मत-भ्रष्टता, सामाजिक विकृति एवं मनोवैज्ञानिक युद्ध

                                                          अभिषेक विल्कन आईंद

 

मत-भ्रष्टता, सामाजिक विकृति एवं मनोवैज्ञानिक युद्ध

(Subversion, Social Perversion, and Psychological Warfare)

  1. सामाजिक विकृति (Social Perversion)

समानता का भ्रम (The Illusion of EQUALITY)

मत-भ्रष्टता के कारक प्रोपेगंडा अर्थात मिथक-प्रचार सीधे-सीधे नहीं करते हैं। वे हर समय बयान-बाजी करते मिलें, ऐसा भी नहीं है। इनका कार्य गूढ़ होता है।

समाचार पत्र, टेलीविज़न, एडवर्टाइज़मेंट, रेडियो इत्यादि के एडिटोरियल पक्ष, कॉलेज के गवर्निंग बोर्ड्स (जी हाँ, इनका असर यहीं अधिक होता है), धार्मिक संस्थानों के गवर्निंग बोर्ड्स इत्यादि माध्यमों में यह कारक “क्लास-स्ट्रगल”अर्थात साधारण समाज (रोजाना कार्य करने वाले साधारण कामगार), मजदूर, कृषक इत्यादि सामाजिक समूह की “आइडियोलॉजी” अर्थात विचारधारा का बहुत वजन के साथ पक्ष रखते मिलेंगे – इस बात पर जोर दिया जाता है की कैसे इनके साथ नाइंसाफी होती है, कैसे कोई “दूसरा” समूह इनके अधिकारों का हनन कर रहा है, कैसे इनके संघर्ष को फलाना-फलाना समूह अथवा विचारधारा से खतरा है। साधारण शब्दों में यह कारक उन सारी संघर्षों के पक्ष में तथ्य देते मिलेंगे जिनका असली संघर्ष से कोई लेना देना नहीं – इनका एक ही मुख्य कार्य है – दमनकारी नौकरशाही और सरकार के दमनकारी नीतियों से ध्यान भटकाना।

इनके “जारगन” अर्थात गुंजन-शब्द में आपको बार-बार एक शब्द मिलेगा – समानता (Equality)। बार-बार इस बात पर जोर की कैसे “हम सब एक हैं और एक ही तरह का संघर्ष कर रहे हैं”।
यह मार्क्सवाद, साम्यवाद और समाजवाद का सबसे बड़ा झूठ है। कोई भी मनुष्य बराबर नहीं होता है।

यह तथ्य पहली बार सुनने से मानसिक झटका लगता है। आपको लगने लगता है की बातें जात-पात पर उतरने वाली है। आप घबराने लगते हैं। कटाक्ष और विवेचना करने से पहले आपको भय होने लगता है कि सामने वाला क्या सोचेगा? यही है इस मत-भ्रष्टता पूर्ण शिक्षा का असर – आपको विवेचन से वंचित रखना। पर धैर्य रखें – यह तथ्य इतना सीधा नहीं।

विश्व के किसी भी ऐतिहासिक इतिहास अथवा व्यवस्था में कभी भी “समानता” का जिक्र नहीं होता है। आप चाहें तो वैश्विक लिटरेचर में चेक कर सकते हैं। “इक्वलिटी” अर्थात समानता का सबसे पहला लोक-प्रचार साम्यवादी रूस और मार्क्स के किताबों में से हुआ है। पर क्यों?
साम्यवाद-मार्क्सवाद के बाद आधुनिक दुनिया के राजनैतिक अगुवे बार-बार कहते मिलते हैं – “हम ऐसा दुनिया बनाएँगे जहाँ सभी मनुष्य समानता में जन्म लेते हैं।”

मनुष्य समानता में जन्म नहीं लेते क्यूंकि वह समान नहीं। हर जन्म लिया हुआ नन्हा प्राण हर कार्य करने के लिए उपयुक्त होता है। वह वैज्ञानिक भी बन सकता है यह डाकू भी। वह अपने कार्य से समानता पाता है – जन्म से नहीं।

मनुष्य का कार्य निर्धारित करता है की वह एक-समान है या नहीं। उसके हावभाव और आचार निर्धारित करते हैं की वह समान है या नहीं। समानता को कानून या विधान से नहीं पाया जा सकता। समानता थोपी नहीं जा सकती है। उसे पाने के लिए मनुष्य को कार्य और मेहनत द्वारा उस लायक बनना होता है।

उदहारण देता हूँ – हमारे विधान के रचयिता ने आरक्षण का प्रावधान बनाया। यह प्रावधान इसलिए नहीं था कि हमे आटोमेटिक समानता मिल जाये – यह प्रावधान था ताकि हम अपनी योग्यता बिना हस्तक्षेप के साबित कर सकें। आरक्षण समानता (Equality) नहीं देती – आरक्षण न्यायसम्य (Equity) आधार देती है। परन्तु आज इसका नेगेटिव इफ़ेक्ट देखने के लिए अधिक मिलता है। कारण?

