कौन है चाय मजदूरों के दोस्त और दुश्मन ?

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नेह इंदवार

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पिछले हप्ते डुवार्स तराई के चाय बागानों के वेतन पर्ची शेयर करने का अनुरोध करके Rahul KumarAjith BodraSuraj MundaSilvanus Biswa, Pritam Kisku और कई दोस्तों आदि द्वारा कई पोस्ट लिखे गए थे। तीन दिनों में कुल चार चाय बागानों के वेतन पर्ची सामने आई थीं। 283 चाय बागानों में से सिर्फ 4 चाय बागानों के वेतन पर्ची सामने आई और कहीं से इस बारे कोई ठोस तार्किक और तथ्यपरक कामेंट तक नहीं आया।
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इन बातों से इतना तो पता चल गया कि चाय बागानों में रहने वाले फेसबुक से जुड़े लोगों में चाय बागानों की समस्याओं पर कितनी पैनी नज़र है और कितनी जागरूकता आई है ? मैंने जानबूझ कर उन वेतन पर्चियों पर कोई कमेंट नहीं किया और सिर्फ इतना लिखा कि कानूनन वेतन पर्ची कैसा होना चाहिए और वेतन पर्ची का क्या महत्व है। मैं इंतजार करता रहा कि शायद उन विवरणों को पढ़कर तथा शेयर किए गए पर्चियों को पढ़कर, उस पर चिंतन मनन करके, उनकी खामियों पर कोई जागरूक नागरिक कानूनी दृष्टिपरक अपना विश्लेषणात्मक कमेंट दें। लेकिन एक सप्ताह हो गया किसी भी जागरूक युवा, मजदूर संघ या किसी राजनैतिक, सामाजिक कार्यकर्ता का कोई कमेंट नहीं आया। शेयर किए गए वेतन पर्ची शोषण, ठगी, चालाकी की अनेक गाथाओं को अपने में सिमटाए फेसबुक पर पड़ा रहा। लेकिन किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। सवाल है कि क्या ये नेतागण जमीनी स्तर पर इन विषयों पर जागरूक हैं और मजदूरों के हित रक्षा के लिए बागान स्तर पर क्रियाशील भी हैं ?
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डुवार्स तराई में अनेक क्रियाशील, राजनैतिक पार्टियों, मजदूर संघों के मान्यता प्राप्त नेतागण हैं। वे ट्रेड यूनियन एक्ट 1926 के तहत मजदूरों के पक्ष में आवाज़ उठाने के लिए मान्यता भी हासिल किए हैं और वे मजदूरों से इस बाबत चंदे भी लेते हैं। मान्यता प्राप्त करके वे श्रम मंत्रालय के कार्यालयों में जाते हैं। वे मजदूर संघ के लेटरहेड पर पत्र भी लिखते हैं। क्या वे मजदूरों के साथ किए जा रहे अन्याय, ठगी, चालाकी को हर स्तर पर प्रतिकार करने के लिए काम कर रहे हैं ? यदि वे इन विषयों पर जागरूक हैं और ठगी चालाकी को जानते बुझते हैं और अच्छी तरह समझते हैं तो सवाल यह है कि उन्होंने अब तक इन विषयों पर कोई ठोस कार्रवाई क्यों नहीं किया ?
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डुवार्स तराई के हजारों लोग सरकारी दफ्तरों में काम करते हैं। सैकड़ों लोग चाय मजदूरों के हितैषी होने के दावा करते हैं। सैकड़ों लोगों ने मैनेजमेंट की पढ़ाई की है। सवाल उठता है कि क्या उन्हे वेतन-पर्ची, उसके कानूनी महत्व के बारे कुछ नहीं मालूम है ? अलग राज्य के समर्थन और विरोध में काम करने वाले बताएँ कि उनके समर्थन और विरोध में चाय मजदूरों के साथ होने वाले अन्याय, ठगी, चालाकी पर ठोस स्तर पर कार्य करने के लिए उन्होंने अब तक क्या-्क्या कदम उठाए हैं या शोषण की कहानी को खत्म करने के लिए क्या-क्या नीतिगत, विचारों के स्तर पर कार्यक्रम प्रस्तुत किया है ? डुवार्स तराई में अलग राज्य के समर्थन और विरोध करने वालों के केन्द्रीय सोच में चाय मजदूरों के हित कहाँ तक समाया हुआ है ?
