. मतलब अभी के वेतन को स्थायी नहीं माना जाना है। इसे तो 1जनवरी 2014 से लागू होने वाले वेतन की जगह अंतरवर्तीकालीन के रूप में दिया जा रहा है।
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इसलिए न्यूनतम वेतन की गणना दिनांक 1 जनवरी 2014 से होनी चाहिए। अर्थात् 1 जनवरी 2014 को सरकार द्वारा नियमों के अधीन महंगाई की घोषणा (डीए) के साथ न्यूनतम वेतन के लिए निर्धारित मूल वेतन मजदूरों को मिलना चाहिए। जितनी मजदूरी मिल चुकी है उतना पैसे काट कर बाकी पैसों को Arrear के रूप में मजदूरों को मिलना चाहिए।
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चूँकि सरकार द्वारा गठित समिति अपना काम समय पर पूरा नहीं कर सकी थी, इसलिए तत्काल रूप से मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं दिया जा सका था। अब जब सरकार इसे घोषित करने वाली है तो सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु इसके लागू किए जाने वाली तारीख ही है। यदि सरकार 2014 के जनवरी महीने से इसे लागू नहीं करती है तो यह मजदूरों के साथ धोखाधड़ी और ठगी होगी।
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इसका मतलब यह होगा कि सरकार बागान मालिकों को अरबों रूपये का आर्थिक लाभ पहुँचाने के लिए जानबूझ इसे किसी बाद की तारीख से लागू करने के लिए समिति के कामकाज को आगे ठेलते रही और बागान मालिकों को आर्थिक लाभ पहुँचाने का कुचक्र रचती रही। इसका मतलब यह भी है कि सरकार मजदूरों के अरबों रूपयों का नुकसान पहुँचाने के लिए षड़यंत्र रचती रही है।
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यदि सरकार न्यूनतम मजदूरी को 1 जनवरी 2014 से लागू नहीं करती है तो यह स्वतंत्र के बाद पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ी ठगी होगी। यह आशंका आधारहीन नहीं है। क्योंकि सरकार ने 17.50 पैसे की वृद्धि और राशन के 660 रूपये की देनदारी पर मजदूरों के साथ धोखाबाजी की है और उसे पिछली तारीख से लागू करने के बजाय बहुत बाद की तारीख से लागू किया है। इस बार सरकार को अपनी ईमानदारी दिखानी होगी। बेईमानी होने पर गेट मिटिंग का आंदोलन और बंद का अह्वान करने वाले ट्रेड यूनियन का अगला कदम क्या होगा ? यह जानना दिलचस्प होगा। क्या मजदूर गोदामों से तैयार माल को उठाने से रोकने के लिए आंदोलन करेंगे ?
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1 जनवरी 2014 को न्यूनतम वेतन की गणना किस तरह की जाएगी। आईए इसे जानने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार के श्रम विभाग द्वारा असंगठित क्षेत्र के लिए जारी नोटिफिकेशन की जाँच पड़ताल करते हैं।
1 जनवरी 2014 में सरकार ने न्यूनतम वेतन के लिए जो नोटिफिकेशन जारी किया था, उसमें निम्नलिखित चार्ट के अनुसार मजदूरी निर्धारित किया गया था।
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कृषि क्षेत्र के लिए –
Unskilled लेबर को 5347.00 (206.00) (without food), 4966.00 (191.00) (with food) )
जबकि Semi-skilled लेबर को 5882.00 (226.00) (without food), 5486.00 (211.00) with food)
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यह दर 30 जून 2014 तक के लिए मान्य था।
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छह महीने के बाद 1 जुलाई 2014 से लागू होने वाले नोटिफिकेशन के अनुसार निम्नांकित दर से न्यूनतम वेतन लागू किया किया।
