व्यापार कैसे किया जाए ?

                                                                                                                                                                                         नेह अर्जुन इंदवार 

आदिवासी समाज में व्यापार या व्यवसाय न के बराबर किया जाता है । जहाँ आदिवासियों की 10 हजार आबादी है वहाँ भी आदिवासी व्यापार करते हुए नहीं पाए जाते हैं और ऐसी आबादी वाली बस्ती में भी गैर आदिवासी ही दुकान चलाते हुए व्यापार करते पाए जाते हैं । सवाल उठता है, कि क्यों आदिवासी अपने ही गाँव-घरों के आसपास भी व्यापार नहीं करता है ? क्या उनमें व्यापार करने की योग्यता नहीं होती है ? क्या उनमें व्यापार करने के लिए आत्मविश्वास नहीं होता है, या पूँजी नहीं होती है ? क्या आदिवासी को व्यापार का फंडा मालूम नहीं होता या वह व्यापार को फालतू का काम समझता है ?

सवाल है कि व्यापार क्या है? दुकानदारी क्या है और इसे चलाने का फंडा क्या है ? कई लोग व्यापार के फंडे को नहीं समझते हैं और कई लोग इसलिए व्यापार नहीं करते कि वे इसे चलाने के लिए आवश्यक समझदारी नहीं रखते । कई लोग इसलिए भी व्यापार नहीं करते क्योंकि वे व्यापार के दम पर आगे बढ़ने के लिए आवश्यक आत्मविश्वास नहीं रखते और अपने सीमित अनुभव के आधार पर व्यापार के बारे एक निश्चित पैमाने पर अपनी सोच को बाँध कर रख लेते हैं । मसलन, इस जगह पर व्यापार या दुकानदारी नहीं चलेगा, दुकानदारी के लिए किसी खास जगह या बाजार के बीच दुकान होनी चाहिए, किसी खास इलाके में खास चीज ही बिकती है ।

यदि किसी जगह पर किसी एक का दुकान बहुत चल रहा है तो उन्हें लगता है उस दुकान पर बिकने वाली चीजों के अलावा दूसरी चीजें वहाँ नहीं बिकेगी। कई लोगों को लगता है कि आदिवासी बहुत हिसंगा वाले होते हैं, वे उनके दुकान से माल लेने के बदले मोदी के दुकान से माल ले लेंगे । सामाजिक ढर्रे के बाहर कुछ नया करने वाले आदिवासियों से समाज के लोग सही ढंग से व्यवहार नहीं करते हैं । पास -पड़ोसी या लोगों में मन में अपने समाज के किसी नये व्यवसायी या उद्यमी के लिए प्रशंसा के भाव के बदले हिसंगा का भाव ज्यादा पैदा होता है । तरह-तरह के पूर्वाग्रह, बेतुके, असंगत, तर्कहीन और गैर संभावना वाले विचार आते हैं । यह कुछ सीमा तक सही हो सकता है, लेकिन पूरी तरह ऐसी ही स्थिति होगी यह तो कोई कह नहीं सकता है । कई लोग व्यापार को किस्मत की बात कहते हैं, तो कई लोग किसी भी तरह की नौकरी को व्यापार से अधिक अच्छा मानते हैं । कहते हैं हाथों की लकीर से हाथों की मेहनत वजनदार होती है । कई लोगों को लगता है कि बिना पढे़-लिखे व्यापार या दुकानदारी नहीं की जा सकती है ।

आइए, दुकानदारी और व्यापार के कुछेक फंडों के बारे बातें करते हैं —

दुकानदारी या व्यवसाय करने के लिए मूल रूप में तीन चीजों की जरूरत होती है। पहला है, आदमी की इच्छाशक्ति और इसके प्रति झुकाव । दूसरा, पूँजी की उपलब्धता और तीसरा, दक्षता अर्थात दुकानदारी, व्यवसाय के लिए आवश्यक व्यावहारिक ज्ञान । कई कहते हैं, उनके पास इसके लिए व्यावहारिक ज्ञान नहीं है । कई कहते हैं, उनके पास पूँजी नहीं हैं । कहते हैं, पूँजी बिना व्यवसाय करने के बारे सोच भी नहीं सकते हैं । मूल रूप से तीन चीजें इच्छा या व्यापार के प्रति झुकाव, दक्षता और पूँजी अर्थात् Attitude, skills and capital चाहिए। 

