रस महुआ बसंती

नेह अर्जुन इंदवार

बसंत के उस दिन जब तुमने पहनाया था,

सुगंधित सजे महुआ के फूलमाला।  

 

बारिश के अंतहीन झोकों से भी,

नहीं गया वह महक फिर कभी।

 

जरा बोलो न ! क्या मिलाया था हार में,

युगों तक छाया है नशा हृदयाकाश में।  

 

कभी सावन के फुहारों से भी,

छिड़क दे कुछ बूंद मेरे मन में।

 

प्यार-प्यास के रेगिस्तान में,

चमकेंगी शबनम सी, रेत के किसी कण पर।

  

क्षणभंगुर तन तो छूट गया सदियों पहले,

मन-देह भटक रहा अब भी सीमाहीन।

 

बोलो न, आखिर क्या मिलाया था

तुमने, रसदार महुआ के फूलों में,

 

काश ! खिलखिलाता फिर बसंत होता,

महुए सने वन-वातायन होता।

 

फिर और, एक जीवन-जन्म होता,   

उम्रहीन “नेह”, तुम और रस-महुआ होता ।।