झारखण्ड का सबसे बड़ा ख़जाना

​                                                                                                                                                                                       नेह अर्जुन इंदवार

​सन् 2001 की बात है ।

मैं अपने भुवनेश्वर के अपने  मित्र जमादार गोडसोरा के साथ सुबह 4 बजे भुवनेश्वर से राँची जाने के लिए मोटरबाइक से निकला । हम किसी विशेष काम से नहीं निकले थे, बल्कि बाइक से रास्ते के आदिवासी गाँवों में जाकर वहाँ के लोगों से मिलना जुलना और बात करना चाहते थे । दोनों शहरों के बीच की 400 किलोमीटर की दूरी बाइक सवारी के लिए वाकई काफी लम्बी है । लेकिन हमारी मंजिल थी राँची ।

हम बहुत जोशिले और उत्साहित थे । कई वर्षो के बाद राँची जाना जा रहा था । दोस्तों से मिलने की खुशी और रास्ते के आदिवासी गाँवों में जाकर लोगों से खूब बातें करने की चाहत । करीबन 100 किलोमीटर जाने के बाद ही बडे़ आदिवासी गाँव दिखाई देने लगे । हम खेतों में काम करते लोगों के पास जाते और गोडसोरा ”हो“ में बात करते । और मुझे हिन्दी में बताते । चूंकि गाँववाले हिन्दी बोल व समझ नहीं पा रहे थे । मैं हिन्दी में बोलता और वह अनुवाद करके किसानों को ”हो“ में बताते ।

दशकों बाद किसानों से बातें हो रही थी । एक जगह कई महिलाएँ डियेंग (हँडिया) बेच रही थी । हम उनके पास गए और उनसे काम, घर परिवार और डियेंग बेचने के बारे बात करने लगे । वे अपने खेती-बारी, खेत-खलिहान और घर-परिवार की बातें बता रही थीं और मैं एक डायरी में नोट कर रहा था । उनके जीवन संघर्ष की बातें, पिछले कई दशकों में गाँवों में आए परिवर्तन को हम करीब से जान रहे थे ।

हम भुवनेश्वर जैसे दूर के शहर से आ रहे हैं यह जानकर वे हमारी थकावट को दूर करने के लिए डियेंग  पीने का अनुरोध किए । हमने मुस्कराकर कर धन्यवाद दिया कि अभी हमें बाईक से सफर करनी है डियेंग हमारे लिए भारी हो जाएगा । यह डियेंग चावल को पूरी तरह से मथ कर बनाया जाता है और उसमें चावल का अंश होता है । डियेंग पीने से पेट भर जाता है, इसका नशा बहुत असरदार होता है । अभी हम रास्ते के क्योंझर शहर नहीं पहुँचे थे और एक जंगल से गुजर रहे थे तभी एक कील बाइक के अगले पहिये में घुस गया । अब हमारे पास पैदल चलने के सिवा कोई चारा नहीं था । पठारी ऊँचाई पर धकेल कर बाइक ले जाना काफी थकावट भरा काम होता है । हम थक कर लतपत हो चुके थे । हम गुजरते ट्रकों से लिफ्ट मांगते लेकिन माल लदा ट्रक नहीं रूकता । बहुत चेष्टा के बाद एक खाली ट्रक आया और हम अपनी हीरोहोंडा उसमें लादने में कामयाब हो गए और क्योंझर आ गए । वहाँ पंक्चर ठीक किए और आगे बढ़ गए । लेकिन शहर से निकलने के बाद ही पेट में चूहे दौड़ने लगे । दोपहर के तीन बज चुके थे, पंक्चर के चक्कर में हम कुछ खाना ही भूल गए थे । हम कई ढाबों में गए लेकिन वहाँ की गंदगी और भिनभिनाती मक्खियाँ देखते ही मैं वहाँ खाने से इंकार कर देता । हमने बिस्कुट से काम चला लिया ।

