व्यापार कैसे किया जाए ?

                                                                                                                                                                                         नेह अर्जुन इंदवार 

आदिवासी समाज में व्यापार या व्यवसाय न के बराबर किया जाता है । जहाँ आदिवासियों की 10 हजार आबादी है वहाँ भी आदिवासी व्यापार करते हुए नहीं पाए जाते हैं और ऐसी आबादी वाली बस्ती में भी गैर आदिवासी ही दुकान चलाते हुए व्यापार करते पाए जाते हैं । सवाल उठता है, कि क्यों आदिवासी अपने ही गाँव-घरों के आसपास भी व्यापार नहीं करता है ? क्या उनमें व्यापार करने की योग्यता नहीं होती है ? क्या उनमें व्यापार करने के लिए आत्मविश्वास नहीं होता है, या पूँजी नहीं होती है ? क्या आदिवासी को व्यापार का फंडा मालूम नहीं होता या वह व्यापार को फालतू का काम समझता है ?

सवाल है कि व्यापार क्या है? दुकानदारी क्या है और इसे चलाने का फंडा क्या है ? कई लोग व्यापार के फंडे को नहीं समझते हैं और कई लोग इसलिए व्यापार नहीं करते कि वे इसे चलाने के लिए आवश्यक समझदारी नहीं रखते । कई लोग इसलिए भी व्यापार नहीं करते क्योंकि वे व्यापार के दम पर आगे बढ़ने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास नहीं रखते और अपने सीमित अनुभव के आधार पर व्यापार के बारे एक निश्चित पैमाने पर अपनी सोच को बाँध कर रख लेते हैं । मसलन, इस जगह पर व्यापार या दुकानदारी नहीं चलेगा, दुकानदारी के लिए किसी खास जगह या बाजार के बीच दुकान होनी चाहिए, किसी खास इलाके में खास चीज ही बिकती है ।

यदि किसी जगह पर किसी एक का दुकान बहुत चल रहा है तो उन्हें लगता है उस दुकान पर बिकने वाली चीजों के अलावा दूसरी चीजें वहाँ नहीं बिकेगी। कई लोगों को लगता है कि आदिवासी बहुत हिसंगा वाले होते हैं, वे उनके दुकान से माल लेने के बदले मोदी के दुकान से माल ले लेंगे । सामाजिक ढर्रे के बाहर कुछ नया करने वाले आदिवासियों से समाज के लोग सही ढंग से व्यवहार नहीं करते हैं । पास -पड़ोसी या लोगों में मन में अपने समाज के किसी नये व्यवसायी या उद्यमी के लिए प्रशंसा के भाव के बदले हिसंगा का भाव ज्यादा पैदा होता है । तरह-तरह के पूर्वाग्रह, बेतुके, असंगत, तर्कहीन और गैर संभावना वाले विचार आते हैं । यह कुछ सीमा तक सही हो सकता है, लेकिन पूरी तरह ऐसी ही स्थिति होगी यह तो कोई कह नहीं सकता है । कई लोग व्यापार को किस्मत की बात कहते हैं, तो कई लोग किसी भी तरह की नौकरी को व्यापार से अधिक अच्छा मानते हैं । कहते हैं हाथों की लकीर से हाथों की मेहनत वजनदार होती है । कई लोगों को लगता है कि बिना पढे़-लिखे व्यापार या दुकानदारी नहीं की जा सकती है ।

आइए, दुकानदारी और व्यापार के कुछेक फंडों के बारे बातें करते हैं —

दुकानदारी या व्यवसाय करने के लिए मूल रूप में तीन चीजों की जरूरत होती है। पहला है, आदमी की इच्छाशक्ति और इसके प्रति झुकाव । दूसरा, पूँजी की उपलब्धता और तीसरा, दक्षता अर्थात दुकानदारी, व्यवसाय के लिए आवश्यक व्यावहारिक ज्ञान । कई कहते हैं, उनके पास इसके लिए व्यावहारिक ज्ञान नहीं है । कई कहते हैं, उनके पास पूँजी नहीं हैं । कहते हैं, पूँजी बिना व्यवसाय करने के बारे सोच भी नहीं सकते हैं । मूल रूप से तीन चीजें इच्छा या व्यापार के प्रति झुकाव, दक्षता और पूँजी अर्थात् Attitude, skills and capital चाहिए। 

इन तीन में से महत्वपूर्ण है इच्छाशक्ति । सर्वप्रथम तो दुकानदारी के लिए व्यक्ति के पास इच्छा होनी चाहिए । बिना इच्छा के आदमी व्यापार तो क्या जिन्दगी में कुछ भी नहीं कर सकता । इच्छा हो, तो हुनर अपने आप आ जाता है । जब एक बार हुनर आप के पास आ जाता है और इच्छा भी अपनी जगह कायम रहती है, तो पूँजी Capital बहुत बड़ी चीज नहीं रह जाती है । लाखों व्यापारी हैं जो अपनी तीव्र इच्छाशक्ति, रवैया, मेहनत के बल पर बिना हुनर और पूँजी के कामयाब व्यापारी बने हैं ।

रिलांयस इंडस्ट्री के संस्थापक स्वर्गीय धीरूभाई अंबानी एक स्कूल टीचर का बेटा था, उसके पास पूँजी के नाम पर सिर्फ एक साइकिल हुआ करता था। लेकिन अपनी तीव्र इच्छाशक्ति, मेहनत के बल पर सिर्फ 25 वर्षों में ही भारत का सबसे कामयाब और सबसे धनी उद्योगपति बन दिखा दिया, कि दुनिया में सफलता के लिए कमर कस कर आगे बढ़ने वालों को दुनिया किसी भी तरह रोक नहीं पाती है । इच्छाशक्ति के सामने हर चीज बौनी हो जाती है। व्यक्ति की तीव्र इच्छाशक्ति के बल पर अन्य चीजें खुद चल कर उनके पास आती है। दूसरे शब्दों में इच्छाशक्ति एक अदृश्य चुंबक है, जो अन्य चीजों को अपने पास खींच लाती है।

कई लोगों को लगता है कि व्यापार करने, दुकानदारी करने के लिए शिक्षा की बहुत जरूरत है, यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, लेकिन हर मामले में यह सही हो, यह जरूरी नहीं । आप अपने आसपास देखिए, आपके पड़ोस का कामयाब दुकानदार कितना पढ़ा लिखा है ? आप किसी भी बाजार या हाट में जाइए और व्यवसायियों से पुछिए कि वे कितने पढ़े-लिखे हैं ? भारत की आजादी के समय भारत के दो भागों में बंटने के कारण लाखों लोग सिर्फ अपने पहने हुए कपड़ों में रिफ्यूजी बनने के लिए मजबूर हुए, लेकिन वे नयी जगह में जाकर व्यवसाय और दुकानदारी के बल पर आज कहाँ से कहाँ पहुँच गए हैं । उन्हें भी लगता रहा होगा कि उनके पास न तो दुकानदारी का हुनर है, न ही पूँजी और न ही अनुभव । लेकिन समय आदमी को हुनर भी सीखा देता है और अनुभव, जिंदगी तथा व्यवसाय को नये अंदाज में देखने के लिए नयी दृष्टि देता है ।

नये लोगों को लाखों-करोड़ों की पूँजी भी नहीं चाहिए होती है, क्योंकि वे इतने भारी भरकम जिम्मेदारी को उठा नहीं सकते हैं । उन्हें तो छोटा सा एक दुकान ही धीरे-धीरे सभी चीजों को सिखाता है और अनुभवी बनाता है । एक छोटा दुकान ही एक बड़ा स्कूल और विश्वविद्यालय बन जाता है । दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति रहे बिल गेट्स मैट्रिक तक भी पढ़े-लिखे नहीं थे, उसके पास इतना पैसा भी नहीं था कि वे कोई बड़ा व्यवसाय शुरू करते, उसने अपने ही घर में एक छोटा-सा व्यवसाय शुरू किया और फिर समय के साथ अपनी मेहनत के बल पर उसे बड़ा बनाने में लगे रहे । शुरूआत में उसके साथ काम करने वाली एक सेकेट्री कहती हैं –

“मैं जब उनके यहाँ काम करने के लिए गयी तो मुझे अपने निर्णय पर पछतावा हुआ, कि मैं एक बहुत साधारण से व्यक्ति, जिनके पास न तो पूँजी थी, न ही अनुभव, के पास काम करने के लिए आई हूँ, मैं कई दिन काम करने के बाद वहाँ काम छोड़ने ही वाली थी।”

लेकिन बिल गेट्स के पास व्यवसाय के लिए बहुत तेज इच्छाशक्ति थी, वह जी-तोड़ मेहनत करने में विश्वास करता था और नये अवसर की तलाश में अपने काम को लगातार करता रहा और सिर्फ कुछ ही सालों में वह दुनिया का सबसे धनी और सफल व्यक्ति बन बैठा ।

आदिवासी इलाकों में अपने ही लोगों के बीच व्यवसाय करने, महज एक छोटे-से दुकान से ही शुरूआत की जा सकती है। दुकानदारी या व्यवसाय ऐसा काम नहीं होता है जहाँ कुछ दिन काम किया और फिर दूसरे काम की खोज में निकल पड़े । एक दुकान, जो सिर्फ चार-पाँच सामानों से शुरू होता है, और थोड़े ही समय में उस दुकान में सैकड़ों सामान आ जाता है । थोक सामानों के बिक्रेता अपनी गाड़ियों के माध्यम से छोटे-छोटे दुकानों में बाकी अर्थात् उधारी में सामान देते हैं और उसके बिक्री होने के बाद पैसे मांगते हैं, या बिक्री नहीं होने पर अपने सामान को वापस लेकर जाते हैं और दूसरे सामान बिक्री के लिए देते हैं ।

दुकानदार हर सामान से मुनाफा कमाता है, किसी में कम तो किसी में ज्यादा । लेकिन दुकानदार अपना मालिक खुद होता है, उसे किसी दूसरे के पास काम मांगने के लिए नहीं जाना होता है, न ही वह किसी के अधीन में काम करता है । यदि वह मेहनती होगा तो दिन दुनी रात चैगुनी कमाई कर सकता है । बस उसे अपने व्यापार को लोगों की आवश्यकता अनुसार बनाना होगा और उसके अनुरूप अपने व्यवहार को ढालना होगा । एक मिलनसार, हँसमुख और मीठी बात बोलने वाले दुकानदार से सामान लेना लोगों को अच्छा लगता है । दुकानदार को थोड़े ही दिनों में पता चल जाता है कि कौन सा सामान अच्छा है और कौन सा खराब । कौन सा सामान अधिक बिकता है और कौन सा सामान यूँ ही पड़ा रहता है। लोगों को किस तरह के सामानों की जरूरत अधिक होती है और किन सामानों के लिए वे अधिक पैसा चुकाने के लिए भी तैयार रहते हैं।

छोटे-मोटे पूँजी से शुरू करने वाले व्यवसाय के लिए तो आसपास ही बड़े थोक व्यापारी से माल मिल जाता है । बहुत ऐसे व्यापारी होते हैं जो एक साथ खुदरा व्यवसाय के साथ अधिक मात्रा में सामान लेने वालों को दस से लेकर तीस-पैंतीस प्रतिशत छूट देकर सामान बेच कर थोक व्यापारी के रूप में भी व्यवसाय करते हैं । कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलौर, अहमदाबाद, सूरत, दिल्ली, लुधियाना, सिलीगुड़ी, गुवाहाटी आदि कई बड़े शहर हैं जहाँ कई बाजारों में सिर्फ थोक के भाव में सामानों की बिक्री की जाती है । कोलकाता में बड़ा बाजार एक ऐसा ही बाजार है जहाँ थोक के भाव में सामान खरीद कर पूरे उत्तर पूर्व भारत के व्यवसायी अपना व्यवसाय करते हैं। इन बाजारों में हर सामान थोक के भाव में मिलते हैं। जो साड़ी, बाजार में चार सौ रूपये में बिकता है, वह यहाँ थोक के भाव में सिर्फ 150 से लेकर 200 रूपये में ही मिल जाता है । व्यापार के इच्छुक आदिवासी युवकों को इन बाजारों में आकर देखना चाहिए और नये आइडिया तथा अनुभव लेनी चाहिए । पूरे आदिवासी इलाकों में ही उपरोक्त शहरों से ही सारा सामान आता है और यदि दूसरे लोग व्यवसाय कर सकते हैं, तो एक आदिवासी क्यों नहीं कर सकता ?

