आदिवासी समाज-व्यवस्था कहाँ खड़ी हैं ?

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                                                                                                                                                                   वाल्टर कांदुलना, राँची

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आदिवासी समाज-व्यवस्था की विशेषताएँ –

   सामुदायिकता की भावना आदिवासियों में एक साथ रहने, काम करने, नाचने-गाने की परंपरा है। आदिवासी व्यक्तिवादी नहीं थे। हाँ,  अब शिक्षितों के बीच व्यक्तिवाद की भावना प्रबल होती जा रही है।

  • निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं।

एक दूसरे से आगे निकल जाने की प्रतियोगिता की भावना कम लेकिन सहयोग की भावना ज्यादा है।

  • आदिवासी समाज-व्यवस्था का कोई मौलिक-लिखित रूप नहीं है, लेकिन यह हमारी परंपरा, रीति-रिवाज, चाल-चलन, बोली-बचन, सामाजिक व्यवहार, आदत में गुंफित है।
  • हम व्यक्तिगत रूप से अपने सामाजिक व्यवस्था के अंग के साथ ही साथ भारतीय राज्य-व्यवस्था के भी अंग हैं । इसकी विशेषताएँ निम्न है –

भारतीय राज्य व व्यवस्था का एक लिखित संविधान है

      देश में उपलब्ध संसाधन और स्रोत, पद और पद से जुड़े अधिकार और उत्त्रदायित्व के रास्ते प्रत्येक नागरिक के लिए खुले है । पियून से लेकर प्रेसिडेंट तक का पद सबके लिए खुला है। शर्त सिर्फ एक है – उक्त पद के लिए

क्या आप योग्य हैं ?

  • चूँकि एक पद के लिए अनेक नागरिक योग्य हो सकते हैं इसलिए गला-काट प्रतियोगिता है। देश में उपलब्ध संसाधनों के लिए भी गला काट प्रतियोगिता है क्योंकि संसाधनों की उपलब्धता भी सीमित है।

      जब गलाकाट प्रतियोगिता है तो आपसी टकराव भी अवश्यसम्भावी है। इस टकराव को दूर करने के लिए कुछ “rules of the game” नियत किये गए हैं। ये ही नियम और कानून कहलाते हैं।

  • कानून को सही ढंग से अमल करने के लिए सरकारी तंत्र तटस्थ अम्पायर का काम करती है। वह किसी पार्टी का आदमी नहीं होता है । वह संविधान में उल्लिखित दिशा-निर्देशकों से संचालित होता है।
  • निर्णय बहुमत पर आधारित होता है। यानी सभी निर्णय वोट द्वारा लिए जाते हैं। बहुमत जिस निर्णय को मानता है वही कानून बन जाता है।
  • बारगेनिंग ताकत की महता–अपने पक्ष या हित में “निर्णय” को झुकाने के लिए मोल-तोल की क्षमता एक व्यक्ति की अपेक्षा कई लोगों के संगठन का होता है. ऐसे ही संगठन “राजनीतिक दलों” का निर्माण करते हैं। इन पॉलिटिकल पार्टियों का एक ही

लक्ष्य होता है अपना एक जनता-समूह का गठन करना और अपनी bargaining शक्ति को बढ़ाना ।

  • राज्य व्यवस्था जनता के हाथ में है, पर किस जनता के हाथ ? उसी जनता-समूह के पास जो अपना बहुमत सिद्ध कर सकता है । यही बहुमत का सिद्धांत प्रजातंत्र का मूल सिद्धांत है। 
  • भारतीय राज्य-व्यवस्था और आदिवासी समाज व्यवस्था में मूलभूत क्या अंतर है ?

राज्य-व्यवस्था में निर्णय “बहुमत” द्वारा लिए जाते हैं, आदिवासी समाज व्यवस्था में “सर्व-सम्मति” से ।

राज्य-व्यवस्था में प्रतिस्पद्र्धा (competition)  है जबकि आदिवासी समाज व्यवस्था में परस्परर सामाजिक सहयोग की भावना है। 

  • राज्य-व्यवस्था में बारगेनिंग एक मूल सिद्धांत है लेकिन आदिवासी समाज-व्यवस्था में इंतहंपदपदह प्रक्रिया की कोई जरुरत नहीं है।
  • उपसंहार-अब हम खुद इन अलग-अलग व्यवस्थाओं में तुलना करके देख सकते हैं कि क्यों आदिवासी समाज की हालात दिन ब दिन बदतर होती जा रही है ।’’’