बाँस का ढूठू

कहानी                                                                                                                                                                       नेह अर्जुन इंदवार 
  

अरे! तू कैसे काम करता है ? दिन भर में बस इतना सा ढूठू निकाला है ?
वह गिनती करने लगा – एक, दो, तीन, चार, पाँच — दस ! बस ? इतना ही ? उसकी आवाज में गुस्से से अधिक उपहास शामिल था । मैं क्या बोलता, मेरे पास बोलने के लिए कुछ था नहीं । मैं चुपचाप उसे देखता रहा ।
 
तू उस बुड्ढे बोलो को देखा है, अरे वही जो लाल शर्ट पहना हुआ है ! वह तर्जनी से उसे दिखाता हुआ बोला । ”वह दिन भर में चार दर्जन ढूठू निकालता है, और तू जवान छोकरा एक दर्जन भी नहीं निकाल पाया।“  उसने सीधे मेरी सामर्थ्य पर सवाल खड़ा किया और मुझे गौर से देखता हुआ बोला-

”तू तो सिंकया पहलवान है, तेरे हाथों में जान ही नहीं तो तेरी कुल्हाड़ी क्या खाक निकालेगी ढूठू ?“
उसने मेरीे बाँहों की ओर इशारा करते हुआ कहा । वह इतना कहता तो शायद मैं आपे से बाहर नहीं होता, लेकिन कदम बढ़ा कर मेरी बाॅह को छूते हुए कहा-

‘‘अरे यह तो लडकियों की तरह मुलायम है ।’’
उसके इतना कहने से मेरा दिमाग भभक गया । गुस्से का एक तूफान दिमाग में आया । गुस्से भरे हाथों से मैंने कुल्हाड़ी के डंडे को कस कर पकड़ लिया । उसने और ज्यादा बकबक की तो सीधे उसके गर्दन में कुल्हाड़ी मारूँगा । मैं बेइज्जती के समंदर में डूबता हुआ सोच रहा था ।
 
मेरी उम्र उन दिनों सतरह-अठारह साल की थी और मैंने इज्जत, बेइज्जत के बारे अच्छा खासा अनुभव प्राप्त कर लिया था । मुझे बेइज्जती के बोल बिल्कुल नहीं सुहाते । किसी के कुछ कहने पर मैं गुस्से से पागल हो जाता था।  गुस्से में किसी से भी भीड़ जाता और जो भी सामान हाथ में आता उससे प्रहार करता।  लेकिन जब से घर से बाहर काम करने निकला था, तब से मैंने देखा कि लोग बात-बात पर बिना सोचे समझे कुछ भी बोल लेते हैं और दूसरे क्षण ही वे उन बातों को भूल जाते हैं। तब मैंने लोगों के सोचने के ढंग को थोड़ा-थोड़ा समझने लगा था। इसका एक लाभ यह हुआ कि  मैंने गुस्सा करना और उसे काबू में करना भी सीख लिया था ।

लेकिन सुपरवाइजर के बोल से मेरा गुस्सा बेकाबू हुआ जा रहा था। मेरी आंखों में खून सवार हो गया था । मैं कुल्हाड़ी से ठीक उसके गर्दन में वार करने के लिए तैयार हो रहा था । तभी बीस गज की दूरी पर जहाज के रनवे से एक लड़ाकू जहाज जोरदार शोर करता हुआ तेजी से गुजर गया और सुपरवाइजर की आवाज उस शोर में गुम हो गई । और उसी के साथ ही वह कदम बढ़ाते हुए वहाँ से आगे दूसरे मजदूरों के ढूठू गिनने के लिए आगे बढ़ गया । कुल्हाड़ी पर मेरी पकड़ ढीली पड़ गई । लेकिन गुस्से से मैं लाल हो चुका था । मेरे आसपास खड़ी मजदूरीन औरतें मेरी ओर देख रही थीं । मेरे गुस्से का असली कारण वहाँ खड़ी औरतों के सामने मेरी ताकत, शरीर और काम करने के सामथ्र्य पर उसका भद्दा कामेंट्स ही था ।

सुपरवाइजर अक्सर मजदूरों को डाँटते हैं, गाली करते हैं यह मुझे मेरी मजदूरी के पहले दिन ही पता चल गया था । लेकिन कम सामथ्र्यवान होने का खमियाजा इस तरह सबके सामने ऐसी बेइज्जती के साथ भी होती है इसका मुझे आज ही एहसास हुआ ।
 
मैं एक दुबला पतला किशोर था । गाँव से दूर कस्बे के स्कूल में नौंवीं कक्षा में पढ़ता था । गाँव से होकर गुजरने वाली बस में स्कूल जाता । लेकिन कभी-कभी किराए के पच्चीस पैसे में से पाँच पैसे कम पड़ जाते तो बस कंडक्टर मुझे बस से उतारने की धमकी देता । रास्ते में तीन किलोमीटर जंगल पड़ता और मैं उन्हें दूसरे दिन पाँच पैसे चुकाने की बात कहता तो वह और जोर-जोर से कहता-
”क्या यह राशन की दुकान है जो बाद में पाँच पैसे चुका दोगे ।“
वह कंडक्टर हम स्टूडेंट्स से हमेशा ऊँची आवाज में बात करता । उसे पता था कि हम लोग चाय बागान में काम करने वाले मजदूरों के बच्चे हैं और हमारे पालक हमें पूरे पैसे दे नहीं पाते हैं । कभी-कभी भूख लगने पर हम किराए के पैसे में से पाँच पैसे के चने खा लेते थे और किराए के पैसे कम पड़ जातेे ।