इन तीन में से महत्वपूर्ण है इच्छाशक्ति । सर्वप्रथम तो दुकानदारी के लिए व्यक्ति के पास इच्छा होनी चाहिए । बिना इच्छा के आदमी व्यापार तो क्या जिन्दगी में कुछ भी नहीं कर सकता । इच्छा हो, तो हुनर अपने आप आ जाता है । जब एक बार हुनर आप के पास आ जाता है और इच्छा भी अपनी जगह कायम रहती है, तो पूँजी Capital बहुत बड़ी चीज नहीं रह जाती है । लाखों व्यापारी हैं जो अपनी तीव्र इच्छाशक्ति, रवैया, मेहनत के बल पर बिना हुनर और पूँजी के कामयाब व्यापारी बने हैं ।

रिलांयस इंडस्ट्री के संस्थापक स्वर्गीय धीरूभाई अंबानी एक स्कूल टीचर का बेटा था, उसके पास पूँजी के नाम पर सिर्फ एक साइकिल हुआ करता था। लेकिन अपनी तीव्र इच्छाशक्ति, मेहनत के बल पर सिर्फ 25 वर्षों में ही भारत का सबसे कामयाब और सबसे धनी उद्योगपति बन दिखा दिया, कि दुनिया में सफलता के लिए कमर कस कर आगे बढ़ने वालों को दुनिया किसी भी तरह रोक नहीं पाती है । इच्छाशक्ति के सामने हर चीज बौनी हो जाती है। व्यक्ति की तीव्र इच्छाशक्ति के बल पर अन्य चीजें खुद चल कर उनके पास आती है। दूसरे शब्दों में इच्छाशक्ति एक अदृश्य चुंबक है, जो अन्य चीजों को अपने पास खींच लाती है।

कई लोगों को लगता है कि व्यापार करने, दुकानदारी करने के लिए शिक्षा की बहुत जरूरत है, यह बात कुछ हद तक सही हो सकती है, लेकिन हर मामले में यह सही हो, यह जरूरी नहीं । आप अपने आसपास देखिए, आपके पड़ोस का कामयाब दुकानदार कितना पढ़ा लिखा है ? आप किसी भी बाजार या हाट में जाइए और व्यवसायियों से पुछिए कि वे कितने पढ़े-लिखे हैं ? भारत की आजादी के समय भारत के दो भागों में बंटने के कारण लाखों लोग सिर्फ अपने पहने हुए कपड़ों में रिफ्यूजी बनने के लिए मजबूर हुए, लेकिन वे नयी जगह में जाकर व्यवसाय और दुकानदारी के बल पर आज कहाँ से कहाँ पहुँच गए हैं । उन्हें भी लगता रहा होगा कि उनके पास न तो दुकानदारी का हुनर है, न ही पूँजी और न ही अनुभव । लेकिन समय आदमी को हुनर भी सीखा देता है और अनुभव, जिंदगी तथा व्यवसाय को नये अंदाज में देखने के लिए नयी दृष्टि देता है ।

नये लोगों को लाखों-करोड़ों की पूँजी भी नहीं चाहिए होती है, क्योंकि वे इतने भारी भरकम जिम्मेदारी को उठा नहीं सकते हैं । उन्हें तो छोटा सा एक दुकान ही धीरे-धीरे सभी चीजों को सिखाता है और अनुभवी बनाता है । एक छोटा दुकान ही एक बड़ा स्कूल और विश्वविद्यालय बन जाता है । दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति रहे बिल गेट्स मैट्रिक तक भी पढ़े-लिखे नहीं थे, उसके पास इतना पैसा भी नहीं था कि वे कोई बड़ा व्यवसाय शुरू करते, उसने अपने ही घर में एक छोटा-सा व्यवसाय शुरू किया और फिर समय के साथ अपनी मेहनत के बल पर उसे बड़ा बनाने में लगे रहे । शुरूआत में उसके साथ काम करने वाली एक सेकेट्री कहती हैं –