नयी दुकानदारी, व्यवसाय या अन्य कोई व्यापार शुरू करने वाले के पास पूँजी की आवश्यकता होती है, लेकिन यह आवश्यकता इच्छाशक्ति के मुकाबले कम महत्व की होती है । इच्छाशक्ति रहने पर महज दो-चार सौ रूपये से भी व्यवसाय शुरू की जा सकती है। यह पूँजी व्यापार की शिक्षा देती है और इसी के बल आगे बढ़ना है, यह भी याद दिलाते रहती है । व्यापार में पूँजी बहुत तेजी से बढ़ती है । व्यापार में अधिक पूँजी की आवश्यकता पर व्यापारी या व्यवसायी को बैंक ऋण देने के लिए हमेशा तैयार रहता है। आदिवासी व्यवसायी आदिवासी विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत प्राप्त होने वाले ऋण के लिए भी कोशिश कर सकता है । इसमें सब्सिडी भी मिलता है, अर्थात् या तो आपको ऋण पर ब्याज कम देना होगा, अथवा ऋण के बीस से तीस प्रतिशत भाग को वापस करने की जरूरत भी नहीं होगी । लेकिन एक सच्चा व्यवसायी मुफ्त में मिलने वाले ऋण की बाट नहीं जोहता है ।

दुकानदार या व्यवसायी को स्थानीय सरकारी महकमे से लाईसेंस भी लेनी होती है । कई व्यापार करने के लिए लाईसेंस की जरूरत नहीं होती है । लेकिन लाईसेंस रहने पर बैंक से ऋण लेने में सुविधा होती है। बैंक में बचत खाता की जगह करेंट एकाउण्ट खोला जा सकता है, जिसमें आवश्यकता होने पर आॅवरड्राफ्ट की भी सुविधा मिलती है, अर्थात् आपके बैंक में आवश्यक फंड नहीं रहने पर बैंक आपको कुछ दिनों के लिए आपके अपने फंड से अधिक पैसे निकालने की सुविधा दे सकता है।

एक व्यवसाय या व्यापार में व्यक्ति को हमेशा अपने हित में कार्य करना होता है। वह अपने व्यापार का मालिक खुद होता है इसलिए उसे चैबीसों घंटे अपने दिमाग को उसी दिशा में रखना होता है, इससे व्यापारी अनावश्यक और फालतू आदतें, जैसे बिना मतलब के वक्त को बर्बाद करना या संगी- साथी के साथ घूमने-फिरने से बच सकता है। हँडिया-दारू पीने की आदत से भी छुटकारा पाया जा सकता है । एक व्यापारी के पास हमेशा पैसा होता है, वह उन पैसों से उन सामानों को सहज ही खरीद सकता है, जिसे कोई कम दाम में बेचना चाहता है । पैसा हमेशा पास में रहने से व्यक्ति को कई फायदा होता है, वह पैसे से पैसा पैदा करने के लिए अधिक मेहनत कर सकता है । इससे मानसिक क्लेश भी कम होता है, क्लेश कम होने से मन की शाँति भी रहती है । सबसे बड़ी बात होती है, वह अपनी मर्जी का मालिक खुद होता है और किसी के अंडर में काम करना नहीं होता है । एक बार व्यवसाय जम जाने पर वह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है और पूरे घर वाले इससे लाभांवित होते हैं। जबकि नौकरी में सिर्फ एक आदमी को नौकरी मिलती है और उसे एक दिन रिटायर भी होना पड़ता है, फिर उस नौकरी पर घर वालों का कोई हक भी नहीं होता है । लेकिन व्यापार में पूरे घर वालों का इस पर हक होता है और दूसरी तीसरी पीढ़ी को भी उसी व्यवसाय या व्यापार से आय आता रहता है ।

इस लेख को पढ़कर यदि आप अपने पैरों पर खड़ा होना चाहते हैं, तो आज ही इस विषय पर सोचना शुरू कीजिए। आदिवासी समाज में एक बिजनेसमैन बन कर आपकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ जाएगी और आपके स्वालंबन से समाज स्वयं स्वालंबित होगा ।   This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec, 2014. All rights reserved

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बाँस का ढूठू

कहानी                                                                                                                                                                       नेह अर्जुन इंदवार 
  

अरे! तू कैसे काम करता है ? दिन भर में बस इतना सा ढूठू निकाला है ?
वह गिनती करने लगा – एक, दो, तीन, चार, पाँच — दस ! बस ? इतना ही ? उसकी आवाज में गुस्से से अधिक उपहास शामिल था । मैं क्या बोलता, मेरे पास बोलने के लिए कुछ था नहीं । मैं चुपचाप उसे देखता रहा ।
 
तू उस बुड्ढे बोलो को देखा है, अरे वही जो लाल शर्ट पहना हुआ है ! वह तर्जनी से उसे दिखाता हुआ बोला । ”वह दिन भर में चार दर्जन ढूठू निकालता है, और तू जवान छोकरा एक दर्जन भी नहीं निकाल पाया।“  उसने सीधे मेरी सामर्थ्य पर सवाल खड़ा किया और मुझे गौर से देखता हुआ बोला-

”तू तो सिंकया पहलवान है, तेरे हाथों में जान ही नहीं तो तेरी कुल्हाड़ी क्या खाक निकालेगी ढूठू ?“
उसने मेरीे बाँहों की ओर इशारा करते हुआ कहा । वह इतना कहता तो शायद मैं आपे से बाहर नहीं होता, लेकिन कदम बढ़ा कर मेरी बाॅह को छूते हुए कहा-

‘‘अरे यह तो लडकियों की तरह मुलायम है ।’’
उसके इतना कहने से मेरा दिमाग भभक गया । गुस्से का एक तूफान दिमाग में आया । गुस्से भरे हाथों से मैंने कुल्हाड़ी के डंडे को कस कर पकड़ लिया । उसने और ज्यादा बकबक की तो सीधे उसके गर्दन में कुल्हाड़ी मारूँगा । मैं बेइज्जती के समंदर में डूबता हुआ सोच रहा था ।
 
मेरी उम्र उन दिनों सतरह-अठारह साल की थी और मैंने इज्जत, बेइज्जत के बारे अच्छा खासा अनुभव प्राप्त कर लिया था । मुझे बेइज्जती के बोल बिल्कुल नहीं सुहाते । किसी के कुछ कहने पर मैं गुस्से से पागल हो जाता था।  गुस्से में किसी से भी भीड़ जाता और जो भी सामान हाथ में आता उससे प्रहार करता।  लेकिन जब से घर से बाहर काम करने निकला था, तब से मैंने देखा कि लोग बात-बात पर बिना सोचे समझे कुछ भी बोल लेते हैं और दूसरे क्षण ही वे उन बातों को भूल जाते हैं। तब मैंने लोगों के सोचने के ढंग को थोड़ा-थोड़ा समझने लगा था। इसका एक लाभ यह हुआ कि  मैंने गुस्सा करना और उसे काबू में करना भी सीख लिया था ।

लेकिन सुपरवाइजर के बोल से मेरा गुस्सा बेकाबू हुआ जा रहा था। मेरी आंखों में खून सवार हो गया था । मैं कुल्हाड़ी से ठीक उसके गर्दन में वार करने के लिए तैयार हो रहा था । तभी बीस गज की दूरी पर जहाज के रनवे से एक लड़ाकू जहाज जोरदार शोर करता हुआ तेजी से गुजर गया और सुपरवाइजर की आवाज उस शोर में गुम हो गई । और उसी के साथ ही वह कदम बढ़ाते हुए वहाँ से आगे दूसरे मजदूरों के ढूठू गिनने के लिए आगे बढ़ गया । कुल्हाड़ी पर मेरी पकड़ ढीली पड़ गई । लेकिन गुस्से से मैं लाल हो चुका था । मेरे आसपास खड़ी मजदूरीन औरतें मेरी ओर देख रही थीं । मेरे गुस्से का असली कारण वहाँ खड़ी औरतों के सामने मेरी ताकत, शरीर और काम करने के सामथ्र्य पर उसका भद्दा कामेंट्स ही था ।

सुपरवाइजर अक्सर मजदूरों को डाँटते हैं, गाली करते हैं यह मुझे मेरी मजदूरी के पहले दिन ही पता चल गया था । लेकिन कम सामथ्र्यवान होने का खमियाजा इस तरह सबके सामने ऐसी बेइज्जती के साथ भी होती है इसका मुझे आज ही एहसास हुआ ।
 
मैं एक दुबला पतला किशोर था । गाँव से दूर कस्बे के स्कूल में नौंवीं कक्षा में पढ़ता था । गाँव से होकर गुजरने वाली बस में स्कूल जाता । लेकिन कभी-कभी किराए के पच्चीस पैसे में से पाँच पैसे कम पड़ जाते तो बस कंडक्टर मुझे बस से उतारने की धमकी देता । रास्ते में तीन किलोमीटर जंगल पड़ता और मैं उन्हें दूसरे दिन पाँच पैसे चुकाने की बात कहता तो वह और जोर-जोर से कहता-
”क्या यह राशन की दुकान है जो बाद में पाँच पैसे चुका दोगे ।“
वह कंडक्टर हम स्टूडेंट्स से हमेशा ऊँची आवाज में बात करता । उसे पता था कि हम लोग चाय बागान में काम करने वाले मजदूरों के बच्चे हैं और हमारे पालक हमें पूरे पैसे दे नहीं पाते हैं । कभी-कभी भूख लगने पर हम किराए के पैसे में से पाँच पैसे के चने खा लेते थे और किराए के पैसे कम पड़ जातेे ।

हमारी कई बार बस वालों से झड़प हो चुकी थी ।
बकझक होने पर वे हमें हमारी औकात बताना चाहते थे । वे यह एहसास दिलाना चाहते थे, वे हमें अपने बस में यात्रा करने देकर हम पर एहसान कर रहे हैं । लेकिन हम उन्हें बस का तय किराया देते थे और हमारी नजर में यह सिर्फ एक लेन देन से अधिक कुछ नहीं था । हम रोज सुबह स्कूल जाने के लिए मघु चौपाथी पर के बस स्टैण्ड पर खड़े होते और बस आने पर रूकने का संकेत करते । लेकिन बकझक होने के बाद वाली दिन पर वे हमें स्टैण्ड पर खडे देखते और को धीमी करते लेकिन रोकने के बजाय अचानक तेजी से बस ले भागते । हम कभी-कभी इसी वजह से स्कूल जा नहीं पाते । बस वालों के गैर जिम्मेदाराना रवैये पर हमें बहुत गुस्सा आता । लेकिन हम कुछ नहीं कर पाते । ऐसा व्यवहार करके शायद उन्हें आनंद आता या संतुष्टि मिलती ।

