क्या है सरना धर्म

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                                                                                नेह अर्जुन इंदवार
सरना धर्म क्या है ? यह दूसरे धर्मों से किन मायनों में जुदा है ? इसका केन्द्रीय आदर्श और दर्शन क्या है ?

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अक्सर इस तरह के सवाल पूछे जाते हैं। कई सवाल सचमुच जिज्ञाषा के पुट लिए होते हैं और कई बार इसे शरारती अंदाज में भी पूछा जाता है, कि गोया तुम्हारा तो कोई धर्मग्रंथ ही नहीं है, इसे कैसे धर्म का नाम देते हो ? लब्बोलुआब यह होता है कि इसकी तुलना और कसौटी किन्हीं किताब पर आधारित धर्मों और उसकी कट्टरता के सदृष्य बिन्दुवार की जाए।

सच कहा जाए तो सरना एक धर्म से अधिक आदिवासियों के जीने की पद्धति है जिसमें लोक व्यवहार के साथ आध्यमिकता या अध्यात्म भी जुडा हुआ है। आत्म और पर-आत्मा या परम-आत्म का आवधारणा और इसका आराधना लोक जीवन से इतर न होकर लोक और सामाजिक जीवन का ही एक भाग है। धर्म यहॉं लोक जीवन से अलग और विशेष स्वरूप और स्थल में आयोजित कर्मकांडीय गतिविधियों के उलट जीवन के हर क्षेत्र में सामान्य गतिविधियों में गुंफित रहता है।

सरना अनुगामी प्राकृतिक को ज्यों के त्यों पूजन करता है। वह प्राकृतिक से अलग उसके किसी कृत्रिम स्वरूप या प्रतीक का निर्माण नहीं करता है। वह घर के चुल्हा, बैल, मुर्गी, पेड, खेत खलिहान, चॉंद और सूरज सहित सम्पूर्ण प्राकृतिक प्रतीकों का उसके प्राकृतिक रूप में ही पूजन करता है। वह पेड काटने के पूर्व पेड से क्षमा याचना करता है। गाय बैल बकरियों को जीवन सहचार्य होने के लिए धन्यवाद देता है। पूरखों को निरंतर मार्ग दर्शन और आशीर्बाद देने के लिए भोजन करने, पानी पीने के पूर्व उनका हिस्सा भूमि पर गिरा कर देते हैं। धरती माता को प्रणाम करने के बाद ही खेतीबारी के कार्य शुरू करते हैं। उनके लिए खेत-खलिहान उत्पादन या आय प्राप्त करने का महज एक साधन नहीं है, बल्कि वह उसे अपने परिवार और समाज का अविभाज्य/अपरिहार्य  (inalienable) अंग मानता है। खेतों की पूजा और आराधना करना सरना के लिए एक अनिवार्य पारिवारिक और सामाजिक कर्तव्य और उतरदायित्व है।

आदिवासियों ने सदियों से अपने धर्म को कोई नाम नहीं दिया था। नामकरण तो तब अनिवार्य हो जाता है, जब एक से अधिक चीजें एक जगह होंती हैं और उसमें अंतर करने के लिए दोनों के नाम अलग-अलग किए जाते हैं। आदिवासी इलाकों में हजारों साल से दूसरा कोई धर्म नहीं था, इसलिए जब दूसरे धर्म इन इलाकों में आए तो पहचान के लिए एक नाम रखना जरूरी हो गया और पूजा स्थल (सरना स्थल) के आधार पर प्रकति पूजा पद्धति को सरना धर्म का नाम दे दिया गया। यह बीसवीं सदी के उस काल में हुआ जब प्रकृति का आराधना करने वालों के लिए एक नाम रखना जरूरी हो गया था, क्योंकि तब अनेक धर्म या आराधरा पद्धति का आगमन आदिवासी समाज में हो गया था। इसलिए इस नाम के साथ किसी प्राचीनता का शोध करना उचित नहीं है।

