क्या सरकार घोषणा करेगी 30 जुलाई को न्यूनतम वेतन ?

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नेह अर्जुन इंदवार

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पश्चिम बंगाल सरकार ने 30 जूलाई तक चाय मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन घोषणा करने का वादा किया है।
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लेकिन क्या सरकार यह वादा पूरी करेगी ? यदि करेगी तो मजदूरों को कितना न्यूनतम वेतन मिलेगा ? क्या मजदूरों को आवास के लिए लीज का अधिकार भी मिलेगा ?
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सबसे महत्वपूर्ण बात है, न्यूनतम वेतन मिलेगा तो वह कब से लागू होगा ? क्या वह पिछली तारीख अर्थात 2014 की जनवरी से मिलेगा ? क्योंकि 2014 से लागू होने वाले वेतन समझौते के समय से ही मजदूर न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत मजदूरी मांग रहे थे और तब उनके द्वारा तीन वर्षीय मजदूरी वेतन निर्धारण शर्तों को अपनी ओर से तोड़ कर, न्यूनतम मजदूरी के लिए आंदोलन किया गया, बागानों में हड़ताल किया गया और इसके समर्थन में सार्वजनिक बंद भी बुलाया गया था। तब मजदूरों ने किसी भी तरह से तत्कालीन समय में लागू तीन वर्षीय वेतन समझौते को मानने से इंकार कर दिया था।
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तब सरकार ने मजदूरों से न्यूनतम वेतन निर्धारण के लिए एक समिति बना दी थी। उस समिति के निर्णय को जनवरी 2014 से लागू किया जाना था। उल्लेखनीय है कि 2011 में हुए वेतन समझौता को 2011 के जनवरी महीने से लागू किया गया था। उस तीन वर्षीय समझौते की मियाद 31 दिसंबर 2013 को समाप्त हो गया था। नया वेतन समझौता अर्थात् नये फार्मेट में न्यूनतम वेतन को 1 जनवरी 2014 से लागू किया जाना था। तब सरकार ने कहा था कि जब तक न्यूनतम वेतन का निर्धारण नहीं हो जाता है, तब तक मजदूरों को “अंतरवर्तीकालीन मजदूरी” दी जाएगी। मतलब अभी अर्थात् दिनांक 1 जनवरी 2014 से जो मजदूरी दी जा रही है, वह अंतरवर्तीकालीन मजदूरी है न कि स्थायी। अंतरवर्तीकालीन का मतलब होता है temporary or for time being or interval time. मतलब अभी के वेतन को स्थायी नहीं माना जाना है। इसे तो 1जनवरी 2014 से लागू होने वाले वेतन की जगह अंतरवर्तीकालीन के रूप में दिया जा रहा है।
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इसलिए न्यूनतम वेतन की गणना दिनांक 1 जनवरी 2014 से होनी चाहिए। अर्थात् 1 जनवरी 2014 को सरकार द्वारा नियमों के अधीन महंगाई की घोषणा (डीए) के साथ न्यूनतम वेतन के लिए निर्धारित मूल वेतन मजदूरों को मिलना चाहिए। जितनी मजदूरी मिल चुकी है उतना पैसे काट कर बाकी पैसों को Arrear के रूप में मजदूरों को मिलना चाहिए।
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चूँकि सरकार द्वारा गठित समिति अपना काम समय पर पूरा नहीं कर सकी थी, इसलिए तत्काल रूप से मजदूरों को न्यूनतम वेतन नहीं दिया जा सका था। अब जब सरकार इसे घोषित करने वाली है तो सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु इसके लागू किए जाने वाली तारीख ही है। यदि सरकार 2014 के जनवरी महीने से इसे लागू नहीं करती है तो यह मजदूरों के साथ धोखाधड़ी और ठगी होगी।
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इसका मतलब यह होगा कि सरकार बागान मालिकों को अरबों रूपये का आर्थिक लाभ पहुँचाने के लिए जानबूझ इसे किसी बाद की तारीख से लागू करने के लिए समिति के कामकाज को आगे ठेलते रही और बागान मालिकों को आर्थिक लाभ पहुँचाने का कुचक्र रचती रही। इसका मतलब यह भी है कि सरकार मजदूरों के अरबों रूपयों का नुकसान पहुँचाने के लिए षड़यंत्र रचती रही है।
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यदि सरकार न्यूनतम मजदूरी को 1 जनवरी 2014 से लागू नहीं करती है तो यह स्वतंत्र के बाद पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ी ठगी होगी। यह आशंका आधारहीन नहीं है। क्योंकि सरकार ने 17.50 पैसे की वृद्धि और राशन के 660 रूपये की देनदारी पर मजदूरों के साथ धोखाबाजी की है और उसे पिछली तारीख से लागू करने के बजाय बहुत बाद की तारीख से लागू किया है। इस बार सरकार को अपनी ईमानदारी दिखानी होगी। बेईमानी होने पर गेट मिटिंग का आंदोलन और बंद का अह्वान करने वाले ट्रेड यूनियन का अगला कदम क्या होगा ? यह जानना दिलचस्प होगा। क्या मजदूर गोदामों से तैयार माल को उठाने से रोकने के लिए आंदोलन करेंगे ?