बार-बार ऐसा होने पर हम सब स्टूडेंट्स मिल कर एक दिन पेड़ की बड़ी सी एक डाल को रोड में रख कर रोड जाम कर दिया और आम जनता को बस के कंडक्टर के व्यवहार के बारे बताया । वे हमारी मदद करने के लिए सड़क पर जमा हो गए और कंडक्टर पर सब अपना-अपना हाथ साफ करने का मन बनाने लगे । बस आई, उसे रूकना पड़ा और हम बस कंडक्टर और ड्राइवर से उलझ पड़े ।इसी बीच कुछ लोग उन पर हाथ उठाने लगे । हम स्टूडेंट्स मिल कर उन्हें पिटने से बचा लिया । इस तरह बस वालों के साथ रोज-रोज का खचर-पचर कुछ कम हुआ । बस वाले हमारी एकता और ताकत को देख चुके थे, इसलिए वे हमसे कम ही उलझते ।

घर में सिर्फ माँ काम करती थी । वह मुझे पूरे पैसे नहीं दे पाती थी । स्कूल की लम्बी छुट्टियों में पैसे कमाने के लिए मजदूरी की खोज में निकल जाता । किसी ने मुझे बताया कि एयरफोर्स में नया रनवे बनने वाला है । वहाँ बाँस के बहुत बड़े-बड़े झुरमुट होने के कारण बाँस के ढूठू अर्थात जड़ को निकालने का काम चल रहा है । मैंने घर का एक पुराने कुल्हाड़ी को निकाल उसे कुछ तेज किया और पहुँच गया ठेकेदार के पास । ठेकेदार ने बताया कि एक ढूठू के पच्चीस पैसे मिलेंगे और एक दिन में बीस ढूठू निकालने होंगे । मुझे लगा यह तो बहुत आसान-सा काम है दिन भर में तो मैं बीस क्या पचास ढूठू निकाल लूँगा । ढूठू निकालने का मुझे कोई तर्जुबा नहीं था ।
 
लेकिन बाँस के ढूठू कितने सख़्त और ढीठ होते हैं कुल्हाड़ी चलाने के बाद ही पता चला । ढूठू पर मेरे अनाड़ी कुल्हाड़ी की वार से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था । वह बस हिलता, हल्का सा नीचे जाता और फिर ऊपर आ जाता । मेरी कुल्हाड़ी भी न भारी-भरकम थी न ही बहुत तेज । भोथरी कुल्हाड़ी से मैं पहले दिन पाँच ढूठू भी काट न सका । दिन भर तेज धूप में खट कर एक रूपये पच्चीस पैसे कमाया था । शाम को दूसरे लोग बताए वे तीस चालीस ढूठू निकाल लिए थे और आठ से दस रूपये कमा लिए थे । मैंने अपने ढूठू की गिनती किसी को नहीं बताया । करीब सौ मजदूर काम करते थे और उन ढूठूओं की गिनती के बाद उसे बाहर निकाल दिया जाता । इसके लिए बीस-पच्चीस लड़कियाँ और औरतें काम करती थी । कुछ औरतें इसकी गिनती करती थी । लेकिन बीच-बीच में सुपरवाइजर भी गिनता था । कौन कितना ढूठू निकालता है यह औरतों को अच्छी तरह पता रहता था। अधिकतर मजदूर एक दूसरे को पहचानते थे, क्योंकि वे हर मौसम में अलग-अलग ठेकेदारों के साथ काम करते थे और यही उनकी जीविका का साधन था।

लेकिन उस झुंड में मैं नया था । कुछ मजदूर मेरे गाँव से भी थे लेकिन मुझे एक-दो लोग ही पहचानते थे।  काम के दूसरे दिन एक दो औरतें मेरी किशोर उम्र को देखते हुए मुझसे जान-पहचान करने आयीं । मैनें उन्हें नहीं बताया कि मैं एक छात्र हूँ और सिर्फ छुट्टियों में काम करने के लिए आया हूँ । परिचय हो जाने पर मैं अन्य मजदूरों के साथ-साथ उनसे भी बातें करता । उस भीड़ में मैं सबसे कमजोर मजदूर था और अधिक संख्या में ढूठू नहीं निकालने का गम मेरे दिल और दिमाग में घर कर गया था । मेरे उदास चेहरे को वे शायद पढ़ते,  लेकिन वहाँ सभी अपनी-अपनी उदासी, गम और गरीबी के साथ आते थे । मजदूर की मजबूरी कितनी होती है, जिंदगी के हर मोड़ पर दिल को मसोस कर रखना और जीवन जीना कितना मजबूर वाला होता है, एक गरीब मजदूर से अधिक कौन जान सकता है । मजबूरी की यही जिंदगी, एक दूसरे के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाता है । एक के दुख का एहसास दूसरे को सहज ही हो जाता है । शायद यही एहसास कुछ लोगों को हो गया था । दो चार मजदूरीन सुपरवाइजर से आँख बचा कर गिनने के बाद बाहर फेंकने के पहले कुछ ढूठू मेरे अनगिने ढूठू में रख देते थे । दिन भर में मैं बहुत कोशिश के बाद भी सात-आठ ढूठू से अधिक नहीं निकाल पाता । लेकिन कई लड़कियों के मेरे ढूठू में चार-पाँच ढूठू मिलाने के कारण मेरे ढूठू की संख्या दस बारह हो जाती और मुझे एक-डेढ़ रूपया अधिक मजदूरी मिलती । मैं उन्हें मना करता कि वे ऐसा न करें, लेकिन वे मेरी मनाही को झिझक समझते । ऐसा करके वे न सिर्फ मेरे लिए खतरे मोल ले रही थीं, बल्कि अपने मजदूरी के पैसे और काम को भी खतरे में डाल रही थी । मैं कोशिश कर रहा था कि मैं अधिक से अधिक ढूठू निकालूँ, इसके लिए पड़ोसी से मांग कर नया और भारी कुल्हाड़ी भी ले आया था । एक-दो करते मैं अपनी कोशिश में कामयाब हो रहा था ।
 
फिर एक दिन वही हुआ जिसका डर था । सुपरवाइजर मेरे बगल से निकला । वह दूसरी ओर चला गया । उसी बीच दो लड़कियाँ चार पाँच ढूठू लाकर मेरे ढूठू में मिला दिए। दस मिनट बाद वह लौटा तो देखा मेरे पास अधिक ढूठू है । वह मुझसे तुनक कर पूछा-
”सिर्फ दस मिनट में तुमने पाँच ढूठू निकाल लिया ?“

शायद वह उधर से गुजरते वक्त मेरे ढूठू को गिन कर गया था ।
मैं क्या बोलता,  चुप था । वह मुझे ताक रहा था । नजरें मेरी एक जगह ठिठक कर रह गई थीं । तभी बगल में काम कर रहा हिंदुआ बोला – ”अरे मैं तो अपना वाला, इस छौवा के ढूठू में मिला दिया । साहेब हम भूल से अपना वाला इसके ढूठू में मिला दिया है ।“

”तो तुम अपना मजदूरी इस सिंकया पहलवान को दे रहा है ।“ उसने व्यंग्य से कहा ।
”गलती से डाल दिया साहेब, काम के धून में मालूम ही नहीं चलता है, किधर फेंक रहा है ।“

सुपरवाइजर वहाँ से चला गया । लेकिन उसके दिमाग में शक के कीड़े ने जन्म ले लिया था ।  लड़कियाँ डर गई थीं । उनकी चोरी पकड़ी ही जाने वाली थी । उनके जाने पर हिन्दुआ ने लड़कियों से कहा-
”तुम्हें काम से निकाल देता और फिर अब तक का मजदूरी भी नहीं देता ।“

ठेकेदार लोग बहुत बदमाश होते हैं यह मुझे बताया गया था ।
मेरे दिमाग में इस घटना से एक हलचल मच गया था । यदि हिन्दुआ हमें नहीं बचाता तो मेरी और उन लड़कियों की सप्ताह भर की कमाई हमें नहीं मिलती और ऊपर से काम से भी हाथ धोना पड़ता । छुट्टियाँ खत्म होने में अभी दस -बारह दिन बचे थे । मुझे शायद बहुत अधिक तकलीफ नहीं होती । लेकिन मजदूरी से गुजारा करने वाली लड़कियों की मजदूरी ही बंद हो जाती । लड़कियों ने गिने हुए ढूठू मेरे ढूठू में मिलाना  बंद कर दिया । शनिवार को सबको पैसे मिलते । मैं जानबूझ कर सबसे अंत में पैसे लेने जाता । बहुत कम पैसे मिलते मुझे । मजदूरी देते समय बड़ा ठेकेदार भी मौजूद रहता, इसलिए वह सुपरवाईजर कुछ नहीं कहता । लेकिन उसकी मुस्कराहट मुझे बहुत कष्ट देती थी ।
 
रमिया ठेकेदार की पुरानी मजदूरिन थी । वह ठेकेदार को कई वर्षों से जानती थी इसलिए उसके काम और ठेकेदारी से मिलने वाली रकम के बारे भी जानती थी । उसने मेरे बारे पूछा तो मैंने बता दिया कि मैं एक स्टूडेंट हूँ और गर्मी की छुट्टी में काम करने आया हूँ। 
 
हम सात बजे सुबह एयरफोर्स के गेट में लाइन से खड़े होते । एयरफोर्स के अफसर हमें गिनते । सबके नाम लिखे जाते और बडे़ अफसर के साइन होने के बाद हमें काम के लिए अंदर जाने दिया जाता । नाम लिखने का काम सुपरवाइजर करता ।

एक दिन गेट पर नया अफसर आया था । वह बड़ा कड़क लग रहा था । ऊँची आवाज में बातें कर रहा था । वह खुद हमलोगों को गिना, सबके रहने का स्थान और गाँव के बारे पूछा । सुपरवाइजर ने हम लोगों का नाम लिखा और अफसर के पास साइन के लिए ले गया । अफसर ने उसकी हैंडराइटिंग देखी और गरज कर कहा

” इतनी गंदी तुम्हारी हैंडराईटिंग ? कौन पढ़ सकेगा इसे, तुम्हें नाम भी साफ-साफ लिखना नहीं आता ?“

ऐसा कहने के साथ ही उसने पेपर खिड़की के बाहर फेंक दिया और लगा सुपरवाइजर को डाँटने । हम मजदूरों को उसके डाँट खाने से सुकून महसूस हो रहा था ।
 
अफसर ने फरमाया-
”ठीक से लिख कर तुरंत दो, नहीं तो मजदूरों को लेकर यहाँ से दफा हो जाओ, वर्ना गार्ड रूम में बंद कर दूँगा, मजाक समझ रखा है एयरफोर्स को ?“

सुपरवाइजर के चेहरे पर परेशानी साफ दिखाई पड़ रही थी । वह लिखने लगा, लेकिन हाथ काँप रहे थे । बहुत सलीके से लिखना चाह कर भी न हो पा रहा था । वह लिखता, फिर फाड़कर दूसरे पेपर में लिखता । अफसर अपने रूम में बैठा खिड़की से उसे देख रहा था । आज सुपरवाइजर की शामत आयी थी । 
हम लोग भी लाइन में खडे़ उसे देख रहे थे । दिल के किसी कोने में लडडू फूट रहे थे ।
तभी रमिया ने सुपरवाइजर को कहा ’’सर आप नहीं लिख पा रहे हैं वे इस लड़के को लिखने के लिए दीजिए । रमिया ने मेरे ओर इशारा करते हुए कहा । सुपरवाईजर ने प्रश्नवाचक नजरों से मुझे देखा । उसे आभास नहीं था कि यह मजदूर लिखने जानता है या नहीं ।

