एक आदिवासी लड़की क्या कुछ नहीं कर सकती यह मैंने साबित कर दिया है – मलावत पूर्णा

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                                               (निरंग पझरा में यह लेख 2014 को प्रकाशित हुआ था )
सिर्फ 13 साल में तेलंगाना की आदिवासी बालिका मलावत पूर्णा ने 25 मई 2014 को माउंट एवरेस्ट चढ़ाई की और वह दुनिया में सबसे कम उम्र की महिला पर्वतारोही बन गयी है। पूर्णा के साथ आंध्र प्रदेश के खम्मम जिले के 18 वर्षीय सादानंदपल्ली आनंद कुमार माउण्ट एवरेस्ट चढ़ने वाले प्रथम दलित बन गए हैं ।

पूर्णा और आनंद दोनों ही अब कई और पहाड़ों पर चढ़ाई करना चाहते हैं ।

पुर्णा बताती है कि वह एक बहुत ही गरीब परिवार से संबंध रखती है।
”मेरे पिता और मां खेतिहर मजदूर हैं और घंटों खेतों में काम करके दोनों मिलकर हर महीने 3000 रुपये कमाते हैं । घर की अति आवश्यक जरूरतों के बाद मुझे और मेरे भाई बहनों को स्कूल के लिए भेजना मेरे माता पिता के लिए बिल्कुल ही आसान नहीं है, बल्कि उनके लिए यह एक बहुत बड़ी“ चुनौती है।

उनका परिवार तेलांगणा राज्य के निजामाबाद के एक दूर-दराज के गाँव पकाला में रहता है । उनका गाँव बहुत पिछड़ा हुआ है और वहाँ एक स्वास्थ्य केन्द्र तक नहीं है । लेकिन आज उनके साथ उनके गाँव को भी लोग जानने लग गए हैं । उनसे मिलने के लिए राज्य के ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्यों के लोग तक आ रहे हैं और उनसे मिल रहे हैं । उनके गाँव और स्कूल में उनके लिए अनेक विशेष कार्यक्रम आयोजित की गईं । उनसे मिलने के लिए ऐसे लोगों की लाइन लग गई जो किसी समय गरीब थे लेकिन अपनी मेहनत के बल पर आज समाज में सम्मानित जीवन जी रहे हैं ।

आनंद एक साईकिल मेकानिक का बेटा है और उन्होंने स्कूली पढ़ाई छोड़कर खम्मम के एक फार्म में काम कर रहा था । लेकिन खेल में रूचि रखने के कारण उन्हें फिर में विद्यालय में दाखिला मिला और कड़ी मेहनत और मुकाबले के आधार पर समाज कल्याण आवासीय विद्यालय के 2 लाख बच्चों में से 20 बच्चों को पहाड़ चढ़ने के लिए चुना गया । फिर उन 20 बच्चों में से उन दोनों को पहाड़ चढ़ने के लिए चुन लिया गया । दोनों को नलगोंड़ा जिले के भोंगिर में आठ महीने तक पहाड़ चढ़ने का प्रशिक्षण दिया गया ।

उनके प्रशिक्षक शेखर बाबु जिन्होंने माउण्ट एवरेस्ट पर चढ़ाई की थी, बताते हैं कि बच्चों में आत्मविश्वास जगाने के लिए और उनके व्यक्तित्व का विकास करने के लिए उन्हें रूटिन रूप में साहसिक अभियान पर ले जाया जाता था । लेकिन जैसे ही इस तरह के कार्यकलापें शुरू की गई, हमने देखा कि बच्चों में छुपी हुई क्षमता है जिसके बारे वे भी स्वयं नहीं जानते थे । इसलिए हमने इस दिशा में काम करना शुरू किया । वे आत्मविश्वास अर्जित करने लगे और उनका पूरा व्यक्तित्व ही बदल गया । हमें लगा ये कुछ अजूबे कर सकते हैं । और उन्होंने किया भी ।

अपने एवरेस्ट अभियान के लिए उनकी चुनाव कैसे हुआ ? इस विषय पर बोलते हुए पूर्णा बताती है कि उसे सरकारी संस्था आंध्र प्रदेश समाज कल्याण आवासीय विद्यालय, जो समाज के गरीब तबके को निशुल्क शिक्षा प्रदान करता है, ने चुना था । संस्था ने आदिवासी बच्चों को पर्वत आरोहन में भेजने के लिए चुनौती स्वीकार कर लिया था।

