रिवाज का हँड़िया

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                                                                                      ओलिवा अर्जुऩ इंदवार

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आदिवासी समाज में हँड़िया पीना कभी उत्सवी-रिवाज हुआ करता था । लेकिन वर्तमान में तो यह लत बन गई है और इसे अब लाईलाज सामाजिक बुराई के रूप में देखा जाने लगा है।

शराब पीना और शराबी होना दो भिन्न स्थिति है। सोशल ड्रिंकर कभी-कभी पीया करते हैं। जबकि शराबी बिना पीये रह नहीं सकता है। सोशल ड्रिंकर को शराब पीने से सुबह हैंगओवर हो सकता है। लेकिन शराबी को सुबह शराब के लिए जोर की तलब होना आश्र्चयजनक नहीं है। ऐसा शराबीपन ही समाज के लिए चिंताजनक विषय होता है।

 

हंडिया दारू की बात की जाती है तो उसका अभिप्राय ऐसी ही स्थिति से दो-चार होते लोग केन्द्रबिन्दु में होते हैं । ऐसे लोग एक तरह से शराब के अधीन अपनी आजादी को गिरवी रख देते हैं। शराब ही उन्हें जीवन देता है, शराब ही उनका जीवन लेता है। ऐसे लोगों की जिन्दगी को शराब ही नियंत्रित करता है। शराब के बिना इनका जीना दुश्वर हो जाता है ।

  झारखण्डी समाज में ऐसे शराबियों की संख्या शायद लाखों में होगी। आप किसी भी आदिवासी क्षेत्रा में जाइए शराब के नशे में लतपत हुए कोई  न कोई व्यक्ति झूमता हुआ नजर आएगा ही। दूसरे समाज के अनेक लोगों के विचारों में ऐसा शराबीपन आदिवासी इलाके की पहचान होती है।

  दूसरे समाज में भी ऐसे शराबी पाए जाते हैं। लेकिन उनकी संख्या उंगली में गिनने लायक होती है। उनके परिवार और समाज में ऐसी शराबीपन को सामाजिक मान्यता बिल्कुल ही नहीं दी जाती है। ऐसे लोगों से अन्य लोग दूरी बना कर चलते हैं।

 सामाजिक बुराईयों को हेय की नजर से देखने से उस बुराई के प्रति आम लोगों में एक जागरूकता होती है और सामाजिक आचरण में वे इसका ख्याल रखते हैं।

 लेकिन सामाजिक स्तर पर अत्यधिक शराबीपन को भी सहज प्रवृत्ति में लेने के कारण आदिवासी समाज में शराब पीने, वह भी नाली में गिर जाने तक से लोग तौबा नहीं करते हैं। इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव कम उम्र के बच्चों में पड़ता है और वे भी इसे स्वाभाविक पेय समझ कर भरपूर सेवन करने से चुकते नहीं।

 युवाओं में इसे स्वाभाविक पेय और बिना रोक टोक के मुड बनाने वाला पेय पदार्थ के रूप में धारणा बनना चिंताजनक है। इस तरह की धारणा के बलवती होने, स्वाभाविक स्थान पाने पर इसका सीधा खामियाजा समाज के सबसे मर्मस्थल युवावर्ग को उठाना पड़ता है।

 युवाओं में शारीरिक और आत्मबल प्रखर रहता है। आत्मविश्वास से भरपूर युवा बड़े से बड़े लक्ष्य को भेद सकते हैं। शिक्षा की उच्चतम ऊँचाई को छू सकते हैं। समाज के लिए वे कोई भी कार्य करने से पीछे नहीं होते हैं। वे चाहें तो जन-आंदोलन कर सकते हैं। वे चाहें तो समाज के हर पिछड़ेपन और बुराईयों को नष्ट कर सकते हैं।

किन्तु ऐसा देखा जाता है कि आदिवासी युवा जैसे ही युवावस्था को प्राप्त करते हैं अधिकतर  शराब की ओर झुक जाते हैं।

 सस्ते और हर रास्ते में मिलने के कारण वे इनके आकर्षण से बच नहीं पाते हैं। एक बार आदत हो जाए तो फिर मौके तो आते ही रहते हैं। लेकिन यह शराब थोड़े में ही कर जाता है उन्हें ख़राब। उनकी जुझने की शक्ति में कमी आती है। आत्मविश्वास में क्षय शुरू हो जाता है।  परिवार और लोगों के नजरों में प्रथम उलाहना लेकिन बाद में स्वाभाविक स्वीकृति पाने के बाद शर्म की चारदीवारी भी ढह जाती है। फिर तो मैदान खुला ही होता है।