हमारी कई बार बस वालों से झड़प हो चुकी थी ।
बकझक होने पर वे हमें हमारी औकात बताना चाहते थे । वे यह एहसास दिलाना चाहते थे, वे हमें अपने बस में यात्रा करने देकर हम पर एहसान कर रहे हैं । लेकिन हम उन्हें बस का तय किराया देते थे और हमारी नजर में यह सिर्फ एक लेन देन से अधिक कुछ नहीं था । हम रोज सुबह स्कूल जाने के लिए मघु चौपाथी पर के बस स्टैण्ड पर खड़े होते और बस आने पर रूकने का संकेत करते । लेकिन बकझक होने के बाद वाली दिन पर वे हमें स्टैण्ड पर खडे देखते और को धीमी करते लेकिन रोकने के बजाय अचानक तेजी से बस ले भागते । हम कभी-कभी इसी वजह से स्कूल जा नहीं पाते । बस वालों के गैर जिम्मेदाराना रवैये पर हमें बहुत गुस्सा आता । लेकिन हम कुछ नहीं कर पाते । ऐसा व्यवहार करके शायद उन्हें आनंद आता या संतुष्टि मिलती ।

बार-बार ऐसा होने पर हम सब स्टूडेंट्स मिल कर एक दिन पेड़ की बड़ी सी एक डाल को रोड में रख कर रोड जाम कर दिया और आम जनता को बस के कंडक्टर के व्यवहार के बारे बताया । वे हमारी मदद करने के लिए सड़क पर जमा हो गए और कंडक्टर पर सब अपना-अपना हाथ साफ करने का मन बनाने लगे । बस आई, उसे रूकना पड़ा और हम बस कंडक्टर और ड्राइवर से उलझ पड़े ।इसी बीच कुछ लोग उन पर हाथ उठाने लगे । हम स्टूडेंट्स मिल कर उन्हें पिटने से बचा लिया । इस तरह बस वालों के साथ रोज-रोज का खचर-पचर कुछ कम हुआ । बस वाले हमारी एकता और ताकत को देख चुके थे, इसलिए वे हमसे कम ही उलझते ।

घर में सिर्फ माँ काम करती थी । वह मुझे पूरे पैसे नहीं दे पाती थी । स्कूल की लम्बी छुट्टियों में पैसे कमाने के लिए मजदूरी की खोज में निकल जाता । किसी ने मुझे बताया कि एयरफोर्स में नया रनवे बनने वाला है । वहाँ बाँस के बहुत बड़े-बड़े झुरमुट होने के कारण बाँस के ढूठू अर्थात जड़ को निकालने का काम चल रहा है । मैंने घर का एक पुराने कुल्हाड़ी को निकाल उसे कुछ तेज किया और पहुँच गया ठेकेदार के पास । ठेकेदार ने बताया कि एक ढूठू के पच्चीस पैसे मिलेंगे और एक दिन में बीस ढूठू निकालने होंगे । मुझे लगा यह तो बहुत आसान-सा काम है दिन भर में तो मैं बीस क्या पचास ढूठू निकाल लूँगा । ढूठू निकालने का मुझे कोई तर्जुबा नहीं था ।
 
लेकिन बाँस के ढूठू कितने सख़्त और ढीठ होते हैं कुल्हाड़ी चलाने के बाद ही पता चला । ढूठू पर मेरे अनाड़ी कुल्हाड़ी की वार से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था । वह बस हिलता, हल्का सा नीचे जाता और फिर ऊपर आ जाता । मेरी कुल्हाड़ी भी न भारी-भरकम थी न ही बहुत तेज । भोथरी कुल्हाड़ी से मैं पहले दिन पाँच ढूठू भी काट न सका । दिन भर तेज धूप में खट कर एक रूपये पच्चीस पैसे कमाया था । शाम को दूसरे लोग बताए वे तीस चालीस ढूठू निकाल लिए थे और आठ से दस रूपये कमा लिए थे । मैंने अपने ढूठू की गिनती किसी को नहीं बताया । करीब सौ मजदूर काम करते थे और उन ढूठूओं की गिनती के बाद उसे बाहर निकाल दिया जाता । इसके लिए बीस-पच्चीस लड़कियाँ और औरतें काम करती थी । कुछ औरतें इसकी गिनती करती थी । लेकिन बीच-बीच में सुपरवाइजर भी गिनता था । कौन कितना ढूठू निकालता है यह औरतों को अच्छी तरह पता रहता था। अधिकतर मजदूर एक दूसरे को पहचानते थे, क्योंकि वे हर मौसम में अलग-अलग ठेकेदारों के साथ काम करते थे और यही उनकी जीविका का साधन था।

लेकिन उस झुंड में मैं नया था । कुछ मजदूर मेरे गाँव से भी थे लेकिन मुझे एक-दो लोग ही पहचानते थे।  काम के दूसरे दिन एक दो औरतें मेरी किशोर उम्र को देखते हुए मुझसे जान-पहचान करने आयीं । मैनें उन्हें नहीं बताया कि मैं एक छात्र हूँ और सिर्फ छुट्टियों में काम करने के लिए आया हूँ । परिचय हो जाने पर मैं अन्य मजदूरों के साथ-साथ उनसे भी बातें करता । उस भीड़ में मैं सबसे कमजोर मजदूर था और अधिक संख्या में ढूठू नहीं निकालने का गम मेरे दिल और दिमाग में घर कर गया था । मेरे उदास चेहरे को वे शायद पढ़ते,  लेकिन वहाँ सभी अपनी-अपनी उदासी, गम और गरीबी के साथ आते थे । मजदूर की मजबूरी कितनी होती है, जिंदगी के हर मोड़ पर दिल को मसोस कर रखना और जीवन जीना कितना मजबूर वाला होता है, एक गरीब मजदूर से अधिक कौन जान सकता है । मजबूरी की यही जिंदगी, एक दूसरे के प्रति संवेदनशीलता को बढ़ाता है । एक के दुख का एहसास दूसरे को सहज ही हो जाता है । शायद यही एहसास कुछ लोगों को हो गया था । दो चार मजदूरीन सुपरवाइजर से आँख बचा कर गिनने के बाद बाहर फेंकने के पहले कुछ ढूठू मेरे अनगिने ढूठू में रख देते थे । दिन भर में मैं बहुत कोशिश के बाद भी सात-आठ ढूठू से अधिक नहीं निकाल पाता । लेकिन कई लड़कियों के मेरे ढूठू में चार-पाँच ढूठू मिलाने के कारण मेरे ढूठू की संख्या दस बारह हो जाती और मुझे एक-डेढ़ रूपया अधिक मजदूरी मिलती । मैं उन्हें मना करता कि वे ऐसा न करें, लेकिन वे मेरी मनाही को झिझक समझते । ऐसा करके वे न सिर्फ मेरे लिए खतरे मोल ले रही थीं, बल्कि अपने मजदूरी के पैसे और काम को भी खतरे में डाल रही थी । मैं कोशिश कर रहा था कि मैं अधिक से अधिक ढूठू निकालूँ, इसके लिए पड़ोसी से मांग कर नया और भारी कुल्हाड़ी भी ले आया था । एक-दो करते मैं अपनी कोशिश में कामयाब हो रहा था ।
 
