चाय बागान को बचायगा होर्टिकल्चर और ऑर्गानिक खेती

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Kind Attention #Dooars_Terai_Darjeeling_Hills_Tea_Unions
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पश्चिम का चाय उद्योग गंभीर रूप से बीमार है। करीबन 19 बागान या तो बंद है या फिर जी-मर कर चल रहे हैं। बंद बागानों में मजबूर मजदूरों को पत्ते तुड़वा कर उसे केजी के भाव में बाहर बेचा जा रहा है। कहीं मजदूरों को 100 रूपये तो कहीं 170 रूपये देकर मजदूरी के नाम पर मजदूर नीतियों, अधिकारों, कर्तव्यों आदि की इतिश्री किया जा रहा है।
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#मुख्य_समस्या_है ? बागान मालिक कहते हैं कि चाय का वाजिफ कीमत नहीं मिलती है और चाय उत्पादन की लागत बढ़ गयी है। वे बागान चलाने में असमर्थ हैं।
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चाय मजदूर कहते हैं कि उन्हें न्यूनतम मजदूरी नहीं मिलती है और आज के महंगाई के जमाने में 176 रूपये की मजदूरी में वे चाय बागान में आर्थिक शोषण का शिकार हो रहे हैं। उन्हें मजदूरी के साथ मिलने वाली फ्रिंज बेनेफिट नहीं दिया जा रहा है, न ही मजदूर हित में बनाए गए किसी कानून का पालन किया जा रहा है।
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मजदूरों का चाय बागान काम से मोहभंग हो चुका है और वे चाय बागान के इत्तर कार्यों में अधिक मजदूरी के लिए बागान छोड़ कर जा रहे हैं। फलतः बागानों में पर्याप्त मजदूर उपलब्ध नहीं है।
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सरकार का श्रम विभाग और टी बोर्ड मिल कर न तो बागान मालिकों की शिकायत दूर कर पा रहे हैं और न मजदूरों को न्याय दिला पा रहे हैं।
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#आखिर_समाधान_क्या_होगा ?
अधिकतर चाय बागानों में CTC (crush, tear, curl) का उत्पादन होता है। जबकि दुनिया में #ऑर्थोडॉक्स और #ग्रीन_टी की मांग बढ़ चली है। कुल उत्पादन में सीटीसी चाय की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत है जबकि देश में डेढ़ प्रतिशत से भी कम ग्रीन टी का उत्पादन होता है।
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डुवार्स-तराई में चाय उत्पादन के लिए फर्टिलाईजर जैसे केमिकल का व्यवहार जम कर किया जाता है। चाय पौधों की देखरेख नहीं किया जाता है। जबकि दुनिया में ऑर्गानिक चाय की मांग की जा रही है। भारतीय चाय में फर्टिलाईजर और अन्य अवांछित तत्वों के तय मानक से अधिक होने के कारण कई देशों में चाय निर्यात में भी बाधा उत्पन्न होती है।
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भारत में भी शिक्षित परिवार सेहत के लिए ग्रीन चाय पीना पसंद करता है। जाहिर है कि जिस वस्तु को मांग कम होगी, उसका दाम भी कम ही कम ही मिलेगा। दुनिया में ऑर्गानिक उत्पादों की बढ़ती मांग ने ऑर्गानिक उत्पादों के लिए भारी मांग पैदा कर दी है। लेकिन चाय बागान के रणनीतिकर भविष्य को भांपने में फिस्सड़डी साबित हुए है, उनके चाय की औसत कीमत 160-300 रूपये मिलती है। वे अभी भी परंपारिक ढंग से ही चाय उत्पादन काम करते हैं।
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कुछ मजदूर नेताओं का मानना है कि चाय बागान का कोई भविष्य नहीं है। क्योंकि चाय बागानों में मजदूरों का शोषण बढ़ते जाएगा और मजदूर असंतोष के कारण बागान बंद होते जाएगा। मजदूरों का पलायन बढ़ते जाएगा और वे अपनी माली हालत को सुधारने के लिए आमदनी का अन्य स्रोतों पर अधिक निर्भर करेंगे। उनके पास स्थिति में अमुलचूल परिवर्तन करने लायक दृष्टिकोण और बुद्धिमानी की घोर कमी है।
