वोट बैंक के पुर्जे चाह बगानिया

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                                                                                                                                                            रामा डहंगा मुण्डा, मेटेली चाह बागान

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माँ बच्ची को गोद में ले कर जाती है चाह बागान में पत्ती तोड़ती है। माँं रोज अपनी बच्ची के मासूम से चेहरे को देखती है और सपने संजोती है, कि बच्ची को अच्छे से स्कूल में पढ़ाएगी और बच्ची को एक काबिल इंसान बनाएगी । वह सोचती है, उसे वह अपनी तरह चाय बागान मजदूर नहीं बनने देगी और वह कहीं अच्छी सी सरकारी नौकरी करेगी और अच्छा जीवन जिएगी ।

लेकिन बच्ची जैसे-जैसे बड़ी होती है वैसे-वैसे ही माँ की चिंता बढ़ती जाती है । बच्ची को अच्छे स्कूल में पढ़ाने के लिए रूपयों की जरूरत है, एक बड़ी रकम की जरूरत है । बच्ची के दिमाग को तेज रखने के लिए बच्ची के शरीर को तंदुरूस्त बनाना है। तंदुरूस्त रखने के लिए अच्छे भोजन की जरूरत है । लेकिन अच्छी पढ़ाई और अच्छा भोजन कैसे हो पाएगा ? भोजन में हरी सब्जी और दाल नसीब नहीं होता है, क्योंकि दाल की कीमत 100 रूपये किलोग्राम है और हरी सब्जी 40 रूपये किलोग्राम है । इन सबके बीच चाय बागान का हजिरा है 132 रूपये ।

इस तरह समय चलता रहता है। माँ की चिंता बढ़ती जाती है, कैसे करे बच्ची की पढ़ाई ? बच्ची को सही पौष्टिक आहार नहीं मिलता है । शरीर दुर्बल रहता है, दिमाग कमजोर होता है, कुपोषित बच्ची का चेहरा मुर्झाया हुआ दिखाई देता है । चेहरे में बचपन की चमक गायब रहती है । माँ की चिंता बढ़ती जाती है । बच्ची सरकारी स्कूल में पढ़ने जाती है लेकिन स्कूल में उसे ठीक से पढ़ाया नहीं जाता है । वह पाँचवी कक्षा में रह कर भी ठीक से न तो पढ़ पाती है, और न ही उच्चारण कर पाती है । वह खुद अनपढ़ होने के कारण घर में बच्ची का मार्गदर्शन नहीं कर पाती है । ट्यूशन पढ़ाई के लिए पैसे नहीं हैं । गरीब बच्चों को मुफ्त में पढ़ाने के लिए कोई तैयार नहीं । बच्ची पढ़ाई में कमजोर होते जाती है और बार-बार फेल होकर एक दिन वह स्कूल छोड़ देती ।

चाय बागानों में काम करने वाली महिलाएँं काम करते-करते अपनी जिंदगी कष्ट में गुजार देती हैं । फिर एक दिन 60 वर्ष की हो जाती हैं और काम से रिटायर हो जाती हैं । अपना घर, खेत-खलिहान और वैकल्पिक जीवन-यापन करने का और कोई ठौर-ठिकाना तो नहीं रहता है, वह क्या करे? बुढ़ापा कैसे गुजारे ? फिर वह अपने उस संतान को बागान के मजदूरी काम में लगा देती है । बच्ची को लेकर बुने गए सभी सपने वास्तविकता की कठोर धरती पर गिर कर कांच की तरह चकनाचूर हो जाते हैं । परिस्थिति को वह अपना किस्मत मान लेती है ।

जिस तरह से चाय का पौधा बूढ़ा हो जाने पर उसे उखाड़कर फेंक देते हैं, ठीक उसी तरह चाय मजदूर को भी 60 वर्ष होने पर मुश्किल जिंदगी का सामना करना पडता है । 30-35 साल चाह बागान में काम करने के बाद भी चाय मजदूर अपनी संतान को बेहतर जिंदगी नहीं दे सकते हैं । संतान सवाल करते हैं, “आप लोगों ने क्या किया मेरे लिए ।”

“बूढ़े माँ-बाप सोचते हैं, क्या किया हमलोगों ने ? अपने शरीर के खून-पसीने को चाह बागान के मालिक को दे दिया, लेकिन अपनी संतान के लिए क्या किया? चाह बागान के मालिक ने हमारे लिए क्या किया? क्या वे हमें अपना मजदूर समझते रहे ?”

