उराँवों का अंतिम गढ़ (किला)

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                                                                               थदेयुस लकड़ा, कोलकाता

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सन् 1961 ई. में मैं छह क्लास में पढ़ता था। स्व. दोमनिक एक्का, छिछवानी, बरवे परगना के क्लास शिक्षक थे। उस समय संत योसेफ स्कूल कटकाही सिर्फ मिडिल (7th standard) तक ही था । यह स्कूल बरवे परगना का पुराना स्कूल है। ग्राम छिछवानी का इससे भी पुराना यानी आदि स्कूल था, जो कटकाही स्कूल चालू होने से बन्द हो गया। अभी उसी छिछवानी नाम से वो स्कूल पुजराटोली में चालू है । स्व. दोमनिक हमें समाज से जुड़े परम्परागत कथाएँ सुनाया करते थे।  जिनमें दो बातें (कथाएँ) हमें थोड़ी बहुत याद है । पहला हमारा गढ़, रोहतास गढ़ है, जहाँ हमारे पूर्वज राज किया करते थे । वे अति समृद्ध थे । वे चैन से रहते थे, उनका सुख शाँति जो उनके पतन का कारण बना। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत सच साबित हुई। जासूस लगा दिए गए, जो उनकी कमजोरी का पता लगा ले। इस काम में एक ग्वालिन ने दुश्मनों का काम आसान किया। उसने बताया कि उराँव लोग सरहुल पर्व बड़े जोर शोर से मनाते हैं, इस पर्व में वो खूब खाते-पीते तथा मौज करते हैं। मदिरा पान के चलते पुरूष लोग बेहोश हो जाते हैं। इसी का फायदा लेने की सलाह देती है।

       सरहुल पर्व उराँव समाज का सर्वश्रेष्ठ पर्व है, उस समय लोग इसकी तैयारी में व्यस्त थे।  उधर दुश्मन भी हमले की तैयारी में जुटा हुआ था।  मौके के इंतजार में आँखे गड़ाये था। उराँव समाज के साधारण धर्मे को सुमराआना (पूजा) कहा जाता है, जो रात में ही हुआ करता था,  अभी भी होता है। यों खान-पान दिन में ही हो जाता है । परिवार का (head) जब तक उस दिन का पाक-पकवान जो भी हो आगे/सर्वप्रथम धर्मे प्रकृति धरती माँ तथा माँ-बाप पूर्वजों को नहीं चढ़ाता,  घर में कोई अन्न ग्रहण नहीं करता है। यों खान-पान मौज-मस्ती शाम ढलते-ढलते चरम सीमा पर पहुँच जाता है। ठीक इस समय साधारणतः मर्द नशे में डूबे रहते हैं।

ऐसे ही एक उसत्व में दुश्मनों ने हमला कर दिया। परिस्थिति भाँपकर स्त्रियों ने उनसे डटकर मुकाबला किया। वो मर्दों की वेशभूषा में तीन बार दुश्मनों को खदेड़ दिए। तीसरी दफा में प्राण बचाते भागते शत्रुओं की मुलाकात उसी ग्वालिन कुटनी से हुई। उस औरत ने उन्हें समझाया वे लड़ाकू मर्द नहीं औरतें हैं, प्रमाण स्वरूप नदी में हाथ-मुँह धोते औरतों को उसी ने गौर कराया। फिर भी वो उनसे लड़ने को तैयार नहीं हुए। फिर सोच समझ कर लड़ाई नियम के विरूद्ध रात के अंधेरे में चौथी बार हमला कर दुर्ग दखल में लिया। उन्होंने उराँव शासक वर्ग तथा वशिंदों को मार दिया, कुछ भाग गये तो कुछ खदेड़ दिए गये। समतल में रहने वाले उराँव लोग अभी भी हैं जैसे मिर्जापुर (यू पी) नगर उटारी, चुनार इत्यादि। उनकी भाषा संस्कृति मिट रही है।

       उराँव समाज, उच्चतम समाज था। इसी समाज से शासक (राजा) हुआ करते थे। इसकी झलक ANCIENT INDIAN CULTURE AND CIVILISATION BY K. C. CHAKRAVARTI M.A., VORA & CO. PUBLISHERS  LIMITED, 3, ROUND BUILDING, KALBADEVI ROAD, BOMBAY  400 002 में मिलती है।  इस रोहतास गढ़ को राजा हरिशचंद्र के पुत्र रोहितेस्व ने बनवाया था। इसी के नाम से यह रोहतासगढ़ कहलाता है।