हम झारखण्ड की सीमा में दाखिल हो चुके थे । झारखण्ड की मिट्टी को हमने माथे पर लगाया और प्रणाम किया । फिर हम आगे बढ़ गए । हम एक पेट्रोल पंप से पेट्रोल ले रहे थे तभी गोडसोरा का एक परिचित दिख गया । वह पास के एक गाँव से था । उसने अपने घर चलने का आमंत्रण दिया और हम उसके साथ हो लिए । उसने कहा खाना तो बन नहीं सकता है, लेकिन डियेंग मिल सकता है । हमने बिस्कुट खाया था इसलिए तुरंत कुछ खाने की आवश्यकता नहीं थी । परिचित जी ने हमें थोड़ा सा डियेंग का स्वाद लेने का अनुरोध किया । हमने थोड़ा सा डियेंग आलू के चखने के साथ लिया ।

चखना को चखने के बाद ही जैसे मुझ पर जादू सा छा गया । इतना स्वादिष्ट आलू ! मैं उनसे और आलू मांग-मांग कर लिया, पेट भरा होने पर भी काफी आलू खा गया । दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, भुवनेश्वर में मैंने वर्षो गुजारा है । हैदराबाद के आसपास के जिलों में हम बाइक से अक्सर घूमने जाते और वहीं तेलगु सीखने के लिए ग्रामीणों के घरों में खाना खा लेते थे । गुजरात के गाँवों में भी खुब घुमना हुआ है । महाराष्ट्र के अधिकतर जगहों पर जाना हुआ है । हर जगह के खास व्यंजनों को चखने का अवसर मिला है । लेकिन यहाँ तो आलू ने जैसे मंत्र ही मार दिया । आलू की वह सब्जी हमारे होस्ट ने कुछ मिनटों में जैसे-तैसे मर्दाना स्टाइल में सिर्फ डियेंग के साथ खाने के लिए बनाया था । पाक कला की कोई करामत नहीं अजमाई गई थी, न ही उसमें कोई मसाला डाला था सिर्फ हल्दी, नमक और मिर्ची से बना था वह नयाब सब्जी । 

मुझे एक ख़जाना मिल गया था । स्वादिष्ट आलू की वह एक प्रजाति है जो छोटानागपुर के गाँवों में ही मिलती है । दिन भर की थकावट छूमंतर हो चुकी थी । शायद यह डियेंग और उस जादुई आलू का असर था । हम पास के साप्ताहिक हाट में जा पहुँचे और वहाँ जाकर देखा जितना बड़ा हाट उतना बड़ा डियेंग का बाज़ार । लोग डियेंग के साथ अलग-अलग चखना खा रहे थे । हमने डियेंग का पैसा चुकाया लेकिन उसे पीने के लिए दूसरों को दे दिया और अलग-अलग सब्जी से बना चखना खाने लगे । वहाँ बेचे जा रहे चखना भी घर में बने आलू की तरह ही स्वादिष्ट थे । चखने का हर कौर हमारे लिए एक अनुभव था और हम उस अनुभव को ठूँसे जा रहे थे । जब हम हाट से निकले और काफी दूर चले गए तो पता चला, चखना खाने के रौ में मैं अपना डायरी वहीं भूल आया । मैंने जोर का ठहाका लगाया । गोडसोरा चौंक कर मुझे देखने लगा ।
क्या हो गया ?
लेकिन असली डायरी तो मैं साथ लेकर आया हूँ । मैंने अपना जीभ उन्हें दिखाया । वह भी जोरदार ठहाके लगाने लगा । अब हम दोनों फिल्म शोले के जय और बीरू की तरह बाइक में गाना गाते हुए चलने लगे ।

पहली मई 2014 को संजय पहान की शादी में शरीक होने के लिए फिर से राँची जाना हुआ और कोलकाता वापसी से पहले मटिल दीदी को ढेर सारा सब्जी बाजार से खरीदवा लिया । कोलकाता आकर सबसे पहले बेंग साग की सब्जी बनवाया । वाह ! क्या स्वाद है । मेरे मुँह से निकला । सभी ने जी भर का बेंग साग का लुफ्त उठाया । वाकई में बहुत स्वादिष्ट था साग । डुवार्स में हम अक्सर बेंग साग खाते रहते हैं लेकिन छोटानागपुरी बेंग साग का स्वाद कमाल का था । हफ्ते भर राँची से लाई गई दूसरी सब्जियाँ भी बनती रही । कोई दिल को उसी तरह बाग-बाग करता रहा और कोई कोलकाता में मिलने वाली सब्जियों की तरह ही साधारण स्वाद वाली थी ।