सरना धर्म में पूजन पद्धति की परंपरा प्राचीन काल से है, लेकिन यह कहीं भी रूढ नहीं है। इसका एक कारण समाज में धर्म के प्रति कट्टरता की भावना का लोप होना है। कोई भी सरना लोक और परलोक के प्रतीकों में से किसी का भी पूजन कर सकता है और किसी का भी न करे तो भी वह सरना ही होता है। कोई किसी एक पेड की पूजा करता है तो जरूरी नहीं कि दूसरा भी उसी पेड की पूजा करे। दिलचस्प और ध्यान देने वाली बात तो यह है कि जो आज एक विशेष पेड़ की पूजा कर रहा है जरूरी नहीं कि वह कल भी उसी पेड की पूजा करे। यहॉं पेड किसी मंदिर, मस्जिद या चर्च की तरह रूढ़ नहीं है। वह तो विराट प्रकृति का खरबों प्रतीक में से सिर्फ एक प्रतीक है और हर पेड़ प्रकृति का जीवंत -प्रतिनिधि-प्रतीक है, इसलिए किसी एक पेड़ को रूढ़ होकर पूजन करने का कोई मतलब नहीं। अमूर्त शक्ति की उपासना के लिए एक मूर्त प्रतीक की सिर्फ आवश्यकता-वस किसी पेड़ का पूजन करता है।

सरना धर्म किसी धार्मिक ग्रंथ और किताब का मोहताज नहीं है। किताब आधारित धर्म में अनुगामी को नियमों के खूँटी से बॉधा गया होता है। जहॉं अनुगामी एक सीमित दायरे में अपने धर्म की प्रैक्टिस करता है। वह दायरे से बाहर नहीं जा सकता है। जहॉं वर्जनाऍं हैं, सीमा है, खास क्रिया क्रमों को करने के खास नियम और विधियॉं हैं, जिसका प्रशिक्षण खास तरीके से दिया जाता है। किताब में लिखित सिद्धांतों, नियमों की रखवाली करने वाले प्रशिक्षित धार्मिक सैनिकों की बाड़ होती है, जो उसके अनुयायियों को अपने धर्म में चिपका कर रखने की वह सारे क्रियाकर्म करते हैं  जिससे वे बाहर न जा सकें। नयी आवधारणाओं पर शोध न कर सकें और उसे न अपना सकें ।  नियमों को न मानने या भंग करने पर अनुयायी को दण्डित किया जाता है। ध्यान देने की बात है कि किताब आधारित धर्म में दण्डित देने की व्यवस्था है लेकिन उसे बाहर निकालने की व्यवस्था नहीं है। क्योंकि वहाँ  धार्मिक वर्चस्व के लिए जनसंख्या का उपस्थित रहना जरूरी है, ताकि उन पर धार्मिक रूप से शासन किया जा सके।

किताब या पोथीबद्ध धर्म के इत्तर सरना धार्मिकता के उच्च व्यक्तिगत  स्‍वतंत्रता की गारंटी देने वाला धर्म है। जहॉं सब कुछ प्राकृतिक से प्रभावित है और सब कुछ प्रकृतिमय है। कोई नियम, वर्जनाऍं नहीं है। कोई केन्द्रीय अवधारणा नहीं है, जिसे मानना अनिवार्य है। आप जैसे हैं वैसे ही बिना किसी कृत्रिमता के सरना हो सकते हैं और प्राकृतिक ढंग से इसे अपने जीवन में अभ्यास कर सकते हैं। जीवंत और प्राणमय प्रकृति, जो जीवन का अनिवार्य तत्व है, आप उसके एक अंग है। आप चाहें तो इसे मान्यता दें या न दें। आप पर किसी तरह की धार्मिक बंदिश नहीं है। जन्‍म से लेकर मृत्‍यु तक आप किसी धार्मिक जंजीर से बंधे हुए नहीं हैं। आपके जन्म, शादी और मृत्यु के किसी भी संस्कार में धार्मिक रूप से आप पर नियंत्रण नहीं किया जाता है, न ही किसी संस्कार को करने के लिए किसी धार्मिक ऑथारिटी से अनुमति प्राप्त करने की जरूरत है।

