मिश्रित भाषाई शिक्षा की आवश्‍यकता

Second ad

                                                                                                                                                                                        नेह अर्जुन इंदवार
 स्‍वतंत्रता के 65 वर्ष गुजर गए। लेकिन आदिवासी भाषाओं को शिक्षा का माध्‍यम बनाया नहीं जा सका। आदिवासी बच्‍चे आज भी गैर आदिवासी भाषाओं के माध्‍यम से शिक्षा ग्रहण करने के लिए मजबूर हैं। उच्‍च शिक्षा की बातें तो दूर की कौडी लगती है, प्राथमिक विद्यालयों में भी आदिवासी भाषाओं को कोई स्‍थान नहीं मिला।

Second ad

समाज को नेतृत्‍व देने वालों ने आदिवासी भाषाओं के विकास के लिए कोई योजना कभी नहीं बनाया और न ही व्‍यापक रूप से इसे आदिवासी अंचलों में लागू करवाने के लिए कभी कोई मांग रखी न ही इस पर समाज में चर्चा हुई। दरअसल आदिवासी शिक्षा के क्षेत्र में क्‍यों आगे नहीं बढ पा रहे हैं, इस पर गंभीरता से कोई बहस शुरू ही नहीं हुई।

जब भी आदिवासी शिक्षा की बातें होती है, गैर आदिवासी भाषाओं के विद्यायल खोलने की घोषणा की जाती है और कुछ विद्यालयों को उत्‍क्रमित कर दी जाती है। शिक्षा के गुणवत्‍ता पर न तो समाज का ध्‍यान गया न ही सरकार कभी इस विषय पर विचार करने का कोई प्रयास किया। आदिवासी भाषाओं के प्रति सरकारी क्षेत्र में उपेक्षा का भाव की मौजुदगी भी इसका एक कारण रहा है। लेकिन इससे भी ज्‍यादा आदिवासी समाज की अपनी रचनात्‍मक सोच नहीं होने और इस विषय पर साहसपूर्वक कोई कदम नहीं उठाना भी बडा कारण है।

आज कई आदिवासी भाषाऍं विलुप्ति के कागार पर पहॅुच चुकी है। देश से कई भाषाऍं पूरी तरह विलुप्‍त हो चुकी हैं। जो भाषाऍं बची हुई है वह अपनी मौलिकता खो रही है। कई शब्‍द और नाम विलुप्‍त हो गए हैं, हम पेडों के नाम, चिडियों के नाम, जडी बुटियों के नाम उस तरह नहीं जानते हैं जैसे हमारे पुरखे जानते थे। एक ही वाक्य बोलने के लिए आज की आधुनिक भाषाओं के शब्दों का प्रयोग करना पड़ता है। 

शिक्षितों की सादरी, मुण्‍डारी, खडिया, मालतो, हो, संताली, कुडुख, कुई, गोंडी आदि बोलने और अशिक्षितों की इन भाषाओं के प्रयोग में काफी अंतर आ चुका है। शिक्षा और साहित्‍य का माध्‍यम नहीं बन पाने के कारण भाषाओं में परिवर्तन आता है और यह परिवर्तन हर स्‍तर, बोलने वालों की शिक्षा दीक्षा, आय में अंतर, गॉंव शहर या कास्‍बा, बच्‍चा और बुढा में अलग होता है और यह परिवर्तन मानकीकरण के अभाव में बढता ही जाता है और बडे काल अंतरण में भाषाओं के रूप में ही परिवर्तन आ जाता है।

शिक्षा के माध्‍यम नहीं होने के कारएा पढुआ परिवार में आदिवासी भाषाओं का स्‍थान विद्यायल की भाषा ले लेता है। मॉं बाप द्वारा भी घर में दिकु भाषाओं के प्रयोग से बच्‍चे दिकु भाषा को ही अपनी मातृ भाषा की तरह प्रयोग करते हैं और कालांतर में उसे अपनी मातृभाषा मान लेते हैं। भाषाओं का क्षरण और प्रयोगहीन इसी तरह बढता रहता है।