एक ही हाट, बाज़ार में मिलने वाली सब्जियों के स्वाद में इतना फर्क क्यों होता है ? इसका मुख्य कारण खेत में उपयोग किया जाने वाला खाद है । बेंग साग उपजाने के लिए किसी खाद की जरूरत नहीं होती है, वह प्राकृतिक तरीके से उगती है, जबकि दूसरे सब्जियों के मामले में अधिक उपज के लिए किसान रासायनिक खाद अर्थात् फार्टिलाइजर आदि का उपयोग करता है । रासायनिक खाद उपज बढ़ाने में मदद तो करता है लेकिन वह जमीन के औषधीय और प्राकृतिक गुण को खत्म कर देता है । यह प्राचीन काल से विकसित हो रहे अन्न में उपस्थित गुणों के तत्वों में बदलाव कर देता है ।

हर जगह की धरती के ऊपरी परत की मिट्टी अलग-अलग होती है । उस मिट्टी में अलग-अलग वनस्पति उगते हैं, पनपते हैं और हर जगह के वनस्पति में उस जगह विशेष की मिट्टी की सुगंध और औषधीय गुण रची बसी होती है । यही अन्न उस खास जगह के मनुष्य के लिए स्वास्थ्यकर होता है और वह कालांतर में उस जगह के निवासियों के लिए औषधि का काम करता है । प्राचीन काल से छोटानागपुर की धरती पर रहने वाले आदिवासी यहाँ के एक-एक कण, एक-एक पत्ते से परिचित हैं और वे यहाँ की धरती पर हमेशा खुशहाल, चैनशील और स्वस्थ रहे हैं । सौ-सौ साल तक मजबूत और स्वस्थ रहने वाले आजा, नाना की यादें अभी भी ताजी है । टाना भगत आंदोलन के दौरान नगर ठिठाईटांगर के फागू भगत, अघनु भगत टैक्स के बारे जानने के लिए राँची के कलेक्टर से मिलने के लिए सिसई से पैदल आए थे । वे कई दिनों तक रोज कलेक्टरेट जाते और कलेक्टर से बातें करने का अनुरोध करते, लेकिन कलेक्टर ने उनकी ओर आँख उठा कर भी देखने की जहमत नहीं उठाई । नाराज़ होकर फागू भगत ने ‘‘कलेक्टर साहेब हमसे बात कीजिए’’ कहते हुए आॅफिस में प्रवेश करते ही कलेक्टर की बाँह पकड़ ली । उनके बाॅडीगार्डस् फागू भगत के हाथों के बंधन छुड़ाने के लिए पूरा जोर लगा दिए, लेकिन छुड़ा नहीं पाए । डर के मारे कलेक्टर ने उससे बात करना स्वीकार किया और तुरंत टाना भगतों के खेतों के लगान को माफ करने की घोषणा कर डाली । यह किस्सा हम फागू भगत जिन्हें हम आजा कहते थे के जुब़ान से ही सुने थे, तब उनकी उम्र एक सौ दस वर्ष थी और तब भी वह अपनी चार वर्षीया नातीनी मनीर को गोदी लेकर गाँव की सैर करते थे ।

तब उनके जैसे न जाने कितने आजा और नाना लम्बी उम्र के साथ-साथ स्वस्थ शरीर के भी मालिक होते थे और जिंदगी का भरपूर आनंद लेते थे । यह स्वास्थ्य इक्का-दुक्का व्यक्तियों की नहीं हुआ करती थी, बल्कि समाज की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी ऐसे ही स्वास्थ्य का आनंद उठाती थी । सुबह की प्रथम लाली के साथ ही बिस्तर से उठ जाना, दिन भर जी-तोड़ शारीरिक मेहनत करना और छोटानागपुर के मिट्टी पर उपजे साधारण, लेकिन प्राकृतिक स्वाद और गुणों से लबालब अन्न खाना और शाम ढलते ही अखरा में गीत-नृत्य में तल्लीन हो जाना । यही दिनचर्या था आदिवासियों के पुरखों का । कहीं कोई अस्पताल, चिकित्सालय नहीं था । जो भी था वह था होड़ोपैथी, जो आदिवासियों के परंपारिक ज्ञान पर आधारित था । यह ज्ञान भी अधिकतर छोटानागपुर की वादियों में मिलने वाली वनस्पतियों पर ही आधारित था । और यह वनस्पति छोटानागपुर की मिट्टी की पैदाइश होती थी । बात आती है यहाँ की मिट्टी की । यह मिट्टी ही यहाँ के वनस्पति, अन्न को दुनिया का बेहद स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर वनस्पति, अन्न बनाता है ।

