विचारों का विकास

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                                                                                                                                                                                  नेह अर्जुन इंदवार

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आदिवासी समाज बहुत सीधा-सादा समाज है। सादे जीवन के साथ शिक्षा की कमी के कारण वह अपने साथ होने वाले शोषण, अत्याचार, पक्षपात, चालाकी को स्पष्ट रूप से रेखांकित और पारिभाषित नहीं कर पाता है । वह ठगी, जालसाजी को जल्द समझ नहीं पाता है । इसी के कारण वह शोषण, पक्षपात और भेदभाव का शिकार हो रहा है । आदिवासी जब तक अपने अहित के षड़यंत्र को समझता है, तब तक उसका सर्वस्व लूट चुका होता है ।

सामाजिक विकास और विचारों की प्रौढ़ता के बीच अन्यायोश्रित संबंध है। विकास के कई पहलू होते हैं । शिक्षा, स्वास्थ्य, स्कूल, सड़क आदि दृष्टिगत पहलू के साथ मानसिक और वैचारिक जैसे अन्य अमूर्त पहलू भी हैं ।

समाज का विचारों से मैच्योर होना भी महत्वपूर्ण है । यह पहलू विकास के अन्य प्रतिमानों से अधिक महत्व रखता है और इसके बिना विकास के दूसरे पहलू एक तरह से बेमानी और अधूरे हैं । क्योंकि विकास का पहला कदम विचारों से बुने गए अवधारणा पर निर्भर होता है ।

विचारों से मैच्योर होने और हर मामले में विश्लेषणात्मक चिंतन से जागरूक व्यक्ति और समाज अपने हित के बारे स्पष्ट विचार रखता है और उसे विकास के शाॅर्टकट और लाॅन्ग कर्ट के साथ अस्थायी और स्थायी रास्ते के बारे भी बखूबी पता होता है । ऐसे मैच्यौर व्यक्तियों के समूह से बना समाज अपने साथ हो रहे व्यवहार को बहुत बुद्धिमता के साथ रेखांकित करता है, उसे पारिभाषित करता है, स्थिति से निपटने के लिए अपने उर्जा को एकत्र करके उसे सही दिशा में उपयोग करता है ।

यदि वह मानसिक रूप से विश्लेषण करने की क्षमता नहीं रखता है, सामने की चीजों, साथ जुड़े व्यक्तियों के विचारों, लगातार घट रहे घटनाक्रमों को उसके सही, सकारात्मक और नकारात्मक रूप को देखने में असफल रहता है, या उसके दूरगामी प्रभावों को आंकने में असफल रहता है, तो वह दूसरों की चालाकी, पक्षपात, अन्याय और शोषण से बच नहीं पाएगा ।

आदिवासी समाज के साथ हो रहे पक्षपात, शोषण, अन्याय को इस परिपेक्ष्य में देखने की बहुत जरूरत है । विकास के इस पहलू के नजरांदाज होने का प्रतिफल आदिवासी समाज भुगत रहा है । मानसिक रूप से सीधा सादा होने, घटित घटनाओं को सही ढंग से नहीं समझने के कारण उसके साथ लगातार अन्याय हो रहा है । समय रहते शोषण या चालाकी को नहीं समझने के कारण आदिवासी समाज का बहुत कुछ लूट चुका है।

सवाल उठना स्वाभाविक है, कि विकास के इस पहलू को कैसे हासिल किया जाए और दिमाग को कैसे विकसित किया जाए ?

हर आदमी में अपना हित सोचने की क्षमता होती है । लेकिन आज के छीना-झपटी युग में अपने हित को बचाए रखने की क्षमता सिर्फ सोच रखने से नहीं बचता है । उसे छीनने वालों से बचाए रखने के लिए छीनने वालों से अधिक सक्रिय होने की जरूरत है । उसे अपनी मानसिक शक्ति, विश्लेषण करने की क्षमता को बढ़ाना होगा। इसके लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण कारक है। लेकिन सिर्फ शिक्षित होने से ही कोई मानसिक रूप से क्षमतावान नहीं हो जाता है । शिक्षित होने के साथ-साथ व्यक्ति को हर घटना, व्यक्ति और परिस्थिति को सही परिपेक्ष्य में विश्लेषण करने की शक्ति भी विकसित करनी होती है । जिन व्यक्तियों में ऐसी शक्ति विकसित होती है, वे अपने हित और अहित को तुरंत आंक सकते हैं और उसके अनुसार ही क्रिया या प्रतिक्रया करते हैं ।

प्रत्येक घटना की एक समयसीमा होती है । घटना के समय की गयी क्रिया या प्रतिक्रया प्रभावी और फलदायक होती है। समयसीमा समाप्त हो जाने पर क्रिया या प्रतिक्रया का कोई फल नहीं मिलता है ।