रमिया के इशारा करने पर मैंने सुपरवाइजर से पेपर और पेन लेकर वहीं बैठकर सबसे नाम और गाँव का नाम लिखा और उसे दे दिया । वह अफसर अपने कमरे से सारा नजारा देख रहा था । उसके पास पेपर जाने पर उसने कहा-
”ऐसा साफ सुथरा लिखा जाता है, एक मजदूर लिख लेता है और तुम नहीं लिख पाते हो ।“  उसने सुपरवाइजर को डाँटते हुए कहा ।

सुपरवाइजर चुप था वह कुछ नहीं बोला । हमें अंदर जाने दिया गया और हम काम करने लगे । सुपरवाइजर का मुड ख़राब हो गया था । वह हमारे काम के पास दिन भर नहीं आया । वह शाम को आया तो रमिया ने सभी मजदूरों की गिनती करके उसे हिसाब बताया । उसने मेरे ढूठू में पाँच अतिरिक्त ढूठू को जोड़ दिया था । ”बिना काम किए इस सिकिंया पहलवान को पैसा मिलेगा ?“ उसने गुस्से से कहा ।
”उसने आज सबका नाम लिखा इसीलिए तो हमलोग काम कर रहे हैं ।“
”तो नाम लिखने के लिए उसे पैसा मिलेगा । यह कितना ढूठू निकलता है ?“ 
”आपको भी तो सिर्फ नाम लिखने के लिए पैसा मिलता है । असल काम तो हम लोग ही करते हैं ।“
”तुम कहना क्या चाहती है ? क्या मेरे न रहने पर तुम लोग खुद काम कर लोगे ?“
”हमलोग आपके अंडर में काम करते हैं, लेकिन यह लड़का आज नहीं रहने पर हम सबकी मजदूरी मारी जाती ।“
”तुम यह कहना चाहती हो कि यह था इसीलिए आज तुमलोग काम में आ पाए हो ।“
”वही तो कह रही हूँ, इसके लिए पाँच ढूठू इस लड़के के नाम लिख दिया तो क्या फर्क पड़ा ।“
”तो अब ठेकेदारी का काम मुझको तुमसे सीखना पड़ेगा ।“
”मैंने ऐसा नहीं कहा । आप चाहो तो ठेकेदार से मेरी शिकायत कर देना । मैं उसको जवाब दूँगी ।“
”इसका मतलब तुम ठेकेदार से मेरी शिकायत करोगी ?“
”मैं कोई शिकायत नहीं करूँगी ।“ 
”तुम बहुत बकवास कर रही हो, कल से तुम्हें और इस सिंकिया पहलवान को काम में आने की जरूरत नहीं ।“
”ठीक है हमलोगों का पैसा अभी दे दो तो हम कल से नहीं आएँगे ।“
”तुम दोनों को अब कोई पैसा नहीं मिलेगा । तुमने मुझसे बहस करने का साहस किया । बहुत बकवास कर लिया है, तुम्हारी मजदूरी खत्म ।“
 
उसका व्यवहार अन्यायपूर्ण था । वह चाहता तो मेरे ढूठू की गिनती कम कर बात वहीं खत्म कर सकता था। लेकिन वह रमिया और मुझसे नाहक अन्याय कर रहा था । छोटी सी बहस के लिए काम से निकालकर आय से वंचित करना बहुत ही अन्याय की बात थी । उसके व्यवहार से सब कोई नाराज हो गए । लेकिन किसी में इतना साहस नहीं था कि वह उस सुपरवाइजर से उलझे । रोज का काम वही देखा करता था । ठेकेदार तो कभी-कभार, शनिवार को पगार देने  आता । सबको अपने काम, मजदूरी की चिंता थी । घर-परिवार, संसार इसी मजदूरी से चलता था । मेरा कोई दोष नहीं होने पर भी वह मुझसे अन्याय कर रहा था । इसलिए मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था । मेरा गुस्सा संभल नहीं रहा था । मैंने अपनी कुल्हाड़ी को कस कर पकड़ रखा था, यदि गुस्सा अतिरेक हो जाए तो शायद मैं उस पर वार कर देता । लेकिन हम एयरफोर्स की चारदीवारी के भीतर थे और किसी भी तरह के झमेले में सिक्योरिटी के लोग गार्डरूम में बंद कर देते थे । गार्ड रूम एक अंधेरा कमरा था, जिसमें कहीं खिड़की या रोशनदान नहीं था। बहस खत्म होने पर भी हम थोड़ी देर वहीं खड़े रहे, शायद वह अपना निर्णय बदले । लेकिन उसने फाइनली हम दोनों को दूसरे दिन से काम में आने से मना कर दिया था । हम बाहर निकल गए ।

जब हम गेट से बाहर निकल रहे थे तभी संयोग से ठेकेदार की गाड़ी दिखाई दी और हम दौड़ कर गाड़ी के पास गए।  रमिया ने उसे सारा वाक्यात कह सुनाया । ठेकेदार ने सुपरवाइजर के लिए कुछ नहीं कहा । सिर्फ रमिया और मुझे काम में फिर से आने के लिए कहा । मेरा गुस्सा कम नहीं हो रहा था । ठेकेदार यदि सुपरवाइजर को उसकी गलती के लिए कुछ कहता तो हमें थोड़ी तसल्ली मिलती । लेकिन हमारे ऊपर हुए अन्याय और दुरव्यहार पर उसकी चुप्पी हमें बहुत नागवार लगी।
 
रमिया तो दूसरे दिन से काम में फिर से चली गई । लेकिन मैं गुस्से से भरा था और काम में नहीं गया । उसके बार-बार सिंकिया पहलवान कहने के अंदाज से दिल में एक हूक सी उठ रही थी । वह शायद मेरे जितना भी पढ़ना लिखना नहीं जानता था। लेकिन ठेकेदार के द्वारा उसे अवसर देने और  हमलोगो के सीधेपन के कारण मालिक बन बैठा  था । यदि हमें भी अवसर मिलता तो शायद उससे अच्छा काम करते। जिंदगी में अवसर मिलने पर ही कोई आगे बढ़ सकता है, लेकिन तमाम योग्यता के बाद भी यदि अवसर न मिले तो आदमी आगे नहीं जा पाता है। लेकिन मैं उस बद् दिमाग को उसकी औकात बताना चाहता था ।
 
गर्मी की छुट्टी खत्म हो रही थी । मजदूरी पर जाना मैंने बंद कर दिया । मुझे स्कूल जाना था । लेकिन सुपरवाइजर से बदला लेना है यह मैं बार-बार मन में दुहराता । एयरफोर्स के बाहर कहीं वह अकेले मिले तो ——– । ऐसे ही कई सप्ताह निकल गए । मेरा स्कूल शुरू हो गया था और धीरे-धीरे मेरा गुस्सा कुछ कम हो चला था, लेकिन खत्म नहीं हुआ था । मैं किसी भी तरह से उसे नुकसान पहुँचाना चाहता था । वह स्कूटर से आता-जाता था, मैंने कई प्लान बनाये । उसके स्पीड में रहने पर आँखों में धूल फेंकना या उसके सिर पर ईंट दे मारना,  किसी तरह उसका एक्सीडेंट करना । कई दिन उसके आने-जाने के समय रास्ते में पत्थर लेकर मैं उसकी बाट जोहता रहा लेकिन वह समय पर आया ही नहीं । मैं पढ़ाई के व्यस्त हो गया था । मैं फिर से कविताएँ और लेख लिखने लग गया था। गुस्से की अवधि में रचनात्मक कार्य नहीं हो पा रहा था।  महीने निकल गए।  एक दिन मैं काम से लौटते मजदूरों से मिला और उसके बारे पूछा । वे बताए कि वह एक सप्ताह से आया ही नहीं है । कहीं वह भाग तो नहीं गया, या किसी और साइट पर तो नहीं चला गया ।
 
लेकिन मेरे बदला लेने की भावना खत्म ही नहीं हो रही थी, मेरे पड़ोसी भोला भैया को इस बारे पता चला तो उसने मुझे समझाया-

“शनिचरवा सबको मालूम है भाई,  ठेकेदार लोगों का मजदूरों के साथ व्यवहार अच्छा नहीं होता है । वे मजदूरों को हमेशा मानसिक दबाव में रख कर काम निकालते हैं।”

“लेकिन भईया उसने मेरे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया है”

” वे किसी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते उन्हें  सिर्फ अपनी कमाई की चिंता रहती है, किसी के मान-सम्मान की नहीं । छोटे-मोटे झगड़े को भूल जाना चाहिए । तुम तो एक अच्छे स्टूडेंट हो पढ़ना-लिखना जारी रखो, एक दिन उस सुपरवाइजर से भी बड़ा काम तुम्हें मिलेगा ।

“लेकिन मैँ एक बार उसे सबक सिखाना चाहता हूँ भईया।” उसे यूँ ही छोड़ देने के लिए मेरा मन नहीं मान रहा था। 

 “तुम भविष्य में नौकरी आदि करने के लिए ही न पढ़ाई कर रहो हो भाई, तुम्हें शायद मालूम नहीं मारपीट करके पुलिस केस होने के बाद सरकारी नौकरी भी नहीं मिलती है।”

भोला भैया की बातें समझ में आई, लेकिन फिर भी मैं उस सुपरवाइजर को किसी भी तरह से नुकसान पहुँचाना चाहता था ।”

 
मैंने उसके घर का पता लगाना शुरू किया । सभी जानने वालों से पूछने लगा। किसी ने बताया कि वह पास के कालोनी के किसी गली के आखिरी मकान में किराए पर रहता है । मेरी बाँछें खिल उठी । साले को भागने का रास्ता भी नहीं मिलेगा, मैं मन ही मन प्लान में कई तब्दीली करता रहा । पत्थर मारना अच्छा होगा या छूरी या दबिया । कई बार सोचने के बाद मैं एक चाकू लिए एक दोपहरी में उसके घर की ओर गया । मुझे ठीक से पता नहीं था कि वह किस घर में रहता है ?
 