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1 जनवरी 2014 को न्यूनतम वेतन की गणना किस तरह की जाएगी। आईए इसे जानने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार के श्रम विभाग द्वारा असंगठित क्षेत्र के लिए जारी नोटिफिकेशन की जाँच पड़ताल करते हैं।
1 जनवरी 2014 में सरकार ने न्यूनतम वेतन के लिए जो नोटिफिकेशन जारी किया था, उसमें निम्नलिखित चार्ट के अनुसार मजदूरी निर्धारित किया गया था।
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कृषि क्षेत्र के लिए –
Unskilled लेबर को 5347.00 (206.00) (without food), 4966.00 (191.00) (with food) )
जबकि Semi-skilled लेबर को 5882.00 (226.00) (without food), 5486.00 (211.00) with food)
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यह दर 30 जून 2014 तक के लिए मान्य था।
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छह महीने के बाद 1 जुलाई 2014 से लागू होने वाले नोटिफिकेशन के अनुसार निम्नांकित दर से न्यूनतम वेतन लागू किया किया।
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Unskilled लेबर को 5762.00.00 (222.00) (without food); 4966.00 (206.00) (with food) per day
Semi-skilled लेबर को 6339.00 (244.00) (without food); 5486.00 (228.00) (with food) per day
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उपरोक्त टेबल पर के राशि में छह महीने में हुई बदलाव को देखें।
कृषि क्षेत्र में Unskilled को छह महीने पहले 5347.00 (206.00) (without food); और Semi-skilled को 5882.00 (226.00) (without food) मिलता था।
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छह महीने में के बाद उन्हें क्रमशः 5762.00.00 (222.00) (without food); और 6339.00 (244.00) (without food) मिलने लगा।
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छह महीने में 206 रूपये की जगह 222 रूपये और 226 रूपये की जगह 244 रूपये मिलने लगा। यह बदलाव छह महीने में अखिल भारतीय स्तर पर होने वाले महंगाई सूचकांक के अनुसार होता है। ख्याल रखें कि वर्तमान समय में चाय मजदूरों के वेतन में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं होता है।
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यदि मजदूरों को 2014 से न्यूनतम मजदूरी दी जाएगी तो इसकी गणना कमोबेश इसी आधार पर की जाएगी। इसका मतलब है कि चाय मजदूरी को बढ़ोतरी प्रत्येक छह महीने में होगी।
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यदि चाय बागानों में मिलने वाले फ्रिंज बेनेफिट और Perquisites को इसमें मिलाया जाएगा तो इसकी गणना इससे भी अधिक होगी। चाय बागान प्रबंधन प्रति महीना मजदूरों से पीएफ राशि के साथ ग्रेज्युएटी राशि की भी कटौती करता है। ग्रेज्यूएटी की राशि की कटौती कानूनन अवैध है। यदि यह मजदूरों के वेतन से ही काट कर दिया जाता है तो इसका नाम ग्रेज्यूएटी क्यों होना चाहिए ?