आप प्रकृति के प्रति अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति कहीं भी कर सकते हैं या कहीं भी न करें तो भी आपको कोई मजबूर नहीं करेगा, क्योंकि हर व्यक्ति की भक्ति की शक्ति या शक्ति की भक्ति की अपनी अवधारणाऍं हैं। एक समूह का अंग होकर भी आपके ”वैचारिक और मानसिक व्यक्तित्व” समूह से भिन्न हो सकता है। अपने वैयक्तिक आवधारणा बनाए रखने और उसे लोक व्यवहार में प्रयोग करने के लिए आप स्वतंत्र है। यही सरना धर्म की अपनी विशेषता और अनोखापन है। मानवीय वैचारिक स्वतंत्रता की ऐसी उर्वरा भूमि अन्य धर्म में मिलना मुश्किल है।

यह किसी रूढ बनाए या ठहराए गए धार्मिक, सामाजिक या नैतिक नियमों से संचालित नहीं होता है। आप या तो सरना स्थल में पूजा कर सकते हैं या जिंदगी भर न करें। यह आपके व्यक्तिगत स्वतंत्रता का भरपूर सम्मान करता है। आप चाहें तो अपने बच्चों को सरना स्थल में ले जाकर वहॉं प्रार्थना करना सिखाऍं या न सिखाऍं । कोई आप पर किसी तरह की मर्जी को लाद नहीं सकता है। प्रत्येक धर्म में धार्मिक संस्कारों की एक सूची होती है, जिसे करना उसके अनुयायी के लिए अनिवार्य है, लेकिन सरना में ऐसी किसी भी तरह के बंधन, नियंत्रण और निर्देशन कहीं नहीं है। आप यहाँ पर परम स्वतंत्र रूप से धार्मिक या अधार्मिक हो सकते हैं। धर्मनिरपेक्षता की आत्म ही सरना धर्म से प्रेरित है।

आप धार्मिक, सामाजिक और ऐच्छिक रूप से स्वतंत्र हैं। आपको पकड कर न कोई प्रार्थना रटने के लिए कहा जाता है न ही आपको किसी प्रकार से मजबूर किया जाता है कि आप धार्मिक स्थल जाऍं और वहॉं अपनी हाजिरी लगाऍं और कहे गए निर्देशों का पालन करें । सरना धर्म के कर्मकांड करने के लिए कहीं किसी को न प्रोत्साहन किया जाता है न ही इससे दूर रहने के लिए किसी का धार्मिक और सामाजिक रूप से तिरस्का्र और बहिष्‍कर किया जाता है। सरना धर्म किसी को धार्मिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक रूप से नियंत्रित नहीं करता है और न ही उन्हें अपने अधीन रखने के लिए किसी भी तरह के बंधन बना कर उन पर थोपता है।

सरना बनने या बने रहने के लिए कोई नियम या सीमा रेखा नहीं बनाया गया है। इसमें घुसने के लिए या बाहर निकले के लिए आपको किसी अंतरण अर्थात (धर्मांतरण) करने की जरूरत नहीं है । कोई किसी धार्मिक क्रियाकलाप में शामिल न होते हुए भी सरना बन के रह सकता है उसके धार्मिक झुकाव या कर्मकांड में शामिल नहीं होने या दूर रहने के लिए कोई सवाल जवाब नहीं किया जाता है। सरना धर्म का कोई पंजी या रजिस्टर नहीं होता है। इसके अनुगामियों के बारे कहीं कोई लेखा जोखा नहीं रखा जाता है, न ही किसी धार्मिक नियमों से संबंधित जवाब के न देने पर नाम ही काटा जाता है।