हमारा अगला पड़ाव दार्जिलिंग हिमालयन माउण्टेनेरिंग इंस्ट्टिच्युट था,  जहाँ 20 दिनों का प्रशिक्षण लेना था । लेकिन इंस्ट्टिच्युट ने हमें सीधे कह दिया कि वे बच्चों को प्रशिक्षण नहीं देते हैं । दार्जिलिंग के प्रशिक्षकों ने जैसे ही बच्चों को देखा उन्होंने घोषणा कर दी कि ये बच्चे तो पहला कैम्प तक भी नहीं पहुँच पाएँगे । उनके साथ गए परमेश्वर ने कहा कि महोदय, यदि बच्चे क्षमता न दिखा सकें तो आप उन्हें वापस भेज दीजिए । लेकिन बच्चों ने पहला कैम्प में समय पर पहुँच कर सबको आश्चर्य में डाल दिया । पर्वत अभियान पर साथ गई एक लड़की सरिता कहती है ‘‘हैदराबाद के वातावरण में रहने के बाद अचानक 20 डिग्री माइनस ठण्ड में पहुँचना हमारे लिए जोर का झटका था । हम वहाँ के वातावरण में खुद को ढाल रहे थे,  हम 20 किलोग्राम वजन ढो रहे थे और पानी पाँच मिनट में बर्फ में बदल रहा था ।

अपने पर्वतारोहन प्रशिक्षण के बारे बताती हुई पूर्णा कहती है प्रशिक्षण आठ महीने तक चला । फिर मुझे दार्जिलिंग स्थित तेनजिंग नोर्गे पर्वतारोहण संस्थान में भेजा गया । मैं जब वहाँ थी तो मुझे कंचनजंघा श्रृखंला के 1700 फीट ऊँची पहाड़ माउण्ट रिनॉक ले जाया गया और मैंने उस पहाड़ की चढ़ाई की । मैंने लद्दाक में 35 डिग्री माइनस तापमान में रहने की आदत सीखा । ऊँचाई पर मेरे सहनशक्ति को देखते हुए मुझे माउण्ट एवरेस्ट अभियान पर भेजा गया ।

माउण्ट एवरेस्ट पर सामना किए कठिनाईयों पर बोलती हुई पूर्णा कहती है कि हवा बहुत ठण्ड थी और वह ठण्ड शरीर को मानो काट रही थी । अभियान के दौरान हमें पैकेज भोजन खाना पड़ता था, जिसे पचाना मेरे लिए आसान नहीं था । जब भी मुझे बंद बैग में खाना दिया जाता, मैं वह खाना फेंक देती थी, क्योंकि उसका गंध मेरे लिए असहनीय होता था । मेरे लिए सिर्फ सूप का सहारा था,  जिसे गर्मागर्म परोसा जाता था और वह बंद पैकेट में नहीं होता था । मेरे लिए ऑक्सिजन टैंक के साथ चढ़ाई करना भी आसान नहीं था ।

मैं मानसिक रूप से दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ने के लिए तैयार थी लेकिन वास्तव में ऐसी कई बाधाएँ मेरे रास्ते में आएगी,  मुझे इसकी उम्मीद नहीं थी । इसके आलावा भी मुझे तिब्बत क्षेत्र की ओर से माउण्ट एवरेस्ट पर चढ़ाई करनी थी,  क्योंकि नेपाल सरकार 16 वर्ष से कम उम्र के लोगों को पर्वतारोहन की अनुमति नहीं देता है । इसके कुछ दिन पहले अप्रैल महीने में ही माउण्ट एवरेस्ट में आए एक बर्फीला तुफान में 16 पर्वतारोही मारे गए थे और आसान रास्ता बंद कर दिया गया था । चीन की ओर से जाने वाला रास्ता ज्यादा खतरनाक है । रास्ते में अनेक मृत देह भी देखने को मिली ।

माउण्ट एवरेस्ट पर की चढ़ाई निश्चित रूप से मेरे सोचा की तुलना में अधिक मुश्किल था – लेकिन एक आदिवासी लड़की कुछ भी कर सकती है ऐसी सोच भरी मेरी इच्छाशक्ति ने इसे साबित करने के लिए मुझे आगे बढ़ते रहने के लिए प्रेरित करता रहा ।