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Unskilled लेबर को 5762.00.00 (222.00) (without food); 4966.00 (206.00) (with food) per day
Semi-skilled लेबर को 6339.00 (244.00) (without food); 5486.00 (228.00) (with food) per day
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उपरोक्त टेबल पर के राशि में छह महीने में हुई बदलाव को देखें।
कृषि क्षेत्र में Unskilled को छह महीने पहले 5347.00 (206.00) (without food); और Semi-skilled को 5882.00 (226.00) (without food) मिलता था।
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छह महीने में के बाद उन्हें क्रमशः 5762.00.00 (222.00) (without food); और 6339.00 (244.00) (without food) मिलने लगा।
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छह महीने में 206 रूपये की जगह 222 रूपये और 226 रूपये की जगह 244 रूपये मिलने लगा। यह बदलाव छह महीने में अखिल भारतीय स्तर पर होने वाले महंगाई सूचकांक के अनुसार होता है। ख्याल रखें कि वर्तमान समय में चाय मजदूरों के वेतन में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं होता है।
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यदि मजदूरों को 2014 से न्यूनतम मजदूरी दी जाएगी तो इसकी गणना कमोबेश इसी आधार पर की जाएगी। इसका मतलब है कि चाय मजदूरी को बढ़ोतरी प्रत्येक छह महीने में होगी।
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यदि चाय बागानों में मिलने वाले फ्रिंज बेनेफिट और Perquisites को इसमें मिलाया जाएगा तो इसकी गणना इससे भी अधिक होगी। चाय बागान प्रबंधन प्रति महीना मजदूरों से पीएफ राशि के साथ ग्रेज्युएटी राशि की भी कटौती करता है। ग्रेज्यूएटी की राशि की कटौती कानूनन अवैध है। यदि यह मजदूरों के वेतन से ही काट कर दिया जाता है तो इसका नाम ग्रेज्यूएटी क्यों होना चाहिए ?
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इस कानून के अनुसार कुछ निश्चित मामलों के आधार पर मालिक कर्मचारी को ग्रेज्युएटी से वंचित भी कर सकता है। लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि यदि मालिक कर्मचारी के वेतन से ही ग्रेज्युएटी की कटौती की है तो वह उस राशि से कर्मचारी को कैसे वंचित कर सकता है, क्योंकि वह तो Provident Fund की तरह ही उनके खून-पसीने की कमाई है। ग्रेज्युएटी पर मालिकों द्वारा मजदूरों के वेतन से कटौती गैर कानूनी है और एक अपराध है।
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इस पर यदि मजदूर सक्षम कोर्ट पर जाएँ तो मालिकों को बहुत भारी जुर्माना अदा करने होंगे और कईयों को जेल की सलाखों में भी बंद किया जा सकता है। इस मामले पर श्रम मंत्रालय के इंस्पेक्टर और कंपनी के चार्टर्ड एकांउटेंड भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ट्रेड यूनियन इस विषय को सरकार के समक्ष उठाएगा या इसे लेकर कोर्ट में जाएगा ? इस मामले में ट्रेड यूनियन ने क्यों अब तक मजदूरों को अंधेरे में रखा है और उसका आर्थिक शोषण में सहमति की भूमिका निभाया है।
