आदिवासी मीडिया के षड़यंत्रकारी विरोधी

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आदिवासी मीडिया से किसको खतरा हो सकता है। कौन डरता है आदिवासी मीडिया से ? इससे किसको फायदा हो सकता है और किसको नुकसान ?

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जी हाॅं या सत्य है आदिवासी मीडिया से किन्ही लोगों या संस्थाओं को खतरा पैदा हो गया है। किन्हीं को डर लग रहा है और वे निरंग पझरा के प्रचार प्रसार और डुवार्स तराई के दुकानों में हो रहे बिक्री को रोकना चाहते हैं। वे रोकने में सफल भी हो गए हैं।

आदिवासी मीडिया के प्रचार प्रसार को कौन रोकना चाहता है ? कौन इसे दुकानों पर बिकने से मना करता है ? कौन इसके चिट्ठियों को आने से रोकता है ? किसको आदिवासी मीडिया से डर है या किसे नुकसान होने वाला है ? यह एक गंभीर प्रश्न बन के सामने आया है।

निरंग पझरा आदिवासी मुद्दों पर समाचार, लेख और साहित्यिक आालेख कहानी, कविताएॅं प्रकाशित करता है। आदिवासी अधिकारों की बातें करता है और आदिवासी अधिकारों, विकास के लिए जागरूकता बढ़ाने के लिए अपने कर्तव्य को निभाता है।इससे आदिवासी समाज को कितना फायदा पहुॅंचता है या इसका कितना सकरात्मक प्रभाव पड़ा है, इसका आकलन तो भविष्य में ही किया जा सकता है।

निरंग पझरा के प्रकाशन का एक मात्र उद्देश्य समाज सेवा है। मीडिया सामाजिक विकास का एक सशक्त और जीवंत माध्यम है और इसके द्वारा आदिवासी समाज का सशक्तिकरण किया जा सकता है तथा जागरूक बनाया जा सकता है।

निरंग पझरा का प्रकाशन पत्रकारिता का विधिवत प्रशिक्षण लेकर पत्रकारिता के वास्तविक अनुभव रखने वाले पत्रकारों के सहयोग से होता है। मीडिया की शक्ति और इसके उत्तरदायित्व और जिम्मेदारी का एहसास निरंग पझरा को है।

निरंग पझरा किसी के राजनैतिक और आर्थिक साम्राज्य और जमींदारी को छीनने नहीं आया है। न ही या किसी प्रकार के नकरात्मक पत्रकारिता का पक्षधर है। लेकिन यह आदिवासी समाज के विकास और अधिकार की बाद करता है। जो आदिवासी विकास और अधिकारों का विरोधी होगा, उन्हें ही निरंग पझरा जैसे पत्रिकाओं के प्रसार और प्रसार से चिढ़ते होंगे। ऐसी सोच और विचारधारा के लोग असामाजिक उद्देश के साथ आदिवासी हित के विरूद्ध कार्यरत्त हैं यह स्पष्ट है।

निरंग पझरा को बिकने से रोकने वाले साधारण लोग नहीं हैं। लेकिन ये आदिवासी विरोधी हैं यह तो स्पष्ट है। अभी इनकी पहचान नहीं हो पाई है। अभी ये नकाब के पीछे अपनी सूरत छिपाए हैं। वे दुकानदारों को निरंग पझरा बेचने से मना कर रहे हैं। दुकानदारों ने इसे बेचने से मना कर दिए हैं। जिन दुकानों में सैकड़ों पत्रिकाएॅं बिक रही हैं वहीं एक आदिवासी पत्रिका के लिए जगह नहीं है। अभिव्यक्ति की गारंटी देने वाले संविधान को पैरों तले रौंदने वाले लोग सम्मानित और सज्जनता के विचारों से लैस तो नहीं ही होंगे।

निरंग पझरा से किसको चुनौती मिल रही है या किसका राजनैतिक, आर्थिक, साहित्य या सामाजिक नुकसान हो रहा है ? आदिवासियों के जागरूक होने, उन्हें उनके अधिकार मिलने से किसको परेशानी हो रही है।

