आदिवासी समाज को बेहतर शिक्षा देनेवाले बाबूलाल कुजूर

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                                                                                                 रामा डहंगा मुण्डा          

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बाबूलाल कुजूर का जन्म मेटेली चाय बागान में हुआ था। उनके पिता का नाम – बंधना कुजूर और माता का नाम – प्राबतिया कुजूर था । बंधना कुजूर के चार पुत्र थे – बाबूलाल कुजूर, आशो कुजूर, परा कुजूर और प्राधुम्ना कुजूर।

          किसी व्यक्ति का इतिहास बनता है उसकी कड़ी मेहनत और तपस्या से। बाबूलाल कुजूर चाय बागान के गरीब परिवार से थे । बागान में काम करने वाले एक व्यक्ति को अपने  चार बेटों को पढ़ाना-लिखाना कितना मुश्किल है, यह बागान वाले ही जानते हैं। मैं बाबूलाल कुजूर को जब से जानता हूँ, तब से उनको समाज में अच्छा काम करते ही देखा है। बाबूलाल कुजूर मेटेली बाजार के हाई स्कूल से बंगला माध्यम से शिक्षा ग्रहण किया था। वे स्कूली जीवन में अपनी पढ़ाई के खर्च के लिए मेटेली बाजार में रविवारीय हाट में गुड़ यानी मीठा बेचते थे। दुकान से जो आय होता था उसे वे अपनी पढ़ाई में लगाते थे। पढ़ाई खर्च के लिए कभी अपने पिता को परेशान नहीं किया। स्कूल लाईफ में वे स्काउट संस्था से जुड़े, और संस्था की ओर से समाज का काम करते थे। उन्होंने कई नाटक लिखे और उनका मंचन भी किया था। आदिवासी समाज को शराब से सचेत करने के लिए नाटक लिखा जिसे गीत में ढाल कर लोगों को यह संदेश दिया, कि अत्याधिक शराब पीने वाले अपने माता-पिता के संस्कार को भूल जाते हैं। इसका मंचन सादरी में किया गया था । ”मांय-बाप पीछे हांड़ी-दारू आगे, हांड़ी-दारू से तनिको नाखे लाज मोके“। नाटक में एक आदमी शराब पी कर घर आता है, शराब पीने से उसका व्यवहार कैसा बदल जाता है। वह घर में झगड़ा करता है, गाली-गलौज करता है। ठंड के मौसम में वह पीकर घर आता है, हल्ला करता है और जलते हुए आलव को लात मारता है जिससे उसका पैर बुरी तरह जल जाता है। घरवाले घायल हालात में उसे दवाखाना ले जाते हैं । इस नाटक से काफी लोगों को शिक्षा मिली थी।

          कड़ी मेहनती बाबूलाल कुजूर को शिक्षण समाप्ति के बाद दिनांक 14-05-1979 को बंगाल सरकार के कृषि विभाग में नौकरी मिली। नौकरी के कुछ दिनों के बाद ही वे मेटेली बागान के ही एक लड़की के साथ परिणय सूत्र में बंध गए। समय के साथ समाज की सेवा बढ़ती गई। वे आदिवासी संस्थाओं से जुड़ कर समाज के लिए काम करने में विश्वास करते थे। वे अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद का सदस्य बने।  इस संस्था के कार्यक्रम के दौरान बाबूलाल कुजूर को एक किताब प्राप्त हुई। उस किताब में आदिवासी समाज के सांस्कृतिक पूजा पाठ कथा, पूजा करने की विधि और शादी करवाने की विधि और विधान लिखा था। आदिवासी समाज में करम पूजा को प्रकृति का पूजा माना जाता है। बाबूलाल कुजूर करम पूजा करवाते थे और पूजन विधि की अगुवाई करते थे । इसी तरह से वे शादी का पाठ भी पढ़ते थे और शादी करवाते थे। वे जब से अखिल भारतीय विकास परिषद् संस्था के साथ जुड़े तब से आदिवासी समाज को एक सूत्र में लाने का प्रयास ही किया । परिषद के विभिन्न कार्यक्रमों से जुड़ने और अपनी बात रखने के कारण बाबूलाल कुजूर को लाइफ में मुसीबतों का सामना भी करना पड़ा। लेकिन वे अपनी जगह पर कायम रहे और सामाजिक काम को पूर्वत करते रहे।