फिर एक दिन वही हुआ जिसका डर था । सुपरवाइजर मेरे बगल से निकला । वह दूसरी ओर चला गया । उसी बीच दो लड़कियाँ चार पाँच ढूठू लाकर मेरे ढूठू में मिला दिए। दस मिनट बाद वह लौटा तो देखा मेरे पास अधिक ढूठू है । वह मुझसे तुनक कर पूछा-
”सिर्फ दस मिनट में तुमने पाँच ढूठू निकाल लिया ?“

शायद वह उधर से गुजरते वक्त मेरे ढूठू को गिन कर गया था ।
मैं क्या बोलता,  चुप था । वह मुझे ताक रहा था । नजरें मेरी एक जगह ठिठक कर रह गई थीं । तभी बगल में काम कर रहा हिंदुआ बोला – ”अरे मैं तो अपना वाला, इस छौवा के ढूठू में मिला दिया । साहेब हम भूल से अपना वाला इसके ढूठू में मिला दिया है ।“

”तो तुम अपना मजदूरी इस सिंकया पहलवान को दे रहा है ।“ उसने व्यंग्य से कहा ।
”गलती से डाल दिया साहेब, काम के धून में मालूम ही नहीं चलता है, किधर फेंक रहा है ।“

सुपरवाइजर वहाँ से चला गया । लेकिन उसके दिमाग में शक के कीड़े ने जन्म ले लिया था ।  लड़कियाँ डर गई थीं । उनकी चोरी पकड़ी ही जाने वाली थी । उनके जाने पर हिन्दुआ ने लड़कियों से कहा-
”तुम्हें काम से निकाल देता और फिर अब तक का मजदूरी भी नहीं देता ।“

ठेकेदार लोग बहुत बदमाश होते हैं यह मुझे बताया गया था ।
मेरे दिमाग में इस घटना से एक हलचल मच गया था । यदि हिन्दुआ हमें नहीं बचाता तो मेरी और उन लड़कियों की सप्ताह भर की कमाई हमें नहीं मिलती और ऊपर से काम से भी हाथ धोना पड़ता । छुट्टियाँ खत्म होने में अभी दस -बारह दिन बचे थे । मुझे शायद बहुत अधिक तकलीफ नहीं होती । लेकिन मजदूरी से गुजारा करने वाली लड़कियों की मजदूरी ही बंद हो जाती । लड़कियों ने गिने हुए ढूठू मेरे ढूठू में मिलाना  बंद कर दिया । शनिवार को सबको पैसे मिलते । मैं जानबूझ कर सबसे अंत में पैसे लेने जाता । बहुत कम पैसे मिलते मुझे । मजदूरी देते समय बड़ा ठेकेदार भी मौजूद रहता, इसलिए वह सुपरवाईजर कुछ नहीं कहता । लेकिन उसकी मुस्कराहट मुझे बहुत कष्ट देती थी ।
 
रमिया ठेकेदार की पुरानी मजदूरिन थी । वह ठेकेदार को कई वर्षों से जानती थी इसलिए उसके काम और ठेकेदारी से मिलने वाली रकम के बारे भी जानती थी । उसने मेरे बारे पूछा तो मैंने बता दिया कि मैं एक स्टूडेंट हूँ और गर्मी की छुट्टी में काम करने आया हूँ। 
 
हम सात बजे सुबह एयरफोर्स के गेट में लाइन से खड़े होते । एयरफोर्स के अफसर हमें गिनते । सबके नाम लिखे जाते और बडे़ अफसर के साइन होने के बाद हमें काम के लिए अंदर जाने दिया जाता । नाम लिखने का काम सुपरवाइजर करता ।

एक दिन गेट पर नया अफसर आया था । वह बड़ा कड़क लग रहा था । ऊँची आवाज में बातें कर रहा था । वह खुद हमलोगों को गिना, सबके रहने का स्थान और गाँव के बारे पूछा । सुपरवाइजर ने हम लोगों का नाम लिखा और अफसर के पास साइन के लिए ले गया । अफसर ने उसकी हैंडराइटिंग देखी और गरज कर कहा

” इतनी गंदी तुम्हारी हैंडराईटिंग ? कौन पढ़ सकेगा इसे, तुम्हें नाम भी साफ-साफ लिखना नहीं आता ?“

ऐसा कहने के साथ ही उसने पेपर खिड़की के बाहर फेंक दिया और लगा सुपरवाइजर को डाँटने । हम मजदूरों को उसके डाँट खाने से सुकून महसूस हो रहा था ।
 
अफसर ने फरमाया-
”ठीक से लिख कर तुरंत दो, नहीं तो मजदूरों को लेकर यहाँ से दफा हो जाओ, वर्ना गार्ड रूम में बंद कर दूँगा, मजाक समझ रखा है एयरफोर्स को ?“

सुपरवाइजर के चेहरे पर परेशानी साफ दिखाई पड़ रही थी । वह लिखने लगा, लेकिन हाथ काँप रहे थे । बहुत सलीके से लिखना चाह कर भी न हो पा रहा था । वह लिखता, फिर फाड़कर दूसरे पेपर में लिखता । अफसर अपने रूम में बैठा खिड़की से उसे देख रहा था । आज सुपरवाइजर की शामत आयी थी । 
हम लोग भी लाइन में खडे़ उसे देख रहे थे । दिल के किसी कोने में लडडू फूट रहे थे ।
तभी रमिया ने सुपरवाइजर को कहा ’’सर आप नहीं लिख पा रहे हैं वे इस लड़के को लिखने के लिए दीजिए । रमिया ने मेरे ओर इशारा करते हुए कहा । सुपरवाईजर ने प्रश्नवाचक नजरों से मुझे देखा । उसे आभास नहीं था कि यह मजदूर लिखने जानता है या नहीं ।