“मैं जब उनके यहाँ काम करने के लिए गयी तो मुझे अपने निर्णय पर पछतावा हुआ, कि मैं एक बहुत साधारण से व्यक्ति, जिनके पास न तो पूँजी थी, न ही अनुभव, के पास काम करने के लिए आई हूँ, मैं कई दिन काम करने के बाद वहाँ काम छोड़ने ही वाली थी।”

लेकिन बिल गेट्स के पास व्यवसाय के लिए बहुत तेज इच्छाशक्ति थी, वह जी-तोड़ मेहनत करने में विश्वास करता था और नये अवसर की तलाश में अपने काम को लगातार करता रहा और सिर्फ कुछ ही सालों में वह दुनिया का सबसे धनी और सफल व्यक्ति बन बैठा ।

आदिवासी इलाकों में अपने ही लोगों के बीच व्यवसाय करने, महज एक छोटे-से दुकान से ही शुरूआत की जा सकती है। दुकानदारी या व्यवसाय ऐसा काम नहीं होता है जहाँ कुछ दिन काम किया और फिर दूसरे काम की खोज में निकल पड़े । एक दुकान, जो सिर्फ चार-पाँच सामानों से शुरू होता है, और थोड़े ही समय में उस दुकान में सैकड़ों सामान आ जाता है । थोक सामानों के बिक्रेता अपनी गाड़ियों के माध्यम से छोटे-छोटे दुकानों में बाकी अर्थात् उधारी में सामान देते हैं और उसके बिक्री होने के बाद पैसे मांगते हैं, या बिक्री नहीं होने पर अपने सामान को वापस लेकर जाते हैं और दूसरे सामान बिक्री के लिए देते हैं ।

दुकानदार हर सामान से मुनाफा कमाता है, किसी में कम तो किसी में ज्यादा । लेकिन दुकानदार अपना मालिक खुद होता है, उसे किसी दूसरे के पास काम मांगने के लिए नहीं जाना होता है, न ही वह किसी के अधीन में काम करता है । यदि वह मेहनती होगा तो दिन दुनी रात चैगुनी कमाई कर सकता है । बस उसे अपने व्यापार को लोगों की आवश्यकता अनुसार बनाना होगा और उसके अनुरूप अपने व्यवहार को ढालना होगा । एक मिलनसार, हँसमुख और मीठी बात बोलने वाले दुकानदार से सामान लेना लोगों को अच्छा लगता है । दुकानदार को थोड़े ही दिनों में पता चल जाता है कि कौन सा सामान अच्छा है और कौन सा खराब । कौन सा सामान अधिक बिकता है और कौन सा सामान यूँ ही पड़ा रहता है। लोगों को किस तरह के सामानों की जरूरत अधिक होती है और किन सामानों के लिए वे अधिक पैसा चुकाने के लिए भी तैयार रहते हैं।

छोटे-मोटे पूँजी से शुरू करने वाले व्यवसाय के लिए तो आसपास ही बड़े थोक व्यापारी से माल मिल जाता है । बहुत ऐसे व्यापारी होते हैं जो एक साथ खुदरा व्यवसाय के साथ अधिक मात्रा में सामान लेने वालों को दस से लेकर तीस-पैंतीस प्रतिशत छूट देकर सामान बेच कर थोक व्यापारी के रूप में भी व्यवसाय करते हैं । कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, बंगलौर, अहमदाबाद, सूरत, दिल्ली, लुधियाना, सिलीगुड़ी, गुवाहाटी आदि कई बड़े शहर हैं जहाँ कई बाजारों में सिर्फ थोक के भाव में सामानों की बिक्री की जाती है । कोलकाता में बड़ा बाजार एक ऐसा ही बाजार है जहाँ थोक के भाव में सामान खरीद कर पूरे उत्तर पूर्व भारत के व्यवसायी अपना व्यवसाय करते हैं। इन बाजारों में हर सामान थोक के भाव में मिलते हैं। जो साड़ी, बाजार में चार सौ रूपये में बिकता है, वह यहाँ थोक के भाव में सिर्फ 150 से लेकर 200 रूपये में ही मिल जाता है । व्यापार के इच्छुक आदिवासी युवकों को इन बाजारों में आकर देखना चाहिए और नये आइडिया तथा अनुभव लेनी चाहिए । पूरे आदिवासी इलाकों में ही उपरोक्त शहरों से ही सारा सामान आता है और यदि दूसरे लोग व्यवसाय कर सकते हैं, तो एक आदिवासी क्यों नहीं कर सकता ?