लेकिन आधुनिकता का अंधानुकरण किए जाने के कारण छोटानागपुर की प्राचीन मिट्टी की गुणवत्ता खत्म होते जा रही है । खेतों को जोत कर व्यवस्थित ढंग से उगाए जाने वाले फसल के लिए रासायनिक खाद का प्रयोग करने के कारण यहाँ की मिट्टी की उर्वरता और स्वास्थ्यकर प्राकृतिक गुण समाप्त होने को है । साग-सब्जियों, मोटे चावल-दाल आदि के खेती के लिए किसानों द्वारा उपयोग किए जा रहे रासायनिक खाद पर उपयोग संबंधी कोई नियंत्रण नहीं है । यह यहाँ की जादुई मिट्टी पर भी बेरोक-टोक, अंधाधुंध प्रयोग किया जा रहा है । समाज में इस विषय पर कोई पहल नहीं की गई है । जहाँ कहीं रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं हुआ है वह मिट्टी और उस पर उपजे वनस्पति की गुणवत्ता, स्वाद और नस्ल बची हुई है । यही कारण है कि बेंग साग अत्यंत स्वादिष्ट लगता है, लेकिन सभी सब्जी दिल को जीत नहीं पाते हैं ।

यह एक अत्यंत गंभीर और महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर समाज और सरकार को तुरंत कदम उठाने की जरूरत है । छोटानागपुर के गर्भ में अनेक खनिज पदार्थ पाए जाते हैं, जो कालांतर में सरकार और बड़ी कंपनियों द्वारा खनन करके निकाल ली जाएगी । लेकिन यहाँ के मिट्टी की रक्षा, सुरक्षा और जतन किया जाए तो यह युगानुयुग यहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य की रक्षा करेगी ।

यहाँ की मिट्टी को बचाने का उपाय क्या है:- छोटानागपुर सहित पूरी दुनिया में प्राचीन काल से ही जैविक खेती-बारी की जाती रही है । लेकिन बढ़ती आबादी के कारण अधिक अन्न उपजाने के लिए अविष्कार और विकसित किए जानेे वाले रासायनिक खाद और जहरीले कीट नाशक धरती की उर्वरता को ही निगल जा रही है, और यह आज किसानों को एक ऐसी चक्र में फांस चुकी है जिससे निकलने के लिए पूरी दुनिया में कोशिशे जारी है । रासायनिक खाद बनाने और बेचने वाले उद्योग रोज इसके गुणवत्त का बखान करती है, लेकिन यह न सिर्फ खेतों को अनुपजाऊ बना रही है, बल्कि प्राकृतिक रूप से मिट्टी में पाए जाने वाले तत्वों को नष्ट कर रही है और इस रासायनिक खाद से उपजा अन्न पूरी आबादी को प्रभावित कर रहा है । यही कारण है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक पश्चिमी देश आज रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों से परहेज कर रहे हैं और जैविक अर्थात् आॅर्गानिक खेती की ओर रूख कर रहे हैं । आॅर्गानिक खेती-बारी की पद्धति न सिर्फ मिट्टी के प्राकृतिक तत्वों को बचा कर रखती है, बल्कि यह जल, वायु तथा वातावरण को भी प्रदूषितरहित रखती है । यह प्राकृतिक चक्र अर्थात् इकाॅलाॅजी सिस्टम को भी बचाए रखती है । यह प्राचीन काल से मानव और प्राकृतिक के बीच स्थिर संतुलन और संबंध को नष्ट नहीं करती है ।

