निर्वासित जीवन के यात्री

नेह अर्जुन इंदवार

पूरी मानव जाति के विकास की कहानी ही निर्वासित जीवन की कहानियाँ हैं। अफ्रीका से चल कर बाहर की दुनिया में कदम रखने वाले मानवों ने निर्वासित जिन्दगी के ताने-बाने से सभ्यता की नींव रखी ।

अपने विवादस्पद उपन्यास ‘सेटानिक वर्सेस” में सलमान रश्दी लिखते हैं “निर्वासन शानदार वापसी का एक सपना होता है।“  वहीं साम्प्रदायिक पृष्टभूमि पर लिखी गई उपन्यास “चौरासी/84”  में सत्य व्यास लिखते हैं “ब्याह औरतों से आँगन छीनता है और व्यापार मर्दों से गाँव.।”

शानदार वापसी करने के सपने हो, रीति-रिवाजों के बरक्स देस छोड़ना हो या नये सुअवसर की तलाश हो, झारखंडी आदिवासी जन हमेशा अपने खेत-खलिहान छोड़ कर बाहर देस में निर्वासित जीवन जीने के लिए अनदेखे जगहों में जाने और बस जाने से परहेज नहीं किया। कहीं वे खुशी से बस गए तो कहीं दुखी होकर।

वन-पहाड़ों से अच्छादित गाँव-खोईर से दूर असम-बंगाल के चाय बागानों में झूंड के झूंड आदिवासी लाखों की संख्या में “शानदार वापसी” करने के सपनों के साथ गए। लेकिन अनगिनत प्रतिकूल थपेड़ों की मजबूरी ने उनकी “शानदार वापसी” के सपनों को चकनाचूर कर दिया और वे वहीं रच-बस गए। हजारों कारण और प्रतिकूल परिस्थितियों के पहाड़ रहे, जिनसे गरीब, अनपढ़ आदिवासी पार नहीं पा  सके और वे आज चाय आदिवासी के संज्ञा के साथ असमिया बनने के लिए अभिशप्त हो गए।

झारखंड के आदिवासी लाखों की संख्या में ईंट भट्टों या इत्तर कार्यों के लिए भारत के अन्य राज्यों, शहरों और महानगरों में भी गए और आज लाखों की संख्या में छोटे-बड़े शहरों या दूर-दराज के क्षेत्रों में हमेशा के लिए बस गए। कुछ परिवारों का किंचित संबंध आज भी अपने गाँव घरों से बने हुए हैं, लेकिन अधिकतर का संबंध नयी पीढ़ियों के अजनबी भावों और भावनाओं में खो गए।

मुंबई शहर के एक उपनगर में रहने वाले एक्का और किंडो परिवार की कहानी, डिग्बोई के पास माकुम चाय बागान में रहने वाले टोप्पनो परिवार से अलग नहीं है।

किंडो परिवार का मुखिया जलपाईगुड़ी के किसी चाय बागान से था। तीन बेटियों और एक बेटा के परिवार में वह सबसे छोटा था। बागान के हिंदी प्राईमरी स्कूल पास करने के बाद वह पास के किसी बंगला माध्यम के विद्य़ालय में दसवीं क्लास तक की पढ़ाई की। दसवीं के बोर्ड परीक्षा में तीन बार फेल होने के बाद पढ़ाई छोड़ दी। उनका मन चाय बागान में माँ-बाप के बदले मिलने वाले मजदूरी पर बिल्कुल नहीं लगा और एक दिन वे ट्रेन पकड़ कर मुंबई शहर के लिए निकल गया। मुंबई में रात को स्टेशन पर सोना और दिन में काम की खोज करते-करते एक होटल में काम मिल गया। होटल में ही जिंदगी गुजर रही थी। फिर एक गोवा मूल की लड़की से मुलाकात हुई। दोस्ती हुई और फिर शादी भी हुई। झोपड़पट्टी में रहते-रहते दो बच्चे भी हुए। गोवा आना-जाना हुआ लेकिन कभी जलपाईगुड़ी जाना नहीं हुआ। हमेशा सोचा पर्याप्त पैसे होने पर हमेशा के लिए मुंबई छोड़ कर जलपाईगुड़ी के बागान या बस्ती में बस जाएँगे। लेकिन परिवार को लेकर अपने माँ-पिता के पास लेकर शानदार ढंग से घर-वापसी करने लायक पैसे कभी बचे नहीं। पैसे बचा कर शानदार वापसी के ख्वाबों में दस-बारह वर्ष निकल गए और अपने बीवी-बच्चों को घर वालों से बिना मिलाए ही एक दिन गोवा के समुद्र में आखरी सांस ले ली।