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मजदूरों का शोषण स्पष्ट है। आज उन्हें न्यूनतम वेतन देने और घर का पट्टा देने से सरकार भी घबराती है। चाय मजदूरों के संदर्भ में ममता बनर्जी की सरकार एक निकम्मा सरकार बन कर सामने आई है। वह मोदी सरकार की तरह एक जुमलेबाज सरकार के रूप में अपना स्थान बना चुकी है।
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ममता बनर्जी की सरकार न्यूनतम वेतन (350-500) रूपये की मंजूरी देने और मजदूरों को आवासीय पट्टा देने की तमाम वादा करके भी पिछले 9 सालों में मजदूर हित में एक भी मुकम्मल कदम नहीं उठा पायी है। चाय मजदूरों को देश की एक जीवंत समाज के रूप में देखने के बजाय सरकार उन्हें चाय बागान के मालिकों के आर्थिक हित को साधने वाले अधिकारविहीन मजदूर के रूप में देखते आई है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि जिस चाय बागान को मजदूर अपनी माँ-माटी-मनुष्य का आश्रय समझता था, उसे वह शोषण का जंजीर समझने लगा है।
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मजदूर परिवारों का चाय बागान से भावनात्मक लगाव खत्म हो चला है। वे पश्चिम बंगाल सरकार को एक शोषक सरकार के रूप में देखने और मानने लगी है। आश्चर्य नहीं होगा यदि अंतहीन शोषण से बचने के लिए भविष्य में यहाँ भी अलग राज्य की मांग उठ खड़ी हो जाए या गोर्खालैंड की मांग में सब अपना सुर मिला दें। यदि गोर्खालैंड आंदोलन के नेतागण बुद्धिमान होंगे तो वे इस स्थिति को बहुत सहजता से समर्थन जुटाने के लिए उपयोग कर पाएँगे। लेकिन उनका एकपक्षीय जातीय भावना की हित-मांग ने खुद अपने राह में बाधा उत्पन्न किया और मांग धराशायी हो गया। वे डुवार्स तराई में दूसरे समुदायों के विश्वास को जीतने में नाकाम साबित हुए।
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चाय बागानों के मालिक विशुद्ध मुनाफाखोर समूह है। उन्हें डुवार्स के सामाजिक, संस्कृति, आर्थिक ढाँचा से कोई लगाव नहीं है। वे अंग्रेज चाय मालिकों की तरह दूरदर्शी भी नहीं है। उनकी मूर्खता और अदूरदर्शीता ने चाय बागानों को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। एक स्वतंत्र देश में वे आज भी उपनिवेशवादी मानसिकता से संचित प्रबंधन का ढाँचा खड़ा करके चाय बागानों में अपनी जमींदारी चलाना चाहते हैं। जबकि देश दुनिया के दृष्टिकोण में क्रांतिकारी बदलाव आ चुका है। आज मजदूर जब तक बागान में काम करता है, तब तक वह मजदूर की भूमिका में रहता है। जैसे ही काम के घंटे खत्म हो जाता है, वह एक आजाद सम्मानित नागरिक बन जाता है। लेकिन इस बदलाव को चाय मालिक और प्रबंधन भाँपने में नाकाम रहे हैं और वे हर समय मजदूर के मालिक बने रहने की बीमारी से निजात नहीं पा सके हैं।
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अधिकतर बागान के झगड़े प्रबंधन के शोषक और जमींदारी मानसिकता के चलते होते हैं और मालिक बिना कुछ बताए एक रात में ही बागान बंद कर बागान से भाग जाते हैं। उन्हें लगता है कि वे बहुत बहादूरी और बुद्धिमानी का काम कर रहे हैं। लेकिन वास्तविक रूप से समय ने उन्हें बुद्धू साबित कर दिया है। लगता है बागान प्रबंधकों को जापानी प्रबंधन पद्धित की कोई जानकारी नहीं है। भारत में मारूति कार कंपनी में यही प्रबंधन पद्धित इसकी सफलता की कहानी है। कहते हैं मुकेश अंबानी भी अपने नीचे के कर्मचारियों के साथ साधारण मेज पर बैठ कर काम करते हैं और अपने कर्मचारियों के साथ दोस्तों की तरह सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़े हुए रहते हैं। लेकिन चाय बागानों में अंग्रेजों के समय की ऊँच-नीच की जमींदारी प्रथा को बनाए रखा गया है। जाहिर है कि यह मानसिकता विवाद बढ़ाने, ठुकाई के लिए महौल बनाने और ठुखाई खाने का बढ़िया पृष्टभूमि तैयार करता है। इस मानसिकता का शिकार कई लोग अपनी जान गँवा कर हुए हैं। बिना मतलब कई बागान बंद हो गए हैं। बेरोजगारी-असंतोष बढ़ गई है। लेकिन सरकार, श्रम मंत्रालय, चाय कंपनी, स्थानीय प्रशासन आदि मिल कर कोई अच्छा कदम उठाने के लिए तैयार नहीं है। हठधर्मिता एक बेवकूफीपन है।