मत-भ्रष्टता के प्रभाव में आरक्षण समानता की लड़ाई कही जाने लगी। लोग इसे ग्रांटेड लेने लगे और इसका मूल भाव अब खतरे में हैं क्यूंकि इसका विवरण ही बदल गया है। “समानता” के गुंजन-शब्द ने इसे असमानता का चिन्ह बना दिया है।

समानता के गुंजन शब्द द्वारा ही हमारे आदिवासी गुण को बाह्य समाज के पिछड़े वर्ग से जोड़ दिया गया। हमसे हमारी विशिष्टता छीन ली गयी। समानता के गुंजन शब्द से झारखण्ड के अनुसूचित क्षेत्र बाह्य समाज के लिए भी खुले हो गए। समानता के गुंजन शब्द यह निर्धारित करते हैं की झारखण्ड में सभी झारखंडी हैं – बिहार बिहारियों का, महाराष्ट्र मराठियों का पर झारखण्ड – हम सभी हिंदुस्तानी हैं, एक हैं, इसलिए पुरे हिंदुस्तान का। समानता सिर्फ तब जब हमसे कुछ लिया जाये। अगर हम अपने अधिकारों और परंपरा की बात करें तो हम राष्ट्रविरोधी।

हमारा समाज भी कभी समानता थोपने वाला नहीं हुआ। ग्रामसभा किसी किंसड़ (Properous) से उसका संपत्ति छीन सब में बाँट नहीं देता था। समानता के लिए मूल शब्द आपको आदिवासी भाषाओँ में शायद ही मिलें – कारण है कर्म-श्रेष्ठता। हमारा समाज जानता था की हमको अपने कर्म के अनुसार ही वैभव मिलता है।

समानता के सिद्धांत पर बना कोई भी विचारधारा एक मिथक है। प्रोपेगंडा द्वारा मत-भ्रष्टता के कारक गुंजन-शब्दों द्वारा विशिष्टता को समानता की खिचड़ी में मिला डालते हैं। विशिष्टता-विहीन समाज जल्दी बिखरता है। विशिष्टता-विहीन समाज के बीच कोई भी एक विशिष्टता – जैसे कहें, कपटता, उन्हें राजा बना देती है।

समानता के गुंजन शब्द यह आभास दिलवाते हैं कि आपके विशिष्ट अधिकार, आपकी मेहनत द्वारा अर्जित पहचान और कौशल किसी बाहरी/बाह्य आलसी अथवा कपटी व्यक्ति के बराबर हैं। आपको कैसा लगेगा जब भोजन के वक़्त आपके घर बाहर से कोई आ धमके और मुफ्त का भोजन करने बैठ जाये – आप विरोध करें तो वह कह देगा – “हम सभी मनुष्य है, हम सभी इस घर के अंदर हैं, यहाँ जो है वह हम सभी का है क्यूंकि हम सभी समान हैं।”

हम सभी सामान है इसलिए खदान के खनिज देश के, बनता स्टील देश और कॉर्पोरेट का!

अगर हम सभी समान हैं तो हम दूकान में पैसे क्यों देते हैं – क्यों नहीं बनिया-मारवाड़ी मुफ्त में हमे सब कुछ दे देता है? क्यों नहीं टाटा हमे हमारे ही जमीन से निकली स्टील बिक्री का मुनाफा देती है?
यहाँ वह बातें करने लगते हैं – अवसर, क्षमता और अधिकार की। तब समानता चरने गयी हुई होती है।

अन्य देशों में यह मुसीबत है – पर भारत में इसपर और एक लेयर चड्ढी हुई है – धर्म-जात की। हमारा नारा है – हम अनेकता में एकता हैं। पर तब तक जब तक उच्च वर्ग लाइमलाइट में हों और पिछड़ों के मसीहा नज़र आएं। आपको अपने लिए बोलने की छूट नहीं है क्यूंकि हम सब जबरदस्ती एक हैं।