उसे इस रूप में समझ सकते हैं।
घटनाक्रम  —–

(एक) कहीं आदिवासी इलाके या गाँव में सड़क, अस्पताल, स्कूल, टायलेट, इंदिरा आवास बन रहा है, वह बेहद घटिया माल के साथ बनाया जा रहा है। शिक्षित आदिवासी उसे रोज देख रहा है, लेकिन व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से कोई आवाज़ नहीं निकालता है और जब निर्माण कार्य पूरा हो जाता है, तब वह उस पर अपनी आवाज (क्रिया या प्रतिक्रिया) निकालता है, तो उसका कोई प्रभाव उस निर्माण पर नहीं होगा।

(दो) किसी अनपढ़ आदिवासी की जमीन को कोई गैरआदिवासी खरीदने, ठगने, हड़पने या जबरदस्ती कब्जाने का प्रयास कर रहा है और एक शिक्षित व्यक्ति उसके बारे जानते हुए भी अशिक्षित को कोई मार्गदर्शन नहीं दे रहा है, या सहायता नहीं कर रहा है, तो समझिए ऐसे व्यक्ति में क्रिया और प्रतिक्रिया करने की योग्यता और क्षमता नहीं है । यदि वह घटना को देखकर कैंछा होकर निकल जाता है और आँखे मूँद लेता है, तो ऐसे व्यक्ति के वास्तविक रूप पर शिक्षित होने का सवालिया निशान लग जाता है।

शिक्षा सामाजिक उत्त्रदायित्व को बढ़ाता है, लेकिन यदि कोई सामाजिक उत्त्रदायित्व का बोध नहीं रखता है, उस पर क्रिया या प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता है, तो उस व्यक्ति के मानसिक जागरूकता और वैचारिक मैच्योरिटी पर सवाल खड़ा हो जाता है।

जागरूक व्यक्ति ऐसी घटनाओं को घटना के पूर्व ही रोक सकता है । लेकिन शिक्षित होकर भी कोई ऐसी घटनाओं को नहीं रोक रहा है, तो समझिए वह व्यक्तिगत और सामाजिक रूप से जागरूक नहीं है । उसमें पारिवारिक और सामाजिक हित को बनाए रखने की योग्यता और क्षमता नहीं है । इसका स्पष्ट अर्थ है, कि क्रिया और प्रतिक्रिया करने की क्षमता व्यक्ति और समाज का महत्वपूर्ण गुण होता है ।

प्रभावी क्रिया या प्रतिक्रिया देने के लिए और विचारों से मैच्यौर होने के लिए मानसिक रूप से अधिक क्षमतावान होना होता है । यह क्षमता सिर्फ शिक्षा लेने भर से नहीं आता है, इसके लिए नियमित अध्ययन, छोटी-बड़ी समस्याओं पर नियमित संतुलित चर्चा, बहस, सभी पक्षों की सामाजिक, नैतिक और कानूनी पहलूओं की जानकारी भी आवश्यक है । वैचारिक क्षमता बढ़ाने के अनेक उपाय है और जानकारी बढ़ाने के असंख्या स्रोत ।

असम और बंगाल के चाय बागानों में दशकों तक आदिवासी मजदूरों का शोषण होता रहा, इनके लिए शिक्षा स्वास्थ्य, बुनियादी सुविधाएँ गायब रहीं, लेकिन समाज से कोई क्रिया या प्रतिक्रिया नहीं आने के कारण यह दशकों तक बद्दस्तुर चलता रहा । लाखों पढ़े-लिखे रहे, लेकिन जागरूक और विचारों से मैच्योर नहीं होने के कारण वे क्रिया या प्रतिक्रिया देने में असमर्थ रहे ।

आज भी तीन वर्षों के मजदूरी वेतन की बढ़ोतरी के नाम पर सिर्फ 40 रूपये बढ़ोतरी देने की बेशर्म कोशिश की जा रही है। एक मजदूर को 112 रूपये हाजिरी देने की कोशिश की जा रही है । ऐसा लगता है, चाय मजदूरों को भीख देने की तैयारी की जा रही है। वेतन समझौता करने के लिए जुटे हुए कई पक्ष न्यूनतम वेतन की मांग को गोल करने और त्रिपक्षीय वेतन समझौते की बातों को ही अग्रता देना चाहते हैं, जो कि उनके शोषण के विस्तार का ही एक अंग है । जबकि मजदूर संघ न्यूनतम वेतन की मांग कर करे हैं । न्यूनतम वेतन अधिनियम के अन्तर्गत मजदूरी मिलने पर यह न सिर्फ दुगुणा होगा, बल्कि इस कानून के साथ होने वाले तमाम नये नोटिफिकेशन का लाभ मजदूरों को मिलेगा । भविष्य में हर परिवार के पास आठ-दस हजार से अधिक की कमाई आ सकती है । जबकि किसी अन्य समझौते में सिर्फ शोषण, भेदभाव और अन्याय ही मिलेगा । यहाँ क्रिया-प्रतिक्रिया की आवश्यकता है ।