बूढ़े माँ-बाप बीते दिनों के बारे सोचते हैं और पछताते हैं । पिछले 65 साल में देश के बाजारों में जिस तरह से सामानों के दाम में बढ़ोतरी हुई है, उस तरह से चाय बागान में वेतन बढ़ोतरी नहीं हुई है । आज के समय में चाह बागान के लोगों के लिए गुजारा करना कितना मुश्किल हो गया है। ऐसा लगता है कि राजनेता और बागान मालिक मिलकर चाह बागान के लोगों का शोषण कर रहे हैं । शोषण करने का एक ऐसा तंत्र विकसित कर लिया गया है कि मजदूर जिन्दगी भर मजदूरी के चक्र से बाहर नहीं आ पाता है। क्योंकि मजदूर सामाजिक रूप से जागरूक नहीं हैं । वे जिन्दगी को अलग नजरिए से देखने में, इससे निकलने में असमर्थ हैं ।उनके नेतागण भी मजदूरों की तरह ही समर्थहीन हैं ।

एक दिन एक पार्टी का एक छोटा सा नेता गाँंव में घूमते हुए एक गुजरते बूढ़े आदमी से कहा “बाड़ा, वोट आलक, वोट इकर में देबे हाँं।”

बुजुर्ग आदमी ने जवाब दिया,  “वोट देते- देते बूढ़ा होई गेली, तोहरे हमरे के सिखाबा वोट देवेक । 65 साल होलक देश कर आजाद होवल, आउर चाह बगान कर हजिरा होलक 132 रूपया । जाइनले कि एगो भिखमंगा भीख मांइग के दिन में 200 रूपया जुटाएला । ”

बुजुर्ग की बात का गाँव के छोटे नेता के पास जवाब नहीं था और वह वहाँं से चलता बना ।

एक दिन मैं (रामा डहंगा) रेल से सिलीगुड़ी जा रहा था, सांझ का समय था, मैं अकेला बैठा था, मेरे पड़ोस का, मेटेली चाह बागान का रहने वाला एक लड़का मुझे मिला, जो मुझे अच्छी तरह पहचानता था ।

उसने मुझसे पूछा,  “कहाँं जा रहे हो ?”  मैंने जवाब दिया, “सिलीगुड़ी जा रहा हूँ ।”

“तुम कहाँ जा रहे हो?” मैंने उससे पूछा ।

“जम्मू जा रहा हूँ।”  उसने जवाब दिया।

मैंने पूछा “किसलिए जा रहे हो?”  उसने जवाब दिया “काम करने के लिए, वहाँ मैं होटल में काम करता हूंँ।”

 फिर मैंने पूछा  “कितना हजिरा मिलता है ?” उसने बताया, “महीना का छह हजार, रहना और खाना मालिक का ।”

“कितने दिनों से काम कर रहे हो ?”

“दो साल से कर रहा हूँ, वहाँं पैसा कमा कर यहाँं एक अच्छा-सा घर बनाया हॅूंं,चाह बागान में ही काम करता तो इतने कम समय में इतना कुछ नहीं कर पाता।”

मैं उसकी बातों को सुन कर दंग रह गया ।

मेरा जब से होश हुआ है, तब से मैं देखता आ रहा हूँ इस एरिया में कोई भी संगठन बनता है, या कोई भी पाॅलिटिशियन आते हैं, वे चाह बागान की व्यवस्था के बारे बातों को लेकर आते हैं । देश को आजाद हुए 68 साल हो गये, लेकिन चाह बागान के लोगों का परिवर्तन का समय नहीं आया है ।

चाह बागान के हजिरा का समझौता 3 साल बाद, तीन साल के लिए होता है । जिसमें सिर्फ कुछ रूपयों की बढ़ोतरी होती है । जो इतना कम होता है, कि उससे घर परिवार ठीक से चलाने के बारे सोचा ही नहीं जा सकता है, लेकिन चाय बागान के लोग उसी पैसे से जिंदगी काट रहे हैं । चाय बागानों के जो नेता कभी चप्पल पहन कर साइकिल में चला करते थे, वे कुछ सालों में ही लाखों के मालिक बन जाते हैं और बड़ी-बड़ी गाड़ियों में उड़ते नजर आतेे हैं । जो बागान में काम करते हैं, वे तो उसी धरती पर रेंगते रहते हैं लेकिन जो उनके नाम पर नेतागिरी करता है, वह मालामाल हो जाता है ।

चाह बागन के लोगों की जिंदगी सँवारने का दावा सभी करते हैं। हर चुनाव के पूर्व वे चाह बागान के लोगों के बारे लम्बी-चौड़ी बातें करते हैं, वादे करते हैं, लेकिन वोट पाने के बाद उन्हें चाह बागान के लोग याद भी नहीं रहते है । चाय बागान के लोग सिर्फ वोट बैंक बन के रह गए हैं। जिनका काम है नेताओं के बताए गए चिन्ह पर वोट देना ।

चाय बागान में अपना खून -पसीना लगाते हैं वे तो नंगे ही रह जाते हैं, लेकिन जो इनके नाम पर काम करने, राजनीति करने का दम्भ भरते हैं वे पता नहीं इन्हीं चाय बागानों के कारण कैसे आदमी बन जाते हैं ?

एक बच्ची को आदमी बनाने के लिए जो सपने देखे जाते हैं, वे इस देश की नीति-रीति में सिर्फ चकनाचूर होने के लिए हमेशा दिल और दिमाग पर चक्कर काटते रहते हैं । क्या कोई इस स्थिति को बदल सकता है ? कौन बदलेगा इस स्थिति को सभी तो अपने- अपने स्वार्थ के साथ जीवन जीने में व्यस्त हैं । शायद हम लोगों को ही अपने सपनों को सच करने के लिए नये अंदाज में संघर्ष करना होगा और अपना नेता खुद बनना होगा ।