पूछते-पूछते एक घर में पहुँचा । घर अंदर से बंद था । मैंने चाकू को पैंट के पाॅकेट में ही खोल दरवाजे को खटखटाया । लेकिन दरवाजा नहीं खुला । मैंने कई बार खटखटाया लेकिन दरवाजा नहीं खुला । तब मैं जोर-जोर से दरवाजे को पीटने लगा तो दरवाजा धीरे से खुला । मैंने चाकू पर अपनी पकड़ बनाई । सामने आते ही उसके चेहरे पर जोरदार ढंग से चाकू गड़ा दूँगा।

लेकिन दरवाजे पर पहले साड़ी दिखाई दिया फिर एक युवती। एक अत्यंत सुंदर सी युवती को देख मैं अवाक् रह गया, बाइस-चौबीस वर्ष की अत्यंत गोरी, तीखे नैन-नक्श की युवती । मैंने पाॅकेट से धीरे से हाथ निकाल लिया और पूछा-

“महेश सुपरवाइजर यहीं रहता है। ”  

वह इशारे से बोली- ”मैं बोल नहीं सकती, और घर में कोई नहीं है ।“

मैं एकटक उसे देखता रह गया । इतनी सुंदर लेकिन जुबान से गूँगी । उसने एक कुर्सी खींच कर दरवाजे के बाहर लगा दिया और मुस्कुरा कर मुझे बैठने का इशारा किया । मैं बैठना नहीं चाह रहा था लेकिन उसने मेरे कंधे को हल्के से छूकर बैठा दिया । मैं मंत्रमुग्ध उसे देखता रहा । मैंने अपने इलाके में ऐसी खूबसूरत युवती कभी नहीं देखा था । मुझे लगा मैं कोई फिल्म देख रहा हूँ, क्योंकि वह फिल्म हीरोइन सी सूंदर और आभावान थी। 
 
वह भीतर गई और एक गिलास पानी ले आई । मैंने पानी का गिलास लिया, लेकिन पीया नहीं । इतने में वह एक प्लेट में दो लड्डू लेकर आई, उस प्लेट में एक राखी भी रखा था । मैं हड़बड़ा गया, कुर्सी से झटके से उठ गया । वह इशारे में कुछ बोल रही थी लेकिन मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था ।
 
तभी पड़ोस की एक औरत थाली में कुछ मिठाईयाँ और राखी लेकर अपने घर से निकली। वह  कहीं जा रही थी लेकिन मुझे देखकर ठिठक गई शायद वह कुछ कहना चाहती थी। मुझे याद आया आज स्कूल में रक्षाबंधन की छुट्टी है।
 
वह पास आई और मुझे संबोधित करके बोली-

”तुमको वह राखी बंधना चाह रही है । दो साल पहले इसके माता-पिता और छोटा भाई का एक्सीडेंट में मौत हो गई और यह परदेशी लड़की घायल और बेसहारा हो गई थी । पुलिस रात के समय उसे अपने साथ थाने लेकर जा रही थी । इलाके के लोगों ने लड़की को अपने परिवार में रखने के लिए प्रस्ताव भी दिया । लेकिन पुलिस का कहना था कि कानूनन वे उसे सिर्फ इसके रिश्तेदारों के घर में ही छोड़ सकती है । दूर परदेशी का यहाॅं कौन रिश्तेदार हो सकता था । इतनी सुंदर लड़की को देख कर पुलिस की नियत ठीक नहीं लग रही थी । भीड़ जमा हो गई थी लेकिन किसी को कुछ नहीं सुझ रहा था।  तब महेश ने सबके सामने इससे शादी करने का ऐलान किया और भीड़ के जनसमर्थन से उसने वहीं पास की मंदिर में इससे शादी कर लिया । महेश न होता तो यह बेचारी कहाँ जाती और इसके साथ क्या-क्या होता यह तो शायद भगवान ही जानता होगा । महेश को इतना ही पता है कि ये लोग हिमाचल प्रदेश से भुटान घूमने के लिए आए थे, इसे छोड़कर सब घर वाले चल बसे । आज गली की लड़की बच्ची सब सबेरे से ही घूम-घूम कर राखी बाँध रही हैं, उसे देखकर शायद इसे भी अपने भाई की याद आ गई और सबेरे से ही यह राखी लेकर बार-बार घर के अंदर-बाहर हो रही है । पिछले दो साल में इसके घर आने वाले तुम पहले आदमी है, इसीलिए यह बहुत खुश लग रही है।“ उसने लगभग एक ही सांस में पूरी कहानी कह डाली। 
 
मैं कुछ सोच पाता उससे पहले ही उसने मेरी कलाई पर राखी बाँध दी और मेरे मुँह में लड्डू ठूूँस दिया । मैं विरोध न कर सका । उसके चेहरे पर खुशी दमक रही थी । अचानक मैं उसका भाई बन गया था।  मेरे पास उसे देने के लिए कुछ न था । पाॅकेट में एक खुला चाकू पड़ा था, मैं वहीं बैठा रहा । वह चाय बना कर ले आई, मैं चाय की चुस्कियाँ लेता हुआ इस बदलती स्थिति पर सोच रहा था । मुझे बदला चुकाने का भरपूर मौका मिला था ।

​गुस्सा करने और उसे नियंत्रण करने वाले किशोर मन को आज एक अनोखा अनुभव हुआ था । मेरे मन में कई विचार आ-जा रहे थे,  बाँस की ढूठू की तरह सख्त और लचकदार । मैं एक कटे ढूठू की तरह वहीं बैठा रहा ।  This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 18, 2016. All rights reserved

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झारखण्डी लोक जीवन में कला और संस्कृति

                                                                                                                                                                        नेह अर्जुन इंदवार

​           प्राकृतिक सौंदर्यता को जीवन में उतारने और ढलने का प्रयास ही कला की उत्पति का पहला चरण होता है। आदिवासी समाज हमेशा प्रकृति की गोद में बसा हुआ समाज रहा है। इसीलिए आदिवासी समाज में कला प्राकृतिक सौंदर्य से प्रेरित रहा है और आदिवासी कला का मूर्त अमूर्त स्वरूप का दर्शन भी प्राकृतिक प्रतिमानों में ही मिलते हैं।  

          आदिवासी समाज में कला प्रदर्शनी और कौतूहल का विषय और वस्तु कभी नहीं रहा, बल्कि कला सामाजिक जीवन जीने के एक भाग के रूप में जुडा हुआ रहा है। कलाकारों की कलाकरी जीवन की आवश्यकता और अपरिहार्य अंग रहे हैं। कला की चर्चा और समीक्षा का विशेष सत्र् का आयोजन शायद ही कहीं किया जाता रहा होगा। कामसूत्र के लेखक वात्सायन ने लिखा है कि समाज में 64 प्रकार के कला होते हैं। लेकिन संसार के अधिकतर कला पारखियों ने पारंपारिक समाजों में छह कलाओं को प्रमुख माना है। जिसमें स्थापत्य कला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, काव्य, नृत्य, रंगमंच आदि है। आदिवासी समाज में अखरा एक अन्यतम रंगमंच हैं जहाँ बिना रोकटोक सभी अपने भावनाओं के साथ शामिल होते हैं। अखरा में नृत्य करते-करते आशु गीतों की रचनाएँ आदिवासी कला की अप्रतिम गुण है।  शेष सभी कला जीवन जीने के विभिन्ऩ रूपों में दृष्यगोचर होते हैं।  

          दुनिया के अन्य सामाजों की तरह ही झारखण्डी समाज में व्यक्तिगत कला और लोककला समाज और आदिवासी संस्कृति के अंग-अंग में बसा रचा हुआ है। आदिवासी कला के दर्शन के लिए सम्पूर्ण समाज को बारीकी से निहारने, मनन करने और उसे आदिवासी जीवन और व्यवहार से रिलेट करने की जरूरत होती है। समाज में पारंपारिक रूप से कहीं कोई कला वीथी अलग ढंग से प्रदर्शऩ के लिए यह पारखी निगाहों से समीक्षा करने के लिए नहीं बनाई गई है। यदि मूर्तिकला और स्थापत्य कला की बातो की जाए तो आदिवासी समाज में अपनी जीवन आवश्यकतानुसार इसका भी स्थान अहम है। लेकिन आराधना के लिए मूर्ति कला का विकास आदिवासी समाज में नहीं हुआ । इसका प्रमुख कारण आदिवासियों का ईश्वर को अमूर्त प्राकृतिक रूप में देखने के विश्वास में खोजा जा सकता है।

          आदिवासी समाज हजारों सालों से अन्य समाजों से अलग थलग रहा है और उसका जीवन यापन करने का ढंग सर्वथा दूसरे समाज से अलग रहा है। जाहिर है कि कला का विकास जीवन जीने का ढंग, सांस्कृतिक आचार-व्यवहार और व्यावहारिक आवश्यकता पर निर्भर करता है। कला का अविष्कार हवा में जादू से मूर्त वस्तुओं का अविष्कार नहीं की तरह कोई अव्यावहारिक अविष्कार नहीं है और इसका विकास जीवन की आवश्यकता के सापेक्ष होता रहा है और आमोद प्रमोद प्रिय होने के बावजूद सिर्फ नयन सुख के लिए अजीब अबूझ कला का अविष्कार और विकास आदिवासी समाज में नहीं हुआ।

          कला के विकास को समझने के लिए सबसे प्रथम हमें मनुष्य की आंखें और दिमाग के विन्यास को समझने की जरूरत है।  मनुष्य की आँखें किसी सुंदर दृष्य या वस्तु दो देख कर ठिठक जाती है। प्राचीन काल से ही मनुष्य की आँखें फूल, पत्ते, पेड पौधे, पहाड, जंगल, नदी, झील, चाँद, तारे, नील गगन, बादल, इंद्रधनुष आदि की सुंदरता को निहारता रहा है और प्राकृतिक आंचल में बिखरी सौंदर्य को अपनी आँखों और जीवन में बसाने का प्रयास करता रहा है। सौंदर्य का पैमाने हर व्यक्ति विशेष के साथ बदलता रहता है और हर एक इंसान की आंखें हर वस्तु में अलग अलग सुंदरता की पहलु ढूँढ लेता है। जो वस्तु एक जोडी आंखों को जरा भी आकर्षित नहीं करता है, वही वस्तु या विषय दूसरी जोडी आंखों को मंत्रमुग्ध कर देता है। इसीलिए सौंदर्य भावनाओं के प्रथम ज्वार को आंखों के खिडकी के साए से गुजरे लहरें कही जाती है।

          संसार भर में कला और सौंदर्य का उट्फूटन नारी देह, उनकी आदाओं, कोमल अंगों, वाणी और उनके व्यवहार और रूप में माना गया है और दुनिया के अधिकतर कलात्मक चित्रकारी में नारी को उकेरा गया है। आदिवासी समाज में भी सौंदर्य को नारी का प्रतिरूप माना गया है। आदिवासी कला और सौंदर्य प्रासाधन नारी को सामने रख कर ही किया गया है। खोंगसा या आज के जमाने की क्लिप आदिवासी नारियों का प्रिय मेकअप-सामान हुआ करता था। गले और हाथों की सौंदर्यता को बढाने के लिए हँसली और कंगना पहने जाते थे। हाथ गले और छाती तथा वक्ष पर खोदा या गोदना लगाने का रिवाज कब से चला इसका पता शायद ही किसी शोध से पता चले।

          एक डेढ दो सदी पूर्व तक आधुनिक पहनावे से आदिवासी समाज बहुत कम परिचित था। गैर आदिवासी समाजों से संपर्क में आने वाले आदिवासी आधुनिक पोशाकों के बारे जानते भी थे लेकिन वे उसे एक गैर आदिवासी पोशाक ही समझा जाता रहा। यदि उन पोशाकों में कोई उत्सुकता रही भी होगी तो भी उनकी उपलब्धता तक पहुँच आदिवासी समाज में नहीं था। इसके कई कारण रहे हैं लेकिन आदिवासी समाज में ऐसे पोशाक का एक दो चलन सरकस में अजीब पोशाकों में सजे जोकरों का सा लगता रहा होगा।

          आदिवासी पुरूषों में कपडे की आवश्यकता बहुत कम रही थी, लेकिन महिलाएँ सजने संवारने में विश्वास करती थीं और वे साडियों में बेलबुटे या फूलों का प्रयोग करती थीं। कलात्मकता की समझ महिलाओं में प्राकृतिक प्रदत्त गुण है और आदिवासी नारी भी इससे अछुते नहीं थीं। झूला या ब्लाउज का चलन बहुत बाद में हुआ। लेकिन झूला पुरूष सार्ट की तरह लम्बे हुआ करतीं थी और उसमें पुरूषों के सार्ट की तरह पाकेट हुआ करता था।

          आदिवासी समाज में पारंपारिक कपडे चीक बडाइक करते हैं और वे सूत कातने से लेकर कपडे बुनने, उसका डिजाइन तैयार करने, रंग रोगन करने आदि के सभी कार्य खुद किया करते थे। कपडों में किए जाने वाले तमाम कार्य, शिल्पकारी पारिवारिक स्तर पर किया जाता रहा है। बुनकर समाज होने के कारण कपडे बनाने के सभी कार्य, जिसमें हाट में बिक्री से लेकर आवश्यकतानुसार घर घर पहुँचाने और कपडे के बदले आनाज या दूसरी जिन्स लेने तक का कार्य चीक बडाइक परिवार खुद करते थे। शादियों में आजी लेदरा, नये दम्पत्ति को बरकी देने की परंपरा के कारण हर गाँव में शादी-विवाह वाले घर में इन कपडों की फर्माइश हुआ करती थी और कपडे बुनने की पारंपारिक कला के कारण चिक बडाइक आदिवासी समाज में खाते पीते समाज के रूप में जाना पहचाना जाता था।