जनतंत्र न्यायसम्य अवसर देता है – जहाँ समाज के असमान लोग सतत प्रतिस्पर्धा और पूर्णता में उच्च जीवन के ओर बढ़ते हैं ताकि अपनी विशिष्टता अनुरूप सामाजिक योगदान दे सकें। मत-भ्रष्टता विशिष्टता मार कर समानता थोपता है जहाँ एक अपराधी को भी आपके बराबर अधिकार प्राप्त है (हमारे केस में – हमसे ज्यादा अधिकार प्राप्त है)

सोवियत रूस में सभी समान रूप से धूल खा रहे थे – पर वह कुछ लोगों की समानता साधारण समानता से अधिक समान थी – पोलित ब्यूरो की समानता।
बंगाल में दशकों तक यही हाल था।

(झारखण्ड के सन्दर्भ में) जरा नज़र बढ़ाएं – पूर्ण समानता हमारे बीच कैसे है – सभी उच्च पदों में समान रूप में बाहरी हैं, अधिग्रहण पालिसी से समान रूप से हमारी सम्पति छीनी जाएगी और समान रूप से उसपर मॉल और फैक्ट्री बनेगी जहाँ टाटा-बिरला जैसे समान रूप से धनाढ्य उच्च वर्ग के घराने मुनाफा पाएंगे। कुछ समानता अन्यों की समानता से अधिक समान होती है – यहाँ उस समानता पर अधिकार बाहरी उच्च वर्ग का है।

इसी के साथ समाज का आचार-भ्रष्टीकरण पूर्ण हो जाता है। समाज सही-गलत नहीं परिभाषित कर पाता। समानता के गुंजन शब्द के प्रभाव में लोग “सामाजिक न्याय” (Social Justice) की बातें करने लग जाते हैं जहाँ न्याय के लिए “हिंसा”, “अतार्किक विवाद” और समानता को थोपने वाले कानून लगाए जाते हैं। आपको झारखण्ड का माहौल देख के लगता होगा की ऐसा क्यों हो रहा है परन्तु पूर्ण चित्र देखें तो मार्क्स-साम्य प्रोपेगंडा के किताब से निकली एक-एक प्रोपेगंडा सफल होती दिखेगी आपको।

आपको यह स्पष्ट कर दूँ की विचारधारा के नाम को भारत में फैले राजनैतिक पार्टियों से जोड़ कर न देखें। विचारधारा पत्थर की लकीर नहीं की कोई एक पार्टी अपने नाम के अनुरूप ही हो!
समाजवादी पार्टी भ्रष्ट नेताओं से भरी पड़ी है, नेताओं को खुद पर पैसे खर्च करना पसंद था। समाजवाद से कोसों दूर।
कम्युनिस्ट पार्टी (एम्) के सारे बड़े नेता उच्च वर्ग से हैं। बंगाल में इनके शासन में गरीबी जाति से ऊपर उठ नहीं पायी। साम्यवाद सिर्फ नाम का।
बीजेपी अति-रूढ़िवादी है पर सिर्फ धर्म पर – उसकी सारी नीतियां अति-घनिष्ठ-पूंजीवादी है। प्रोपेगंडा में वह पूरा मार्क्स-साम्यवादी है।
कांग्रेस मध्य-उदारवादी होते हुए भी भतीजावाद और अति-पूंजीवादी है।

  1. सामाजिक अस्थिरता (Social Destabilization)

    (मत-भ्रष्टता, सामाजिक विकृति और मनोवैज्ञानिक युद्ध की दूसरी कड़ी है। इसमें हम उपर प्रस्तुत हुए तथ्यों पर गहन विवेचना और नयी जानकारी पर विचार करेंगे।)

  2. सामाजिक विकृति (Social Perversion)

सामाजिक विकृति एक दिन अथवा एक महीने या एक साल के भीतर कार्यान्वित होने वाला संकट नहीं है। इस विकृति को अमल में लाने वाले कारक आपके फिल्म और नावेल के किरदार नहीं हैं जिनके चेहरे पर निशान होता है या विलन मिस्टर इंडिया के अमरीश पूरी सरीखे बड़े-बड़े डायलाग मारता हो जिसे आप देखते ही समझ जाएँ।
नहीं!