रमिया के इशारा करने पर मैंने सुपरवाइजर से पेपर और पेन लेकर वहीं बैठकर सबसे नाम और गाँव का नाम लिखा और उसे दे दिया । वह अफसर अपने कमरे से सारा नजारा देख रहा था । उसके पास पेपर जाने पर उसने कहा-
”ऐसा साफ सुथरा लिखा जाता है, एक मजदूर लिख लेता है और तुम नहीं लिख पाते हो ।“  उसने सुपरवाइजर को डाँटते हुए कहा ।

सुपरवाइजर चुप था वह कुछ नहीं बोला । हमें अंदर जाने दिया गया और हम काम करने लगे । सुपरवाइजर का मुड ख़राब हो गया था । वह हमारे काम के पास दिन भर नहीं आया । वह शाम को आया तो रमिया ने सभी मजदूरों की गिनती करके उसे हिसाब बताया । उसने मेरे ढूठू में पाँच अतिरिक्त ढूठू को जोड़ दिया था । ”बिना काम किए इस सिकिंया पहलवान को पैसा मिलेगा ?“ उसने गुस्से से कहा ।
”उसने आज सबका नाम लिखा इसीलिए तो हमलोग काम कर रहे हैं ।“
”तो नाम लिखने के लिए उसे पैसा मिलेगा । यह कितना ढूठू निकलता है ?“ 
”आपको भी तो सिर्फ नाम लिखने के लिए पैसा मिलता है । असल काम तो हम लोग ही करते हैं ।“
”तुम कहना क्या चाहती है ? क्या मेरे न रहने पर तुम लोग खुद काम कर लोगे ?“
”हमलोग आपके अंडर में काम करते हैं, लेकिन यह लड़का आज नहीं रहने पर हम सबकी मजदूरी मारी जाती ।“
”तुम यह कहना चाहती हो कि यह था इसीलिए आज तुमलोग काम में आ पाए हो ।“
”वही तो कह रही हूँ, इसके लिए पाँच ढूठू इस लड़के के नाम लिख दिया तो क्या फर्क पड़ा ।“
”तो अब ठेकेदारी का काम मुझको तुमसे सीखना पड़ेगा ।“
”मैंने ऐसा नहीं कहा । आप चाहो तो ठेकेदार से मेरी शिकायत कर देना । मैं उसको जवाब दूँगी ।“
”इसका मतलब तुम ठेकेदार से मेरी शिकायत करोगी ?“
”मैं कोई शिकायत नहीं करूँगी ।“ 
”तुम बहुत बकवास कर रही हो, कल से तुम्हें और इस सिंकिया पहलवान को काम में आने की जरूरत नहीं ।“
”ठीक है हमलोगों का पैसा अभी दे दो तो हम कल से नहीं आएँगे ।“
”तुम दोनों को अब कोई पैसा नहीं मिलेगा । तुमने मुझसे बहस करने का साहस किया । बहुत बकवास कर लिया है, तुम्हारी मजदूरी खत्म ।“
 
उसका व्यवहार अन्यायपूर्ण था । वह चाहता तो मेरे ढूठू की गिनती कम कर बात वहीं खत्म कर सकता था। लेकिन वह रमिया और मुझसे नाहक अन्याय कर रहा था । छोटी सी बहस के लिए काम से निकालकर आय से वंचित करना बहुत ही अन्याय की बात थी । उसके व्यवहार से सब कोई नाराज हो गए । लेकिन किसी में इतना साहस नहीं था कि वह उस सुपरवाइजर से उलझे । रोज का काम वही देखा करता था । ठेकेदार तो कभी-कभार, शनिवार को पगार देने  आता । सबको अपने काम, मजदूरी की चिंता थी । घर-परिवार, संसार इसी मजदूरी से चलता था । मेरा कोई दोष नहीं होने पर भी वह मुझसे अन्याय कर रहा था । इसलिए मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था । मेरा गुस्सा संभल नहीं रहा था । मैंने अपनी कुल्हाड़ी को कस कर पकड़ रखा था, यदि गुस्सा अतिरेक हो जाए तो शायद मैं उस पर वार कर देता । लेकिन हम एयरफोर्स की चारदीवारी के भीतर थे और किसी भी तरह के झमेले में सिक्योरिटी के लोग गार्डरूम में बंद कर देते थे । गार्ड रूम एक अंधेरा कमरा था, जिसमें कहीं खिड़की या रोशनदान नहीं था। बहस खत्म होने पर भी हम थोड़ी देर वहीं खड़े रहे, शायद वह अपना निर्णय बदले । लेकिन उसने फाइनली हम दोनों को दूसरे दिन से काम में आने से मना कर दिया था । हम बाहर निकल गए ।

जब हम गेट से बाहर निकल रहे थे तभी संयोग से ठेकेदार की गाड़ी दिखाई दी और हम दौड़ कर गाड़ी के पास गए।  रमिया ने उसे सारा वाक्यात कह सुनाया । ठेकेदार ने सुपरवाइजर के लिए कुछ नहीं कहा । सिर्फ रमिया और मुझे काम में फिर से आने के लिए कहा । मेरा गुस्सा कम नहीं हो रहा था । ठेकेदार यदि सुपरवाइजर को उसकी गलती के लिए कुछ कहता तो हमें थोड़ी तसल्ली मिलती । लेकिन हमारे ऊपर हुए अन्याय और दुरव्यहार पर उसकी चुप्पी हमें बहुत नागवार लगी।
 