पहाड़ सा दुख लिए गोवानीज बीवी गोवा में ही बच्चों को पाला-पोसा। बच्चे गोवानीज भाषा और संस्कृति में ढल-बस गए। जिंदगी ने कभी भी उन्हें जलपाईगुड़ी चाय बागान की जिंदगी से रूबरू नहीं कराया। वे न तो बीवी-बच्चों को अपने परिवार का अता-पता बता पाए और न ही परिवार से मिलवा पाए। बच्चे बड़े होकर माँ के साथ मुंबई आ गए। वे चाह कर भी बिना अता-पता के अपने रिश्तेदारों के ढूँढ नहीं पाए। उनके साथ अपने परिवार की सिर्फ गोत्र बचा हुआ था। एक दिन मेरे छोटे भाई ने अपनी कंपनी में किंडो गोत्र सुनकर उनसे परिचय पूछा तो सिर्फ इतना ही बता पाए कि पिताजी किसी जलपाईगुड़ी गाँव से मुंबई आए थे। बातचीत में अपने परिवार से बिछुड़ जाने का गम था, साथ ही अपने रिश्तेदारों से मिलने की चाहत भी थी। अब वे गोवानिज होकर मुंबईकर भी बन गए हैं।

दूसरी ओर आजादी की लड़ाई चल रही थी। आजादी की लड़ाई में टाना भगत आंदोलन की कुछ छिट-पुट याद लिए एक किशोर 1930-35 के आसपास तत्कालीन राँची जिले के किसी नवाटोली गाँव से डिब्रुगढ़ जिले के डिग्बोई के पास माकुम चाय बागान में मजदूर बन कर काम करने लगा। गाँव में कई वर्षों से ठीक से बारिश नहीं हुई थी और गाँव में भुखमरी की स्थिति आ गई थी। गाँव में उनके खेत किसी ऊँची जगह पर थी। वह अपने खेत के पास कुँआ बना कर एक बड़ा घर बनाना चाहता था। वह चाय बागान में मजदूरी करने के साथ-साथ बकरी और गाय-बैल पालने लगा और सात-आठ साल के बाद सारे गाय-बैल-बकरियों के बेच कर अपने गाँव लौट आया।

गाँव में पिताजी ने छोटे भाई की शादी कर दी थी। उन्होंने सारी बचत को लगा कर गाँव में कुएँ बनाया, नया मकान बनाया और गाँव के पास ही कुछ नये खेत भी खरीद लिया। वहीं शादी करके गाँव में बसने के सपने भी देख लिया था। लेकिन साल भर में ही छोटे भाई के साथ संपत्ति के स्वमित्व पर विवाद हो गया। छोटा भाई ने उन पर हाथ भी उठाया। वह बहुत दुखी हो गया और घर वालों से मोह तोड़ लिया।  अजनबी बन कर एक ही घर में रहना असंभव हो गया।

दुख और नाराजगी में वह पुनः असम लौट गया। नाराजगी इतनी थी कि वे वहीं घर-बार बसा लिया। अभी बच्चे छोटे ही थे। चाहत थी कि उन्हें देस-गाँव में लेकर कर दादा-दादी और गाँव वालों से मिला दे। लेकिन जिंदगी के डगर में उबड़-खबड़ अधिक होते हैं। वह असम के कुख्यात मलेरिया का शिकार हो गया और पाँच वर्षों के अंतराल में ही चल बसा। दो अबोध बच्चे थे। पत्नी को भी देस दुनिया और परिवार के बारे कुछ मालूम नहीं था। पति के चले जाने पर पत्नी किसी और के साथ घर बसा ली। बच्चे सौतेले बाप के घर में शिक्षित हुए बड़ा भाई कंपनी के एक बागान में क्लर्क बन गया और दूसरा किसी स्कूल में शिक्षक।

एक दिन दोनों सप्ताह भर की छुट्टी में अपने पैतृक गाँव जाने के लिए राँची आए। पता चला नवाटोली नाम के तो कई गाँव हैं। एक दो नवाटोली में वे गए और पूछताछ किए। लेकिन नौ-दस दशक में तीन पीढियाँ गुजर जाती है। बीस पच्चीस वर्ष के लोगों के बारे किसी को कुछ पता नहीं रहता है। यहाँ तो अस्सी नब्बे वर्ष पहले की बात थी। किसी को उनके बारे कुछ भी मालूम नहीं था। झारखंड के कितने नवाटोली में वे जाते और कब तक अनुसंधान करते। दोनों बहुत मायुस होकर असम लौट गए। अब असम ही उनका देस है। झारखंड से उनका कोई रिश्ता बचा नहीं। यह इन दो भाईयों की कथा नहीं, बल्कि असम, बंगाल के चाय बागान या अंदामान निकोबार में रहने वाले करीब एक करोड़ आदिवासियों की कहानी है। वे सिर्फ इतना जानते हैं कि कभी उनके पुरखे राँची, लोहरदगा, दुमका, जशपुर से काम की खोज में आए थे। लेकिन उनकी “शानदार गाँव वापसी की इच्छा” वहीं हमेशा के लिए दफन हो गए।

शायद दुनिया में इंसानों की नयी बस्ती ऐसे ही निर्वासियों के द्वारा बसती रही है। कहीं कोई रोजगार की खोज में दूर दुनिया में भटकता है तो कोई वापस आने के लिए जिंदगी के बेशकीमती वर्षों को सपनों के थपोड़ों में गँवा देते हैं।