          पहनावे के माध्यम से शारीरिक सौदर्य को निखाने का रिवाज और तत्कालीन समाज में उसकी बढती मांग के कारण चिक बडाइक समाज में कपडो पर विभिन्न प्रकार से प्रयोग करने और उसे अधिक कलात्मक बनाने की उत्सुकता और दबाव ने कपडों के नये डिजाइन बनाने के लिए प्रेरित किया और जो साडी और गमछा पहले सिर्फ सफेद हुआ करते थे वह उतरोत्तर रंगीन होने लगे। बेलबुटे या झालर का प्रयोग उसे नये रूप देने लगे।

          कपडे बुनने की यह कला बाद में रूई या कटन से चल कर सिल्क तक पहुँच गई और दुनिया को छोटानागपुर के टसर सिल्क का परिचय मिला। पुराने कपडों का प्रयोग छोटानागपुर के कंपकंपाती ठण्ड से बचने के लिए लेदरी बनाने के काम में आता था। लेदरी में भी नक्कासी करने का चलन बना जो बाद में एक कला का रूप अख्तियार कर लिया। विभिन्न प्रकार के रंग बिरंगे, बुटेदार लेदरी बना कर हाट में बेचा जाता था। सुंदर लेदरी बनाने के लिए भी दक्ष हाथ चाहिए होते थे और इसकी कला का सराहना भी किया जाता था। लेकिन आधुनिक ऊनी कंबलों का चलन लेदरी सिलाई पर भी भारी पडा और आज भी कहीं कहीं इसे अपनी घरेलु आवश्यकता के लिए बनाया जाता है।

          आदिवासी समाज हजारों साल तक आत्मनिर्भर समाज हुआ करता था। दैनिक जीवन और विशेष आवश्यकता की सभी चीजों का निर्माण खुद करता था।

          लकडी, मिट्टी, कच्चे इंट और पत्थरों से आदिवासी समाज सुंदर और मजबूत घर बनाते रहे हैं। दीवारे खुब मजबूत होती थीं। दीवारों में समान रखने के लिए दिरखा और अलमारी बनाने की परंपरा आदि युग से रहा है। दीवारों के बाहर आंगन और आंगन के चारों और चारदीवारी बनाना आदिवासी मकान बनाने के खास तरीके हुआ करते थे। हर घर में किसी एक कमरे में माचा अर्थात सामान रखने के लिए छत के नीचे एक फ्लोर बनाया जाता था। कृषि उपज के जिन्स जैसे आलू, प्याज वगैरह वहाँ रखे जाते थे। चुल्हा के उपर बनाए गए माचा में रखे सामान सडते नहीं थे, और वह साल, दो साल तक खराब नहीं होतो थे। लकडी के दरवाजे के पट्ट में नक्कासी करने का चलन भी रहा है। 

          मिट्टी के घरों के फ्लोर को गोबर से लीपा जाता है और लीपने के लिए महिलाएँ विभिन्न प्रकार के रेखांकन बना कर लीपती रहीं है। घरों के दीवारों को भी लीपते वक्त कुछ विशेष मनमोहक आकार देकर लीपा जाता है। घरों में, विशेष कर शादी विवाह के मौकों में दीवारों को गाँव के आसपास मिलने वाले सफेद मिट्टी या चूना मिट्टी से लीपा जाता है और विभिन्न प्रकार के चित्रकारी की जाती है। इसमें आदमी, स्त्री, फूल, पत्ते, घडा, नृत्य, नगाडे, मांदर, ढोल, वन, जंगल, चिडियों के चित्र उकेरे जाते हैं। इन चित्रों के चित्रकार कुछ खास कलाकार होते हैं जो अवसर विशेष में घरों के सजाने के लिए चित्रकारी करने के लिए बुलाए जाते हैं। चित्रकार अपने चित्रकारी कलाकारीता को पेशागत नहीं बनाकर एक सामाजिक सहयोगी के रूप में मकान मालिकों की सहायता करते हैं। जहाँ गैर आदिवासी समाज में कलाकारी एक पेशागत कार्य होता है, वहीं आदिवासी समाज में यह शौकिया चित्रकरिता के रूप में मिलते हैं। इन आदिवासी कलाओं में आदिवासी में आदिवासी जीवन के अलंकरण, सज्जाकारी के तरीके के द्वारा आदिवासी इतिहास और मिथकों को भी उकेरने की कोशिशिं की जाती है। हर कला की तरह इसमें भी मानवीय बोध को गुंफने की कोशिश की जाती है।
 
          आदिवासी समाज में जंगल और पेड खास मायने रखते हैं। समाज जंगल पर अनेक चीजों के लिए आश्रित होता है। बांस, सखूआ, बेंत आदि का प्रयोग व्यापक स्तर पर होता है। बांस के खैचला, सूप, डागरा, कंघी, गेडुआ, हँसुआ, बरछा, तीर, धनुष, पिंजरा, पशु बाडा आदि अनेक दैनिक प्रयोग में आने वाली चीजें बनाई जाती है। लाली के पेड से खटनाही आदि बनाए जाते हैं और उसके बनाने वाले कलाकारों की बहुत मांग होती थी।

          इंदरा या कुआँ की खुदाई भी दक्ष लोग की किया करते हैं, विशेष कर चट्टानों को एक विशेष आकार प्रकार में बडी सफाई से काटना और इंदरा बनाने के लिए करीने से इस प्रकार सजाना की वह बरसों या सदियों तक मजबूती से अपनी जगह बनी रहे। चट्टानों को काट कर घरों के दीवार बनाने की रिवाज रही है। चट्टानों से सिलपट, सिल, बैठने के चेयर, मेज, पीढा आदि बनाए जाते थे और इसमें लम्बा अनुभव और दक्षता की जरूरत होती है। नयनाभिराम, आकार प्रकार देने, उसे जोडने, तराशने के काम इस कार्य में उस्ताद कलाकार ही करते हैं। अनेक आदिवासी गाँवों में उपलब्ध चट्टानों को ही समतल करके नृत्य का आखरा बनाया जाता था या औखल की जगह उसे करीने से काट तराश कर ओखल का रूप दिया जाता था।  इन चट्टानों के समतल करके धान मिसने के लिए खलिहान बनाया जाता था और बारिश के दिनों में गाँव की बैठकी, पंचायत या धान सुखाने के लिए काम में लाया जाता रहा है।

          कृषि कार्य में रत्त आदिवासी समाज अपने कृषि उपकरणों का सृजन और उत्पन्न खुद ही करते रहे हैं। हल, कुल्हडी का बेंट, हँसुआ, दबिया, छूरी में लगने वाले हथुआ आदि आदिवासी समाज में कुछ खास लोग ही सुंदर, सुघड रूप में बनाते हैं। मछली मारने का जाल, डोंगी, नाव, तेल निकाने का कोल्हू, ढेकी, मुर्गी कुसली, पगहा, फसल को सुरक्षित रखने का मोरा आदि आदिवासी खुद बनाते थे और इसकी कलात्मकता को धार देना कुछ कलाकारों की खास कलाकारी होती थी।
आदिवासी होडोपैथी में पुरानी चीजों का बहुत प्रयोग किया जाता है। पुरानी घी, मधु, सुअर की चर्बी आदि को विभिन्न दवाओं के लिए अनिवार्य समझा जाता था। इन चीजों को दस बीस या तीस चालीस वर्ष संजोकर रखते थे। इन्हें रखने के लिए कोंहडा, लौकी, चमडे के थैली आदि का प्रयोग किया जाता था, जिसे खास ढंग से बनाया जाता था।

           आदिवासी समाज में जहाँ कपडों के लिए चिक बडाइक में शिल्प की जानकारी थी, वैसे ही लोहा गलाने के काम में असुर लोगों की कलाकारी जग जाहिर है। कहा जाता है कि असुरों में लोहा गलाने का ज्ञान था कि उनके गलाए गए लोहे में जंग नहीं लगते है। लेकिन अब यह विशेष ज्ञान विलुप्तप्रायः हो गया है और शायद अब किसी को इसकी जानकारी नहीं सौंपी जा सकी है। लेकिन लोहा के पांरापारिक दैनिक काम को लोहारा समुदाय दक्षता के साथ करता आया है जो आज भी कमोबेश जारी है। लोहरा समुदाय कृषि, शिकार, घरेलु कार्यों में आने वाले सभी लौह उपकरणों का उत्पादन और विकास करते थे। हल का फार, हँसुआ, कुल्हाडी, तलवार, बरछा, तीर, इंदरा से पानी निकालने का कुंड आदि सभी का उत्पादन लोहरा समुदाय ही करता रहा है।

           आदिवासी समाज के आमोद प्रमोद, गीत गोबिन्द में मांदर, नगेडा, ढोल, ढाँक शहनाई का विशेष महत्व है। छोटानागपुर के गाँवों मे कुछ दशक पहले तक बियारी या रात के भोजन के बाद अखरा में मांदर की ताल गुँजने लगता था। नृत्यगणें मांदर की आवाज सुन कर समूह में अखरा में जाकर मौसम और पर्व त्यौहारों के अनुसार गीत गाते हुए झुम उठतीं थीं। पुरूष भी अपने मांदर या झांझ के साथ ताल में ताल मिलाते मगन होकर नृत्य करते थे। छोटानागपुर में कहावत है बारे महीना तेरो परब अर्थात हर महीने एक दो परब और उस परब के लिए अलग गीत, मांदर की अलग धुन, अलग नृत्य, नृत्य में अलग गति, अलग मानसिक तान। आदिवासी समाज में हर मौके पर मांदर और नगाडे बजते थे और हर अवसर पर सामूहिक नृत्य होता है। आदिवासी शादी में ही दस तरह के अलग अलग नृत्य किए जाते हैं। सबसे दिलचस्प और विचारनीय नृत्य बराती और सराती के बीच होने वाले मेरघेरैय नृत्य होता है। जिसमें एक दूसरे को घेर कर विपक्षी दल को अलग थलग करने की कोशिश की जाती है और उनके घेरे को तोड कर उसमें घुसने की कोशिश की जाती है। यह कई मायनों में युद्ध का रूप होता है। सबसे अधिक विचारनीय तत्व उस दौरान गाए जाने वाले गाली गीत होते हैं। जिसमें दूसरे के लिए अश्लिल गालियों का प्रयोग किया जाता है। शादी में दो परिवार और दो गाँव या कुटुँब के लोग मिल कर एक होते हैं, उनके बीच प्रेम की गीत गाए जाने के बदले गाली गीत गाने के क्या मायने है, इस पर शोध करने की जरूरत है। क्या शादी मेरघेरैय नृत्य में किसी प्रकार की कोई ऐतिहासिक लडाई की बात छिपी हुई है, या गाली के माध्यम से परिचय के झिझक को दूर करने की कोई मनोवैज्ञानिक पहलू छिपी हुई है ??