सरना अनुगामी जन्म से मरण तक किसी तरह के किसी धार्मिक सत्ता के निर्देशन, संरक्षण, प्रवचन, मार्गदर्शन या नियंत्रण के अधीन नहीं होते हैं। उसे धार्मिक रूप से आग्रही या पक्का बनाने की कोई कोशिश नहीं की जाती है। वह धार्मिक रूप से न तो कट्टर होता है और न ही धार्मिक रूप से कट्टर बनाने के लिए उसका ब्रेनवाश किया जाता है। क्योंकि ब्रेनवाश करने, उसे धार्मिकता के अंध-कुँए में धकेलने के लिए कोई तामझाम या संगठन होता ही नहीं है। इसीलिए इसे प्राकृतिक धर्म भी कहा गया है। प्राकृतिक अर्थात् जो जैसा है वैसा ही स्वीकार्य है। इसे नियमों ओर कर्मकांडों के अधीन परिभाषित भी नहीं किया गया है। क्योंकि इसे संकीर्ण परिभाषा से बांधा नहीं जा सकता है।

जन्म, विवाह मृत्यु सभी संस्कारों में उनकी निष्ठा का कोई परिचय न तो लिया जाता है न ही दिया जाता है। हर मामले में वह किसी आधुनिक देश में लागू किए गए सबसे आधुनिक संवैधानिक प्रावधानों (समता का अधिकार, जीवन और वैचारिक धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार जैसे मूल अधिकारों की तरह) का सदियों से व्यक्तिगत और सामाजिक स्वतंत्रता का उपभोग करते आ रहा है। उसके लिए कोई पर्सनल कानून नहीं है। वह शादी भी अपनी मर्जी जिसमें सामाजिक मर्जी स्वयं सिद्ध रहता है, से करता है और तलाक भी अपनी मर्जी से करता है। लड़कियॉं सामाजिक रूप से लडकों की तरह की स्वतंत्र होतीं हैं। धर्म उनके किसी सामाजिक या वैयक्तिक कार्यों में कोई बंधन नहीं लगाता है।

सरना बनने के लिए किसी जाति में जन्म लेने की जरूरत नहीं है। वह उरॉंव, मुण्डा, हो, संताल, खडिया, महली या चिक-बडाइक या कोई भी समुदाय, कहीं के भी आदिवासी, मसलन, उडिसा, छत्तीसगढ, महाराष्ट्र, गुजरात या केरल के हो सकते हों, जो किसी अन्य किताबों, ग्रंथों, पोथियों आधारित धर्म को नहीं मानता है और जिसमें सदियों पुरानी जीवन यापन के अनुसार जिंदगी और समाज चलाने की आदत रही है सरना या प्राकृतिक धर्म का अनुगामी कहा जा सकता है। क्योंकि उन्हें नियंत्रित करने वाले न तो कोई संगठन है, न समुदाय है न ही उन्हें मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से नियंत्रण में रखने वाला बहुत चालाकी से लिखी गई धार्मिक किताबें हैं। कोई भी आदमी सरना बन कर जीवन यापन कर सकता है क्योंकि उसे किसी धर्मांतरण के क्रिया कलापों से होकर गुजरने की जरूरत नहीं है।

सरना धर्म में सरना अनुगामी खुद ही अपने घर का पूजा पाठ या धार्मिक कर्मकांड करता है। लेकिन सार्वजनिक पूजापाठ जैसे सरना स्थल में पूजा करना, करम और सरहूल में पूजा करना, गॉंव देव का पूजा या बीमारी दूर करने के लिए गॉंव की सीमा पर किए जाने वाले डंगरी पूजा वगैरह पहान करता है। पहान का चुनाव विशेष प्रक्रिया जिसे थाली और लोटा चलाना कहा जाता के द्वारा किया जाता है। जिसमें चुने गए व्यक्ति को पहान की जिम्मेदारी दी जाती है। लेकिन अलग अलग जगहों में पृथक ढंग से भी पहान का चुनाव किया जाता है। चुने गए पहान पहनई जमीन पर आर्थिक अलंबन के लिए खेती बारी कर सकता है या जरूरत न होने पर उसे चारागाह बनाने के लिए छोड सकता है। यहाँ भी सरना किसी रूढ़ीवादी संकीर्ण विचारों से अनिवार्य रूप से बंधित नहीं है।