शहरों के बाज़ारों में आजकल जैविक अन्न अर्थात् आॅर्गेनिक फूड की बहुत मांग है और यह सामान्य खाद्य पदार्थों से दुगुणे दाम पर बिकता है । विदेशों में आज कल इसी खेती पद्धति की धूम मची हुई है । उच्च आय वर्ग के ग्राहक सिर्फ आॅर्गेनिक फूड ही खरीदना पसंद करते हैं, क्योंकि ये जहरीले रासायनिक खाद और कीटनाशक रहित होते है और स्वादिष्ट तथा स्वास्थ्यकर होते हैं । छोटानागपुर की मिट्टी जैसी मिट्टी दुनिया में बहुत कम हैं । यह आॅर्गेनिक खेती के लिए सर्वोत्त्म है । यही कारण है कि कुछ बाहरी कंपनियाँ यहाँ भूमि लेने के फिराक में रहती हैं । एक तो मिट्टी अनमोल ऊपर से क्या पता उस मिट्टी के नीचे सोना या हीरा भरा पड़ा हो । छोटानागपुर के किसान सिर्फ आॅर्गेनिक खेती करके ही मालामाल हो सकते हैं और यह अंतहीन उच्च आय का साधन बन सकता है । लेकिन इसके लिए किसानों को संगठित रूप से कार्य करना होगा । उन्हें व्यक्तिगत खेती-बारी से ऊपर उठ कर सामूहिक, संगठित और नियोजित तरीके से खेती-बारी करना होगा । आदिवासी कृषि काॅआॅपरेटिव इस तरह के कार्य बखुबी कर सकता है । संगठित होने पर ही इसके मार्केटिंग व्यय को उठाया जा सकता है । छोटानागपुर में इसकी मिट्टी ही सबसे बड़ा खजाना है और यह खजाना हर खजाने से बड़ा है । बस मिट्टी पर नजरें गड़ाकर इसे प्यार से हासिल करना होगा । This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 18, 2016. All rights reserved

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चमरा ऊराँव और आदिवासी परंपरा

चमरा ऊराँव और आदिवासी परंपरा

                                                                                                                                                                                          नेह अर्जुन इंदवार 

           जंगली हाथियों ने चमरा उरॉंव का घर दो साल पहले ही उजाड दिया था । वे घर में रखे चावल दाल तथा अन्‍य खाद्यपदार्थ भी  खा गए। किसी तरह 65 वर्षीय वृ्द्ध चमरा उरॉंव ने भाग कर रात में अपनी जान बचायी थी। लेकिन दो वर्ष बीत जाने के बावजूद अभी तक उन्‍हें वन विभाग ने कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी।

नियमानुसार वन विभाग ऐसे लोगों को तुरंत क्षतिपूर्ति देता है, जिन्‍हें जंगली हाथी नुकसान पहुँचाते हैं। अकेले जीवन गुजर बसर करने वाले गरीब चमरा पिछले दो वर्षों में अपने घर की मरम्‍मत नहीं करवा पाए हैं  और आज वे  भीषण सर्दी ठिठुरता हुआ रात काटते हैं। बीरपाड़ा के पास रंगालीबाजना, चापागुडी मौजा के डिपालाइन में रहने वाले श्री चमरा उरॉंव किसी तरह मजदूरी करके अपना पेट तो भर लेते हैं, लेकिन इतना पैसा नहीं बचा पाते हैं कि वे अपने मकान की मरम्‍मत करवा सकें। श्री चमरा उरॉंव के पास बीपीएल (बिलो पॉवर्टी लाइन) राशन कार्ड था जिसके आधार पर उसे सरकार से इंदिरा आवास के नाम पर एक रूम मिला हुआ था। लेकिन मकान बनने के दो महीने बाद ही हाथियों का झुंड गॉंव में आया और घरों को तहस नहस करके चला गया।