रमिया तो दूसरे दिन से काम में फिर से चली गई । लेकिन मैं गुस्से से भरा था और काम में नहीं गया । उसके बार-बार सिंकिया पहलवान कहने के अंदाज से दिल में एक हूक सी उठ रही थी । वह शायद मेरे जितना भी पढ़ना लिखना नहीं जानता था। लेकिन ठेकेदार के द्वारा उसे अवसर देने और  हमलोगो के सीधेपन के कारण मालिक बन बैठा  था । यदि हमें भी अवसर मिलता तो शायद उससे अच्छा काम करते। जिंदगी में अवसर मिलने पर ही कोई आगे बढ़ सकता है, लेकिन तमाम योग्यता के बाद भी यदि अवसर न मिले तो आदमी आगे नहीं जा पाता है। लेकिन मैं उस बद् दिमाग को उसकी औकात बताना चाहता था ।
 
गर्मी की छुट्टी खत्म हो रही थी । मजदूरी पर जाना मैंने बंद कर दिया । मुझे स्कूल जाना था । लेकिन सुपरवाइजर से बदला लेना है यह मैं बार-बार मन में दुहराता । एयरफोर्स के बाहर कहीं वह अकेले मिले तो ——– । ऐसे ही कई सप्ताह निकल गए । मेरा स्कूल शुरू हो गया था और धीरे-धीरे मेरा गुस्सा कुछ कम हो चला था, लेकिन खत्म नहीं हुआ था । मैं किसी भी तरह से उसे नुकसान पहुँचाना चाहता था । वह स्कूटर से आता-जाता था, मैंने कई प्लान बनाये । उसके स्पीड में रहने पर आँखों में धूल फेंकना या उसके सिर पर ईंट दे मारना,  किसी तरह उसका एक्सीडेंट करना । कई दिन उसके आने-जाने के समय रास्ते में पत्थर लेकर मैं उसकी बाट जोहता रहा लेकिन वह समय पर आया ही नहीं । मैं पढ़ाई के व्यस्त हो गया था । मैं फिर से कविताएँ और लेख लिखने लग गया था। गुस्से की अवधि में रचनात्मक कार्य नहीं हो पा रहा था।  महीने निकल गए।  एक दिन मैं काम से लौटते मजदूरों से मिला और उसके बारे पूछा । वे बताए कि वह एक सप्ताह से आया ही नहीं है । कहीं वह भाग तो नहीं गया, या किसी और साइट पर तो नहीं चला गया ।
 
लेकिन मेरे बदला लेने की भावना खत्म ही नहीं हो रही थी, मेरे पड़ोसी भोला भैया को इस बारे पता चला तो उसने मुझे समझाया-

“शनिचरवा सबको मालूम है भाई,  ठेकेदार लोगों का मजदूरों के साथ व्यवहार अच्छा नहीं होता है । वे मजदूरों को हमेशा मानसिक दबाव में रख कर काम निकालते हैं।”

“लेकिन भईया उसने मेरे साथ बहुत बुरा व्यवहार किया है”

” वे किसी के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते उन्हें  सिर्फ अपनी कमाई की चिंता रहती है, किसी के मान-सम्मान की नहीं । छोटे-मोटे झगड़े को भूल जाना चाहिए । तुम तो एक अच्छे स्टूडेंट हो पढ़ना-लिखना जारी रखो, एक दिन उस सुपरवाइजर से भी बड़ा काम तुम्हें मिलेगा ।

“लेकिन मैँ एक बार उसे सबक सिखाना चाहता हूँ भईया।” उसे यूँ ही छोड़ देने के लिए मेरा मन नहीं मान रहा था। 

 “तुम भविष्य में नौकरी आदि करने के लिए ही न पढ़ाई कर रहो हो भाई, तुम्हें शायद मालूम नहीं मारपीट करके पुलिस केस होने के बाद सरकारी नौकरी भी नहीं मिलती है।”

भोला भैया की बातें समझ में आई, लेकिन फिर भी मैं उस सुपरवाइजर को किसी भी तरह से नुकसान पहुँचाना चाहता था ।”

 
मैंने उसके घर का पता लगाना शुरू किया । सभी जानने वालों से पूछने लगा। किसी ने बताया कि वह पास के कालोनी के किसी गली के आखिरी मकान में किराए पर रहता है । मेरी बाँछें खिल उठी । साले को भागने का रास्ता भी नहीं मिलेगा, मैं मन ही मन प्लान में कई तब्दीली करता रहा । पत्थर मारना अच्छा होगा या छूरी या दबिया । कई बार सोचने के बाद मैं एक चाकू लिए एक दोपहरी में उसके घर की ओर गया । मुझे ठीक से पता नहीं था कि वह किस घर में रहता है ?
 
पूछते-पूछते एक घर में पहुँचा । घर अंदर से बंद था । मैंने चाकू को पैंट के पाॅकेट में ही खोल दरवाजे को खटखटाया । लेकिन दरवाजा नहीं खुला । मैंने कई बार खटखटाया लेकिन दरवाजा नहीं खुला । तब मैं जोर-जोर से दरवाजे को पीटने लगा तो दरवाजा धीरे से खुला । मैंने चाकू पर अपनी पकड़ बनाई । सामने आते ही उसके चेहरे पर जोरदार ढंग से चाकू गड़ा दूँगा।

लेकिन दरवाजे पर पहले साड़ी दिखाई दिया फिर एक युवती। एक अत्यंत सुंदर सी युवती को देख मैं अवाक् रह गया, बाइस-चौबीस वर्ष की अत्यंत गोरी, तीखे नैन-नक्श की युवती । मैंने पाॅकेट से धीरे से हाथ निकाल लिया और पूछा-

“महेश सुपरवाइजर यहीं रहता है। ”  

वह इशारे से बोली- ”मैं बोल नहीं सकती, और घर में कोई नहीं है ।“

मैं एकटक उसे देखता रह गया । इतनी सुंदर लेकिन जुबान से गूँगी । उसने एक कुर्सी खींच कर दरवाजे के बाहर लगा दिया और मुस्कुरा कर मुझे बैठने का इशारा किया । मैं बैठना नहीं चाह रहा था लेकिन उसने मेरे कंधे को हल्के से छूकर बैठा दिया । मैं मंत्रमुग्ध उसे देखता रहा । मैंने अपने इलाके में ऐसी खूबसूरत युवती कभी नहीं देखा था । मुझे लगा मैं कोई फिल्म देख रहा हूँ, क्योंकि वह फिल्म हीरोइन सी सूंदर और आभावान थी। 
 