शोषण, अत्याचार, ठगी और चालाकी को रेखांकित करने के लिए एक समाज को अनेक अनुभवों के रास्ते से गुजरना होता है, इसके लिए एक महौल तैयार करना पड़ता है, सूचनाओं का विशाल संग्रहण करना पड़ता है । अपने समाज के क्लाॅसिकल समस्याओं को सूक्ष्म ढंग से अध्ययन करना पड़ता है, उसका उपाय ढूँढ़ना पड़ता है । उसके बारे लिखी गयी सारी जानकारियों को दिमाग में बैठाना पड़ता है ।

पुराने जमाने में गाँवों में बुजुर्गगण बच्चों को बैठा कर सामाजिक किस्से- कहानियाँ सुनाया करते थे । जंगली और पालतू पशुओं तथा काल्पनिक पात्रों पर आधारित दिलचस्प कहानियों के माध्यम से समाज का चित्रण किया जाता था । सामाजिक इतिहास, पुरखों की जीजिविषा, संघर्ष की कहानियाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी, नयी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जाता रहा । इन कहानियों में नैतिक और व्यावहारिक पक्ष गंुफित हुए रहते थे। स्कूली शिक्षण से वंचित समाज में शिक्षा का यह चलन सदियों तक चलता रहा । लोग इन कहानियों को सुनकर व्यक्तिगत और सामाजिक रूप से जागरूक और मैच्योर होते थे और पारिवारिक तथा सामाजिक उत्त्रदायित्व का वहन करते थे ।

आज स्थिति बदल चुकी है, शाम को किस्से-कहानियाँ सुनने, सुनाने की जगह टीवी, सिनेमा, कम्प्यूटर, मोबाइल और रेडियो ने ले लिया है । नैतिकता और सामाजिक उत्त्रदायित्व के मानदण्ड बदल चुके हैं । सामाजिक हित से पारिवारिक या व्यक्तिगत हित अधिक बलवती हो चली है । सामाजिक ढांचे के अंदर की टूट एक बाहरी समाज को भी दिखाई देती है। समाज में भाई चारे को बढ़ाने की जगह स्वार्थ की बातों को अधिक जगह दी जा रही है ।

समाज में आज राजनैतिक और धार्मिक स्वार्थ, सामाजिक स्वार्थ से अधिक बलवान हो चला है । समाज में समुदायगत हित (उराँव, मुण्डा, खड़िया, हो, संताली, सदान, सरना, क्रिश्चिन, आर सी, प्रोटेस्टेंट, शिक्षित, अशिक्षित आदि) की बात अधिक आवाज से सुनाई पड़ती है । आदिवासी एकता में ये सारे हित घुन का काम कर रहे हैं, जो धीरे-धीरे समाज को कमजोर कर रहे हंै ।
सामाजिक ताना-बाना विकास के वैचारिक और मानसिक पक्ष का एक अविभाजित अंग है । विकास का सारा तामझाम सामाजिक विकास के लिए ही होता है और जब समाज ही परिवार और व्यक्तियों के रूप में टूट कर बालू के कणों की तरह असंगठित होता है, तो विकास की अवधारणा ही बदल जाती है ।

निर्माणगत विकास के साथ सामाजिक, मानसिक विकास जब एक पथ पर चलता है, तो किसी समाज में विकास का सभी पहिया एक साथ गतिमान होता है। लेकिन इसके लिए एक गतिशील सांस्कृतिक ढाँचे की आवश्यकता होती है और यह गतिशील सांस्कृतिक ढाँचा पुरानी संस्कृति को बचा कर, उसे सुगढ़ बना कर ही किया जा सकता है । यह सिर्फ शिक्षित लेकिन मैच्योर व्यक्तियों के समूह द्वारा ही बनाया जा सकता है ।

आदिवासी समाज के साथ हो रहे अन्याय, पक्षपात, शोषण को समाप्त करने के लिए विकास की परिभाषा को बदलने की जरूरत है । मूर्त विकास के साथ-साथ अमूर्त सकरात्मक विचारों, जो क्रिया और प्रतिक्रिया से लैस हाे, के निर्माण से ही समाज में संतुलित विकास आएगा । इसका कोई विकल्प भी नहीं है ।  This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec, 2014. All rights reserved