चोंचलेबाज धर्म

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नेह इंदवार

• धर्म के चोंचलेबाजी खोखले विचारों ने सदियों से मनुष्य के सोचने की स्वभाविक प्राकृतिक शक्ति को तहस-नहस करके रख दिया है। मनुष्य को यह कृत्रिमता की गहरे खड्डे में फेंक देता है और बड़ी अजीबोगरीब व्यवहार करने के लिए मजबूर करता है।
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किसी को यह पूरब की ओर मुँह रखने को कहता है तो किसी को पश्चिम की ओर। किसी को दाड़ी मूँछ रखने के लिए कहता है तो किसी को मूँछ निकाल कर सिर्फ दाड़ी रखने के लिए कहता है। किसी को यह बडे़-बडे़ लबादा ओढने के लिए कहता है तो किसी को भरे बाज़ार में भी नंगे रहने के लिए मजबूर करता है। किसी को गुरूवार को पवित्र काम करने को कहता है तो किसी को शुक्रवार को और किसी को रविवार। किसी को यह 12 बज कर 20 मिनट के बाद बड़ा काम शुरू करने के लिए कहता है तो किसी को रात को बाल काटने से मना करता है और सूरज ढलने के बाद खाना खाने से भी मना करता है। कोई-कोई धर्म तो पेशाब-पैखाना करने का भी नियम बना डाला है। किस दिशा में खड़े होकर या बैठ कर या सोते हुए प्राकृतिक कार्य न करें, इसका भी बड़े जतन से बखान किया है।
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धर्मोें में इतनी चोंचलीबाजी मौजूद है कि इस पर लिखने बैठो तो एक हजार पृष्ट के कुल साढे़ बीस खण्डों में एक नया धार्मिक (पवित्र 😝) पोथी ही तैयार हो जाएगा। गुमनामी निठल्लों को इतिहास में नया विश्व स्तरीय धर्म प्रवर्तक बनने के लिए यह एक धाँसू विषय है।
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• धार्मिक लोग (असली या नकली) इन चोंचलेबाजी बातों को ईश्वरीय आदेश मानते हैं। इन विविधता भरी आदेशों के मूल स्रोतों के बारे पूछो तो वे अलग अलग पृष्टभूमि में लिखे सैकड़ों पोथियों की ओर इशारा करते हैं। उनका विश्वास है कि इन पोथियों में जो भी लिखा है वह अंतिम सत्य है। यह अंतिम सत्य क्या होता है ?? पूछने पर उनका दिमाग बगले झांकने लगता है। दुनिया में उपलब्ध इन अलग अलग किताबों में एक बात अवश्य लिखी होती है और वह है “यह खुद ईश्वर द्वारा रचित है।” यही एक स्थायी वाक्य है जिसे धर्म के ठेकेदार खूब प्रचारित करते हैं और दुनिया के भोले-भाले लोगों के दिमाग में ठूँसते रहते हैं। लेकिन सवाल है कि ये ईश्वर हर किताब में अलग-अलग बातें लिख कर पूरी सभ्यता को कंफ्यूज करके कौन सा तीर मार लिया है ? हर किताब में एक ही विषय पर अलग-अलग बातें, अलग-अलग दावे और अलग-अलग परम सत्य। क्या प्रकृति की हर बातों या विषयों के अलग-अलग परम सत्य हो सकते हैं ? यदि ऐसा है तो इसका मतलब है, एक नहीं अनेक ईश्वर हैं और सारे ईश्वर एक दूसरे के घोर विरोधी हैं।
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• संसार में धार्मिक विविधता या चोंचलेबाजी की जमींदारी को अच्छुन्न बनाए रखने के लिए मनुष्य जाति ने पिछले कई हजार सालों से पृथ्वी के 50 प्रतिशत उर्जा और संसाधनों को इसमें झोंक दिया है। धर्म के नाम पर पृथ्वी के एक भी मनुष्येत्तर प्राणी ने एक केजी ऊर्जा और संसाधन का अपव्यय नहीं किया है। आज भी सबसे अधिक उर्जा और संसाधन इन्हीं खोखले धार्मिक विचारों के रक्षण में लगाए जा रहे हैं। जिसका खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है। किसी को किसी सब्जी के मसाले से दुश्मनी है तो किसी को खास मनुष्यों से नफरत और खास जानवरों से प्यार है।
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• धर्म ने मानव जाति को जितना बेवकूफ बनाया है, उतना और किसी ने नहीं। धार्मिक किताबों में लिखी तमाम रहस्यजनक समझे जाने वाली बातों के छिलके को विज्ञान एक एक करके उतार रहा है। अधिकतर का कचूमर निकाल ही दिया है। धार्मिक आदमी विज्ञान के इन छिलकों और कचूमर का सार्वजनिक उपयोग तो करता है लेकिन व्यक्तिगत दिमाग के अंदरूनी हिस्से पर काबिज़ धार्मिक मन उसे मानता नहीं।
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* वास्तव में धार्मिक मन और मनोवैज्ञानिक भावनाओं को जन्म और मृत्यु के रहस्यों के बंधनों से कस कर बाँध दिया गया है और तमाम करोडों वैज्ञानिक उपलब्धियों को देखते हुए भी तुरंत सिर घुमा कर नज़रों को धार्मिक बातों की ओर मोड़ लेता है। हर अनसुलझे रहस्य के लिए शुतुरमुर्गों की तरह धर्म की शरण में मुँह छुपा लेना और उसमें छिछले रूप से उसका कारण और उलजूलूल तर्क ढूँढना धर्म और असली-नकली धार्मिकों का शगल रहा है।
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• लेकिन विडंबना देखिए इन किताबों में हर रहस्य का ज्ञान होने के तमाम दावों के बाद भी आज तक कोई भी बड़बोले दावों को वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुरूप व्यावहारिक रूप में साबित नहीं कर पाया है। कुल मिला कर घुमा फिरा कर मानसिक शांति के चोंचेलबाजी विचारों की ओर बहस को खींच लिया जाता है। धार्मिक पोथियों के वजन को बढ़ाने के लिए समय समय पर उलटे सीधे दावे किए जाते रहते हैं। मानसिक अशांति के लिए दायी समस्याओं को खत्म करने की कोशिश करने के लिए प्रेरित करने के बजाय धार्मिक मनोविज्ञान धर्म में घुस कर मृगमरीचिकामयी शांति तलाशने के लिए निदेश देता है।