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आज की तारीख में केरल में मजदूरों को 600 रूपये न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है। दक्षिण के राज्यों में कहीं भी तमाम सुविधाओं के साथ 300 रूपये से कम की मजदूरी नहीं है। पश्चिम बंगाल में भी चाय मजदूरों को महंगाई भत्ता अर्थात डीए को छोड़ कर 270 मिलना चाहिए। महंगाई भत्ते के साथ इसे 375 से 400 रूपयों के बीच होना चाहिए।
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सरकारी क्षेत्र में न्यूनतम वेतन का निर्धारिण असंगठित क्षेत्र के लिए किया जाता है। असंगठित क्षेत्र का मतलब ऐसा मजदूरी का क्षेत्र जहाँ मजदूर संगठित नहीं होते हैं। मजदूरों का कोई यूनियन नहीं होता है और और उनके पास मोलतोल करने की शक्ति भी नहीं होती है। क्योंकि वे कहीं दो चार की संख्या में तो कहीं पाँच-दस की संख्या में अनियमित ढंग से मजदूरी करते हैं और अपनी मजदूरी अपनी ओर से तय नहीं कर पाते हैं। असंगठित होने के कारण उनके साथ नाइंसाफी और पक्षपात तथा शोषण होने की बहुत संभावना होती है। इसीलिए उनके लिए सरकार हर छह महीने में वेतन का निर्धारण नोटिफिकेशन के जरिए करती है।
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चाय बागान क्षेत्र एक संगठित क्षेत्र है और यहाँ 20 से भी अधिक श्रमिक संगठन हैं। वे न्यूनतम वेतन से भी अधिक के लिए मोलतोल करने की शक्ति रखते हैं। इसलिए न्यूनतम वेतन से उन्हें अधिक वेतन मिलना चाहिए।
बागान मालिक मजदूरों से अनेक सुविधाओं के लिए वेतन से पैसे कटौती करते हैं, लेकिन वे वेतन से राशि कटौती करके भी उन सुविधाओं को मुकम्मल ढंग से नहीं देते हैं। इसके लिए श्रम विभाग को कार्य करना चाहिए लेकिन वह मालिकों से पैसा लेकर मजदूरों के पक्ष में कोई कदम नहीं उठाते हैं और मजदूरों का भारी शोषण जारी रहता है।
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अब बहुत सारी सुविधाओं को मालिक पक्ष ने देना बंद कर दिया है। कंबल, चप्पल, लकड़ी आदि सुविधाओं पर कोई नीति नहीं है। वहीं तीन स्तरीय पंचायत सरकार के प्रावधानों को चाय बागानों में लागू किए जाने के कारण अधिकतर नागरिक सुविधाएँ मजदूरों को सरकार से मिल रही है। ऐसे में आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक कार्य आदि के पैसे चाय बागान प्रबंधन द्वारा वेतन से काटने का कोई मतलब नहीं है। इस तरह के लगातार कटौती मजदूरों से मजदूरों का आर्थिक शोषण ही जारी रहता है।
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असम सरकार ने चाय मजदूरों के पक्ष में निर्णय लेते हुए प्रत्येक बागान में दो एकड़ जमीन लेकर प्रत्येक चाय बागान में एक उच्च विद्यालय और एक प्राईमरी हेल्थ सेटर की स्थापना कर रही है। इसके साथ ही उच्च शिक्षा के लिए राज्य के प्रत्येक मेडिकल कालेज में तीन सीट चाय बागान के बच्चों के लिए आरक्षित रख रही है।
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लेकिन पश्चिम बंगाल में मजदूरों के पक्ष में सरकार द्वारा सिर्फ प्रतीकात्मक कदम ही उठाए जा रहे हैं। चाहे वह टी टुरिज्म की नीति हो चाहे, लोक संस्कृति के माध्यम से दो तीन दर्जन लोगों को रोजगार देने की घोषणा या किसी पर्व त्यौहार में अवकाश की घोषणा।