उल्लेखनीय है कि सरना पहान सिर्फ पूजा पाठ करने के लिए पहान होता है और उसका पद रूढ या स्‍थायी नहीं होता है। वह समाज को धर्म का सहारा लेकर नियंत्रित नहीं करता है। वह हमेशा पहान की भूमिका में नहीं रहता है, न ही उसका कोई विशिष्ट पोशाक या मेकअप होता है। वह सिर्फ पूजा करते वक्त ही पहान होता है। पूजा की समाप्ति पर अन्य सामाजिक सदस्यों की तरह ही सामान्यं सदस्य होकर समाज में रहता है और सबसे व्यवहार करता है। वह पहान होने पर कोई विशिष्टता प्राप्त नागरिक नहीं होता है, न ही विशिष्ट सम्मान और व्यवहार की अपेक्षा करता है।

अन्य धर्मो में पूजा करने वाला व्यक्ति न सिर्फ विशिष्ट होता है बल्कि वह हमेशा उसी भूमिका और पोशाक और मेकअप में समाज के सामने आता है और आम जनता को उसे विशिष्ट सम्मान अदा करना पडता है। सम्मान नहीं अदा नहीं करने पर धार्मिक रूप से ”उदण्ड” व्यक्ति को सजा दी जा सकती है, उसकी निंदा की जा सकती है या व्यक्ति के धार्मिक अधिकारों को छीना जा सकता है। पहान धार्मिक कार्य के लिए कोई आर्थिक लाभ नहीं लेता है। वह किसी तरह का चंदा भी नहीं लेता है, न ही किसी प्रकार के पैसे इकट्ठा करने में सहभागी बनता है। वह अपनी जीविकोपार्जन स्वयं करता है और समाज पर आश्रित नहीं रहता है। सरना धर्म में परजीविता का कोई स्थान नहीं है।

कई लोग अन्जाने में या शरारत-वश सरना धर्म को हिन्दू धर्म का एक भाग कहते हैं और सरना आदिवासियों को हिन्दू कहते हैं। लेकिन दोनों धर्मो में कई विश्वास या कर्मकांड एक सदृष्य होते हुए भी दोनों बिल्कुल ही जुदा हैं। यह ठीक है कि सदियों से सरना और हिन्दू धर्म का सह-अस्तित्व रहा है। इसलिए कई बातें एक सी दिखती है। नाम वगैरह आदि में एकरूपता दिखता है। लेकिन नाम से कोई किसी और धर्म का नहीं हो जाता है। एक भूभाग में रहने वाले समाजों के बीच इस तरह के समानता का होना आश्‍चर्य की बात नहीं है। लेकिन यह याद रखना चाहिए कि आदिवासी सरना और हिन्दू धर्म के बीच विश्वास, सिद्धांत और आदर्श के मामलों में 36 का आंकडा है और वे सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से एक दूसरे के विरोधी रहे हैं।