       यह गढ़ 42 वर्ग किलोमीटर (28 वर्ग मील) में फैला हुआ है, 82 दरवाजे हैं, जिनमें चार प्रमुख द्वार हैं जैसे राजघाट, छोटाघाट इत्यादि।  103 बड़े उराँव ग्राम हैं। विन्धयाचल पर्वत माला के पूर्वी छोर पर बना है। यह ट्रेन से नजर आता है। डेहरी (Delhi-on son) से बाँया याने दक्षिण दिशा में जो पहाड़ दिखता है, वही गढ़ का बाहरी दीवार है,  उतर पूर्व छोर में अब एक मन्दिर है, जो आसमान साफ रहने से नजर आता है। सासाराम तक जो बाँये में पहाड़ी दिखता है उसी पर्वत का अंग है। प्राकृतिक दीवार से जुड़े जगह-जगह कृत्रिम दीवारें हैं, जिनको दुश्मन या कोई भी व्यक्ति पार नहीं कर सकता है। जहाँ-जहाँ द्वार है वहाँ ऐसे दीवार की बनावट है जहाँ से दुश्मनों पर नजर रखी जा सके तथा पहरेदार उन पर वार कर सके। याने सुरक्षा का पक्का इंतजाम है। उस समय और अभी भी यह कमाल की जगह है। वातावरण हवा पानी के क्या कहने। अति विशुद्ध है। इसके पूर्व में सोन नदी, पश्चिम में विन्धयाचल पर्वत माला, उतर में डेहरी सासाराम की समतल भूमि तथा दक्षिण में फिर सोन नदी जो उत्तरी कोयल से मिलकर उत्तर की ओर बहती है । रोहतासगढ़ पठार पर मच्छर प्राय नहीं के बराबर। पर अब अन्य लोग इस क्षेत्र में घुस रहे हैं । Article 244 (1) की अवहेलना हो रही है ।

       यहाँ जाने के लिए कोई पक्का रास्ता नहीं है Tractor  से जाया जा सकता है। मगर आठ घंटे लग सकते हैं। पैदल में अकबरपुर की ओर से तीन घंटे राजमहल तक जाने में लगेंगे। कठौतिया पाइंट जो अकबरपुर होकर ही जाता है सबसे नजदीक है। करीबन घंटाभर लगेगा। महुआटोली राजमहल का सबसे नजदीकी गाँव है।  यहाँ के उराँव हंड़िया बनाना नहीं जानते हैं। अरखी आसानी से मिलेगा। स्कूल अस्पताल बिजली नहीं है। हाँ, स्कूल कुछ मिशनरी चला रहे हैं। अब दिवाने खास की ओर एक नया मंजर नजर आया। याने राजमहल पर भी दखलदारी हो रही है।

       इस किले की विशेषता ये है कि ये 28 वर्ग मील की बाहरी मजबूत तथा ऊँचे दीवारों से सुरक्षित है, घिरा है। राजमहल के उत्तर की ओर (लगता है चारों ओर) राजमहल से करीबन दो किलो मीटर दूरी में फिर चारदीवारी है,  जहाँ दुश्मन का पार पाना कठिन है। फिर राजमहल तीसरी दीवार से घिरा है,  इसी के भीतर दीवाने आम है। जहाँ राजा तथा राज परिवार आम जनता को दर्शन देते थे तथा पर्व-त्यौहारों में नाच-गान का अवलोकन करते थे। उनके लिए अलग-अलग महल से जुड़ा दरबार है जो करीब अखड़ा से 15 से 20 मीटर ऊपर बना है। राजा, रानी तथा राजकुमार-कुमारी के लिए अलग-अलग झरोखे हैं। फिर राजमहल का अभेद्य दीवार । घुसने के साथ दाहिनी ओर दीवाने खास जहाँ राजा अपने सलाहकारों से मिलते थे, बैठते थे ।

       महल में बहुत सारी कोठरियाँ हैं शायद पाँच एकड़ जगह पर बना है। छोटा गु्रप का शायद निकल पाना कठिन होगा। बीच छत में मड़वा बना है। मड़वा याने शादी की जगह। मड़वा जाने के लिए सीढ़ी है मगर पत्थर का slab जो बिना आधार रखा हुआ है दीवार से जड़ा है।

       मेरी नजर में ऐसा किला शायद दुनिया के किसी भी राजा ने नहीं बनवाई, न ही बनवायेगा। ये एकमात्र अनोखा, बेजोड़ किला है।