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इस कानून के अनुसार कुछ निश्चित मामलों के आधार पर मालिक कर्मचारी को ग्रेज्युएटी से वंचित भी कर सकता है। लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि यदि मालिक कर्मचारी के वेतन से ही ग्रेज्युएटी की कटौती की है तो वह उस राशि से कर्मचारी को कैसे वंचित कर सकता है, क्योंकि वह तो Provident Fund की तरह ही उनके खून-पसीने की कमाई है। ग्रेज्युएटी पर मालिकों द्वारा मजदूरों के वेतन से कटौती गैर कानूनी है और एक अपराध है।
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इस पर यदि मजदूर सक्षम कोर्ट पर जाएँ तो मालिकों को बहुत भारी जुर्माना अदा करने होंगे और कईयों को जेल की सलाखों में भी बंद किया जा सकता है। इस मामले पर श्रम मंत्रालय के इंस्पेक्टर और कंपनी के चार्टर्ड एकांउटेंड भी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ट्रेड यूनियन इस विषय को सरकार के समक्ष उठाएगा या इसे लेकर कोर्ट में जाएगा ? इस मामले में ट्रेड यूनियन ने क्यों अब तक मजदूरों को अंधेरे में रखा है और उसका आर्थिक शोषण में सहमति की भूमिका निभाया है।
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आज की तारीख में केरल में मजदूरों को 600 रूपये न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है। दक्षिण के राज्यों में कहीं भी तमाम सुविधाओं के साथ 300 रूपये से कम की मजदूरी नहीं है। पश्चिम बंगाल में भी चाय मजदूरों को महंगाई भत्ता अर्थात डीए को छोड़ कर 270 मिलना चाहिए। महंगाई भत्ते के साथ इसे 375 से 400 रूपयों के बीच होना चाहिए।
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सरकारी क्षेत्र में न्यूनतम वेतन का निर्धारिण असंगठित क्षेत्र के लिए किया जाता है। असंगठित क्षेत्र का मतलब ऐसा मजदूरी का क्षेत्र जहाँ मजदूर संगठित नहीं होते हैं। मजदूरों का कोई यूनियन नहीं होता है और और उनके पास मोलतोल करने की शक्ति भी नहीं होती है। क्योंकि वे कहीं दो चार की संख्या में तो कहीं पाँच-दस की संख्या में अनियमित ढंग से मजदूरी करते हैं और अपनी मजदूरी अपनी ओर से तय नहीं कर पाते हैं। असंगठित होने के कारण उनके साथ नाइंसाफी और पक्षपात तथा शोषण होने की बहुत संभावना होती है। इसीलिए उनके लिए सरकार हर छह महीने में वेतन का निर्धारण नोटिफिकेशन के जरिए करती है।
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चाय बागान क्षेत्र एक संगठित क्षेत्र है और यहाँ 20 से भी अधिक श्रमिक संगठन हैं। वे न्यूनतम वेतन से भी अधिक के लिए मोलतोल करने की शक्ति रखते हैं। इसलिए न्यूनतम वेतन से उन्हें अधिक वेतन मिलना चाहिए।
बागान मालिक मजदूरों से अनेक सुविधाओं के लिए वेतन से पैसे कटौती करते हैं, लेकिन वे वेतन से राशि कटौती करके भी उन सुविधाओं को मुकम्मल ढंग से नहीं देते हैं। इसके लिए श्रम विभाग को कार्य करना चाहिए लेकिन वह मालिकों से पैसा लेकर मजदूरों के पक्ष में कोई कदम नहीं उठाते हैं और मजदूरों का भारी शोषण जारी रहता है।
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अब बहुत सारी सुविधाओं को मालिक पक्ष ने देना बंद कर दिया है। कंबल, चप्पल, लकड़ी आदि सुविधाओं पर कोई नीति नहीं है। वहीं तीन स्तरीय पंचायत सरकार के प्रावधानों को चाय बागानों में लागू किए जाने के कारण अधिकतर नागरिक सुविधाएँ मजदूरों को सरकार से मिल रही है। ऐसे में आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक कार्य आदि के पैसे चाय बागान प्रबंधन द्वारा वेतन से काटने का कोई मतलब नहीं है। इस तरह के लगातार कटौती मजदूरों से मजदूरों का आर्थिक शोषण ही जारी रहता है।