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• कभी कहा जाता है कि इन किताबों में विमान बनाने की विधि लिखी हुई है तो कहीं पोथी में किसी बैनेरी तारे के किसी ग्रह में आत्माओं का अंतिम ठिकाना होने का दावा। अनेक बार लोगों को सरगोशी की आवाज में काले पीले, नीले या हरे रंग के जीवित ईश्वर होने की आशा बंधायी जाती है। मतलब धार्मिक गुलाम बनाने के नये नये उपाय किए जाते रहते हैं और इसका शिकार मानसिक रूप से पिछड़ा समाज सबसे अधिक होता है। क्योंकि उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सर्वदा अभाव रहता है। लकड़ी, पत्थर, मिट्टा की मूर्तियों, रोटी के टुकड़ों की प्राण प्रतिष्ठा करके उसे जीवित ईश्वर में बदला जाता है। लेकिन मृत व्यक्ति के शरीर में प्राण नहीं डाला जा सकता है। जबकि मृत शरीर के जी उठने की संभावना सबसे ज्यादा हो सकती है। यूएफओ, परग्रही एलियन की बातों को भी स्वर्ग से उतर कर आने वाले देवदूत, ईश्वर के रूप में चर्चा करके वैज्ञानिक विमर्श को ही उलटने की कोशिश इस वैज्ञानिक युग के दरमियान भी चालू ही है।
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• आज भी पुरानी पोथियों की पढ़ाई बद्दस्तूर चालू है। जितनी पढ़ाई इन किताबों की करते हैं, उतने ही धार्मिक चोंचलेबाजी के चक्कर में पड़ते जाते हैं। आज मनुष्य-मनुष्य के बीच जो लडाईयाँ चल रही और समाज में जो विभेद दिखाई देता है, उसकी चोंचलेबाजी पृष्टभूमि भी इन्हीं किताबों ने तैयार की है। संसार की आधी जनसंख्या इन्हीं किताबों की गुलामी करती है। इन किताबों के बाज़ार और धर्म के मुनाफा-जमींदारी-सिद्धांत ने आधुनिक राजनीति के न्याय सिद्धांत को मटियामेट कर दिया है। देश की अधिकांश जनता को राजनीति के नाम पर धार्मिक कायदों से गुलाम बना दिया गया है। धर्म के नाम पर पूरे क्षेत्र को और समुदाय को दुश्मन मान लिया जाता है। धर्म के आफीम से संचालित समुदाय इसे ही सामाजिक न्याय की राजनीति समझ लेता है। धार्मिक पोथियों की चालाकी से निकले चोंचलेबाजी की किरणें वहाँ-वहाँ तक पहुँचती है, जहाँ-जहाँ किसी कवि की कल्पना नहीं पहुँचाती है। धर्म के चोंचलेबाजी-कसरती कल्पना से धाँसू कवि और लेखक भी मात खा जाते हैं।
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• लेकिन चालाक लोग इन किताबों की गुलामी से खुद को मुक्त कर चुके हैं और इन किताबों का उपयोग सहज रूप से दूसरों के दिमाग को गुलाम बनाने के लिए उपकरण के रूप में कर रहे है। घाघ राजनीतिज्ञ इसी वर्ग के मनुष्य होते हैं। बाकी के चालाक लोग कौन हैं इसे जानने के लिए दिमाग के परतों को खोलने की जरूरत है। लेकिन दिमाग तब खुलेगा जब आदिम जमाने में लिखी किताबों से सोचने की शक्ति पर लगाया गया नियंत्रण को हटाया जाएगा। नहीं तो चोंचलेबाजी-सभ्यता अगली सदी में भी प्रमुख सभ्यता के रूप में जिंदा रहेगी।