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मालबाजार में 2013 में ममता बनर्जी ने आदिवासियों के बच्चों के लिए यूपीएससी, मेडिकल, ईंजीनियरिंग आदि के लिए कोचिंग क्लास शुरू करने की घोषणा की थी। लेकिन वह अब तक जमीनी स्तर पर कहीं दिखाई नहीं दी है। न ही मजदूरों को आवास के लिए बागानों में पट्टा देने की घोषणा पूरी हुई। दो हिंदी कालेज बने लेकिन वहाँ कालेज भर्ती में आदिवासी या नेपाली बच्चों के छह प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। अब कुछ दिन पहले ममता ने कहा कि सरकार मजदूरों के बच्चों को रोजगारउन्मुख प्रशिक्षण देगी, लेकिन ममता ने ऐसी बातें 2013 में भी कहा था, और वे अब तक जुमला ही साबित हुई है। ये तमाम कार्य सिर्फ आंख में धूल झोंकने के बराबर ही है।
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चाय बागानों के मजदूरों और उनके साथ रहने वाले आदिवासी और नेपाली समाज का विकास आर्थिक और सामाजिक विकास की ठोस नीतियों के आधार पर होंगी न कि प्रतीकात्मक कदमों के द्वारा। ठोस नीति में श्रम के बदले कानूनन न्यायपूर्ण वेतन देना पहली बात होगी।
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अक्सर मालिक पक्ष द्वारा कहा जाता है कि मजदूरों को न्यायपूर्ण वेतन देने से चाय बागान कंपनियों पर भारी आर्थिक दबाव पडेगा और कई बागान बंद हो सकते हैं। लेकिन केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में चाय मजदूरों को प्लानटेंशन लेबर एक्ट में उल्लेखित सुविधाओं के साथ 300-500 न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है। नागरिक सुविधाएँ देने के लिए उन राज्यों में मजदूरी से कोई कटौती भी नहीं की जाती है।
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चाय बागानों की चाय से होने वाली आय पर एक नजर देखने से हमें पता चल जाएगा कि पश्चिम बंगाल और दक्षिण राज्यों के चाय बागानों के चाय की कीमतों में कितना अंतर है।.
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टी बोर्ड के द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 19 दिसंबर 2015 में नीलाम हुए सीटीसी चाय की कीमत निम्नांकित थी।
सिलीगुड़ी में प्रति केजी 153, गुवाहाटी में 135, वहीं उसी दिन कोचिन में 105 रूपये, कुन्नुर में 82 रूपये, कोयंबटूर 86 रूपये था।
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दिनांक 26 सितंबर 2015 को सिलीगुड़ी में प्रति केजी 158 गुवाहाटी में 146, वहीं उसी दिन कोचिन में 98 रूपये, कुन्नुर में 68 रूपये, कोयंबटूर 72 रूपये था।
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दिनांक 2 दिसंबर 2017 को सिलीगुड़ी में प्रति केजी 157, गुवाहाटी में 142, वहीं उसी दिन कोचिन में 110 रूपये, कुन्नुर में 74 रूपये, कोयंबटूर 89 रूपये था।
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यह देखा गया है कि पश्चिम बंगाल के सीटीसी चाय की कीमत असम और दक्षिण भारत के चाय से हमेशा अधिक रहा है। पश्चिम बंगाल के चाय बागानों को दक्षिण के चाय बागानों से हमेशा अधिक आय होता रहा है। लेकिन सबसे अधिक चाय की कीमत वसूल कर भी पश्चिम बंगाल में चाय मजदूरों को सबसे कम वेतन दिया जाता है। जबकि सबसे कम कीमत पाकर भी तमिलनाडु, केरल और कनार्टक में मजदूरों को 300 से 500 रूपये तक मजदूरी दी जाती है।
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(TAN TEA तमिलनाडु में चाय मजदूरों को Basic Wage के रूप में 183.50 रूपये और डीए के रूप में 117.70 रूपये कुल 301.20 पैसे मजदूरी दी जाती है। अधिक जानकारी के लिए लिंक पर क्लिक करें। http://tantea.co.in/org.html)