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चाय बागान की इन समस्याओं को मिटाना बहुत मुश्किल तो नहीं। दुनिया में हर विकसित देश में पहुँच बनाने के लिए चाय के उत्पादन के रंग-ढंग को बदलना होगा। कल ही मैंने टेटली का ग्रीन टी का एक डब्बा खरीदा। 25 (पच्चीस) ग्राम ग्रीन टी का दाम 145 रूपया चुकाया। मतलब एक किलो चाय का दाम हजार रूपये से कम नहीं है। चाय उद्योग को ऑर्गानिक, ग्रीन टी, व्हाईट टी बनाने से किसने रोका है ? मजदूर तो बागान मैनेजरों के हुकुम पर काम करते हैं। भारतीय बाजार में एक किलोग्राम व्हाईट टी (White tea) का दाम 11,000/- (Eleven thousand Rupees) है। चाय का पर्याप्त दाम नहीं मिलने का चाय उद्योग का दावा नकली है।
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चाय कंपनियाँ क्वालिटी चाय बनाने के लिए कमर कस लें। मजदूरों को पर्याप्त मजदूरी चुकाएँ। सरकार उन्हें घर का पट्टा प्रदान करें। पश्चिम बंगाल सरकार उन्हें राज्य का स्थायी निवासी समझें। सरकार चाय बागानों में Horticulture के अन्तर्गत व्यावसायिक रूप से फल, फूल, मेडिसिन पौधे आदि बनाने की अनुमति दें तो चाय बागान की आय की भारी बढ़ोतरी हो सकती है। महत्वपूर्ण बात है, नये जमाने के साथ दृष्टिकोण को बदलना। सरकार टी टूरिज्म के लिए 150 एकड़ तक जमीन मालिक को देना चाहती है। लेकिन वह बताए कि देश में टूरिज्म के लिए इतनी सारी भूमि कहाँ उपयोग में लाई जा रही है?
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दार्जिलिंग का सबसे महंगा और सुविधाजनक विंडामियर होटल मुश्किल से दो बीघा जमीन में पसरा हुआ है। दार्जिलिंग, शिमला, ऊटी, नैनीताल, मुनार, सिलीगुड़ी, चालसा, शिंलांग आदि तमाम जगहों में टूरिस्ट होटल आदि एक दो, तीन बीघा में बनाए गए हैं। सरकार बताए कि 150 एकड़ भूमि वह टी टूरिज्म के नाम से क्यो देना चाहती है। 5 प्रतिशत जमीन तो उन्होंने 2013 से ही देना शुरू किया है। आज तक इन जमीनों पर कितने टूरिस्ट सेंटर बने या उससे कितनी आय हुई है और कौन-कौन से चाय बागान की माली हालत में सुधार आया है? सरकार की नजर चाय बागानों में सुधार लाने की है या सत्ताधारी पार्टियों को भारी मुनाफा दिलाने की है?
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बंद चाय बागानों में मजदूरों द्वारा कॉआपरेटिव बनाया जा रहा है। बंदापानी और रेडबैंक में बनाए गए कॉआपरेटिव ने लीज जमीन के लिए चार साल पहले ही आवेदन किया। लेकिन उन्हें लीज नहीं दिया गया। आखिर सरकार बताए कि वह क्यों मजदूरों को चाय बागान संचालन करने नहीं दे रही है और उपर से पूँजीपतियों को ही चाय बागानों में टूरिज्म शुरू करने के लिए सेलेक्टिव रूप से अनुमति देने का निर्णय कर रही है। चाय बागान मजदूरों को आवासीय पट्टा दिया जाए तो वह टी टूरिज्म के सारे लक्ष्यों को सहज ही पूरा कर सकते हैं। चाय बागानों के बाहर सैकड़ों लोग होम स्टे बना कर पर्यटकों को रहने खाने की सुविधा रहे हैं। चाय बागान बचाने के लिए मजदूरों को यह सुविधा सरकार क्यों नहीं दे रही है? चाय मजदूरों को पर्याप्त मजदूरी मिले, ऑर्गानिक चाय का उत्पादन हो, उन्हें आवासीय पट्टा मिले, उनके साथ जापानी प्रबंधन पद्धति के साथ दोस्ताना संबंध बना कर रखा जाए, चाय बागान में होर्टिकल्चर की भी शुरूआत की जाए तो चाय बागान एक आदर्श रोजगार उपलब्ध कराने वाला उद्योग बन जाएगा।
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चाय बागानों की समस्या का समाधान बहुत मुश्किल नहीं है। लेकिन सरकार को ईमानदारी से इसके लिए काम करना होगा। पक्षपातीय ढंग से कार्य करने पर स्थिति बिगड़ेगी और इसका ठीकरा सरकार की नीतियों पर ही फोड़ा जाएगा। नेह इंदवार ।
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