भाषा किसी भी समाज की पहचान और अपनी विरासत होती है। भाषाओं के निर्माण, विकास और उस पर सम्‍पूर्ण समाज की समस्त ज्ञान की अभिव्‍यक्ति होती है, जिसमें पूरी संस्‍कृति और इतिहास समाये रहता है। भाषाओं के विकास एक बहुत लम्‍बी प्रक्रिया होती है। अपने पूरखों का सम्‍पूर्ण अनुभव, ज्ञान, गीत गोविन्‍द, कथा कहानी, हँसी मजाक, कहावत आदि का एक अनवरत बहने वाली नदी होती है जिसमें नहा कर तैर कर, उसे पीकर पूरा समाज जीता है और अपना एक अलग अस्तित्‍व गढता है।

एक भाषा या समाज की कई भाषाऍं किसी एक जाति समूह को भावनात्‍मक रूप से एकता की डोरी में बॉंध कर रखती है। एकता भी भावना बढ़ने से समाज के बडे-बडे कार्य सामुहिक रूप से निपटाए जाते हैं। समाज, सामाजिक एकता की सुरक्षात्‍मक दीवार के सहारे आगे बढ़ता है और अपनी मंजिलों को खुद तय करता है।

आदिवासी समाज पर गैर आदिवासी भाषाओं को थोपने की कोशिश और प्रक्रिया अनवरत जारी है। दिकुओं की चाहत है कि आदिवासी अपनी भाषा और संस्‍कृति भूल जाऍं। वे उनकी भाषाओं और संस्‍कृतियों तथा उनके जीवन मूल्‍य और जीने की पद्धति को अपना लें। ऐसा करने के लिए दिकुओं ने सिर्फ अपनी भाषाओं में शिक्षा उपलब्‍ध करने की व्‍यवस्‍था किए। लेकिन इन बातों पर आदिवासी समाज में चर्चा और बहस करने की कहीं कोई कोशिश नहीं की गई है और न ही इसके विकल्प की तलाश ही की जा रही है। 

अभी हाल यह है कि तमाम प्राथमिक स्‍कूलों में आदिवासी बच्‍चे गैर आदिवासी शिक्षकों के माध्‍यम से शिक्षा ग्रहण करने के लिए विवश हैं और वे एक अजनबी भाषाओं के माध्‍यम से शिक्षा पाते हैं जिन्‍हें समझने के लिए उनके पास कोई क्षमता नहीं होती है न शब्‍द भंडार। शिक्षा का मतलब रटना और रटवाना नहीं है। शिक्षा के माध्‍यम से बच्‍चे के नैसर्गिक कल्‍पनाशीलता को बढ़ाना और उसकी रचनात्‍मक को बढावा देना होता है। उनमें शिक्षा के प्रति रूचि पैदा करना शिक्षा को टूल बना कर जीवन संघर्ष में नये उत्‍साह और साहस के साथ हर मोड पर विजय पाना।

आज सौ प्रतिशत शिक्षा दिकु भाषाओं में प्राप्त किया जा रहा है। इसका प्रभाव बच्चों के सोच और विकास पर पड़ता है और एक आदिवासी शिक्षित होने के बाद सबसे पहले अपनी संस्कृति, भाषा, मूल्य और जीवन दृष्टिकोण से दूर हो जाता है और वह दिकु मूल्यों का वाहक हो जाता है। आदिवासी सामाजिक मूल्यों के बारे उनके पास अल्प ज्ञान होता है और वे आदिवासी सामाजिक मूल्यों को हेय की नजर से देखने लग जाते हैं। 

यदि आदिवासी बच्चों को  दिकु भाषाओं में शिक्षा का विकल्प नहीं दिया जाना संभव नहीं हो तो कम से कम उन्हें प्राथमिक स्तर पर तो आदिवासी भाषाओं में शिक्षा देने की व्यवस्था किया जा सकता है। लेकिन विकास के विभिऩ्न योजनाओं पर कार्य करने वाला आदिवासी नेतृत्व इस विषय पर अभी तक ठोस विमर्श नहीं कर पाया है और किसी प्रकार के सकरात्मक कदम नहीं उठाया जा सका है। लेकिन आज मिश्रित माध्यम से शिक्षा की व्यवस्था करने का समय आ गया है और आदिवासी समाज को इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।