कब तक दूसरों के लिए सड़कों पर नाचते रहेंगे ??

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                                                                                                                                                                                नेह अर्जुऩ इंदवार 

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जब भी कहीं कोई नेता आता है, सभा होती है या सार्वजनिक कार्यक्रम होता है मांदर ढोल और नगाडे लेकर आदिवासी युवतियों को सार्वजनिक रूप से नचाया जाता है। चाहे कोई राजनैतिक नेता का आगमन होता है, चाहे कोई धार्मिक आदमी कहीं से आता होता है चाहे कोई क्रिकेटर एयरपोर्ट पर उतरता है।इन लोगों के आगवानी करने के लिए सिर्फ आदिवासी लोगों को ही सड़कों पर नाचाया जाता है। राजनेताओं, धार्मिक अगुवा, बाबा, या फादर, छुटभैया नेता या किसी क्रिकेट खिलाड़ी के आगवानी के लिए किसी और समाज के जवान लड़कियाॅं को सड़कों पर घण्टों नहीं नचवाया जाता है। इसके लिए पूरी दुनिया में सिर्फ आदिवासी लड़कियाॅं और लड़के ही मिलते हैं। आखिर क्यों ??????

क्या सिर्फ आदिवासी ही नाचना और ढोल बजाना जानते हैं ??????  या सिर्फ आदिवासी ही हमेशा अपने नृत्य कौशल को दिखाने के लिए तत्पर रहते हैं ??????

कई सवाल उठते हैं जेहन में। और न जाने कितने ही ‘‘क्यों’’ सामने आते हैं। क्या दूसरे समाज के लोग या लड़कियाॅं नाचना नहीं जानती हैं ?????? यदि वे जानती हैं तो क्यों उन्हें सड़कों में नाचने के लिए, अगुवाई या आगवानी करने के लिए नहीं बुलाया जाता है ??????  क्या उनमें नाचने का आत्मविश्वास नहीं होता है ??????

सच तो यह है दूसरे समाज के लोग भी नाचते हैं गाते हैं, आनंद मनाते हैं। दुनिया के अधिकतर समाज में खुशियों पर लोग नृत्य ही करते हैं। भारत के सभी प्रमुख समाजों का अपना विशेष नृत्य शैली है, जिसकी पहचान उस समाज के नाम से होता है। साधारण नृत्य से लेकर क्लासिकल नृत्य तक के नृत्य कौशल हैं, जिसे नृयांगाएॅं नये-नये रंग ढंग में रचने उसका विकास करने के लिए दिन रात एक करते हैं, उसे अन्य नृत्य से अधिक परिष्कार नृत्य के रूप में ढालने की कोशिशें होती है और उस नृत्य का अपना एक मुकाम होता है। हर समाज नाचता है लेकिन हर समाज सड़क पर आकर अपने नृत्य शैली का प्रदर्शन नहीं करता है। वे किन्हीं ऐरे गैरे के लिए सड़कों पर नाच कर मजमा नहीं लगाते हैं। वे अपने नृत्य को सड़क छाप नहीं बनाते हैं न ही खुद को सड़क छाप नचैया में बदलते हैं। वे अपने नृत्य के कौशल, कला का सम्मान करते हैं और अपने खुद के सम्मान को भी बचा के रखना जानते हैं।

लेकिन सार्वजनिक कार्यक्रमों में आदिवासी लड़कियों को सड़कों पर नाचने के लिए बुला लिया जाता है।क्योंकि वे जानते हैं आदिवासी अपने नृत्य अपनी संस्कृति और अपने सम्मान का ख्याल नहीं रखते हैं। वे कहीं भी नाचने के लिए हमेशा तैयार हो जाते हैं! ऐसा लगता है आदिवासी समाज अपने सम्मान के प्रति आत्माभिमान नहीं होते हैं।

शायद इन्हीं कारणों से इन नेताओं के मन में आदिवासियों के लिए और उनके सामाजिक नृत्य के लिए कोई सम्मान भी नहीं होता है। ये आदिवासियों को सस्ते में उपलब्ध होने वाले नचैया ही मानते हैं इसलिए कोई भी ऐरा गैरा के सामने नाचने के लिए आदिवासी लड़कियों, मांदर और ढोल वादकों को बुला लेते हैं। कुछ पैसे देकर मासूम जवान लड़कियों को सड़क छाप नचैया बना कर प्रस्तुत करते हैं। दूसरे लोग इन लड़कियों को सड़कों पर दूसरे के लिए नाचते हुए देखते हैं आदिवासी समाज के बारे बिकाऊ होने का एक अवधारणा बना कर चलते चले जाते हैं।

आदिवासी समाज में सामूहिक नृत्य का क्या महत्व है ????

आदिवासी समाज अपने समाज की एकता, भाईचारा और सम्पूर्ण सामाजिक भावना को सामूहिक रूप से नृत्य के माध्यम से प्रकट करता है। वह किसी व्यावसायिक या बाजारू उद्देश्य के लिए नहीं नाचता है। वह किसी दर्शक को देखाने के लिए भी प्रदर्शन नहीं करता है। वह स्वयं हृदय के अंतहीन आनंद को महसूस करके सामूहिक भाईचारा के भावनाओं से ओतप्रोत, मगन होकर नृत्य करता है। सामूहिक नृत्य किसी दूसरे समाज के दर्शक या किसी नेता को खुश करने के लिए नहीं होता है। सामूहिक नृत्य आदिवासी परब त्यौहार, शादी विवाह या आदिवासी उत्सवों के दौरान खुशियों को व्यक्त करने का एक जरिया है। यह आदिवासी समाज के जींवत होने, पुरूष और महिला के बीच ऊँच नीच नहीं होनेे और समाज में समानता की भावना और स्वीकृति के स्थिति को दिखाने और उसकी परंपरा बनाने का एक जरिया है। यह आदिवासी संस्कृति में सामूहिक भावना और एकता का परिचायक है। यह आदिवासी समाज की पहचान है।

समाज में इसे बाजारू बनाने की कोई परंपरा नहीं रही है। किसी गैर आदिवासी के खुशियों के लिए सड़क पर नृत्य करना समाज और संस्कृति की बेइज्जती है। समाज को ऐसी कोई आदत नहीं है कि वह गैर आदिवासियों या आदिवासी नेताओं को खुश करने के लिए, उसके अहं की भावना को शामित करने के लिए सड़क पर बाजारू ढंग से नाचें।

कुछ लोग शराब के नशे में डूबे हुए रहते हैं और उन्हें अपना और अपने परिवार के इज्जत और कल्याण की चिंता नहीं रहती है। लेकिन कुछ लोगों के कारण पूरे समाज को नशेड़ी नहीं कहा जा सकता है और कुछ लोगों के रास्ते में उच्छृंखलता को समाज की उच्छृंखलता नहीं माना जा सकता है। ऐसे ही कुछ पैसों के लिए समाज के अनपढ़ और सीदे-सादे युवतियों को कब तक नाचाया जाएगा ??? 

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