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असम सरकार ने चाय मजदूरों के पक्ष में निर्णय लेते हुए प्रत्येक बागान में दो एकड़ जमीन लेकर प्रत्येक चाय बागान में एक उच्च विद्यालय और एक प्राईमरी हेल्थ सेटर की स्थापना कर रही है। इसके साथ ही उच्च शिक्षा के लिए राज्य के प्रत्येक मेडिकल कालेज में तीन सीट चाय बागान के बच्चों के लिए आरक्षित रख रही है।
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लेकिन पश्चिम बंगाल में मजदूरों के पक्ष में सरकार द्वारा सिर्फ प्रतीकात्मक कदम ही उठाए जा रहे हैं। चाहे वह टी टुरिज्म की नीति हो चाहे, लोक संस्कृति के माध्यम से दो तीन दर्जन लोगों को रोजगार देने की घोषणा या किसी पर्व त्यौहार में अवकाश की घोषणा।
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मालबाजार में 2013 में ममता बनर्जी ने आदिवासियों के बच्चों के लिए यूपीएससी, मेडिकल, ईंजीनियरिंग आदि के लिए कोचिंग क्लास शुरू करने की घोषणा की थी। लेकिन वह अब तक जमीनी स्तर पर कहीं दिखाई नहीं दी है। न ही मजदूरों को आवास के लिए बागानों में पट्टा देने की घोषणा पूरी हुई। दो हिंदी कालेज बने लेकिन वहाँ कालेज भर्ती में आदिवासी या नेपाली बच्चों के छह प्रतिशत आरक्षण प्राप्त है। अब कुछ दिन पहले ममता ने कहा कि सरकार मजदूरों के बच्चों को रोजगारउन्मुख प्रशिक्षण देगी, लेकिन ममता ने ऐसी बातें 2013 में भी कहा था, और वे अब तक जुमला ही साबित हुई है। ये तमाम कार्य सिर्फ आंख में धूल झोंकने के बराबर ही है।
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चाय बागानों के मजदूरों और उनके साथ रहने वाले आदिवासी और नेपाली समाज का विकास आर्थिक और सामाजिक विकास की ठोस नीतियों के आधार पर होंगी न कि प्रतीकात्मक कदमों के द्वारा। ठोस नीति में श्रम के बदले कानूनन न्यायपूर्ण वेतन देना पहली बात होगी।
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अक्सर मालिक पक्ष द्वारा कहा जाता है कि मजदूरों को न्यायपूर्ण वेतन देने से चाय बागान कंपनियों पर भारी आर्थिक दबाव पडेगा और कई बागान बंद हो सकते हैं। लेकिन केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में चाय मजदूरों को प्लानटेंशन लेबर एक्ट में उल्लेखित सुविधाओं के साथ 300-500 न्यूनतम वेतन दिया जा रहा है। नागरिक सुविधाएँ देने के लिए उन राज्यों में मजदूरी से कोई कटौती भी नहीं की जाती है।
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चाय बागानों की चाय से होने वाली आय पर एक नजर देखने से हमें पता चल जाएगा कि पश्चिम बंगाल और दक्षिण राज्यों के चाय बागानों के चाय की कीमतों में कितना अंतर है।.
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टी बोर्ड के द्वारा उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 19 दिसंबर 2015 में नीलाम हुए सीटीसी चाय की कीमत निम्नांकित थी।
सिलीगुड़ी में प्रति केजी 153, गुवाहाटी में 135, वहीं उसी दिन कोचिन में 105 रूपये, कुन्नुर में 82 रूपये, कोयंबटूर 86 रूपये था।
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दिनांक 26 सितंबर 2015 को सिलीगुड़ी में प्रति केजी 158 गुवाहाटी में 146, वहीं उसी दिन कोचिन में 98 रूपये, कुन्नुर में 68 रूपये, कोयंबटूर 72 रूपये था।
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दिनांक 2 दिसंबर 2017 को सिलीगुड़ी में प्रति केजी 157, गुवाहाटी में 142, वहीं उसी दिन कोचिन में 110 रूपये, कुन्नुर में 74 रूपये, कोयंबटूर 89 रूपये था।
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यह देखा गया है कि पश्चिम बंगाल के सीटीसी चाय की कीमत असम और दक्षिण भारत के चाय से हमेशा अधिक रहा है। पश्चिम बंगाल के चाय बागानों को दक्षिण के चाय बागानों से हमेशा अधिक आय होता रहा है। लेकिन सबसे अधिक चाय की कीमत वसूल कर भी पश्चिम बंगाल में चाय मजदूरों को सबसे कम वेतन दिया जाता है। जबकि सबसे कम कीमत पाकर भी तमिलनाडु, केरल और कनार्टक में मजदूरों को 300 से 500 रूपये तक मजदूरी दी जाती है।