वह भीतर गई और एक गिलास पानी ले आई । मैंने पानी का गिलास लिया, लेकिन पीया नहीं । इतने में वह एक प्लेट में दो लड्डू लेकर आई, उस प्लेट में एक राखी भी रखा था । मैं हड़बड़ा गया, कुर्सी से झटके से उठ गया । वह इशारे में कुछ बोल रही थी लेकिन मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था ।
 
तभी पड़ोस की एक औरत थाली में कुछ मिठाईयाँ और राखी लेकर अपने घर से निकली। वह  कहीं जा रही थी लेकिन मुझे देखकर ठिठक गई शायद वह कुछ कहना चाहती थी। मुझे याद आया आज स्कूल में रक्षाबंधन की छुट्टी है।
 
वह पास आई और मुझे संबोधित करके बोली-

”तुमको वह राखी बंधना चाह रही है । दो साल पहले इसके माता-पिता और छोटा भाई का एक्सीडेंट में मौत हो गई और यह परदेशी लड़की घायल और बेसहारा हो गई थी । पुलिस रात के समय उसे अपने साथ थाने लेकर जा रही थी । इलाके के लोगों ने लड़की को अपने परिवार में रखने के लिए प्रस्ताव भी दिया । लेकिन पुलिस का कहना था कि कानूनन वे उसे सिर्फ इसके रिश्तेदारों के घर में ही छोड़ सकती है । दूर परदेशी का यहाॅं कौन रिश्तेदार हो सकता था । इतनी सुंदर लड़की को देख कर पुलिस की नियत ठीक नहीं लग रही थी । भीड़ जमा हो गई थी लेकिन किसी को कुछ नहीं सुझ रहा था।  तब महेश ने सबके सामने इससे शादी करने का ऐलान किया और भीड़ के जनसमर्थन से उसने वहीं पास की मंदिर में इससे शादी कर लिया । महेश न होता तो यह बेचारी कहाँ जाती और इसके साथ क्या-क्या होता यह तो शायद भगवान ही जानता होगा । महेश को इतना ही पता है कि ये लोग हिमाचल प्रदेश से भुटान घूमने के लिए आए थे, इसे छोड़कर सब घर वाले चल बसे । आज गली की लड़की बच्ची सब सबेरे से ही घूम-घूम कर राखी बाँध रही हैं, उसे देखकर शायद इसे भी अपने भाई की याद आ गई और सबेरे से ही यह राखी लेकर बार-बार घर के अंदर-बाहर हो रही है । पिछले दो साल में इसके घर आने वाले तुम पहले आदमी है, इसीलिए यह बहुत खुश लग रही है।“ उसने लगभग एक ही सांस में पूरी कहानी कह डाली। 
 
मैं कुछ सोच पाता उससे पहले ही उसने मेरी कलाई पर राखी बाँध दी और मेरे मुँह में लड्डू ठूूँस दिया । मैं विरोध न कर सका । उसके चेहरे पर खुशी दमक रही थी । अचानक मैं उसका भाई बन गया था।  मेरे पास उसे देने के लिए कुछ न था । पाॅकेट में एक खुला चाकू पड़ा था, मैं वहीं बैठा रहा । वह चाय बना कर ले आई, मैं चाय की चुस्कियाँ लेता हुआ इस बदलती स्थिति पर सोच रहा था । मुझे बदला चुकाने का भरपूर मौका मिला था ।

​गुस्सा करने और उसे नियंत्रण करने वाले किशोर मन को आज एक अनोखा अनुभव हुआ था । मेरे मन में कई विचार आ-जा रहे थे,  बाँस की ढूठू की तरह सख्त और लचकदार । मैं एक कटे ढूठू की तरह वहीं बैठा रहा ।  This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 18, 2016. All rights reserved

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चमरा ऊराँव और आदिवासी परंपरा

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                                                                                                                                                                                          नेह अर्जुन इंदवार 

           जंगली हाथियों ने चमरा उरॉंव का घर दो साल पहले ही उजाड दिया था । वे घर में रखे चावल दाल तथा अन्‍य खाद्यपदार्थ भी  खा गए। किसी तरह 65 वर्षीय वृ्द्ध चमरा उरॉंव ने भाग कर रात में अपनी जान बचायी थी। लेकिन दो वर्ष बीत जाने के बावजूद अभी तक उन्‍हें वन विभाग ने कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी।

नियमानुसार वन विभाग ऐसे लोगों को तुरंत क्षतिपूर्ति देता है, जिन्‍हें जंगली हाथी नुकसान पहुँचाते हैं। अकेले जीवन गुजर बसर करने वाले गरीब चमरा पिछले दो वर्षों में अपने घर की मरम्‍मत नहीं करवा पाए हैं  और आज वे  भीषण सर्दी ठिठुरता हुआ रात काटते हैं। बीरपाड़ा के पास रंगालीबाजना, चापागुडी मौजा के डिपालाइन में रहने वाले श्री चमरा उरॉंव किसी तरह मजदूरी करके अपना पेट तो भर लेते हैं, लेकिन इतना पैसा नहीं बचा पाते हैं कि वे अपने मकान की मरम्‍मत करवा सकें। श्री चमरा उरॉंव के पास बीपीएल (बिलो पॉवर्टी लाइन) राशन कार्ड था जिसके आधार पर उसे सरकार से इंदिरा आवास के नाम पर एक रूम मिला हुआ था। लेकिन मकान बनने के दो महीने बाद ही हाथियों का झुंड गॉंव में आया और घरों को तहस नहस करके चला गया।

विगत दो वर्षो तक उन्‍हें क्‍यों क्षतिपूर्ति नहीं दी गई इस विषय पर वन विभाग के अधिकारी सुरंजन सरकार कहते हैं वे यहॉं नये आए हैं वे देखेंगे कि क्‍यों चमरा उरॉंव को क्षतिपूर्ति नहीं मिली। इस गाँव में रहने वाले अधिकतर रहीवासी आदिवासी हैं और मजदूरी करके जीवन निर्वाह करते हैं।