           आदिवासी वाद्य जैसे मांदर, नगडा, ढाँक को महली समुदाय बनाते है, वहीं शहनाई का निर्माण अलग अलग समुदायों के दक्ष कलाकारों द्वारा किया जाता रहा है। बांस के सामानों के लिए तुरी समुदाय की दक्षता या कलाकारी के सामने सब नतमस्तक होते रहे हैं। गोदना गोदने का काम भी समुदाय की महिलाएँ करती रहीं हैं। इनका गोदना स्थायी होता है और शरीर में हमेशा के लिए गोदित हो जाते हैं।

           आधुनिकता और औधोगिकीकरण के कारण पारंपारिक कला का क्षय बडी तेजी से हो रहा है। आज आधुनिक शिक्षा पाकर आदिवासी अपने हाथों और दिमागों में सदियों से संचित कलाकारी को या तो छोडते जा रहे हैं या भूलते जा रहे हैं। कहीं चाहते हुए भी उसका संरक्षण विभिन्न कारणों से नहीं  हो पा रहा है।
पारापारिक कला का विकास किसी एक दिन या एक पीढी में नहीं होता है। उसका मूर्त रूप दिमाग में प्रथम बार अमूर्त रूप में प्रगट होता है फिर वह धीरे धीरे व्यक्ति विशेष के हाथों से एक अलग रूप में आकार लेता है। उसका लम्बा विकास काल की प्रक्रिया कई चरणों में होती है।  

            18 वीं सदी में आदिवासियों के बडी संख्या में छोटानागपुर से असम और बंगाल के डुवार्स तराई इलाकों में ले जाया गया। आदिवासी समाज के साथ आदिवासी कला और सांस्कृतिक प्रतीक भी इन जगहों में गए, लेकिन वहाँ समाज उन्मुक्त जीवन जीता आदिवासी समाज नहीं रह गया था। उसके जीवन में अचानक एक बडा परिवर्तन आया जो पारंपारिक आदिवीसी कला और संस्कृति की अस्तित्व और विकास के लिए डेथ बारंट साबित हुआ।

          वहाँ तत्कालीन ब्रिटिशकालीन समय में मजदूर के रूप में काम करने वाले आदिवासी चाय बागान कंपनियों के बंधुआ मजदूर थे और उऩ्हें कलात्मक, रचानात्मक जीवन जीने की आजादी नहीं थी और न ही अवसर। किसी समुदाय के रचनात्मकता और सृजनात्मकता को को खत्म करने के लिए उनके उन्मुक्त जीवन और मुक्त सोच व्यबहार को खत्म कर दिया जाना फांसी की सजा सुऩाए जाने के बराबर ही होता है।

          उन्हें सुबह सात बजे से सायं 6 बजे तक अस्वास्थ्यकर चाय के बागानों में पसीना बहाना होता था और रात को खा पी कर आराम करना होता था। उन्हें अपने काम के दौरान और बस्ती में मलेरिया के मच्छरो से युद्ध करना होता है। जहरीले सांप और दूसरे खतरनाक जानवरों से दो चार होना होता था। तब मलेरिया की दवा का ईजाद नहीं हुआ था, और तेज बुखार से आए दिन किसी न किसी की मौत होती थी। जानवरों से होने वाली मौत को स्वाभाविक मौत मानने की विवशता थी। उनके पास पीने का साफ पानी न था और न ही स्वास्थ्यकर रहने का स्थान। खाने पीने की व्यवस्था और उपलब्धता वैसे नहीं थी, जैसे उनके शरीर सदियों से आदी था। छोटानागपुर संताल परगना, तत्कालीन मध्य प्रदेश और उडिसा से चाय बागानों में ले गए मजदूर रात को अपने ढोल, नगाडे, मांदरों की ताल पर झुमते थे और गम को भूलाते थे। संस्कति और कला के नाम पर सिर्फ यही कार्य करने की अनुमति थी उन्हें।

          विषम परिस्थितियों में जीवन जीने वाला समाज में कला और संस्कृति का सृजन और विकास नहीं होता है और वह अपनी कला संस्कृति थाती को भी संरक्षित करने में असमर्थ होता है। और यहाँ भी आदिवासी समाज के साथ यही हुआ। पारंपारिक कला और संस्कृति धीर-धीरे भुलते गए और इसे जानने की ललक खत्म हो गया। आमोद प्रामोद की मानसिक और शारीरिक जरूरतें आधुनिक हिन्दी और बंगला सिनमाई गीत संगीत ने ले लिया। मांदर नगाडे, शहनाई, बांसुरी आदि के बिना ही आदिवासी जीना सीख लिया। बियारी के बाद आखरा में मांदर की ताल कहीं बाजता है, ऐसी हर्षदायक आवाज कहीं से नहीं आती है।
विस्थापन का शिकार सिर्फ आदमी ही नहीं होता है, उसका सबसे बडा शिकार सामाजिक सरिता में कल कल बहने वाला भाषा संस्कृति और कला भी होती है। यह संकट हर विस्थापन में होता है। चाय बागानों में रहने वाले आदिवासी फिर भी अपनी आदिवासियत को बचा कर रख रहे हैं। लेकिन कला की मौत की सांस अभी धीरे धीरे चल रहा है और निकट भविष्य में अंतिम सांस निकलेगी। This work is copyright © Neh Arjun Indwar, July. 12, 2016. All rights reserved.

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झारखण्ड का सबसे बड़ा ख़जाना

​                                                                                                                                                                                       नेह अर्जुन इंदवार

​सन् 2001 की बात है ।

मैं अपने भुवनेश्वर के अपने  मित्र जमादार गोडसोरा के साथ सुबह 4 बजे भुवनेश्वर से राँची जाने के लिए मोटरबाइक से निकला । हम किसी विशेष काम से नहीं निकले थे, बल्कि बाइक से रास्ते के आदिवासी गाँवों में जाकर वहाँ के लोगों से मिलना जुलना और बात करना चाहते थे । दोनों शहरों के बीच की 400 किलोमीटर की दूरी बाइक सवारी के लिए वाकई काफी लम्बी है । लेकिन हमारी मंजिल थी राँची ।

हम बहुत जोशिले और उत्साहित थे । कई वर्षो के बाद राँची जाना जा रहा था । दोस्तों से मिलने की खुशी और रास्ते के आदिवासी गाँवों में जाकर लोगों से खूब बातें करने की चाहत । करीबन 100 किलोमीटर जाने के बाद ही बडे़ आदिवासी गाँव दिखाई देने लगे । हम खेतों में काम करते लोगों के पास जाते और गोडसोरा ”हो“ में बात करते । और मुझे हिन्दी में बताते । चूंकि गाँववाले हिन्दी बोल व समझ नहीं पा रहे थे । मैं हिन्दी में बोलता और वह अनुवाद करके किसानों को ”हो“ में बताते ।

दशकों बाद किसानों से बातें हो रही थी । एक जगह कई महिलाएँ डियेंग (हँडिया) बेच रही थी । हम उनके पास गए और उनसे काम, घर परिवार और डियेंग बेचने के बारे बात करने लगे । वे अपने खेती-बारी, खेत-खलिहान और घर-परिवार की बातें बता रही थीं और मैं एक डायरी में नोट कर रहा था । उनके जीवन संघर्ष की बातें, पिछले कई दशकों में गाँवों में आए परिवर्तन को हम करीब से जान रहे थे ।

हम भुवनेश्वर जैसे दूर के शहर से आ रहे हैं यह जानकर वे हमारी थकावट को दूर करने के लिए डियेंग  पीने का अनुरोध किए । हमने मुस्कराकर कर धन्यवाद दिया कि अभी हमें बाईक से सफर करनी है डियेंग हमारे लिए भारी हो जाएगा । यह डियेंग चावल को पूरी तरह से मथ कर बनाया जाता है और उसमें चावल का अंश होता है । डियेंग पीने से पेट भर जाता है, इसका नशा बहुत असरदार होता है । अभी हम रास्ते के क्योंझर शहर नहीं पहुँचे थे और एक जंगल से गुजर रहे थे तभी एक कील बाइक के अगले पहिये में घुस गया । अब हमारे पास पैदल चलने के सिवा कोई चारा नहीं था । पठारी ऊँचाई पर धकेल कर बाइक ले जाना काफी थकावट भरा काम होता है । हम थक कर लतपत हो चुके थे । हम गुजरते ट्रकों से लिफ्ट मांगते लेकिन माल लदा ट्रक नहीं रूकता । बहुत चेष्टा के बाद एक खाली ट्रक आया और हम अपनी हीरोहोंडा उसमें लादने में कामयाब हो गए और क्योंझर आ गए । वहाँ पंक्चर ठीक किए और आगे बढ़ गए । लेकिन शहर से निकलने के बाद ही पेट में चूहे दौड़ने लगे । दोपहर के तीन बज चुके थे, पंक्चर के चक्कर में हम कुछ खाना ही भूल गए थे । हम कई ढाबों में गए लेकिन वहाँ की गंदगी और भिनभिनाती मक्खियाँ देखते ही मैं वहाँ खाने से इंकार कर देता । हमने बिस्कुट से काम चला लिया ।

हम झारखण्ड की सीमा में दाखिल हो चुके थे । झारखण्ड की मिट्टी को हमने माथे पर लगाया और प्रणाम किया । फिर हम आगे बढ़ गए । हम एक पेट्रोल पंप से पेट्रोल ले रहे थे तभी गोडसोरा का एक परिचित दिख गया । वह पास के एक गाँव से था । उसने अपने घर चलने का आमंत्रण दिया और हम उसके साथ हो लिए । उसने कहा खाना तो बन नहीं सकता है, लेकिन डियेंग मिल सकता है । हमने बिस्कुट खाया था इसलिए तुरंत कुछ खाने की आवश्यकता नहीं थी । परिचित जी ने हमें थोड़ा सा डियेंग का स्वाद लेने का अनुरोध किया । हमने थोड़ा सा डियेंग आलू के चखने के साथ लिया ।

चखना को चखने के बाद ही जैसे मुझ पर जादू सा छा गया । इतना स्वादिष्ट आलू ! मैं उनसे और आलू मांग-मांग कर लिया, पेट भरा होने पर भी काफी आलू खा गया । दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, भुवनेश्वर में मैंने वर्षो गुजारा है । हैदराबाद के आसपास के जिलों में हम बाइक से अक्सर घूमने जाते और वहीं तेलगु सीखने के लिए ग्रामीणों के घरों में खाना खा लेते थे । गुजरात के गाँवों में भी खुब घुमना हुआ है । महाराष्ट्र के अधिकतर जगहों पर जाना हुआ है । हर जगह के खास व्यंजनों को चखने का अवसर मिला है । लेकिन यहाँ तो आलू ने जैसे मंत्र ही मार दिया । आलू की वह सब्जी हमारे होस्ट ने कुछ मिनटों में जैसे-तैसे मर्दाना स्टाइल में सिर्फ डियेंग के साथ खाने के लिए बनाया था । पाक कला की कोई करामत नहीं अजमाई गई थी, न ही उसमें कोई मसाला डाला था सिर्फ हल्दी, नमक और मिर्ची से बना था वह नयाब सब्जी । 