सामाजिक विकृति को जन्म देने वाले “मत-भ्रष्टता के कारक” (Agents of Subversion) आप और हम जैसे साधारण नागरिक होते हैं – कुछ शिक्षक, कुछ छात्र, कुछ साधारण सैलरी लेने वाले, कुछ रिपोर्टर, कुछ धार्मिक व्यक्ता और कुछ समाज सेवक होते हैं। सविंधान में ऐसी कोई नियमावली नहीं जो इन्हे रोके, यह नियम तोड़ कर मत-भ्रष्टता का प्रचार नहीं करते हैं। और यही कारण है कि कैंसर की तरह शुरुआती चरणों में इनके कामों का दुष्प्रभाव नज़र नहीं आता है।

उपर मैंने लिखा था :- मत-भ्रष्टता एक दो-राही नीति है जिसमे मत-भ्रष्टता के कारक तभी काम कर सकते हैं जब शिकार होने वाली सभ्यता उसे खुले दिल से स्वीकारे। अन्यथा मत-भ्रष्टता कार्य नहीं कर सकती।

इम्पीरियल अर्थात राजतांत्रिक जापान कुछ ऐसा ही देश हुआ करता था। सोलहवीं शताब्दी से ही यूरोपीय नाविक व्यापारी जापान से व्यापार की उम्मीद रखते आये हैं – बदले में वह यूरोपीय विचारधारा, सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक प्रोपेगंडा रोपने की कोशिश करते थे। जापान का उत्तर – “नहीं चाहिए”। दर्शन शास्त्रियों को यह पहलु हमेशा से खाती आयी है – जापानियों ने ऐसा क्यों किया? उत्तर बहुत सरल है – अपने समाज, सामाजिक विचारधारा, परंपरा और अहमियत को “अखंड” रखने के लिए। आज जापान आधुनिक देश जरूर है परन्तु वह अपने जड़ को नहीं भूला है। जापान के सामाजिक मूल्य, परम्पराएं, सामाजिक विचारधाराएं और अहमियत जस की तस हैं और वह किसी भी बाहरी समाज, देश, ताकत का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करते हैं।

हमारे समाज को इस मापदंड पर रखिये – देखिये की त्रुटियां कहाँ शुरू हुई?
हमारा मौखिक इतिहास आपको बताएगा की हमारे पूर्वज जंगलों में क्यों पलायन कर गए ? किस विचारधारा और सामाजिक हस्तक्षेप से उन्हें आपत्ति थी?

मौखिक इतिहास स्पष्ट है और हमारे पूर्वजों की तरह हम भी उसी विचारधारा को मानते आये हैं – हमे बाह्य सामाजिक बंदिश पसंद नहीं और न ही अपरिचित समाज से सामाजिक हस्तक्षेप। हमारे पूर्वजों ने आर्यों की घृणास्पद वर्ण-व्यवस्था को नकारा और बंदिश जीवन से जंगल में रहना अधिक सही माना। इन तथ्यों को नहीं पचा पाने की वजह से बाह्य समाज ने पहला मत-भ्रष्ट तथ्य गढ़ा – हमे वानर (अर्थात वन का) और जंगली (जंगल का) कहा और कालांतर में यह शब्द नकारात्मक और उपहास उड़ाने का यंत्र बना।

परन्तु यह अलगाव लम्बे समय तक नहीं बचा – हमारे ही समाज के अग्रजों ने बामड़े समाज को पठार में जगह दे दी, उन्हें हमारे धार्मिक स्थलों की चाबी दे दी, अंग्रेजों से शासन काल में यूरोपीय धर्म प्रचारकों को अपनाया, क्रांति के लहर में आर्य समाज के चिंतकों की बात सुन उनका अनुसरण किया। और अंत में सबसे अधिक हानिकारक कार्य – अपने आप को उदार समझते हुए बाह्य समाज को न सिर्फ अपनाया परन्तु उन पर विश्वास किया कि वह हमारी चिंता करेंगे।