विगत दो वर्षो तक उन्‍हें क्‍यों क्षतिपूर्ति नहीं दी गई इस विषय पर वन विभाग के अधिकारी सुरंजन सरकार कहते हैं वे यहॉं नये आए हैं वे देखेंगे कि क्‍यों चमरा उरॉंव को क्षतिपूर्ति नहीं मिली। इस गाँव में रहने वाले अधिकतर रहीवासी आदिवासी हैं और मजदूरी करके जीवन निर्वाह करते हैं।

आदिवासी समाज बहुत बदल गया है। युग बीतने के साथ तो समाज बदलता ही है। लेकिन आदिवासी समाज में निरंतर हो रहे बदलाव प्राकृतिक और स्‍वभाविक बदलाव नहीं है। यह बदलाव देश में विकास के नाम पर हो रहे उथल-पथल का साइट इफेक्‍ट अधिक और समाज के द्वारा सहर्ष चुना गया कम है। आदिवासी समाज में व्‍यक्तिगत जीवन सुखमय जीवन का एक पहलू होता था। अर्थात व्‍यक्ति यदि सुखी है तो वह व्‍यक्तिगत जीवन में एकांतिक जीवन जी सकता था। लेकिन दुख में समाज हमेशा उसके दुख को बॉंटने के लिए तत्‍पर रहता था। समाज कौटोंबिक परिवारों में बॉंटा हुआ जरूर होता था लेकिन एकता और सामुहिकता की भावना उनमें स्‍वभाविक रूप से व्‍याप्‍त होती थी। चाहे फसल की कटाई हो चाहे फसल की बुआई। मदइत के सहारे पूरे गॉंव में हर तरह के पारिवारिक और सामाजिक कार्यो को सभी मिल कर पूरा कर लेते थे। बच्‍चों के पालन-पोषण और देखरेख अथवा युवक युवतियों के सामाजिक प्राशिक्षण की बातें हो, सभी मिल कर करते थे। किसी में यह भावना नहीं होती थी कि ये बच्‍चे फालना के हैं इसलिए हमें उसे नजरांदाज करने हैं। बडों की इज्‍जत गॉव समाज में सभी करते थे। एक बुजुर्ग सभी के बडा, आजा अथवा नाना होता था।
किसी  एक आदमी के बीमार पड़ने पर सभी उसके दावा दारू में भले व्‍यकितगत रूप से हाथ नहीं बटा रहे होते लेकिन परोक्ष रूप से सभी उसके लिए दुखी होते थे और उसके खेती बारी को बारी-बारी से मदद करके फसल उगाने में सहायता करते थे। किसी मजबूर आदमी की मजबूरी को समाज कभी भी न तो मजबूर आदमी की व्‍यक्तिगत मजबूरी समझता था न ही कभी उनकी मजबूरी का लाभ उठाने के लिए कोई नीचता के स्‍तर पर उतरता था। झारखण्‍ड के गॉंवों में गॉंव हमेशा स्‍वनिर्भर होते थे और बहुत कम चीजों के लिए वे गॉंव के बाहर निर्भर रहते थे। गॉंव बृहद रूप में एक परिवार ही होता था।

किन्‍तु आज गॉंव और समाज की बात छोड दीजिए आज तो परिवार में ही एकता की भावना नहीं होती है। व्‍यक्ति केि‍न्‍द्रत स्‍वार्थ आधारित व्‍यक्तिवाद ने आज पूरे आदिवासी समाज को अपने आगोश में ले लिया है। आज हर चीज के लिए आदिवासी समाज दूसरे समाज पर निर्भर है। क्‍योंकि साम्‍यवाद की भावना दिलों से खत्‍म होती जा रही है।  विकासवाद ने आदिवासी स्‍वनिर्भरता को खत्‍म कर दिया है और हम आज आदिवासीयत से दूर होते जा रहे हैं। आज समाज में लाखों चमरा उरॉंव हैं जिन्‍हें पढा-लिखा तबका जरा सी मदद पहॅुचा के उनके साधारण जीवन में सुख की दो घडी दे सकता है। लेकिन चमरा उरॉंवों को उनके आस पडोस में रहने वाले आदिवासी शिक्षित मदद पहुँचाने में तत्‍पर नहीं होते हैं और तमाम नियमों और कानूनों के बावजूद उन्‍हें सहज रूप से प्राप्‍त होने वाली सहायता नहीं पहॅुच पाती है।