आदिवासी मूल्य, विश्वास, अध्यात्म हिन्दू धर्म से बिल्कुल जुदा है इसलिए किसी आदिवासी का हिन्दू होना मुमकिन नहीं है। हिन्दू धर्म कई किताबों पर आधारित है और उन किताबों के आधार पर चलाए गए विचारों से यह संचालित होता है। याद कीजिए इन किताबों का आदिवासी समाज के लिए कोई महत्व नहीं है, न ही उसका समाज पर प्रभाव है। इन किताबों के लिए आदिवासियों के मन में सम्मान भी नहीं है न ही हिकारत। इन किताबों में आत्मा, पुर्नजन्म, सृष्टि और उसका अंत, चौरासी कोटी देवी देवता, ब्राह्मणवाद की जमींदारी और मालिकाना विचार आदि केन्द्र बिन्दु है। हिन्दू धर्म में तमाम देवता राजा या वर्चस्ववादी रहे हैं जो एक दूसरे से युद्ध करते हुए रक्तपान करने वाली मानसिकता का पोषण करता है। आदिवासी कभी किसी के उपर वर्चस्व जमाना नहीं चाहा। हिंन्दू धर्म जातिवाद का जन्मदाता और पोषक है और सामांतवाद और मानवीय शोषण, आर्थिक ठगी को यहॉं धार्मिक मान्यता प्राप्त है। आज भी हिंदू शोषण और भेदभाव को हिंदू धर्म की जड़े मानते हैं। आदिवासी समाज सच्चे रूप में एक समाजवादी समाज हैं वहीं हिन्दू में बड़े छोटे का न सिर्फ सिद्धांत कायम है, बल्कि छोटे हो दीनहीन और घटिया समझने के मानसिकता केन्द्रबिन्दु में हैं। यहॉं हिन्‍दू धर्म सरना धर्म के उलट रूप में प्रकट होता है। ब्राहणवाद और जातिवाद से पीडित यह जबरदस्ती बहुसंख्यक, कर्मवीर और श्रमशील लोगों को नीच और घटिया घोषित करता है और लौकिक और परलौकिक विषयों की ठेकेदारी ब्राह्मण और उनके मनोवैज्ञानिक उच्चता का बोध कराने के लिए बनाए गए नियमों को सर्वोच्चता प्रदान करता है। हिंदू समाज में न्यायपू्र्ण सामाजिक व्यवस्था को नकारा गया है। यहाँ शोषण करने, अपने से तथाकथित रूप से कमजोर लोगों के साथ अन्याय को उचित माना गया है। यह वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और मानवीय रूप ये अत्यंत अन्यायकारी और घ़ृष्टातापूर्ण है। इंसानों को अन्यायपूर्ण रूप से धार्मिक भावनाओं के बल पर, जानवरों की तरह गुलाम बनाने, ठगने के हर औजार इन किताबों में मौजूद है। आदिवासियों को दीन-हीन नीच समझने या मनवाने के षड़यंत्र के रूप में आज के विकासमय समय में भी हिंदू धर्म संगठन उन्हें वनवासी शब्द से संबोधित करने का हर मौका को काम में लाते हैं। आदिवासियों को भारतीय धरती पर न्यायपूर्ण स्थान देने के बदले वे उनके साथ अन्याय करने के लिए खरबों रूपये व्यय कर रहे हैं। क्योंकि उनके धार्मिक अवधारणा में ही ऊँच-नीच और न्याय-अन्याय गुंफित है।

किसी समुदाय या मानव को नीच और अन्याय का पात्र समझने की धार्मिक नियम, परंपरा और लोक व्यवहार सरना समाज में मौजूद नहीं है। सरना समाज में जातिवाद और सामांतवाद दोनों ही नहीं है। यहॉं सिर्फ समुदाय है, जो न तो किसी दूसरे समुदाय से ऊँच है न नीच है। सरना धर्म के समता के मूल्य और सोच के बलवती होने के कारण किसी समुदाय के शोषण का कोई सोच और मॉडल न तो विकसित हुई है और न ही ऐसे किसी प्रयास को मान्यता मिली है। प्रथमदृष्ट में सरना धर्म की तरह ऊँच गुणों से संपन्न और कोई धर्म है ऐसा नहीं प्रतीत नहीं होता है।

