पेसा (कानून) के मूल बिंदु

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                                                                                                            घनश्याम बिरूली

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पेसा के मूल बिंदु इस प्रकार है :-

संविधान के भाग 9 में किसी बात के होते हुए भी, किसी राज्य का विधान मंडल, उस भाग के आधीन, ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो निम्नलिखित बिंदुओं के असंगत हो :-

१) पंचायतों के बारे में कोई राज्य जो विधान बनाएं वो रूढ़िजन्य विधि सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं और समुदाय के संसाधनों की परंपरागत प्रबंध पद्धतियों के अनुरूप होगा ।

२) ग्राम साधारणता आवास या आवासों के समूह अथवा निवासी एवं निवासियों के समूह से मिलकर बनेगा जिसमें समुदाय समाविष्ट हो और जो परंपराओं तथा रूढ़ियों के अनुसार अपने कार्यकलापों का प्रबंध करता हो ।

३) प्रत्येक ग्राम में एक ग्राम सभा होगी जो ऐसे व्यक्तियों से मिल कर बनेगी जो गांव का मूल निवासी हो ।

४) प्रत्येक ग्राम सभा, लोगों की परंपराओं और रूढियों तथा उनकी सांस्कृतिक पहचान एवं विवाद निपटाने के रूढिजन्य तरीके का संरक्षण करने के लिए सक्षम होगी।

प्रत्येक ग्राम सभा :
क) ग्राम स्तर पर योजनाओं ,कार्यक्रमों और परियोजनाओं के कार्यान्वयन से पहले , ग्रामसभा अनुमोदन करेगी ।

ख) गारीबी उन्मुलन ओर अन्य कार्यक्रमों के आधीन लाभार्थियों की पहचान और उनके चयन के लिए उत्तरदायी होगी ।

ग) ग्राम स्तर पर प्रत्येक कार्यकारी इकाई से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह योजनाओं कार्यक्रमों तथा परियोजनाओं के लिए निधि के सदुपयोग का प्रमाण पत्र, ग्रामसभा से लेगी ।

घ) क्योंकि राज्य का विधानमंडल,अनुसूचित क्षेत्र में जिला और ग्राम स्तर पर छठवीं अनुसूची के अनुरूप प्रशासनिक व्यवस्था की परिकल्पना करेगा इसलिए ऐसा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान भी छठी अनुसूची के अनुरूप होगा।

च) राज्य सरकार ऐसी जातियों के व्यक्तियों को नामित करेगी जिनका ग्राम स्तर पर और जिला स्तर पर समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है ।

छ) अनुसूचित क्षेत्र में विकास परियोजनाओं के लिए भूमि के अर्जन करने से पूर्व इससे प्रभावित व्यक्तियों को फिर से बसाने और उनका पुनर्वास करने से पूर्व उपयुक्त स्तर पर ग्राम सभा से परामर्श किया जाएगा ।

ज) अनुसूचित क्षेत्र में लघु जल निकायों की योजना और उनका प्रबंधन , उपयुक्त स्तर पर ग्रामसभा को सौंपा जाएगा।

झ) अनुसूचित क्षेत्र में गौण खनिजों के लिए तथा खनन पट्टा के लिए उपयुक्त स्तर पर ग्रामसभा का सिफारिश अनिवार्य है।

ट) अनुसूचित क्षेत्र में गौण खनिजों के समुपयोजन के लिए रियायत देने की सिफारिश अनिवार्य रूप से ग्राम सभा से करानी होगी।

ठ) राज्य विधानमंडल यह सुनिश्चित करें कि अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को ऐसी शक्तियां और अधिकार प्रदान करे जो उन्हें स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने में समर्थ बनाएं ।

वे ग्राम सभा को निम्नलिखित शक्तियों से सुसज्जित करें –

१)शराब की बिक्री पर प्रतिबंध और नियंत्रण रखने की शक्ति,

२) लघु वनोपजों पर ग्रामसभा का स्वामित्व,

३) अनुसूचित क्षेत्र में किसी बाहरी को जमीन अधिग्रहित करने से रोकने की शक्ति और गलत तरीके से कब्जा किए गए जमीनों को वापस कराने की शक्ति,

४) ग्राम बाजार या हॉट के प्रबंधन की शक्ति,

५) आदिवासियों को ऋण देने की गतिविधि पर नियंत्रण की शक्ति,

६) क्षेत्र के सभी संस्थाओं और सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ पर नियंत्रण की शक्ति,

७) स्थानीय योजनाओं और ऐसी योजनाओं के लिए जिसके अंतर्गत जनजातीय कल्याणकारी योजनाएं हैं, के संसाधनों (tribal sub plan)पर नियंत्रण की शक्ति,

ठ) राज्य की विधायिका, ग्राम सभा को ऐसी शक्तियां और प्राधिकार प्रदान करें जो उन्हें स्वायत्त शासन की संस्था के रूप में कार्य करने में समर्थ बनाएं ताकि जिला स्तर पर स्थापित स्वायत्त जिला परिषद, निचले स्तर पर कार्यकारी ग्रामसभा के अधिकार और शक्तियों का हनन ना करें ।

ठ ) राज्य की विधायिका जब भी अनुसूचित क्षेत्रों के जिला स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था की संरचना तैयार करें तो वह संविधान के छठी अनुसूची की अनुरूप हो।

विद्यमान विधियों और पारंपरिक व्यवस्थाओं को बनाए रखना

५) इस अधिनियम द्वारा किए गए अपवादों और रूपांतरों सहित संविधान के भाग 9 में किसी बात के होते हुए भी, उस तारीख से ठीक पूर्व, जिस दिन इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, अनुसूचित क्षेत्र में प्रचलित पारंपरिक स्वशासी व्यवस्था से संबंधित किसी विधि का कोई उपबंध, जो ऐसे अपवादों और रूपांतरों सहित भाग 9 के उपबंधों से असंगत है तथा जब तक किसी विधान मंडल द्वारा या अन्य किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा उसे संशोधित या निरस्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक उस तारीख जब से इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है ,एक वर्ष समाप्त नहीं हो जाता है, तब तक यह कार्यकारी रहेगा ।

उक्त तारीख के ठीक पूर्व विद्यमान सभी स्वशासी पारंम्परिक कार्यकारी इकाई अपने अवधि समाप्त होने तक जारी रहेगी जब तक उपरोक्त अवधि समाप्त होने से पूर्व, राज्य की विधायिका ,सदन में इस आशय का (पेसा कानून का) प्रस्ताव लाकर इसे विघटित नहीं कर देती है ।