शिक्षा से समाज में सुबह के उजाले की किरण की जगह दोपहरी की ऐसी किरणे मिल रही है जिनकी तपीश हमें जला रही है।रोज सुबह निकलने वाला सूरज हमेशा पुराना वाला सूरज नहीं होता है वह अपने साथ नयी रोशनी लेकर आता है। नयी सुबह की नई रोशनी से आदिवासी गॉंव भी अछूते नहीं रहे और गॉवों से ग्रामीण शहरों और कस्‍बों में जाने लगे और वहॉं से वापसी में वे अपने साथ कुछ रूपये पैसे और नये कपडे ही नहीं बल्कि नयी सोच, नयी विचारधारा, परंपरा और आचार-व्‍यवहार भी लाने लगे। सामूहिक जीवन पद्वति में जीवन जीने वाले आदिवासी कस्‍बों, शहरों और नगरों में जाकर व्‍यक्ति-केि‍न्‍द्रत, स्‍वकल्‍याण के विचारों से वाकिफ होने लगे,  उसे अपनाने लगे और इसे वे अपने गॉंवों में भी परांपरा की तरह सींचने लगे।


व्‍यक्ति-केि‍न्‍द्रत विचारधारा ने समाज को बुरी तरह से झकझोर दिया है। आज सामुहिकता की भावना की जगह व्‍यक्तिगत स्‍वार्थ की भावना ने ले लिया है। कभी छोटे-मोटे झगडे से लेकर बडी-बडी लडाईयों को गॉंव के पंचायत अथवा पडहा पंचायत आदि में सुलझाया जाता था, लेकिन आज मामूली कहासुनी भी पुलिस और कचहरी तक पहॅुचती है। शहरों में जा कर बस जाने वाले गॉंव वालों को भूलते जा रहे है। वहीं गॉंव वाले भी शहरों में बस जाने वालों के साथ न सिर्फ शहरी के रूप में ही व्‍यवहार करते हैं, बल्कि उन्‍हें खेती-बारी के हक से भी जुदा समझते हैं। पैसे आधारित सोच ने तमाम सामाजिक विचारों को स्‍वार्थ आधारित विचारों में बदल दिया है। आज कोई चमरा उरॉंव बुढापे में कष्‍ट का जीवन जीता है तो समाज में कहीं कोई हलचल नहीं मचता है। कोई पडोसी सामने आकर उन्‍हें न तो दिलासा दिलाता है न ही उन्‍हें अपनी सामर्थ्‍यता के अनुसार कोई मदद पहुँचाता है। जो पढे-लिखे हैं वे अपनी ही दुनिया में खोए हुए अपने जीवन स्‍तर  को और उँचा उठाने में व्‍यस्‍त हैं।

समाज को नेतृत्‍व देने का दावा करने वाले अपनी रूतबा को बढाने और अपने लक्ष्‍य को पाने में ही लगे हुए हैं।आदिवासी समाज भारत के अन्‍य सम-सामयिक समाजों में सिर्फ आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछडी हुआ है। सामाजिक रूप से आदिवासी समाज अभी भी अनेक समाजों से आगे और समृद्व है। अभी भी आदिवासी समाज में समाज की कीमत पर अपनी झोली भरने, अपने धनबल पर अन्‍याय और अनैतिक कार्य करने वालों को मान्‍यता नहीं मिलता है। न ही अन्‍य भारतीय समाजों में व्‍याप्‍त कुरीतियों को अपने समाज में स्‍थान देता है।

नारी जाति को आदिवासी समान में जितना सम्‍मान और अधिकार मिलता है उतना और कहीं भी नहीं। शादी में दहेज मांगने का साहस करने वाले उँगली में गिने जा सकते हैं। खेती की भूमि सामूहिक और सामाजिक मानी जाती है। जाति और धर्म के रूप में किसी भी व्‍यक्ति के साथ सामाजिक रूप से कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। एक ही घर में एक भाई सरना और एक भाई ईसाई हो सकते हैं। वर्ग भेद न के बराबर है। चाहे कोई धार्मिक हो चाहे कोई अधार्मिक समाज इसकी कोई परवाह नहीं करता है। धार्मिक कटटरता  थोपने की तमाम कोशिशें बेकार हुई है। समाज को धार्मिक रूप से बॉंटने की कोशिशे भी सफल नहीं हुई है।