नयी दुकानदारी, व्यवसाय या अन्य कोई व्यापार शुरू करने वाले के पास पूँजी की आवश्यकता होती है, लेकिन यह आवश्यकता इच्छाशक्ति के मुकाबले कम महत्व की होती है । इच्छाशक्ति रहने पर महज दो-चार सौ रूपये से भी व्यवसाय शुरू की जा सकती है। यह पूँजी व्यापार की शिक्षा देती है और इसी के बल आगे बढ़ना है, यह भी याद दिलाते रहती है । व्यापार में पूँजी बहुत तेजी से बढ़ती है । व्यापार में अधिक पूँजी की आवश्यकता पर व्यापारी या व्यवसायी को बैंक ऋण देने के लिए हमेशा तैयार रहता है। आदिवासी व्यवसायी आदिवासी विकास कार्यक्रम के अन्तर्गत प्राप्त होने वाले ऋण के लिए भी कोशिश कर सकता है । इसमें सब्सिडी भी मिलता है, अर्थात् या तो आपको ऋण पर ब्याज कम देना होगा, अथवा ऋण के बीस से तीस प्रतिशत भाग को वापस करने की जरूरत भी नहीं होगी । लेकिन एक सच्चा व्यवसायी मुफ्त में मिलने वाले ऋण की बाट नहीं जोहता है ।

दुकानदार या व्यवसायी को स्थानीय सरकारी महकमे से लाईसेंस भी लेनी होती है । कई व्यापार करने के लिए लाईसेंस की जरूरत नहीं होती है । लेकिन लाईसेंस रहने पर बैंक से ऋण लेने में सुविधा होती है। बैंक में बचत खाता की जगह करेंट एकाउण्ट खोला जा सकता है, जिसमें आवश्यकता होने पर आॅवरड्राफ्ट की भी सुविधा मिलती है, अर्थात् आपके बैंक में आवश्यक फंड नहीं रहने पर बैंक आपको कुछ दिनों के लिए आपके अपने फंड से अधिक पैसे निकालने की सुविधा दे सकता है।

एक व्यवसाय या व्यापार में व्यक्ति को हमेशा अपने हित में कार्य करना होता है। वह अपने व्यापार का मालिक खुद होता है इसलिए उसे चैबीसों घंटे अपने दिमाग को उसी दिशा में रखना होता है, इससे व्यापारी अनावश्यक और फालतू आदतें, जैसे बिना मतलब के वक्त को बर्बाद करना या संगी- साथी के साथ घूमने-फिरने से बच सकता है। हँडिया-दारू पीने की आदत से भी छुटकारा पाया जा सकता है । एक व्यापारी के पास हमेशा पैसा होता है, वह उन पैसों से उन सामानों को सहज ही खरीद सकता है, जिसे कोई कम दाम में बेचना चाहता है । पैसा हमेशा पास में रहने से व्यक्ति को कई फायदा होता है, वह पैसे से पैसा पैदा करने के लिए अधिक मेहनत कर सकता है । इससे मानसिक क्लेश भी कम होता है, क्लेश कम होने से मन की शाँति भी रहती है । सबसे बड़ी बात होती है, वह अपनी मर्जी का मालिक खुद होता है और किसी के अंडर में काम करना नहीं होता है । एक बार व्यवसाय जम जाने पर वह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है और पूरे घर वाले इससे लाभांवित होते हैं। जबकि नौकरी में सिर्फ एक आदमी को नौकरी मिलती है और उसे एक दिन रिटायर भी होना पड़ता है, फिर उस नौकरी पर घर वालों का कोई हक भी नहीं होता है । लेकिन व्यापार में पूरे घर वालों का इस पर हक होता है और दूसरी तीसरी पीढ़ी को भी उसी व्यवसाय या व्यापार से आय आता रहता है ।

इस लेख को पढ़कर यदि आप अपने पैरों पर खड़ा होना चाहते हैं, तो आज ही इस विषय पर सोचना शुरू कीजिए। आदिवासी समाज में एक बिजनेसमैन बन कर आपकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ जाएगी और आपके स्वालंबन से समाज स्वयं स्वालंबित होगा ।   This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec, 2014. All rights reserved

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