जयपाल सिंह मुण्डा को अभी समझना बाकी है

                                                                                                                                                                     महादेव टोप्पो, राँची 

राकेश बताव्याल द्वारा संपादित पुस्तक ”दि पेंग्विन बुक आॅफ माॅडर्न स्पीचेस“ अपने आप में एक अद्भुत किताब है जहाँ 1877 से 1998 तक के ऐसे प्रसिद्ध भाषण संकलित है जिससे कि देश प्रभावित हुआ या उन भाषणों द्वारा उठाए गए मुद्दों, प्रश्नों, विचारों की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। कुल अट्ठारह खंडों में देश की विभिन्न समस्याओं, मुद्दों, राष्ट्र निर्माण, स्वतंत्रता संग्राम, शिक्षा, श्रम, चीनी आक्रमण, विकास समस्याओं, विषयों को बाँटा गया है और इनसे संबंधित प्रसिद्ध भाषणों को संकलित किया गया है।

इस पुस्तक में झारखंड आंदोलन के अगुआ जयपाल सिंह मुण्डा के तीन भाषण संकलित हैं, जिन्हें पढ़कर जाना जा सकता है जयपाल सिंह मुण्डा देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, भाषिक, सांस्कृतिक एवं विकास संबंधी मुद्दों को गहराई से समझते थे। जयपाल सिंह मुण्डा न केवल एक राजनीतिज्ञ थे बल्कि समाज चिंतक, विचारक भी थे। इस संग्रह में संकलित तीनों भाषणों को पढ़ने से यह स्पष्ट होता है। आॅक्सफोर्ड से शिक्षित एवं भारत के पहले ओलंपिक हाॅकी कैप्टेन जयपाल सिंह अपने समय में देश के चंद उन राजनीतिज्ञों में थे, जो अपने विचारों को लेकर अत्यन्त गंभीर थे।

संसद में बहस करते अपने भाषण में विस्थापन से प्रभावित लोगों के पक्ष में जब उन्होंने कई तर्क प्रस्तुत किए, उसमें एक महत्वपूर्ण पहलू आदिवासियों के ”आध्यात्मिक पुनर्वास“ का भी था। क्योंकि संथाल, मुंडा आदि जाहेर थान (पूजा स्थल) को अन्य धर्मावलंबियों की तरह कहीं भी बसाए जाने की अपनी व्यावहारिक व सामाजिक कठिनाइयाँ हैं। आगे तर्क करते हुए उन्होंने कहा कि ”विस्थापन से आदिवासियों के आत्म सम्मान खोने का खतरा है।“ लेकिन देश को स्वतंत्रता के बाद विकास की राह पर ले जाने की हड़बड़ी में नेहरु ने उनकी बातों को अनसुना कर दिया और यह मुद्दा आज भी उपेक्षित है। आदिवासियों की अखड़ा परंपरा पर भी उन्होंने तर्क प्रस्तुत किए और कहा कि-”नृत्य में आदिवासियों के जीवन की गति और लय समाहित हैं।“

आज सहज ही रांची, धनबाद, जमशेदपुर एवं बोकारो आदि शहरों में इसका दुष्प्रभाव देखा जा सकता है। लेकिन जयपाल सिंह मुण्डा ने लगभग साठ सत्त्र साल पहले ही बताया कि-”कैसे शेष भारत जीवन का लय बचाना आदिवासियों से सीख रहा था और सभ्य समाज, जीवन का लय बचाने के लिए नंग धड़ंग आदिवासियों के बीच जा रहा था।

रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे महान कवि इसीलिए बोलपुर जैसे आदिवासी इलाके में गए और इसे अपना कार्य एवं सृजन स्थल बनाया।(दि पेंग्विन बुक आॅफ माॅडर्न स्पीचेस पृष्ठ-465)“। निश्चय ही यह इनके पैनी सामाजिक समझ का परिणाम था कि उन्होंने रवीन्द्रनाथ के शिक्षा संबंधी कृत प्रयासों में संथाल-आदिवासी प्रभाव को देखा। वहाँ निर्मित भवन आदि पर संथाल गृह निर्माण कला के प्रभाव को स्पष्टतः देखा जा सकता है। इसके अलावा वहाँ कई कलाकारों एवं लेखकों की कृतियाँ संथाल या आदिवासी जीवन से प्रभावित रहे हैं। शांति निकेतन में संथाली भाषा को जो महत्व दिया गया यह भी इसका प्रमाण है।
नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने ”दि अर्ग्यूमेन्टिव इंडियन“ में संकलित लेख ”टैगोर और उनका भारत“- में लिखा कि ”शान्तिनिकेतन में भारतीय परंपराओं के प्रति आग्रह के रूप में सशक्त स्थानीय प्रभाव थे।“ शांति निकेतन के माध्यम से टैगोर ने जाने या अनजाने बंगाली समाज में आदिवासी समाज के प्रति जिस रोमांसवाद को जन्म दिया वह आज भी बरकरार है। विभूतिभूषण, सुनील गंगोपाध्याय, कालकूट, बुद्धदेव गुहा, महाश्वेता देवी के अलावा इससे प्रभावित लोगों की देश भर में एक लंबी फेहरिश्त हैं।

जयपाल सिंह के उक्त विचारों पर और गहराई से शोध, विचार किए जायें, तो संभव है कि भारतीय सामाजिकता को समझने के लिए नए उपकरण और नए दृष्टिकोण प्राप्त किए जा सकते हैं। झारखंड निर्माण के बाद उनके खिलाड़ी रूप को महत्व तो दिया गया, लेकिन यह देखना निराशाजनक है कि उनके सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, विकास, भाषा, संस्कृति आदि पर व्यक्त विचारों को आज भी समझा नहीं गया है।

ऐसे में टैगोर जन्मशती की 150 वीं जयंती के उपलक्ष्य में जयपाल सिंह के नजरिए से रवीन्द्रनाथ टैगोर को जानना, देखना उनकी कृतियों एवं विचारों पर अध्ययन का एक नया आयाम खोल सकता है।

क्योंकि जयपाल सिंह जब यह कह रहे थे कि ”शेष भारत टैगोर के बोलपुर के आस पास के परिवेश से जीवन के लय पा रहे थे“- तो इसका अर्थ कई संदर्भों में निहित है। इस निहितार्थ को समझा जाय तो टैगोर और जयपाल दोनों के विचारों को विस्तार मिल सकता है, क्योंकि जहाँ एक व्यक्ति तब विश्व के श्रेष्ठतम शिक्षा संस्थान आॅक्सफोर्ड से शिक्षित था, तो दूसरा भारतीय परिवेश में पलकर स्वाध्याय से देश, समाज को समझ रहा था। दोनों पश्चिम के अंधभक्त नहीं थे, लेकिन वे पूर्व और पश्चिम के समन्वय के हामी थे। जहाँ कभी टैगोर, गांधी से असहमत होते थे वहीं जयपाल सिंह, नेहरू और उनके मंत्रियों से बार बार विकास, संस्कृति, भाषा, आदिवासी सवालों पर अपने गंभीर, मौलिक विचार रखते थे।
अपनी दूरदर्शिताओं के कारण आज के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक संदर्भ में उनके विचार ज्यादा प्रासंगिक होते दिख रहे है।
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