 आप चाहें तो पूर्व से इसमें प्रवेश करें चाहे पश्चिम से कोई फर्क नहीं पड़ता। जब शराब पीने की आदत मजबूत हो जाती है तो एक डायलाग मुख में रख लेते हैं ‘शराब पीना तो हमारी संस्कृति है।’ ‘शराब के बिना हम कोई आदिवासी सांस्कृतिक रस्म नहीं निभा सकते हैं तो आप शराब के बारे इतनी बुराईयाँ क्यों मन में रखते हैं।’‘मैं अपने पैसे से शराब पीता हॅू, क्या गुनाह किया है मैंने।’ ‘अरे भई पीते हैं तो हम जीते हैं। न पीएँ तो मर नहीं जाएँगे।’

 गिरते हुए आत्मबल और शर्मसार से सराबोर होने पर वे ऐसे ही डागलाग सुना कर दूसरों को शराब के प्रति कायल कर देना चाहते हैं। किन्तु इस तरह के डागलाग के खोखलेपन से भला उनसे बढ़कर कौन परिचित होगा।  उन्हें अच्छी तरह पता है कि वे खोखले ढ़ोल को ही पीट रहे हैं।  वे जिस फंदे में बंध चुके होते हैं उससे निकलने के लिए उनके पास जरूरी शारीरिक और मन की इच्छाशक्ति नहीं होती है।

 किन्तु परिवार के सदस्य, आस-पड़ोस वाले तथा नजदीकी मित्रा बंधु इस तरह के लोगों का उद्धार कर सकते हैं।  यह श्रमसाद्ध कार्य होता है। ऐसे लोग बहुत कठिनाई से ही शराब के प्रति नेगेटिव विचार पैदा कर सकते हैं।

  युवावर्ग जब शराब का सेवन शुरू करता है तो उसके घर वालों को स्वाभाविक कष्ट होता है। कोई भी परिवार यह नहीं चाहता है कि उसका होनहार और शारीरिक रूप से तंदुरूस्त बेटा शराब के साथ दोस्ती बढ़ाए।

 लेकिन कभी-कभी पारिवारिक महौल, सामाजिक स्वीकृति और कभी-कभी मनोवैज्ञानिक रूप से हारे हुए लोग गम़ ग़लत करने के लिए शराब की शरण में जाते हैं। ऐसे महौल से निकालने उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से मजबूत करने में घर-परिवार के लोग मदद कर सकते हैं। समय रहते यदि उचित तरीके अपनाएँ जाएँ तो ऐसे लोगों को शराबी होने से रोका जा सकता है। लेकिन इसके लिए सकारात्मक धारणाओं को उनके दिमाग में बसाने की जरूरत होती है।

 एक आदमी के शराबी बन जाने से परिवार के लोगों को कितना कष्ट उठाना पड़ता है, यह शराबी के परिवार ही जान सकते हैं। कदम-कदम पर उन्हें किन झंझटों से जुझना पड़ता है। लोगों के सामने कैसे सिर को झुका कर रखना पड़ता है अथवा कैसे आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। शराबी अपना मान-सम्मान और मर्यादा तो गँवाता ही है। अपने परिवार के सदस्यों के मान-सम्मान और इज्जत को भी दाँव में लगाता है।

  शराबी का शरीर शराब के केमिकल से झझरा हो जाता है। उनके खून में अल्कोहल की मात्रा ज्यादा हो जाती है। दिमाग में अल्कोहल के अंश जमा होने के कारण तार्किक रूप से सोचने समझने की ताकत कम होते जाती है। शारीरिक संतुलन बिगड़ने लगता है। यदि ऐसे पुरूष अथवा स्त्री के बच्चे होते हैं तो वे भी मानसिक दृष्टि से बहुत स्वास्थ्य नहीं होते हैं। गर्भवती स्त्रिायों के लिए तो शराब सेवन अत्यंत हानिकारक माना गया है। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी गर्भवती को शराब से दूर रहने की सलाह दी जाती है।

 बड़ा प्रश्न यह है कि हम कैसे आदिवासी समाज को शराब के हानिकारक प्रभाव से बचा सकते हैं?