आप जब माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंच गयी तो आपके मन में आने वाली पहली बात क्या थी ?
अपनी कड़ी मेहनत की संतुष्टि वैराग्यपूर्ण शांति से मेरा मन भर गया था । मेरा सिर ऊँचा तन गया था जब मैंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर भारत का झंडा फहराया
आप अभी सिर्फ 13 साल की हैं, आप आगे क्या करना चाहते हैं,  यह पूछने पर पूर्णा कहती है कि वह पूरी मेहनत से पढ़ना चाहती है और भविष्य में आईपीएस अफसर बनना चाहती है । लेकिन साथ ही मैं दुनिया के अनेक ऊँची पर्वतीय चोटी पर चढ़ना चाहती हूँ। संसार की सबसे ऊँची चोटी पर चढ़ाई करने के बाद आपने देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात की । उन्होंने आप से क्या कहा यह पूछने पर पूर्णा कहती है – उन्होंने मुझे बहुत उत्साहित किया और कहा कि आप जिस क्षेत्र में सबसे अच्छा कर सकती हैं उसे करती रहें और उसे कभी नहीं छोड़िए । उन्होंने मुझे अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए कहा और कहा कि आगे बढ़ते रहो ।

पूर्णा और आनंद की सफलता के पीछे समाज कल्याण विभाग के अनेक कर्मचारियों के साथ-साथ 1995 बैच के एक आईपीएस अफिसर आर. एस. प्रवीण कुमार हैं,  जो बच्चों को नये और बडे़ सपने देखने के लिए प्रेरित करते हैं । दो वर्ष पूर्व उन्होंने प्रदेश के मुख्यमंत्री से निवेदन किया कि उन्हें समाज कल्याण विद्यालयों का सचिव प्रभारी बना दिया जाए । वे दो लाख बच्चों के जीवन को संवारना चाहते हैं । वे बच्चों को सिखाते हैं कि सपने सच होते हैं । पूर्णा और आनंद ने उनकी शिक्षा को सच करके दुनिया को दिखाया ।

प्रवीण कुमार हजारों गरीब बच्चों के सपनों को पूरा करने के अपनी योजनाओं को अमली जामा पहनाने के काम में लग गए हैं । वे अपनी सोच और काम को पूरा करने के लिए सिस्टेमेटिक ढंग से काम कर रहे हैं । उनके काम में अपने विभाग के लिए अधिक धनराशि जुटाना,  शिक्षकों की योग्यता को बढ़ाना, उन्हें प्रशिक्षित करना और स्कूल में अंग्रेजी को शिक्षा और बातचीत का मुख्य माध्यम बनाना शामिल है । उन्होंने रचनात्मक शिक्षण प्रक्रिया को अपनाने पर जोर दिया है और गाइड बुक को स्कूलों में बैन कर दिया है । वे कहते हैं हर बच्चा पूर्णा और आनंद बनेंगे । स्कूलों के प्रयास से हर बच्चा का आत्मविश्वास रोज बढ़ रहा है । वे बताते हैं कि सफलता पाने में गरीबी आडे़ नहीं आती है । गरीबों और अमीरों के बीच सिर्फ अवसर का अंतर रहता है । एक बार अवसर पा जाने पर मेहनती लोग किसी भी लक्ष्य को प्राप्त कर ही लेते हैं । उनका विश्वास है कि प्रतिकूल परिस्थिति आदमी के गुण को अधिक निखारता है और ऐसे हालातों से गुजरे लोग मुश्किल हालातों पर सहज भाव से विजय प्राप्त करते हैं ।

वे बताते हैं कि कभी उनकी माँ कुली का काम करती थी । सामाजिक कार्यकत्ताओं ने उनकी रक्षा की और उन्हें स्कूल भेजा गया और फिर वह टीचर बन गई । आज मैं आईपीएस अफिसर हूँ । हम बच्चों को हर तरह के खेल खेलने के लिए प्रेरित करते हैं । उन्हें हम कहते हैं कि वे आसमान में उड़ सकते हैं और हर लक्ष्य को छू सकते हैं । प्रस्तुति-ओलिवा इंदवार

  

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