मुझे एक ख़जाना मिल गया था । स्वादिष्ट आलू की वह एक प्रजाति है जो छोटानागपुर के गाँवों में ही मिलती है । दिन भर की थकावट छूमंतर हो चुकी थी । शायद यह डियेंग और उस जादुई आलू का असर था । हम पास के साप्ताहिक हाट में जा पहुँचे और वहाँ जाकर देखा जितना बड़ा हाट उतना बड़ा डियेंग का बाज़ार । लोग डियेंग के साथ अलग-अलग चखना खा रहे थे । हमने डियेंग का पैसा चुकाया लेकिन उसे पीने के लिए दूसरों को दे दिया और अलग-अलग सब्जी से बना चखना खाने लगे । वहाँ बेचे जा रहे चखना भी घर में बने आलू की तरह ही स्वादिष्ट थे । चखने का हर कौर हमारे लिए एक अनुभव था और हम उस अनुभव को ठूँसे जा रहे थे । जब हम हाट से निकले और काफी दूर चले गए तो पता चला, चखना खाने के रौ में मैं अपना डायरी वहीं भूल आया । मैंने जोर का ठहाका लगाया । गोडसोरा चौंक कर मुझे देखने लगा ।
क्या हो गया ?
लेकिन असली डायरी तो मैं साथ लेकर आया हूँ । मैंने अपना जीभ उन्हें दिखाया । वह भी जोरदार ठहाके लगाने लगा । अब हम दोनों फिल्म शोले के जय और बीरू की तरह बाइक में गाना गाते हुए चलने लगे ।

पहली मई 2014 को संजय पहान की शादी में शरीक होने के लिए फिर से राँची जाना हुआ और कोलकाता वापसी से पहले मटिल दीदी को ढेर सारा सब्जी बाजार से खरीदवा लिया । कोलकाता आकर सबसे पहले बेंग साग की सब्जी बनवाया । वाह ! क्या स्वाद है । मेरे मुँह से निकला । सभी ने जी भर का बेंग साग का लुफ्त उठाया । वाकई में बहुत स्वादिष्ट था साग । डुवार्स में हम अक्सर बेंग साग खाते रहते हैं लेकिन छोटानागपुरी बेंग साग का स्वाद कमाल का था । हफ्ते भर राँची से लाई गई दूसरी सब्जियाँ भी बनती रही । कोई दिल को उसी तरह बाग-बाग करता रहा और कोई कोलकाता में मिलने वाली सब्जियों की तरह ही साधारण स्वाद वाली थी ।

एक ही हाट, बाज़ार में मिलने वाली सब्जियों के स्वाद में इतना फर्क क्यों होता है ? इसका मुख्य कारण खेत में उपयोग किया जाने वाला खाद है । बेंग साग उपजाने के लिए किसी खाद की जरूरत नहीं होती है, वह प्राकृतिक तरीके से उगती है, जबकि दूसरे सब्जियों के मामले में अधिक उपज के लिए किसान रासायनिक खाद अर्थात् फार्टिलाइजर आदि का उपयोग करता है । रासायनिक खाद उपज बढ़ाने में मदद तो करता है लेकिन वह जमीन के औषधीय और प्राकृतिक गुण को खत्म कर देता है । यह प्राचीन काल से विकसित हो रहे अन्न में उपस्थित गुणों के तत्वों में बदलाव कर देता है ।

हर जगह की धरती के ऊपरी परत की मिट्टी अलग-अलग होती है । उस मिट्टी में अलग-अलग वनस्पति उगते हैं, पनपते हैं और हर जगह के वनस्पति में उस जगह विशेष की मिट्टी की सुगंध और औषधीय गुण रची बसी होती है । यही अन्न उस खास जगह के मनुष्य के लिए स्वास्थ्यकर होता है और वह कालांतर में उस जगह के निवासियों के लिए औषधि का काम करता है । प्राचीन काल से छोटानागपुर की धरती पर रहने वाले आदिवासी यहाँ के एक-एक कण, एक-एक पत्ते से परिचित हैं और वे यहाँ की धरती पर हमेशा खुशहाल, चैनशील और स्वस्थ रहे हैं । सौ-सौ साल तक मजबूत और स्वस्थ रहने वाले आजा, नाना की यादें अभी भी ताजी है । टाना भगत आंदोलन के दौरान नगर ठिठाईटांगर के फागू भगत, अघनु भगत टैक्स के बारे जानने के लिए राँची के कलेक्टर से मिलने के लिए सिसई से पैदल आए थे । वे कई दिनों तक रोज कलेक्टरेट जाते और कलेक्टर से बातें करने का अनुरोध करते, लेकिन कलेक्टर ने उनकी ओर आँख उठा कर भी देखने की जहमत नहीं उठाई । नाराज़ होकर फागू भगत ने ‘‘कलेक्टर साहेब हमसे बात कीजिए’’ कहते हुए आॅफिस में प्रवेश करते ही कलेक्टर की बाँह पकड़ ली । उनके बाॅडीगार्डस् फागू भगत के हाथों के बंधन छुड़ाने के लिए पूरा जोर लगा दिए, लेकिन छुड़ा नहीं पाए । डर के मारे कलेक्टर ने उससे बात करना स्वीकार किया और तुरंत टाना भगतों के खेतों के लगान को माफ करने की घोषणा कर डाली । यह किस्सा हम फागू भगत जिन्हें हम आजा कहते थे के जुब़ान से ही सुने थे, तब उनकी उम्र एक सौ दस वर्ष थी और तब भी वह अपनी चार वर्षीया नातीनी मनीर को गोदी लेकर गाँव की सैर करते थे ।

तब उनके जैसे न जाने कितने आजा और नाना लम्बी उम्र के साथ-साथ स्वस्थ शरीर के भी मालिक होते थे और जिंदगी का भरपूर आनंद लेते थे । यह स्वास्थ्य इक्का-दुक्का व्यक्तियों की नहीं हुआ करती थी, बल्कि समाज की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी ऐसे ही स्वास्थ्य का आनंद उठाती थी । सुबह की प्रथम लाली के साथ ही बिस्तर से उठ जाना, दिन भर जी-तोड़ शारीरिक मेहनत करना और छोटानागपुर के मिट्टी पर उपजे साधारण, लेकिन प्राकृतिक स्वाद और गुणों से लबालब अन्न खाना और शाम ढलते ही अखरा में गीत-नृत्य में तल्लीन हो जाना । यही दिनचर्या था आदिवासियों के पुरखों का । कहीं कोई अस्पताल, चिकित्सालय नहीं था । जो भी था वह था होड़ोपैथी, जो आदिवासियों के परंपारिक ज्ञान पर आधारित था । यह ज्ञान भी अधिकतर छोटानागपुर की वादियों में मिलने वाली वनस्पतियों पर ही आधारित था । और यह वनस्पति छोटानागपुर की मिट्टी की पैदाइश होती थी । बात आती है यहाँ की मिट्टी की । यह मिट्टी ही यहाँ के वनस्पति, अन्न को दुनिया का बेहद स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर वनस्पति, अन्न बनाता है ।

लेकिन आधुनिकता का अंधानुकरण किए जाने के कारण छोटानागपुर की प्राचीन मिट्टी की गुणवत्ता खत्म होते जा रही है । खेतों को जोत कर व्यवस्थित ढंग से उगाए जाने वाले फसल के लिए रासायनिक खाद का प्रयोग करने के कारण यहाँ की मिट्टी की उर्वरता और स्वास्थ्यकर प्राकृतिक गुण समाप्त होने को है । साग-सब्जियों, मोटे चावल-दाल आदि के खेती के लिए किसानों द्वारा उपयोग किए जा रहे रासायनिक खाद पर उपयोग संबंधी कोई नियंत्रण नहीं है । यह यहाँ की जादुई मिट्टी पर भी बेरोक-टोक, अंधाधुंध प्रयोग किया जा रहा है । समाज में इस विषय पर कोई पहल नहीं की गई है । जहाँ कहीं रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं हुआ है वह मिट्टी और उस पर उपजे वनस्पति की गुणवत्ता, स्वाद और नस्ल बची हुई है । यही कारण है कि बेंग साग अत्यंत स्वादिष्ट लगता है, लेकिन सभी सब्जी दिल को जीत नहीं पाते हैं ।

यह एक अत्यंत गंभीर और महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर समाज और सरकार को तुरंत कदम उठाने की जरूरत है । छोटानागपुर के गर्भ में अनेक खनिज पदार्थ पाए जाते हैं, जो कालांतर में सरकार और बड़ी कंपनियों द्वारा खनन करके निकाल ली जाएगी । लेकिन यहाँ के मिट्टी की रक्षा, सुरक्षा और जतन किया जाए तो यह युगानुयुग यहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य की रक्षा करेगी ।

यहाँ की मिट्टी को बचाने का उपाय क्या है:- छोटानागपुर सहित पूरी दुनिया में प्राचीन काल से ही जैविक खेती-बारी की जाती रही है । लेकिन बढ़ती आबादी के कारण अधिक अन्न उपजाने के लिए अविष्कार और विकसित किए जानेे वाले रासायनिक खाद और जहरीले कीट नाशक धरती की उर्वरता को ही निगल जा रही है, और यह आज किसानों को एक ऐसी चक्र में फांस चुकी है जिससे निकलने के लिए पूरी दुनिया में कोशिशे जारी है । रासायनिक खाद बनाने और बेचने वाले उद्योग रोज इसके गुणवत्त का बखान करती है, लेकिन यह न सिर्फ खेतों को अनुपजाऊ बना रही है, बल्कि प्राकृतिक रूप से मिट्टी में पाए जाने वाले तत्वों को नष्ट कर रही है और इस रासायनिक खाद से उपजा अन्न पूरी आबादी को प्रभावित कर रहा है । यही कारण है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक पश्चिमी देश आज रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों से परहेज कर रहे हैं और जैविक अर्थात् आॅर्गानिक खेती की ओर रूख कर रहे हैं । आॅर्गानिक खेती-बारी की पद्धति न सिर्फ मिट्टी के प्राकृतिक तत्वों को बचा कर रखती है, बल्कि यह जल, वायु तथा वातावरण को भी प्रदूषितरहित रखती है । यह प्राकृतिक चक्र अर्थात् इकाॅलाॅजी सिस्टम को भी बचाए रखती है । यह प्राचीन काल से मानव और प्राकृतिक के बीच स्थिर संतुलन और संबंध को नष्ट नहीं करती है ।

शहरों के बाज़ारों में आजकल जैविक अन्न अर्थात् आॅर्गेनिक फूड की बहुत मांग है और यह सामान्य खाद्य पदार्थों से दुगुणे दाम पर बिकता है । विदेशों में आज कल इसी खेती पद्धति की धूम मची हुई है । उच्च आय वर्ग के ग्राहक सिर्फ आॅर्गेनिक फूड ही खरीदना पसंद करते हैं, क्योंकि ये जहरीले रासायनिक खाद और कीटनाशक रहित होते है और स्वादिष्ट तथा स्वास्थ्यकर होते हैं । छोटानागपुर की मिट्टी जैसी मिट्टी दुनिया में बहुत कम हैं । यह आॅर्गेनिक खेती के लिए सर्वोत्त्म है । यही कारण है कि कुछ बाहरी कंपनियाँ यहाँ भूमि लेने के फिराक में रहती हैं । एक तो मिट्टी अनमोल ऊपर से क्या पता उस मिट्टी के नीचे सोना या हीरा भरा पड़ा हो । छोटानागपुर के किसान सिर्फ आॅर्गेनिक खेती करके ही मालामाल हो सकते हैं और यह अंतहीन उच्च आय का साधन बन सकता है । लेकिन इसके लिए किसानों को संगठित रूप से कार्य करना होगा । उन्हें व्यक्तिगत खेती-बारी से ऊपर उठ कर सामूहिक, संगठित और नियोजित तरीके से खेती-बारी करना होगा । आदिवासी कृषि काॅआॅपरेटिव इस तरह के कार्य बखुबी कर सकता है । संगठित होने पर ही इसके मार्केटिंग व्यय को उठाया जा सकता है । छोटानागपुर में इसकी मिट्टी ही सबसे बड़ा खजाना है और यह खजाना हर खजाने से बड़ा है । बस मिट्टी पर नजरें गड़ाकर इसे प्यार से हासिल करना होगा । This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 18, 2016. All rights reserved

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