कई लोग आदिवासियों के हनुमान महादेव और प्राकृतिक के अन्य प्रतीकों के पूजन को हिन्दू धर्म से जोडकर इसे हिन्दू सिद्ध करना चाहते हैं। लेकिन सरना वालों ने कहीं इसका मंदिर न तो खुद बनाए हैं न ही सामाजिक धर्म और पर्वों में घरों में इनकी पूजा की जाती है। सरना किंवदती में भी ऐसी कथा नहीं मिलती है। किसी सरना गीत और लोक कथा में भी ऐसी कोई घटना नहीं मिलती है, जिससे सिद्ध हो कि हिंदू महादेव और हनुमान ही आदिवासी देवता भी हैं। ऐतिहासिक रूप से अभी तक कुछ स्पष्ट नहीं हो पाया है लेकिन अनेक विद्वान हनुमान और महादेव को प्रागआदिवासी मानते हैं। महादेव का सामान्य अर्थ महा अर्थात् बड़ा होता है। हजारों सालों से एक ही धरती पर निरंतर साथ रहने के कारण दोनों के बीच कहीं अंतरण हुआ होगा। लेकिन आदिवासी हिन्दू नहीं है यह स्पष्टं है। हिंदू धर्म मुसलमान और ईसाई धर्म की तरह वर्चस्ववादी, विस्तारवादी, घमंडवादी, दूसरों पर अपने विचारों को जबरदस्ती थोपने वाला धर्म है, यही कारण है कि यह मानवीय हिंसा में विश्वास करने वाला धर्म के रूप में दूसरे विस्तारवादी धर्म के साथ अपना नाम लिखा लिया है। आदिवासी गाँवों में हिंदू देवी देवताओं के तस्वीरों का मुफ्त वितरण, आदिवासी गाँव अंचलों में मंदिरों का निर्माण, आदिवासी बालकों का अपने स्कूल में शिक्षा दान देकर आदिवासी मूल्य और संस्कृति को नष्ट करने के लिए उन्हें एजेंट के रूप में इस्तेमाल आदि करना,गरीब आदिवासियों का मंदिरों में ब्राह्मण द्वारा समूहिक विवाह कराना, आदिवासियों को आदिवासियों के माइंडवाश करने की प्रक्रिया में शामिल करना, घोर हिंदू बने लोगों को आदिवासियों का राजनैतिक नेता बनाना, उन्हें पद और पैसे का लोभ से पाट देना आदि बातें हिंदू धर्म को ईसाई और मुसलमान धर्मों की तरह हटधर्मी और विस्तारवादी धर्मों की पंक्तियों में बैठा दिया है। ईसाई धर्म का आदिवासियों के बीच प्रचार शुद्ध धार्मिक सिद्धांत नहीं रहा है, बल्कि उसे शिक्षा और सेवा की आड़ में किया गया। यदि शुद्ध धार्मिक सिद्धांत के माध्यम से ईसाईयत का प्रचार किया जाता तो वह आदिवासी सोच-विचार और अवधारणा के विपरीत होने के कारण स्वीकार्य नहीं होता। लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य की आवश्यकता ने इसे स्वीकार्यता दिलाया है।

हाल ही में कुछ सरना लोग जो खुद को सरना के रूप में परिचय देते हैं और हिन्दुत्‍व, क्रिश्चिनि‍टी, इस्लाम के ऊपरी आवरण से प्रभावित हैं। इन लोगों ने सरना को परिभाषित करने, उसका कोई प्रतीक चिन्ह, तस्वीर, मूर्ति,  मठ, पोथी आदि बनाने की कोशिश की है जिसे निहायत ही आईडेंटिटी क्राइसिस से जुझ रहें लोगों का प्रयास माना जा सकता है। इन चीजों के बनने से सरना धर्म के वैश्विक मूल्यों में हृास होगाऔर इसके अनुठापन खत्म होगा। इन चीजों की अनुपस्थिति ही सरना धर्म को दूसरे धर्मों से अलग एक विशिष्ट मूल्य और प्राकृतिक आवधारणा वाला बनाया है।