आपको एक दूसरा पहलु भी बताता हूँ – मत-भ्रष्टता के कौशल को जानने के बाद भी आप बाह्य समाज के विरुद्ध इसका प्रयोग नहीं कर सकते – बाह्य समाज बृहत दिखता हो परन्तु वह एक “बंद” व्यवस्था है। आप बामड़े समाज की शक्तिपीठ या उसकी क्षत्रिय कार्यकारी समितियों और संगठनों में एक सदस्य बनकर उनके विरुद्ध मत-भ्रष्टता के बीज नहीं बो सकते क्यूंकि आप सदस्य बनकर भी उस चरम पंथ के जन्मजात अंग नहीं – और वह इस तथ्य को बखूबी जानते हैं। वहां उनके तथ्यों का प्रचार सटीक और बंद व्यवस्था के जरिये होता है, जानकारी का प्रचार खुले में नहीं परन्तु अंदरूनी सामाजिक संबंधों और संपर्कों के जरिये होता है। आप और मैं इस सम्बन्ध और संपर्क नेटवर्क का हिस्सा नहीं हैं। हमारे समाज के विभीषण जो इस बात पर गर्व करते हैं की वह उस सम्बद्ध और संपर्क का हिस्सा हैं – यह खेदनीय है कि वह यह नहीं जानते की वह शतरंज के सिपाही से बढ़कर कुछ नहीं। समय आने पर उन्हें फेंक दिया जायेगा (इस पर विस्तार से बाद में)।

सामाजिक विकृति को सफल बनाने के लिए बाहरी ताकतें मत-भ्रष्टता का प्रयोग करते हैं – यह चार चरणों में होता है। इसे आप समयावधि अनुसार चार युग में बाँट सकते हैं:-

  1. आचारभ्रष्टीकरण अर्थात नैतिक विकृति (Demoralization):

इस चरण को पूरा होने में 15-20 साल लगते हैं। पंद्रह से बीस साल क्यों? क्यूंकि यही समय है जब समाज की एक पूरी पीढ़ी बचपन से पढाई पूरी कर सामाजिक कार्यकारिणी का एक अभिन्न अंग बनने वाली होती है। यह पीढ़ी ज्ञान समेटती है अपने विचाधारा को दृढ़ बनाने के लिए, अपने व्यक्तित्व को उभारने के लिए, अपने नैतिक आधार को खड़ा करने के लिए ताकि उस ज्ञान के जरिये समाज को योगदान दे सके। मत-भ्रष्टा के कारक यहाँ शैक्षिक घुसपैठ कर, प्रोपेगंडा अथवा सीधे सामाजिक संपर्क द्वारा इस नयी पीढ़ी को प्रभावित करते हैं। इन प्रभावित क्षेत्रों में कई प्रकार की सामाजिक मतें आकार लेतीं हैं जैसे – धर्म, शैक्षणिक संस्थान, सामाजिक जीवन, प्रशासन, क़ानूनी प्रवर्तन प्रणाली, सैन्य प्रणाली एवं श्रमिक और नियुक्ति प्रणाली। (इस पर विस्तार से बाद में)

आपको इस स्थान पर भ्रान्ति हो सकती है कि यह सामाजिक प्रयोग यहाँ, हमारे समाज पर कैसे लागू होती है? यहाँ तो रुसी एजेंट नहीं हैं! आप गलत हैं – एजेंट हैं – बाह्य बामड़े समाज के कारक अर्थात एजेंट हैं न हमारे बीच! परन्तु बात यहाँ एजेंटों की नहीं अपितु एक ख़ास विचारधारा की है – नाम और स्थान भले ही मीलों दूर हों पर बाह्य समाज की विचारधारा सोवियत रूस की साम्यवाद-समाजवाद से अलग नहीं है। मूल अन्तर्भाग पूरा का पूरा आईने के भीतर की परछाई के सामान है। (इसपर अधिक गहराई से बाद में चर्चा करेंगे)

यह कारक ही सारे मुसीबत की जड़ हैं यह कहना सही नहीं है। जैसा मैंने पहले कहा – मत-भ्रष्टता तभी कार्य करती है जब उसे कोई स्वीकारे। हमारे ही समाज की गलतियां उन्हें मदद करती हैं। कैसे?
मार्शल आर्ट्स अर्थात स्वयंरक्षा शिक्षण जैसे जुडो और कराटे का में सिखाया जाता है की जब आपका प्रतिद्वंदी आपसे बड़ा हो तब आप उससे सीधे-सीधे नहीं लड़ सकते। न ही प्रहार को हाथ से रोककर सीधा बचाव कर सकते हैं – दोनों रास्ते आपको ही चोट पहुंचाएंगे। सही तरीका है – प्रतिद्वंदी या दुश्मन के आते हुए प्रहार, उसकी गति और उसी के बल को प्रयोग में ला, हाथ मोड़कर आप उसे पटखनी दें तो आपकी जीत हुई।
बाह्य कारक इसी सिद्धांत का प्रयोग करते हैं। जरा अपने स्मृति और याददाश्त पर भार डालें। आज से २० साल पहले झारखण्ड (तकनीकी रूप से झारखण्ड नहीं था परन्तु झारखण्ड का मनोभाव हमारे लोगों में जिन्दा था) कैसा था?