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पश्चिम बंगाल में मजदूरों द्वारा अधिक मजदूरी की मांग किए जाने पर बागानों को बंद करने की धमकी दी जाती है। इस तरह की अनैतिक बातें दशकों से होता रहा है। इस प्रकार का व्यवहार अब तो बंद होना चाहिए।
चाय बागानों के दूसरे अनेक समस्याओं पर भी एक मुश्त निर्णय होना चाहिए। चाय बागानों में केमिकल का छिड़काव करने वाले मजदूरों को न तो सुरक्षा दिया जाता है और न उनका मेडिकल जाँच की जाती है और न ही उन्हें अतिरिक्त वेतन और Insurance की सुविधा दी जाती है। The Insecticides Act, 1968 पर सरकार ने चाय मजदूरों के लिए क्या कदम उठाया है ? मजदूरों को इसकी जानकारी देना बहुत जरूरी है।
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चाय मजदूर और फैक्टरी में काम करने वालों की अदला-बदली की जाती है। क्या बागानों में काम करने वालों पर भी फैक्टरी एक्ट लागू है ? दोनों जगह की मजदूरी एक जैसी क्यों होनी चाहिए ?
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चाय बागानों में झोला छाप डाक्टरों की नियुक्ति से क्या सरकार मजदूरों की मौत को सुनिश्चित करना चाहती है। बागान अस्पतालों की हालत कैसी होती है यह सभी जानते हैं। ग्रुप अस्पताल की बातें हमेशा हवा-हवाई होती रहीं हैं। बाबु स्टाफ में शिक्षित युवाओं की कहीं भी निष्पक्ष भर्ती नहीं होती है।
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Company Social Responsibility के तहत कंपनी कैसे अपना पैसा गैर बागान क्षेत्र या शहरों में खर्च करती है ???? क्या बागानों के निवासियों के प्रति उनकी जिम्मेदारी सिर्फ पैसे कमाने की रह गई है। सरकार इस संबंध में क्या सोचती है, सरकार को स्पष्ट करनी चाहिए।
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मजदूरों को राशन के बाबत 660 रूपये मिलने चाहिए। आखिर इस रूपये को कम करके दैनिक 9 रूपये करने के निर्णय के पीछे क्या औचित्य है?
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30 जुलाई बहुत दूर नहीं है। इस दिन सरकार अपने वादे के अनुसार न्यूनतम मजदूरी की घोषणा करेगी तो मजदूरों को अन्य राज्यों के साथ इसकी तुलना करनी चाहिए। फ्रिंज बेनेफिट, परक्युजिट, नागरिक सुविधाओं की भी तुलना की जाए।
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मजदूरी के साथ मजदूरों के आवास पट्टा, फ्रिंज बेनेफिट आदि बहुत सारे मामले हैं जिस पर सरकार को अपना रूख स्पष्ट करनी चाहिए। यदि सरकार मजदूरों के साथ न्याय करती है तो सच में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार माँ, माटी और मनुष्य की सरकार होने का सबूत देगी।
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यदि मजदूरों को न्याय पूर्ण मजदूरी नहीं मिलेगी तो मजदूरों को न्याय पाने के लिए सड़कों पर उतरना होगा और आवश्यकता के अनुसार कोर्ट का भी रास्ता चुनना होगा। प्लान्टेशन लेबर एक्ट 1951 में 2010 में एक संशोधन किया गया था, जिसके अनुसार यदि कोई असंतुष्ट मजदूर चाहे तो अपने साथ होने वाले अन्याय के विरूद्ध कोर्ट का रास्ता चुन सकता है। पहले यह सुविधा सिर्फ ट्रेड यूनियन को प्राप्त था। अब कोई भी मजदूर शोषण, वंचना, पक्षपात के आधार पर बिना किसी ट्रेड यूनियन के सहारे ही कोर्ट में जा सकता है और अपने लिए न्याय मांग सकता है। आखिर अन्याय और शोषण सहने की भी एक सीमा होती है।

