विलुप्त हो रही झारखड की मौलिक आवाज

First ad

प्रवीण प्रियदर्शी, रांची, झारखण्ड क्षेत्र की विशिष्ट सभ्यता, संस्कृति और जीवन पद्धति के आधाप पर लगभग एक सौ वर्ष के संघर्ष के बाद झारखंड राज्य तो अस्तित्व में आ गया, लेकिन इन विशिष्टताओं को पहचान देने वाली जनजातीय भाषाएं बाह्य संसर्ग और विकास की आंधी में गुम होती जा रही हैं। कृषि, आखेट व जंगल के नदी-नालों से रंग-बिरंगी जीवन पद्धति की हर भाव-भंगिमा को अभिव्यक्त करने वाले सूबे के सभी 32 जनजातीय समुदायों की 32 भाषाओं में से 27 विलुप्त हो चुकी हैं, जबकि पांच बड़ी जनजातीय भाषाओं को केंद्रीय भाषा संस्थान मैसूर ने देश के बारह संक्रमण काल से गुजर रही भाषाओं की सूची में डाल खतरे का संकेत दे दिया है। भाषा शास्त्रियों ने तो साफ कर दिया है कि यदि सजग प्रयास नहीं हुए तो आने वाले सौ वर्ष में फिलहाल 15 लाख लोगों के द्वारा बोली जाने वाली कुड़ुख भाषा भी विलुप्त हो जाएगी। कुड़ुख लिटरेरी सोसाइटी आफ इंडिया के अध्यक्ष डा. हरि उरांव कहते हैं कि कुड़ुख बोलने वाले अब या तो बुढ़े हैं या जवान, बाजार के अनुकू ल नहीं होने के कारण बच्चे इसे सीखने से परहेज करते हैं। मालूम हो कि झारखंडी जनजातियों में द्रविड़ और आस्टि्रक भाषा परिवार से संबद्ध भाषाओं का बोलबाला है। उरांव जनजाति की भाषा कुड़ुख व मालेर जनजाति की भाषा मालतो द्रविड़ परिवार की भाषा है जबकि मुंडारी, संताली, हो और खडि़या आस्टि्रक भाषा परिवार से संबद्ध हैं। इस परिवार की कई भाषाएं वैज्ञानिक, तकनीकी शब्दावली के अभाव में बाजार की मांग के अनुरूप खरी नहीं उतर पा रहीं और उनके विलुप्त होने की रफ्तार बढ़ गई है। संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि आदिवासी भाषाओं में महत्वपूर्ण परंपरागत ज्ञान संरक्षित हैं। सिंधु घाटी सभ्यता के कई स्थलों सहित अन्य ऐतिहासिक स्थलों की खुदाई में ऐसे अनेक अभिलेख मिले हैं, जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। कई विद्वानों द्वारा उन्हें आदिवासी भाषाओं से मिलाकर समझने का प्रयास किया जा रहा है, ऐसे में इन भाषाओं के लुप्त होने से बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी के लुप्त होने का भी खतरा पैदा हो गया है। डा. हरि उरांव कहते हैं जनजातीय भाषाओं का मौखिक साहित्य लिखित साहित्य से काफी समृद्ध है। लेकिन भाषाओं को जीवित रखने के लिए वर्तमान समय के अनुसार अब उन्हें लिखित साहित्य का रूप देना आवश्यक है। वह कहते हैं कि इस ओर सरकार का रवैया भी काफी उपेक्षापूर्ण रहा है। आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भाषाओं में संताल एकमात्र झारखंडी जनजातीय भाषा है, जबकि कई ऐसी भाषाएं इस सूची में शामिल हैं, जिन्हें बोलने वालों की संख्या झारखंड की अन्य जनजातीय भाषाओं से भी काफी कम है। कई राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों ने एक से अधिक भाषाओं को राजभाषा का दर्जा दिया है। झारखंड में भी ऐसा किया जाना चाहिए। डा. उरांव कहते हैं कि जनजातीय साहित्य के प्रकाशन की व्यवस्था भी सरकार के स्तर पर की जानी चाहिए तथा इन भाषाओं में साहित्य सृजन को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र संघ की सांस्कृतिक परिषद की रिपोर्ट के अनुसार इस सदी में दुनिया क सात हजार भाषाओं में से 63 सौ भाषाएं मर जाएंगी। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए जनजातीय भाषाओं का संरक्षण आवश्यकता हो गया है। वहीं झारखंड में सादरी (नागपुरी), कुरमाली, खोरठा और पंचपरगनिया चार प्रमुख क्षेत्रीय भाषाएं हैं। इसमें सादरी नागवंशी राजाओं के संरक्षण के कारण झारखंड के आदिवासी और गैर आदिवासी समुदायों के बीच समान रूप से लोकप्रिय है। इसने जहां झारखंड के सदान और आदिवासी समुदायों को एक सूत्र में बांधे रखा है, वह सूबे की संपर्क भाषा बन कर उभरी। इन भाषाओं की भी पर्याप्त वैज्ञानिकता के बावजूद वे बाजार की लड़ाई हारती दिख रही है।