क्या आज की तरह युवा दारू पे रस्ते में टल्ली थे?
क्या धर्म के नाम पर हमारे ही लोग युद्ध के लिए तैयार थे ?
क्या बाहरी लोगों को हमे ही आँख दिखने की हिम्मत होती थी ?
क्या जमीन और जीवोपार्जन पर गुंडागर्दी युक्त पूंजीपतियों का संकट छाया था ?
क्या बाह्य राजनीतिज्ञ हमारे ही विरुद्ध नीति बना पा रहे थे ?

जो उस युग के हैं उन्हें उत्तर पता है परन्तु युवा वर्ग को बता दूँ – उत्तर है ऐसा कुछ नहीं था। बिहार में होने के बावजूद हमारी जमीन हमारी पहचान बहुत दृढ़ थी। झारखण्ड बनने में बहुत खिचड़ी पकी पर शुरुआती दौर में यह तय था की हमे हमारी पहचान मिलने वाली थी। फिर शुरू हुआ मत-भ्रष्टता का खेल क्यूंकि बाह्य समाज को इसकी पूरी जानकारी थी की अगर वह इस राज्य पर आधिपत्य नहीं जता पाए तो बहुत बड़ी पूंजी उनके हाथ से जाने वाली थी।

हमारी गलतियां:
किसी भी गणतांत्रिक समाज में अर्थात ऐसा समाज जहाँ जनता, जनता का प्रतिनिधित्व, प्रतिनिधित्व आधारित नीतियां इत्यादि विचारधारा चलती है उसमे अंतर्विरोध होना सामान्य बात है। बहुमत एक दिशा में चले तो भी मुट्ठी भर मत सामाजिक रूप से विरुद्ध ही चलता है। यह एक प्राकृतिक बहाव है जो गणतंत्र में बहती ही है। क्यूँकि समाज में – मुर्ख, अहंकारी, मानसिक रोगी, अपराधी किस्म के लोग भी होते हैं – इनका काम ही है उलटी गंगा बहाना। परन्तु गणतंत्र इन्हे छूट नहीं देता।
गणतांत्रिक रूप से भली बहाव को कुचल उटपटांग बहाव को सर-आँखों पर चढाने का कार्य सिर्फ तानाशाही, साम्यवादी, समाजवादी और राजशाही तंत्र में ही किया जा सकता है। असली दुनिया में ऐतिहासिक रूप से कुचला गया है, आज भी कुचला जाता है। (ध्यान दें समाजवाद और गणतंत्र पर्यायवाची शब्द नहीं हैं) आपको उदहारण देता हूँ – इससे स्पष्ट होगा।

तानाशाही व समाजवाद – हिटलर, किम-जोंग-उन (उत्तर कोरिया)
तानाशाही व फासीवाद – मुसोलिनी
तानाशाही और राजतन्त्र – अरब, इराक, कुवैत इत्यादि
तानाशाही और साम्यवाद – स्टालिन और फिर सोवियत रूस
साम्यवाद – चीन, रूस
सामजवाद – गृह-युद्ध में फंसे कई, दक्षिण अमरीकी, अरबी और अफ्रीकी देश।
वैश्विक चित्र मोनालिसा नहीं!

मत-भ्रष्टता के कारक गणतंत्र के विरोधी बहाव को बहने का नाला खोद के देते हैं। जलती आग को हवा देते हैं। समाज से बहिष्कृत, समज-विरोधी और सामाजिक रूप से हानिकारक विचारधाराओं को एक ही दिशा में परिवर्तित कर उसे एक योजना तहत अर्जित कर समाज के विरुद्ध खड़ा कर देते हैं जिससे समाज के बिखरने की स्थिति उत्त्पन्न होती है।
कुछ पैराग्राफ ऊपर देखें, वहां लिखी सात क्षेत्रों में मत-भ्रष्टता के कारक निम्नलिखित प्रकार से विरोधाभास उत्त्पन्न करते हैं (जिसमे इस विनाश को शुरू करने के लिए समाजविरोधी मूर्खों और मानसिक रोगियों को अग्रज श्रेणी का दर्जा दिलवाया जाता है)