आदिवासी समाज बहुत बदल गया है। युग बीतने के साथ तो समाज बदलता ही है। लेकिन आदिवासी समाज में निरंतर हो रहे बदलाव प्राकृतिक और स्‍वभाविक बदलाव नहीं है। यह बदलाव देश में विकास के नाम पर हो रहे उथल-पथल का साइट इफेक्‍ट अधिक और समाज के द्वारा सहर्ष चुना गया कम है। आदिवासी समाज में व्‍यक्तिगत जीवन सुखमय जीवन का एक पहलू होता था। अर्थात व्‍यक्ति यदि सुखी है तो वह व्‍यक्तिगत जीवन में एकांतिक जीवन जी सकता था। लेकिन दुख में समाज हमेशा उसके दुख को बॉंटने के लिए तत्‍पर रहता था। समाज कौटोंबिक परिवारों में बॉंटा हुआ जरूर होता था लेकिन एकता और सामुहिकता की भावना उनमें स्‍वभाविक रूप से व्‍याप्‍त होती थी। चाहे फसल की कटाई हो चाहे फसल की बुआई। मदइत के सहारे पूरे गॉंव में हर तरह के पारिवारिक और सामाजिक कार्यो को सभी मिल कर पूरा कर लेते थे। बच्‍चों के पालन-पोषण और देखरेख अथवा युवक युवतियों के सामाजिक प्राशिक्षण की बातें हो, सभी मिल कर करते थे। किसी में यह भावना नहीं होती थी कि ये बच्‍चे फालना के हैं इसलिए हमें उसे नजरांदाज करने हैं। बडों की इज्‍जत गॉव समाज में सभी करते थे। एक बुजुर्ग सभी के बडा, आजा अथवा नाना होता था।
किसी  एक आदमी के बीमार पड़ने पर सभी उसके दावा दारू में भले व्‍यकितगत रूप से हाथ नहीं बटा रहे होते लेकिन परोक्ष रूप से सभी उसके लिए दुखी होते थे और उसके खेती बारी को बारी-बारी से मदद करके फसल उगाने में सहायता करते थे। किसी मजबूर आदमी की मजबूरी को समाज कभी भी न तो मजबूर आदमी की व्‍यक्तिगत मजबूरी समझता था न ही कभी उनकी मजबूरी का लाभ उठाने के लिए कोई नीचता के स्‍तर पर उतरता था। झारखण्‍ड के गॉंवों में गॉंव हमेशा स्‍वनिर्भर होते थे और बहुत कम चीजों के लिए वे गॉंव के बाहर निर्भर रहते थे। गॉंव बृहद रूप में एक परिवार ही होता था।

किन्‍तु आज गॉंव और समाज की बात छोड दीजिए आज तो परिवार में ही एकता की भावना नहीं होती है। व्‍यक्ति केि‍न्‍द्रत स्‍वार्थ आधारित व्‍यक्तिवाद ने आज पूरे आदिवासी समाज को अपने आगोश में ले लिया है। आज हर चीज के लिए आदिवासी समाज दूसरे समाज पर निर्भर है। क्‍योंकि साम्‍यवाद की भावना दिलों से खत्‍म होती जा रही है।  विकासवाद ने आदिवासी स्‍वनिर्भरता को खत्‍म कर दिया है और हम आज आदिवासीयत से दूर होते जा रहे हैं। आज समाज में लाखों चमरा उरॉंव हैं जिन्‍हें पढा-लिखा तबका जरा सी मदद पहॅुचा के उनके साधारण जीवन में सुख की दो घडी दे सकता है। लेकिन चमरा उरॉंवों को उनके आस पडोस में रहने वाले आदिवासी शिक्षित मदद पहुँचाने में तत्‍पर नहीं होते हैं और तमाम नियमों और कानूनों के बावजूद उन्‍हें सहज रूप से प्राप्‍त होने वाली सहायता नहीं पहॅुच पाती है।

शिक्षा से समाज में सुबह के उजाले की किरण की जगह दोपहरी की ऐसी किरणे मिल रही है जिनकी तपीश हमें जला रही है।रोज सुबह निकलने वाला सूरज हमेशा पुराना वाला सूरज नहीं होता है वह अपने साथ नयी रोशनी लेकर आता है। नयी सुबह की नई रोशनी से आदिवासी गॉंव भी अछूते नहीं रहे और गॉवों से ग्रामीण शहरों और कस्‍बों में जाने लगे और वहॉं से वापसी में वे अपने साथ कुछ रूपये पैसे और नये कपडे ही नहीं बल्कि नयी सोच, नयी विचारधारा, परंपरा और आचार-व्‍यवहार भी लाने लगे। सामूहिक जीवन पद्वति में जीवन जीने वाले आदिवासी कस्‍बों, शहरों और नगरों में जाकर व्‍यक्ति-केि‍न्‍द्रत, स्‍वकल्‍याण के विचारों से वाकिफ होने लगे,  उसे अपनाने लगे और इसे वे अपने गॉंवों में भी परांपरा की तरह सींचने लगे।


व्‍यक्ति-केि‍न्‍द्रत विचारधारा ने समाज को बुरी तरह से झकझोर दिया है। आज सामुहिकता की भावना की जगह व्‍यक्तिगत स्‍वार्थ की भावना ने ले लिया है। कभी छोटे-मोटे झगडे से लेकर बडी-बडी लडाईयों को गॉंव के पंचायत अथवा पडहा पंचायत आदि में सुलझाया जाता था, लेकिन आज मामूली कहासुनी भी पुलिस और कचहरी तक पहॅुचती है। शहरों में जा कर बस जाने वाले गॉंव वालों को भूलते जा रहे है। वहीं गॉंव वाले भी शहरों में बस जाने वालों के साथ न सिर्फ शहरी के रूप में ही व्‍यवहार करते हैं, बल्कि उन्‍हें खेती-बारी के हक से भी जुदा समझते हैं। पैसे आधारित सोच ने तमाम सामाजिक विचारों को स्‍वार्थ आधारित विचारों में बदल दिया है। आज कोई चमरा उरॉंव बुढापे में कष्‍ट का जीवन जीता है तो समाज में कहीं कोई हलचल नहीं मचता है। कोई पडोसी सामने आकर उन्‍हें न तो दिलासा दिलाता है न ही उन्‍हें अपनी सामर्थ्‍यता के अनुसार कोई मदद पहुँचाता है। जो पढे-लिखे हैं वे अपनी ही दुनिया में खोए हुए अपने जीवन स्‍तर  को और उँचा उठाने में व्‍यस्‍त हैं।