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डुवार्स तराई के चाय बागानों के खून चुसने की क्रिया को कौन नहीं जानता है? कौन पार्टी, मजदूर संघ या राजनैतिक-सामाजिक संस्था को मालूम नहीं है ? मैंने लोकसभा चुनाव के दौरान चाय बागानों की समस्याओं को वोट और चुनाव की राजनीति के केन्द्र बिन्दु में लाने के लिए एक दर्जन से अधिक लेख लगातार रोज लिखा। लेकिन चाय बागानों में वोट के लिए गिड़गिड़ाने वाली किसी भी पार्टी ने अपनी चुनावी घोषणा-पत्र या चुनावी चहल-पहल, स्थानीय राजनीति कार्यकलापों में चाय बागानों की समस्या को कोई तवज्जो नहीं दिया। चाय मजदूरों को शिक्षित बच्चे दिल्ली और कोलकाता के नेताओं के हित और कल्याण के लिए अपना खून पसीने बहा रहे थे और चाय बागानों के मुद्दों को कचरे की पेटी में फेंक रहे थे। वे जिस अंदाज और ऊर्जा व्यय करके अपने माँ-बाप के शोषणकर्ताओं के लिए काम कर रहे थे। वह बता रहा था कि उन्हें कितनी शिक्षा मिली है ?
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चाय बागानों की समस्यों पर पिछले 15 सालों से मैं लगातार लिख रहा हूँ। लेकिन मुझे कभी नहीं लगा कि कोई राजनैतिक दल चाय बागान मजदूरों के साथ न्याय करना चाहती है या कोई नेता उन्हें शिक्षा-दीक्षा, रोजगार प्रशिक्षण, पर्याप्त आय देकर उनके सामाजिक आर्थिक स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहता है। बाहरी लोगों को तो अपने स्वार्थों की पड़ी हुई है लेकिन चाय मजदूरों के बच्चे भी अपने समाज के हित में राजनीति को हथियार के रूप में प्रयोग करने में फिस्सडी साबित हो रहे हैं। इसका दूरगामी दुष्परिणाम होना अवश्यंभावी हैं।
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मुख्य सवाल है कि कौन यहाँ चाय मजदूरों के दोस्त है और कौन दुश्मन ? कौन चाय मजदूरों के हित के लिए काम कर रहा है और कौन उनकी खून चूसने के लिए बनी शोषण चक्र को स्थायित्व प्रदान करने के लिए चाय अंचल के समाज को हथियार बनाने में सहयोग कर रहा है ? चाय मजदूरों के वेतन बहुत अल्प है और इस अल्प राशि को भी सरे-आम हड़पने के षड़यंत्र रचे जाते हैं और पूरा शिक्षित वर्ग मांस का लोथड़ा बन कर चुपचाप पड़ा रहता है तो मेरे जैसे एक आम इंसान को दुख और गुस्सा आना लाजमी है। दोस्तों मुझे पूरे परिस्थिति को देख कर दुख और गुस्सा ही आ रहा है। क्या आप अपने सामने अनपढ़ों, मजबूरों के साथ निरंतर योजनाबद्ध ढंग से हो रहे शोषण, ठगी और अन्याय को देख कर भी चुप रह सकते हैं ?

डुवार्स तराई के मजदूरों के बच्चे नहीं जानते हैं कि उनके माँ-बाप को न्याय पूर्ण वेतन देने में कौन रूकावट पैदा करते हैं ??
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उन्हें न राजनीति की समझ है और न वे भावनाओं से बाहर निकल कर दिमाग से काम लेते हैं।
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उनकी गलतियों का ठीकरा समाज पर फूटता है।
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शोषक और राजनीति के खिलाड़ियों की किस्मत यूँ ही आसमान में नहीं चमकता है। उन्हें मजदूरों के शिक्षित बच्चे मिलकर चमकाते हैं।