मानव तस्करी रोकने के लिए समाज आगे आए

                                                                                                                                           ओलिवा अर्जुन इंदवार

मानव तस्करी क्या है ? किसी भी व्यक्ति को धोखे, छल-बल से ऐसे जीवन जीने के लिए मजबूर करना जो वह व्यक्ति नहीं चाहता है। मजबूर व्यक्तियों को अपने निजी मुनाफे के लिए शारीरिक-यौन शोषण करना, वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर करना, बंधुआ मजदूरी कराना, घरों में बलपूर्वक रोक कर काम कराना, जबरदस्ती विवाह करने लिए भगाना, शरीर के अंगों का व्यापार करना, किडनी, आँंख, दिल या यकृत निकाल कर बेचना, विकलांग करके भीख मंगवाना, सेक्स या युद्ध में उपयोग करना आदि मानव तस्करी का हिस्सा है ।

तस्करी के शिकार व्यक्तियों को कैद में रखा जाता है । उन्हें धमकाया जाता है कि यदि वे धोखे से बच निकलने का प्रयास करेंगे तो उनकी स्थिति बद से बदतर कर दी जाएगी और उन्हें जान से भी हाथ धोना पड़ सकता है । मानव तस्करों के शिकार व्यक्तियों का अपने जीवन और जीने के तरीके पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता है। वे हर प्रकार से गुलामी का जीवन जीते हैं और उनकी जिंदगी नर्क बन जाती है । मानव तस्करी के अधिकतर शिकार लोग कम पढ़े-लिखे होते हैं, जिन्हें रोजगार, नौकरी या विवाह आदि का लालच देकर फाँस लिया जाता है और बेरोजगार तथा अर्द्धशिक्षित होने के कारण वे नकली लोगों के वादे पर सहज विश्वास कर लेते हैं ।

अनेक लोग बेहतर आय और भविष्य के सब्जबाग दिखाए जाने पर अन्जाने लोगों के साथ दूरस्थ स्थानों में काम के लिए वगैर किसी को सूचना दिए, बिन बताए चले जाते हैं । ऐसा करने के लिए तस्कर भोले-भाले लोगों को पहले से ही तैयार करते हैं कि किसी को बताया तो बात नहीं बनेगी । अधिकतर गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी और नशासेवन से जुझ रहे लोगों को मानवतस्कर शिकार बनाते हैं । क्योंकि वे अपने स्तर से इसके विरूद्ध विरोध करने में असमर्थ होते हैं ।

मानव तस्कारों ने जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग जिले के चाय बागानों की गरीबी, अशिक्षा और बेरोजगारी को अपने धंधे के लिए मुनासिब अड्डा बना लिया है । अक्सर किसी बागान या बस्ती के कम उम्र की लड़कियाँं और लड़के बच्चे इन तस्करों के चंगुल में फंस जाते हैं। वे इन्हें दिल्ली, मुंबई, केरल आदि राज्यों में लेकर बेच देते हैं ।

यह देखा गया है कि मानव तस्कर कम वयस्क लड़कियों, लड़कों को फाँसने के लिए स्कूल, काॅलेज, कम्प्यूटर, टंकण प्रशिक्षण संस्थाओं, बाज़ार, हाट आदि स्थानों में सक्रिय होते हैं । ऐसे में इन संस्थाओं में जाने वाले बच्चों को मानव तस्करों के बारे पहले से ही विस्तृत जानकारी देनी चाहिए, वे अपने स्तर से जागरूक रहें और ऐसी स्थिति आने पर अपने सहज बुद्धि से स्थिति का सामना कर सकेें । स्थिति की गंभीरता का पता इससे पता चलता है, मानव तस्करी में स्थानीय स्तर में आदिवासी ही लिप्त पाए जा रहे हैं । ऐसी स्थिति में परंपारिक सामाजिक संस्थाओं, गैर सरकारी संस्थाओं, लेबर युनियन, राजनैतिक पार्टी, महिला और आदिवासी कल्याणकारी संस्थाओं को आगे आकर इस समस्या के समाधान के लिए रास्ता खोजना चाहिए ।