कई लोगों का कहना है कि हँड़िया दारू हमारे नेग दस्तुर का एक अहम हिस्सा है। इसे समाज से अलग नहीं किया जा सकता है। हाँड़िया को आप समाज से अलग करेंगे तो सामाजिक रिवाजों में बाधा उत्पन्न होगी और एक दिन सारे रिवाज इतिहास के अंग हो जाएँगे।

ऐसी बातों से एक बात का पता तो चलता है कि हमें अपने रीति-रिवाजों के बारे चिंता है हम उनकी कद्र करते हैं और आदिवासी संस्कृति के संरक्षण के लिए रिवाजों का संरक्षण और पालन जरूरी है।

  रिवाजों का पालन उनका संरक्षण और विकास एक बात है और रिवाजों के नाम पर अनियंत्रित रूप से शराब का सेवन अलग। संसार के अधिकतर सभ्यताओं में शराब पीने की परंपरा रही है। शराब बनाने के कई तरीके सभ्यताओं में ईजाद किए गए हैं।

  हँडिया बनाने का तरीका तो बेहद आसान है। जबकि कई समुदायों में शराब बनाने के कई दुरूह तरीके पाए जाते हैं। निश्चय ही उन समाजों में भी शराब को अहम सामाजिक स्थान प्राप्त रहा है। लेकिन शराब का सेवन दैवीशक्तियों, देवों अथवा भगवान, ईश्वर आदि को चढ़ावा देकर शेष अंश को परसाद के रूप में ग्रहण करने का रहा है। शेष अंश को जब कोई परसाद के रूप में लेता है तो वह उसका अनियंत्रित ढंग से सेवन नहीं करता है। उसे पवित्र मानकर उसकी पवित्राता से खुद के आत्मिक अंश को पवित्र करने के लिए उसका सेवन करता है।

 आदिवासियों में भी ठीक ऐसी ही परंपरा रही है। शादी में, पूजा में अथवा जहाँ कहीं भी नेग के रूप में इसका चढ़ावा चढ़ाया जाता है, वहाँ इसे परसाद के रूप में ही थोड़ा-थोड़ा एक-एक दोना देने का रिवाज रहा है।

 गुतिया में आए लोगों की आवभगत के लिए भी दिया जाने वाला हँड़िया थकावट दूर करने के लिए होता है। उससे पेट भरने के लिए नहीं।

 लेकिन जैसे कि हँड़िया का स्वभाव है वह पीने वाले को नशा देता है और नशा करने वाले किसी भी झुंड के सीनियर लोग ही होते हैं जिनकी तूती सामाजिक मामलों में ज्यादा बोलती है।

 जब सीनियर लोग हँड़िया के नशे में आ जाते हैं तो वे अपने सामाजिक पद के जिम्मेदारी को भूल कर हँड़िया को परसाद के रूप में कम से कम बाँटने के फरमान देने के बदले मन भर पीने के लिए हुक्म दिया करते हैं। इससे हँड़िया की भूमिका ही बदल गयी और यह परसाद से फरसाण अर्थात खाना बन गया।

 आज हँड़िया की भूमिका को बदलने की जरूरत है। हँड़िया के प्रति सामाजिक धारणा को धीरे-धीरे बदल कर आदिवासी दैनिक पेय के बदले इसे उत्सव और खुशियों का पेय बनाएँ। अर्थात् जब खुशियों का मौका आए तब ही थोड़ी सी मात्रा में इसका सेवन करें और हँड़िया का मान बढ़ाएँ।

 विदेशों में छोटे-छोटे गिलासों में वाइन पीने का रिवाज है। वहाँ ठण्डा मौसम होने के कारण इससे उन्हें हानि नहीं होती है। बल्कि इससे उन्हें शारीरिक गर्माहट प्राप्त होती है। लेकिन हमारे देश में हँड़िया अधिक गर्मी को जन्म देता है जिसका खामियाजा हमारे शरीर को भुगतना पड़ता है। क्यों न हम हँड़िया को अधिक स्वादिष्ट पेय बनाएँ और इसे सिर्फ उत्सव के अवसर पर छोटे-छोटे दोने अथवा ग्लास में लें वह भी सिर्फ एक बार जिससे किसी को कोई हानि न पहुँचे और हमारे रीति-रिवाज भी सही सलामत रहें। क्या हम ऐसी तब्दीली लाने में सक्षम हैं?