एक छोटी सी अनियमित और महीनों के बाद छापने वाली पत्रिका से किसको क्या चुनौती मिल रही है? यह कल्पनातीत बातें लगती है। लेकिन यह सत्य है कि इसे कहीं दुकानों में स्थान नहीं मिल रहा है। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि इसे आदिवासी दुकानदार भी बेचने के लिए तैयार नहीं । इसके पोस्टर कई दुकानों में लगाए गए थे लेकिन सभी पोस्टर उतार दिए गए।

किसी भी समाज की उन्नति और विकास के लिए मीडिया की आवश्यकता सार्वभौमिक है। विकास का केन्द्र बिंदु मानसिक विकास और जागरूकता है। बिना मानसिक विकास और जागरूकता के किसी समाज का उत्थान संभव नहीं। शैक्षणिक रूप से पिछड़़ गए आदिवासी समाज में मीडिया की आवश्यकता किसी रोगी को दी जाने वाली प्राणरक्षक दवा की तरह है। दुनिया में जितने भी समाज आगे बढ़ा है वह शिक्षा प्राप्त करने के बाद अपने घरेलु मीडिया के बल पर जागरूकता हुई है और समाज अधिक लोकतांत्रिक हुई है।

देश में मीडिया ने आश्चर्यजनक कार्य किया है। यह देश में लोकतंत्र, स्वतंत्रता और समानता के विचारों को मजबूत किया है।

आदिवासी विकास की बातें स्थानीय सरकार से लेकर अंतर्राष्ट्रीय मंचों तक हो रही है। यह तय है कि बिना आदिवासी विकास के देश विकसित नहीं हो सकता है। आदिवासी विकास के लिए सरकार अरबों रूपये आबंटित करती है। लेकिन देश में विकास विरोधी लोग भी हैं जो एक पूरे समाज के विकास में बाधा डालना चाहते हैं। ऐसे कौन लोग हैं जिन्हें आदिवासी मीडिया से जलन होती है, जो उसके रास्ते में बाधा खड़ी करना चाहते हैं। आदिवासी विकास और जागरूकता से इन्हें कौन सा नुकसान होने वाला है। आदिवासी और देश के विकास में बाधा बनने वाले ये लोग कौन हैं ? समाज विरोधी और देशद्रोही है तो नहीं ?

तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया में आदिवासी समाज के लिए कोई स्थान नहीं है। आदिवासी प्रतिनिधियों को वहाॅं जगह भी आसानी ने नहीं मिलती है। आदिवासियों को अपना मीडिया का आकाश खुद बनाना होगा। आदिवासी मीडिया की आदिवासी लेखकों को प्रोत्साहन दे सकता है। वही आदिवासी बुद्धिजीवियों को सामने ला सकता है। सामाजिक विकास और जागरूकता बुद्धिजीवी नेतृत्व से ही मिलता है। यह परूी दुनिया और स्वतंत्र देशों में सिद्ध हो चुका है। जनता के जागरूक होने पर शोषकों का जंजीर टूट जाती है। जनता आजाद हो जाती है और वह अपने वजूद और विकास के लिए स्वयं फैसला लेती है। जो आदिवासी समाज को अपने चंगुल में रखना चाहते हैं उन्हें आदिवासी मीडिया से चिंतित होना लाजमी है।

संविधान ने सभी को बराबरी का दर्जा दिया है। समता और स्वतंत्रता की लड़ाई सबसे पहले 1772 में आदिवासियों ने ही शुरू किया था । देश स्वतंत्र हो गया है लेकिन निहित स्वार्थ में लिप्त सामंती जमींदारी दिमागों को आम जनता की स्वतंत्रता रास नहीं आई है। शोषक अपने उपनिवेश को बद्दस्तुर बचाए रखना चाहते हैं। इसीलिए वे आदिवासी मीडिया के विरूद्ध में गैरकानूनी और अपराधिक षड़यंत्र में रत्त हैं। आदिवासी समाज को इस पर गंभीर मंत्रणा करने की जरूरत है और उन्हें मुॅंहतोड़ जवाब देने की जरूरत है। आदिवासियों को अपने वजूद बचाने के लिए एकजुट होकर आदिवासी मीडिया को बचाने, उसे बढ़ाने और मीडिया को विस्तार देने के लिए आगे आना होगा। उन्हें मकूल जबाव तो देना ही होगा। -नेह इंदवार