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पृथ्वी से अधिक पानी हो सकता है इन परग्रहों में

वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के एरिक एगोल समेत खगोलविदों की एक टीम ने पाया है कि तारा ट्रैपिस्ट-1 (TRAPPIST-1) के परिभ्रमण करने वाले ‘धरती के आकार के सात ग्रह’ ज्यादातर चट्टान के बने हुए हैं, और कुछ में पृथ्वी की तुलना में अधिक पानी हो सकता है-जो जीवन को पनपने का मौका दे सकता है।

सूचनाओं के आधार पर कलाकार की कलाकारीNASA/JPL-Caltech

इस अनुसंधान का नेतृत्व स्विट्जरलैंड के बर्न विश्वविद्यालय के साइमन ग्रिम द्वारा किया गया था, जिसकी रिपोर्ट Astronomy and Astrophysics पत्रिका में 5 फरवरी को प्रकाशित किया गया है। एगोल लगभग दो दर्जन सह-लेखकों में से एक हैं। इन वैज्ञानिकों ने 7 ग्रहों के स्वरूप निर्धारण करने के लिए अब तक उपलब्ध जानकारी के आधार पर कंप्यूटर मॉडल में इसका प्रयोग किया।

ट्रैपिस्ट -1 कुंभ नक्षत्र में स्थित एक अल्ट्रा-शीतल बौना तारा है, जो पृथ्वी से 40 प्रकाश-वर्ष या लगभग 235 ट्रिलियन मील की दूरी में है। खगोलविदों ने 2017 की शुरुआत में नासा स्पिट्जर स्पेस टेलीस्कॉप और चिली में यूरोपीय दक्षिणी वेधशाला समूह के ‘ला सिला वेधशाला’ का प्रयोग करते हुए सात संभाव्य-आवास-योग्य-ग्रहों (potentially habitable planets) की पुष्टि की  है। यह पृथ्वी-आकार के ग्रहों के साथ एक एकल तारा की परिक्रमा करने वाले सबसे पहला ज्ञात पर-सौर मण्डल प्रणाली (extrasolar systems) है।

TRAPPIST-1 के सात ग्रह जिन्हें TRAPPIST-1b, से TRAPPIST-1 h के नाम दिए गए हैं, अपने तारे से बाहर की ओर बहुत नजदीक से चक्कर लगाते हैं। इनकी नजदीकी सूरज से बुध ग्रह की तुलना से भी कम है और हमारे सौर मण्डल प्रणाली में यह संभावित-आवास-क्षमता बनाए की दृष्टिकोण से बहुत ज्यादा नजदीकी होगी।  लेकिन, चूँकि TRAPPIST-1  बहुत घुंधला तारा है,  इसके चारों तरफ के आकाश में (सिद्धांतों में) घुमते चट्टानी ग्रहों को अपनी सतह पर पानी बनाए रखने के लिए उपयुक्त परिस्थिति मिलती है।  

वास्तव में, ट्रैपिस्ट -1 की कक्षा में ये ग्रहें इतनी करीब से परिक्रमा करती हैं कि  एक ग्रह के सतह पर खड़े व्यक्ति को पड़ोसी ग्रहों के दृश्य बहुत शानदार दिखेगी। कुछ पडोसी ग्रह पृथ्वी से दिखते चंद्रमा की तुलना में आकाश में अधिक बड़े दिखेंगे।

ग्रहों की घनत्व के बारे अब पहले की अपेक्षा बहुत अधिक जानकारी प्राप्त हुई हैं। नयी जानकारी इंगित कर रहे हैं कि  उनमें से कुछ में पृथ्वी के महासागरों की तुलना में लगभग 250 गुना ज्यादा पानी है। उनके कुल द्रव्यमान का 5 प्रतिशत तक पानी हो सकता है। करीब के ग्रहों में गर्म, घने, वाष्पशील माहौल और अधिक दूर वाले ग्रहों में बर्फीले सतह होने की संभावना है।

आकार, घनत्व और तारे से प्राप्त होने वाले विकिरण की मात्रा के संदर्भ में, चौथा ग्रह, ट्रैपिस्ट-1ए,  पृथ्वी के लगभग सबसे अधिक समान है, हालांकि थोड़ा घनीभूत है। यह सातों में से सबसे बड़ा चट्टानी (रॉकी) ग्रह है, और इसमें तरल पानी की मेजबानी करने की क्षमता अधिक है। TRAPPIST-1f, जी और एच स्टार से काफी दूर हैं,  इसके सतहों में पानी जमे हो सकते हैं।