इसी सामाजिक सोच से प्रेरित होकर बाबूलाल कुजूर ने सामाजिक शिक्षा के प्रचार के लिए एक कहानी लिखा और उस कहानी पर एक फिल्म बनाया, जिससे समाज को शिक्षा मिले और समाज के लोग आगे बढ़े। उन दिनों आदिवासी समाज में नाटक करने वाले, अभिनय करने वाले नहीं मिलते थे। बाबूलाल कुजूर को सादरी गीत गायक के तौर पर सुदर्शन कुजूर और अमर नायक मिले।  गीत रिकार्ड होने, गाने को समाज के सामने लाने और सुदर्शन कुजूर, अमर नायक के मधुर आवाज को सुनने के बाद फिल्म में अभिनय करने वाले एक-एक करके जुड़ने लगे। इस तरह से बाबूलाल कुजूर ने 1991 साल में ‘‘सांझ आउर बिहान’’ नामक सादरी फिल्म बनाया। यह फिल्म वीडियो कैसेट पर बनी थी। इस फिल्म को काफी दिनों तक डुवार्स के गाँव बागानों में दिखाया गया। फिल्म देख कर काफी लोगों को एहसास हुआ कि आदिवासी समाज में भी प्रतिभाशाली कलाकार हैं। डुवार्स के आदिवासी समाज में सादरी भाषा में फिल्म बनाने वाले वे पहले व्यक्ति थे। 2008 में जब डुवार्स तराई में आदिवासी समाज एक सू़त्र में आने लगा तब मैंने (रामा डहंगा) बाबूलाल कुजूर के साथ काम किया। समाज का कहीं भी सभा होता था बाबूलाल कुजूर मुझे साथ लेकर चलते थे । कभी-कभी सभा में वे मुझे बोलने के प्रेरित करते थे । इस तरह से हम दोनों दादा भाई की तरह मिलकर काम कर रहे थे।  बाबूलाल कुजूर कहते थे उन्हें और एक फिल्म बनाने की इच्छा है,  कहानी लिख रहा हूँ। इस तरह से बाबूलाल कुजूर समाज के लिए और भी बहुत कुछ करने की इच्छा रखते थे। जब 2009-10 में डुवार्स तराई का आदिवासी समाज एक मंच पर आया तो बाबूलाल कुजूर जैसे लोग बहुत खुश थे। वे कहते थे हमारी वर्षों की मेहनत बेकार नहीं हुई है। लेकिन कुछ दिनों के बाद जब आदिवासी समाज फिर से दो तीन भाग में बँटने लगा, तो उन्हें भी और लोगों की तरह बहुत दुख हुआ। कुछ दिनों के बाद बाबूलाल कुजूर की शरीरिक अवस्था खराब होती चली गई, इलाज के लिए उनका वेल्लोर आना-जाना होता था। चालसा में उनका दफ्तर होने की वजह से वे चालसा के निवासी बन गए थे। मुझे समय मिलता था तो मैं उनके आफिस में जाकर मिलता और ढेर सारी बातें बैठ कर करते थे। मैं देखता था उसके चेहरे में पहले जैसा बातें करने का जोश नहीं रह गया था। वे कहते थे अब तो मैं दवा के सहारे चल रहा हूँ।

          उनकी एकलौती बड़ी बेटी की शादी हो चुकी थी और वे काफी पहले ही नाना बन चुके थे।  उनके दो बेटे हैं जिसमें से छोटे बेटे की शादी कुछ साल पहले हुई, बड़ा बेटा अपने पिता की तरह ही समाज सेवा से जुड़ा हुआ है। बाबूलाल कुजूर अपने मेहमान नवाजी के लिए जाने जाते थे।  किसी भी आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता  के लिए उनका घर हमेशा खुला रहता था। 

14 जनवरी 2013 सोमवार का दिन था किसी ने मुझे फोन पर बताया कि बाबूलाल कुजूर इस दुनिया में नहीं रहे । यह खबर सुन कर मैं स्तब्ध हो गया। जीवन भर आदिवासी समाज के हित में काम करते हुए बाबूलाल कुजूर इस दुनिया से विदा ले लिए ।

                                                                                                मेटली चाह बागान, चालसा