लेबर युनियन और राजनैतिक पार्टियाँ अपने सभा, मीटिंग में आए हुए लोगों को इस मामले पर जानकारी दे सकते हैं । महिला सभा और एनजीओ इस विषय पर बाज़ार स्कूल, हाट आदि जगहों में मानव तस्करी की बातों को बताने के लिए छोटे-छोटे समूह में आवश्यक जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं । इसमें स्थानीय पुलिस की भी मदद ली जा सकती है । बच्चों को बताया जाए कि किसी भी नये व्यक्ति से मेलजोल होने पर वे मोबाइल से उसकी तस्वीर ले लें और अपने घर वालों के मोबाइल या दोस्तों के मोबाइल के साथ उसे शेयर कर लें ।

प्यार, दोस्ती, मित्रता और रोजगार की बातें करने वालों के नाम-पता, मोबाइल नम्बर और उसके निकटतम दोस्तों, रिश्तेदारों की जानकारी अपने दोस्तों, परिवार के सदस्यों को दिया जाए और व्यवहार में असामान्यता मिलने पर उसकी जानकारी अपने निकटतम व्यक्तियों को दी जाए । बागान, बस्तियों में इसके बारे बैठक का आयोजन किया जाए और कुछ लोगों को इसके लिए अधिकृत किया जाए ताकि उसके मोबाइल नम्बर पर सम्पर्क किए जाने पर वे तुरंत उचित कार्रवाई कर सकें । ऐसे लोगों को सामान्य कानूनी पहलुओं की जानकारी वर्कशाॅप के माध्यम से दी जाए ।

अपने आसपास मानव तस्करी की घटनाएँ होने पर उसकी सूचना तुरंत स्थानीय पुलिस और राज्य के सीआईडी में देने की कोशिश करें । राजनैतिक पार्टियाँ, एनजीओ मुख्य रेलवे स्टेशनों पर विशेष महिला पुलिस वालों की नियुक्ति और सीसीटीवी कैमरे लगवाने की मांग कर सकते हैं । महिला पुलिस ऐसे संदिग्ध मामलों पर आवश्यक कार्रवाई कर सकें ऐसा प्रशिक्षण उन्हें दिया जाए ।

बच्चों के शारीरिक शोषण और मानव तस्करी को रोकने का समग्र प्रावधान करने वाला दंड विधि (संशोधन) कानून फरवरी 2013 से लागू हो चुका है । इस अधिनियम में भारतीय दंड संहिता की धारा 370 के स्थान पर धारा 370 और 370 क लायी गयी है । इस कानून में किसी भी रूप में बच्चों के शारीरिक शोषण, यौन शोषण, गुलामी, दासता, जबरन अंग निकालने तथा बच्चों की मानव तस्करी आदि के खतरों से मुकाबला करने के लिए समग्र प्रावधान है । इसके अलावा बच्चों के विरूद्ध अपराध के लिए अनेक विशिष्ट कानून हैं । इनमें बाल श्रम (निषेध एवं नियंत्रण) अधिनियम 1986, बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006, दुर्व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 आदि शामिल हैं । बच्चों के तस्करी और उनके खो जाने पर कार्रवाई करते हुए सरकार ने कई कदम उठाए हैं जिसमें एक वेबसाइट भी शामिल है । वेबसाइट http://www.trackthemissingchild.gov.in में खोए हुए बच्चों की रिपोर्ट दर्ज की जा सकती है । इसके अलावा भी राष्ट्रीय स्तर के अनेक एनजीओ इस क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं जिसके विवरण आदि भारतीय दंड संहिता के Section 366A के तहत अवयस्क लड़कियों की तस्करी करने और वेश्यावृत्ति के व्यापार में धकेलने के लिए दोषी को 10 वर्ष तक का कारावास होता है । गुलाम की तरह किसी व्यक्ति की उसके इच्छा के विरूद्ध खरीद-बिक्री करने वाले को धारा 370 के तहत 7 वर्षों तक का कारावास होता है ।Section 15 in The Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956 के अनुसार पुलिस को बिना वारंट के ही संदिग्ध जगहों पर तलाशी का अधिकार है । इस तरह के अनेक कानून है जिसके आधार पर मानव तस्करों के विरूद्ध कार्रवाई किया जा सकता है । लेकिन इसके लिए समाज को आगे आने की जरूरत है, कुछ नियम कानूनों की जानकारी आवश्यक है ।