       एक खास बात ये है कि चुनारगढ़ जो मिर्जापुर से 20 कि मी दूरी पर गंगा से सटा है वहाँ भी मड़वा पक्का का बना है। मड़वा याने शादी के लिए तैयार जगह। यों लगता है इलाहाबाद किला चुनार तथा पाटलिपुत्र जिसका प्राचीन नाम कीकट था जिसे बाद में करूष या कुरूख भी कहा गया, जो गंगा और सोन नदी का दक्षिण पश्चिम संगम जगह पर है उराँव समाज से कभी जुड़ा था।

       जिन दुश्मनों ने इस किले पर कब्जा किया, नहीं टिक पाये। इसे त्याग दिये। क्योंकि वो धन की लालच में हमला किये थे। उन्हें धन हाथ नहीं लगा। अभी जो उराँव लोग हैं, उनके पूर्वज फिर से आकर बसे थे, वे उनकी संतानें हैं। पूर्वज भी खजाने की सुरक्षा, जाँच-पड़ताल के लिए आकर रह गए, बस गए।

       गीत ये कहानी, गाथा मैंने शिक्षक से सुना था। इसे मैं 2011 में Kurukh Literary Society of India   में देखा, सुना, और बहुत कुछ सुना जो अविश्वासीय है । किन्तु एक किताब THE ASHUR में तथ्य है ।

       मेरे पूर्वज बहुत समृद्ध थे । कारोबार के साथ खेती-बारी का भी काम था।  छोटानागपुर की राजधानी लोहरदगा में समान बेचते थे, तथा वहाँ से समान लेकर उन्हें बिक्री करते थे। परिवार के किसी सदस्य की शादी पर परम्परागत मड़वा की पहरेदारी में या कहें मड़वा जागने में रोहतासगढ़ से संबंधित गाना अवश्य ही गाया जाता था। गाने के बोल ये हैं:-

1 -रूइदास पटेना सोना बड़ सुन्दर गढ़े भेल ।2।

ओह गढ़े भरी गेलैं हमर पुरखा केर खेत ।2।

2 -रनबना जंगल काटे ऊँचा नीचा कुदाल माँगे ।2।

हेरे हमर पुरखा कर सोना रे मोर हाथ उचइड़ गेल ।2।

3- टिकिरा में गोंदीली भाई टिकिरा मा मड़ुवा ।2।

इसन उपज भेलैं रे भाई बन वाइल गेल,

इसन उपज भेलैं रे भाई गढ़े भइर गेल ।

4 – गोंदीली का हाँड़ी उठाय मड़ुवा का लठा बनाय ।2।

इसन खालैं पीलैं गालैं रे भाई मधुरस खेला भेल,

इसन बाजा बजालैं भाई गढ़े फाइट गेल ।

5- कोन देशक दिकु आले माइर भगैं देलैं हैरे ।2ं

रोवत कादंत निकइल गेलैं छोइड़ रूइदास पटना ।

6- ओहे खनेक विपइत हैरे आइज बड़ा भारी भेल ।2।

सोना समान जाति रे मोर कहाँ लुइक गेल,

रूपा समान जाति रे मोर कहाँ छिप गेल ।

7 – जागू जागू देख सोना आइज मति निंदाउ हैंरे ।2।

रूपा समान जाति रे मोर कहाँ छिप गेल,

सोना समान जाति रे मोर कहाँ लुइक गेल ।

       इस गीत को जब भी मैं सुनता हूँ या था, मेरा मन भावुक हो जाता हैै । साथ में सोचने में मजबूर हो जाता हूँ कि हमारे पूर्वज कितने उन्नत थे । वहीं हम कितने लाचार और दब्बू हैं । अपनी बचाव और तरक्की की बात पर विचार भी नहीं करते हैं । एक ओर हमारे पूर्वज रोहतासगढ़ हार गए तो दूसरी ओर न हारने, खोने वाला किला जीत लिया । जिसे EXCLUDED या  NON REGULATED AREAS कहा जाता था । सन् 1935 ई से इसे Scheduled Areas कहा जाता है और Scheduled Areas में रहने वालों को Scheduled tribes ये किला कभी टूटेगा न हम खदेड़े जायेंगे।  इसे हमें समझना है, खोजना है, ढूँढना है, खोजबीन करना है । इसका मतलब माने समझना है । ये पाँचवीं अनुसूची प्रशासन प्रणाली हमारे पूर्वजों की सबसे बड़ी देन है । इस देन को दिलाने में हमारी मातृभाषा कुँड़ुख, मुंडारी, खड़िया इत्यादि का बड़ा योगदान है।