कुछ लोग आदिवासियों को दलितों से भी पिछडे और नीच साबित करने की बहुतेरे कोशिशें की लेकिन आदिवासी उच्‍च सामाजिक मूल्‍यों के कारण वे इस मामले में फिसडडी साबित हुए हैं। आदिवासी, समता स्‍वतंत्र और समरसता में प्राकृतिक रूप से विश्‍वास करता है। न तो किसी समाज को अपने से छोटा समझता है न ही किसी समाज को अपने से बडा। वर्तमान समय में जिन मूल्‍यों और विचारों को कानून और संविधान के द्वारा लोगों में प्रचारित किया जा रहा है वे तमाम बातें आदिवासी समाज में युगों से स्‍थापित हैं। चाहे वह पर्यावरण की बातें हो, प्रदुषण फैलाने की बाते हो या वह आदमी को अनचाहे आचार-व्‍यवहार और परांपराओं से बचाने की बातें हो। आदिवासी समाज हमेशा सर्वकल्‍याणकारी और सर्वजनहिताय बातों को ही अपने समाज में स्‍थान और मान्‍यता दिया है।

आदिवासी गॉंव जितने साफ-सुथरे और स्‍वच्‍छ होते हैं वैसे गॉंव भारत के और कौन से हिस्‍से में मिलते हैं इस बात की जानकारी पूरे भारत की यात्रा करने के बाद भी मुझे नहीं हुई। मेरे यह कहने से लोगों को आश्‍चर्य होता है कि आदिवासी परिवार तथाकथित ब्राहमण और  तथाकथित दलित को एक ही नजर से न सिर्फ देखता है, बल्कि समान रूप से व्‍यवहार भी करता है। सामाजिक रूप से न तो वह किसी व्‍यक्ति को जन्‍म के आधार पर छोटा समझता है न ही बडा।

भारतीय संविधान को लागू हुए साठ साल हो गए। तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद लोगों की जातिवादी विचारों और परंपराओं में कोई परिवर्तन नहीं आया है। लेकिन आदिवासी समाज इन्‍सान के बराबर होने की बातों को युगों से मान्‍यता देता आ रहा है।इन तमाम अच्‍छाईयों के बावजूद आदिवासी समाज आज टूट रहा है। टूटन की गति समय बीतने साथ तीब्रतर होते जा रही है। हम दूसरे समाज की अच्‍छाईयों को तो नहीं अपना रहे हैं, लेकिन बुराईयों को जरूर अपना रहे हैं। आदिवासी समाज की सामाजिक मूल्‍यों पर हम कोई बहस नहीं करते हैं। हमारी सामाजिक धरोहर, मूल्‍यों, विचारधारा, अच्‍छी सामाजिक परंपराओं, स्‍वतांत्रिक विचारों, समता के मूल्‍यों, भाईचारा, सामाजिक और धार्मिक खुलेपन को बचाए रखने के कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं।

​           हम दूसरे समाज की घार्मिक और साम्‍प्रादयिक भावनों को अपना कर अपने ही समाज में विभेद पैदा कर रहे हैं। य‍द्यपि इस तरह की बुराईयॉ अभी गहरी रूप में अपनी पैठ नहीं बना पाई है। लेकिन यदि हम सजग नहीं हुए तो दूसरे समाज में फैली व्‍यक्तिवादी परंपरा और विचारधारा आदिवासी समाज को खत्‍म कर देगी। समाज में दुख झेल रहे चमरा उरॉंवों ने हमें सोचने, विचार करने का एक मौका दिया है। यदि हम सामाजिक चेतना जगा कर विचार करेंगे तो हम अपने समाज को बचा सकते हैं। अपनी मूल्‍यों को बचा कर समाज में एकता और एक्‍य की भावना को बचा कर रख सकते हैं।​ This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 18, 2016. All rights reserved.

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