सरना धर्म में विचार, चिंतन की स्वतंत्रता उपलब्ध है। सरना वालों को किसी कट्टर सिद्धांतों को मानने का कोई निर्देशन भी नहीं है, न ही नये विचारधारा पर चिंतन करने की मनाही है। अपने धार्मिक चिंतन को एक रूप देने के लिए ऐसा करने वाले भी स्वतंत्र हैं । लेकिन ऐसे परिवर्तन को सरना धर्म का अनुयायी कहना, एक मजाक के सिवा कुछ नहीं है। क्योंकि इनके विचारों में नयी धारा नहीं है। बल्कि दूसरे धर्म के उपरी आवरण की नकल करने का प्रयास है। सरना किसी मूर्ति, चिन्ह, तस्वी्र या मठ का मोहताज नहीं है। लेकिन ऐसा करने में यह भी दूसरे धर्म की धार्मिक बुराईयों का शि‍कार हो जाएगा और यह अन्य धर्मो के सदृष्यर उनका एक कार्बन कॉपी बन के रह जाएगा। सरना धर्म के विरोधी तो ऐसे कार्यकलापों को प्रोत्साहित करना पसंद करेंगे, क्योंकि इससे सरना धर्म का कद घटेगा, वहीं वे अपने धर्म की कमियों को सही साबित करने के लिए सरना को भी कई आवधारणों के गुलाम धर्म साबित करने में कामयाब होंगे। मूर्ति, तस्वीर, मठ आदि के रास्ते सरना धर्म में एक बाजार, वर्चस्व, प्रभाव जमाने की बुराईयां आ जाएगी। ऐसी बुराईयाँ केन्द्रीय विचारधारा को नष्ट करके उसे एक साधारण धर्म बना देता है, जिसमें आर्थिक पक्ष सबल हो जाता है।

यदि सरना-दर्शन के शब्दों में कहा जाए तो यह सब चिन्ह आपनी आईडेंटिटी गढने, रचने और उसके द्वारा वैयक्तिक पहचान बनाने के कार्य हैं । जिसका इस्तेमाल, सामाजिक कम राजनैतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक साम्राज्य् गढने और वर्चस्व स्थापित करने के लिए एक हथियार के रूप में किया जाता रहा है। ऐसे चीजों का अपना एक बाजार होता है और उसके सैकडों लाभ मिलते हैं। लेकिन सरना दर्शन, सोच, विचार, विश्वास, मान्यता से बाजार का कोई संबंध नहीं है। धार्मिक क्रिया कांड में सिर्फ मिट्टी के दीए और छोटे मोटे मिट्टी भांड तथा पत्तों, पुआलों का उपयोग किया जाता है। मिट्टी के छोटे दीया, भांड, घडा आदि हजारों साल से स्थानीय लोगों के द्वारा ही निर्मित होता रहा है और इसका कोई स्थायी बाजार नहीं होता है। न ही इसका कोई सबल आर्थिक पक्ष होता है।

कु्ल मिला कर यही कहा जा सकता है कि सरना एक अमूर्त शक्ति को मानता है और सीमित रूप से उसका आराधना करता है। लेकिन इस आराधना को वह सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक औजार के रूप में नहीं बदलता है। वह आराधना करता है लेकिन उसके लिए किसी तरह के शोशेबाजी नहीं करता है। यदि वह करता है तो फिर वह कैसे सरना ?  लेकिन किसी मत को कोई मान सकता है और नहीं भी, क्यों कि व्यक्ति के पास अपना विवेक होता है और यह विवेक ही उसे अन्य प्राणी से अलग करता है,  विवेकवान होने के कारण अपनी अच्छाईयों को पहचान सकता है। सभी कोई अच्छाईयॉं, कल्याणकारी पथ खोजने के लिए स्वतंत्र हैं। इंसान की इसी स्वतंत्रता की जय-जय-कार हर युग में हर तरफ हुई है।