समाज को नेतृत्‍व देने का दावा करने वाले अपनी रूतबा को बढाने और अपने लक्ष्‍य को पाने में ही लगे हुए हैं।आदिवासी समाज भारत के अन्‍य सम-सामयिक समाजों में सिर्फ आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछडी हुआ है। सामाजिक रूप से आदिवासी समाज अभी भी अनेक समाजों से आगे और समृद्व है। अभी भी आदिवासी समाज में समाज की कीमत पर अपनी झोली भरने, अपने धनबल पर अन्‍याय और अनैतिक कार्य करने वालों को मान्‍यता नहीं मिलता है। न ही अन्‍य भारतीय समाजों में व्‍याप्‍त कुरीतियों को अपने समाज में स्‍थान देता है।

नारी जाति को आदिवासी समान में जितना सम्‍मान और अधिकार मिलता है उतना और कहीं भी नहीं। शादी में दहेज मांगने का साहस करने वाले उँगली में गिने जा सकते हैं। खेती की भूमि सामूहिक और सामाजिक मानी जाती है। जाति और धर्म के रूप में किसी भी व्‍यक्ति के साथ सामाजिक रूप से कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। एक ही घर में एक भाई सरना और एक भाई ईसाई हो सकते हैं। वर्ग भेद न के बराबर है। चाहे कोई धार्मिक हो चाहे कोई अधार्मिक समाज इसकी कोई परवाह नहीं करता है। धार्मिक कटटरता  थोपने की तमाम कोशिशें बेकार हुई है। समाज को धार्मिक रूप से बॉंटने की कोशिशे भी सफल नहीं हुई है।

कुछ लोग आदिवासियों को दलितों से भी पिछडे और नीच साबित करने की बहुतेरे कोशिशें की लेकिन आदिवासी उच्‍च सामाजिक मूल्‍यों के कारण वे इस मामले में फिसडडी साबित हुए हैं। आदिवासी, समता स्‍वतंत्र और समरसता में प्राकृतिक रूप से विश्‍वास करता है। न तो किसी समाज को अपने से छोटा समझता है न ही किसी समाज को अपने से बडा। वर्तमान समय में जिन मूल्‍यों और विचारों को कानून और संविधान के द्वारा लोगों में प्रचारित किया जा रहा है वे तमाम बातें आदिवासी समाज में युगों से स्‍थापित हैं। चाहे वह पर्यावरण की बातें हो, प्रदुषण फैलाने की बाते हो या वह आदमी को अनचाहे आचार-व्‍यवहार और परांपराओं से बचाने की बातें हो। आदिवासी समाज हमेशा सर्वकल्‍याणकारी और सर्वजनहिताय बातों को ही अपने समाज में स्‍थान और मान्‍यता दिया है।

आदिवासी गॉंव जितने साफ-सुथरे और स्‍वच्‍छ होते हैं वैसे गॉंव भारत के और कौन से हिस्‍से में मिलते हैं इस बात की जानकारी पूरे भारत की यात्रा करने के बाद भी मुझे नहीं हुई। मेरे यह कहने से लोगों को आश्‍चर्य होता है कि आदिवासी परिवार तथाकथित ब्राहमण और  तथाकथित दलित को एक ही नजर से न सिर्फ देखता है, बल्कि समान रूप से व्‍यवहार भी करता है। सामाजिक रूप से न तो वह किसी व्‍यक्ति को जन्‍म के आधार पर छोटा समझता है न ही बडा।

भारतीय संविधान को लागू हुए साठ साल हो गए। तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद लोगों की जातिवादी विचारों और परंपराओं में कोई परिवर्तन नहीं आया है। लेकिन आदिवासी समाज इन्‍सान के बराबर होने की बातों को युगों से मान्‍यता देता आ रहा है।इन तमाम अच्‍छाईयों के बावजूद आदिवासी समाज आज टूट रहा है। टूटन की गति समय बीतने साथ तीब्रतर होते जा रही है। हम दूसरे समाज की अच्‍छाईयों को तो नहीं अपना रहे हैं, लेकिन बुराईयों को जरूर अपना रहे हैं। आदिवासी समाज की सामाजिक मूल्‍यों पर हम कोई बहस नहीं करते हैं। हमारी सामाजिक धरोहर, मूल्‍यों, विचारधारा, अच्‍छी सामाजिक परंपराओं, स्‍वतांत्रिक विचारों, समता के मूल्‍यों, भाईचारा, सामाजिक और धार्मिक खुलेपन को बचाए रखने के कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं।

​           हम दूसरे समाज की घार्मिक और साम्‍प्रादयिक भावनों को अपना कर अपने ही समाज में विभेद पैदा कर रहे हैं। य‍द्यपि इस तरह की बुराईयॉ अभी गहरी रूप में अपनी पैठ नहीं बना पाई है। लेकिन यदि हम सजग नहीं हुए तो दूसरे समाज में फैली व्‍यक्तिवादी परंपरा और विचारधारा आदिवासी समाज को खत्‍म कर देगी। समाज में दुख झेल रहे चमरा उरॉंवों ने हमें सोचने, विचार करने का एक मौका दिया है। यदि हम सामाजिक चेतना जगा कर विचार करेंगे तो हम अपने समाज को बचा सकते हैं। अपनी मूल्‍यों को बचा कर समाज में एकता और एक्‍य की भावना को बचा कर रख सकते हैं।​ This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 18, 2016. All rights reserved.

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