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(TAN TEA तमिलनाडु में चाय मजदूरों को Basic Wage के रूप में 183.50 रूपये और डीए के रूप में 117.70 रूपये कुल 301.20 पैसे मजदूरी दी जाती है। अधिक जानकारी के लिए लिंक पर क्लिक करें। http://tantea.co.in/org.html)
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पश्चिम बंगाल में मजदूरों द्वारा अधिक मजदूरी की मांग किए जाने पर बागानों को बंद करने की धमकी दी जाती है। इस तरह की अनैतिक बातें दशकों से होता रहा है। इस प्रकार का व्यवहार अब तो बंद होना चाहिए।
चाय बागानों के दूसरे अनेक समस्याओं पर भी एक मुश्त निर्णय होना चाहिए। चाय बागानों में केमिकल का छिड़काव करने वाले मजदूरों को न तो सुरक्षा दिया जाता है और न उनका मेडिकल जाँच की जाती है और न ही उन्हें अतिरिक्त वेतन और Insurance की सुविधा दी जाती है। The Insecticides Act, 1968 पर सरकार ने चाय मजदूरों के लिए क्या कदम उठाया है ? मजदूरों को इसकी जानकारी देना बहुत जरूरी है।
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चाय मजदूर और फैक्टरी में काम करने वालों की अदला-बदली की जाती है। क्या बागानों में काम करने वालों पर भी फैक्टरी एक्ट लागू है ? दोनों जगह की मजदूरी एक जैसी क्यों होनी चाहिए ?
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चाय बागानों में झोला छाप डाक्टरों की नियुक्ति से क्या सरकार मजदूरों की मौत को सुनिश्चित करना चाहती है। बागान अस्पतालों की हालत कैसी होती है यह सभी जानते हैं। ग्रुप अस्पताल की बातें हमेशा हवा-हवाई होती रहीं हैं। बाबु स्टाफ में शिक्षित युवाओं की कहीं भी निष्पक्ष भर्ती नहीं होती है।
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Company Social Responsibility के तहत कंपनी कैसे अपना पैसा गैर बागान क्षेत्र या शहरों में खर्च करती है ???? क्या बागानों के निवासियों के प्रति उनकी जिम्मेदारी सिर्फ पैसे कमाने की रह गई है। सरकार इस संबंध में क्या सोचती है, सरकार को स्पष्ट करनी चाहिए।
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मजदूरों को राशन के बाबत 660 रूपये मिलने चाहिए। आखिर इस रूपये को कम करके दैनिक 9 रूपये करने के निर्णय के पीछे क्या औचित्य है?
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30 जुलाई बहुत दूर नहीं है। इस दिन सरकार अपने वादे के अनुसार न्यूनतम मजदूरी की घोषणा करेगी तो मजदूरों को अन्य राज्यों के साथ इसकी तुलना करनी चाहिए। फ्रिंज बेनेफिट, परक्युजिट, नागरिक सुविधाओं की भी तुलना की जाए।
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मजदूरी के साथ मजदूरों के आवास पट्टा, फ्रिंज बेनेफिट आदि बहुत सारे मामले हैं जिस पर सरकार को अपना रूख स्पष्ट करनी चाहिए। यदि सरकार मजदूरों के साथ न्याय करती है तो सच में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार माँ, माटी और मनुष्य की सरकार होने का सबूत देगी।
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यदि मजदूरों को न्याय पूर्ण मजदूरी नहीं मिलेगी तो मजदूरों को न्याय पाने के लिए सड़कों पर उतरना होगा और आवश्यकता के अनुसार कोर्ट का भी रास्ता चुनना होगा। प्लान्टेशन लेबर एक्ट 1951 में 2010 में एक संशोधन किया गया था, जिसके अनुसार यदि कोई असंतुष्ट मजदूर चाहे तो अपने साथ होने वाले अन्याय के विरूद्ध कोर्ट का रास्ता चुन सकता है। पहले यह सुविधा सिर्फ ट्रेड यूनियन को प्राप्त था। अब कोई भी मजदूर शोषण, वंचना, पक्षपात के आधार पर बिना किसी ट्रेड यूनियन के सहारे ही कोर्ट में जा सकता है और अपने लिए न्याय मांग सकता है। आखिर अन्याय और शोषण सहने की भी एक सीमा होती है।