शोधकर्ता ग्रहों के द्रव्यमान की गणना करने में इसलिए सक्षम थे, क्योंकि वे अपने तारे के सामने से गुजरते समय क्रमबद्ध थे, जिसे पारगमन कहा जाता है। पारगमन के दौरान पृथ्वी- और अंतरिक्ष-आधारित दूरबीनों द्वारा ग्रह के प्रकाश में आने वाले क्षणिक मंदता का पता लगा सकते हैं। ग्रह के प्रकाश में आने वाले धुंधलापन ग्रह के त्रिज्या से संबंधित होता है उससे ग्रह की घनत्व की मात्रा ज्ञात की जाती है।

ग्रहों के घनत्व को जानने के लिए टीम ने “ट्रांजिट टाइमिंग वैरिएशन” या “टीटीवी” नामक एक विधि का इस्तेमाल किया था – जिसे हाल ही के वर्षों में अगोल ने विकास करने में सहायता की थी। अन्य गुरुत्वाकर्षण बलों को छोड़कर एक पारगमनकारी ग्रह अपने मेजबान स्टार के सामने से हमेशा एक ही समय-मात्रा में पारगमन करेगा – जैसे पृथ्वी हर 365 दिन में सूरज-घड़ी की तरह इसकी परिक्रमा करती है।

लेकिन चूँकि TRAPPIST-1 में ग्रहे एक साथ अत्यंत करीब रूप से पैक्ट हैं,  वे एक दूसरे को गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित करते हैं,  इससे “वर्ष” के समय में थोड़े से बदलाव लाते हैं। कक्षीय समय में उन तब्दीलों का उपयोग ग्रहों के द्रव्यमान का अनुमान लगाने में किया जाता है।

अगोल ने आलेख के अग्रणी-लेखक ग्रिम के साथ समानांतर में टीटीवी गणना की। उन्होंने कहा, “हमने ग्रहों का समान द्रव्यमान पाया,” जो सुसंगत है, और हमारे विश्वास में वृद्धि हुई है कि हमने कोई गलती नहीं की। “

फिर घनत्व की गणना करने के लिए द्रव्यमान और त्रिज्या का उपयोग बारी-बारी में किया जाता है

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के खगोल विज्ञान के प्रोफेसर एगोल को गोगेंनहेम फैलोशिप द्वारा इस कार्य में समर्थन दिया गया था और वे वॉशिंगटन विश्वविद्यालय पर स्थित नासा एस्ट्रोबोलॉजी इंस्टीट्यूट के वर्चुअल प्लेनेटरी प्रयोगशाला से संबद्ध हैं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि अगले चरण में  ट्रैपिस्ट-1 प्रणाली की खोज में निकट भविष्य में नासा द्वारा स्थापित किए जाने वाले जेम्स वेब टेलेस्कोप का उपयोग किया जाएगा और इन ग्रहों के वायुमंडल का अध्ययन किया जाएगा।

एगोल कहते हैं “कुछ समय के लिए परग्रहों का अध्ययन का लक्ष्य, पृथ्वी जैसे आकार के ग्रहों की संरचना और तापमान की जांच करना रहा है,” । “ट्रैपेस्ट 1 की खोज और चिली में ईएसओ की सुविधाओं की क्षमताओं और अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित नासा स्पिट्जर स्पेस टेलीस्कॉप ने यह संभव बना दिया है – यह हमें पृथ्वी की आकार वाले परग्रह किससे बना हुआ,  इसकी पहली झलक दे रहे हैं।”

कैल टेक में स्पिट्जर साइंस सेंटर के प्रबंधक सीन केरी कहते हैं, “अब हम हमारे खुद के सौर मण्डल के अलावा किसी अन्य सौर मण्डल की अपेक्षा ट्रापपीस्ट -1 के बारे में अधिक जानते हैं।” प्रस्तुति-नेह अ इंदवार 

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