1.1 धर्म (Religion) – इसे नष्ट करो, इसे किसी दूसरी व्यर्थ की विचारधारा से बदली करो, इसके स्थान पर भौतिकवादी कर्म-कांड और दिखावे को पॉपुलर करो।

इस तथ्य को अंधभक्त और मूर्ख दोनों ही सामान प्रकार से लेते हैं और अपने ही समाज के विरोधी, धार्मिक अंधभक्त, आडम्बरी और मूर्ख इन कारकों का साथ देते हैं। उन्हें लगता है कि उनके धर्म पर ऊँगली उठायी जा रही है। यहाँ किसी एक धर्म के ऊंच-नीच अथवा सही-गलत की व्याख्या नहीं हो रही है। धर्म एक प्लेसहोल्डर अर्थात एक बुकमार्क है जो किसी समाज के अध्यात्म, शांति, समन्वयता और नैतिकता की अभिव्यक्ति है – किस्म कोई भी हो! एक अधार्मिक या नास्तिक की भी नैतिकता और आध्यात्मिकता होती है जिसे वह किसी पॉपुलर धर्म से व्याख्या करने के स्थान पर आत्म-अभिव्यक्ति द्वारा कार्यान्वित करता है।

मत-भ्रष्टा को इससे कोई मतलब नहीं की धर्म की किस्म कौन सी है। उसका प्रमुख कार्य है धर्म के मूल सिद्धांत अर्थात नैतिकता और सामाजिक समन्वयता का विनाश।

कई किस्म की डुप्लीकेट धार्मिक “संगठनों”, “शाखाओं”, “अभिव्यक्ताओं/स्पीकरों”, “लीडरों” को मशरुम की तरह उगने दिया जाता है जो की नैतिकता, आध्यात्मिकता और समन्वयता जो की समाज के लिए जरुरी है से ध्यान भटकाने का काम करते हैं।

फिर दोहराता हूँ – धर्म के किस्म से कारकों को कोई मतलब नहीं – हर धर्म में यह हो रहा है। चूँकि हमारे समाज में दो ही धर्म है – मूल धर्म और ईसाई धर्म इस लिए सीधे-सीधे कह देता हूँ – इन दोनों में ही व्यर्थ के संगठन, शाखाएं और धार्मिक “लीडर” भरे पड़े हैं जिनको सामाजिक नैतिकता से रेत के कण भर भी मतलब नहीं। उनका उद्देश्य – पैसा, अहंकार, सामाजिक वैभव, राजनितिक शक्ति और “और अधिक पैसा” है। इसे आप जितनी जल्दी समझें उतनी जल्दी समाज लिए सही होगा।

आगे के पंक्तियों में हम

शिक्षण Education पर विवेचना करेंगे

(यह लेख मत-भ्रष्टता, सामाजिक विकृति और मनोवैज्ञानिक युद्ध की तीसरी कड़ी है।)

  1. सामाजिक विकृति (Social Perversion)
  2. आचारभ्रष्टीकरण अर्थात नैतिक विकृति (Demoralization):

अब हम उन सामाजिक क्षेत्रों पर मत-भ्रष्टता के असर की विवेचना करेंगे जो एक समाज के मत-निर्धारण के स्तम्भ हैं। पिछले अंक में हमने देखा धर्म पर असर, आज के विषय हैं – शिक्षण और शैक्षणिक संस्थान, सामाजिक जीवन, प्रशासनिक प्रणाली इत्यादि

1.2 शिक्षण Education

समाज के युवाओं को रचनात्मक, व्यवहारिक और कौशल पूर्ण विषयों जैसे गणित, विज्ञान, वैश्विक इतिहास, भाषा-विज्ञान, साहित्यिक विवेचना, वोकेशनल स्किल्स इत्यादि पर जोर देने के स्थान पर मॉडर्न आध्यात्म (दिखावटी धर्म-कर्म), मनगढंत इतिहास, मैथोलॉजिकल इतिहास, भाषा-विवाद, क्षेत्रीय-विवाद, खान-पान, घरेलु नुख्से, राष्ट्रवाद, संस्कृत-हिंदी की महानता, वैदिक उत्कृष्टता, सामाजिक क्रांति इत्यादि विषयों पर बल डालने को प्रेरित करो।

(मैंने हमारे कॉन्टेक्स्ट में कन्वर्ट किया है – हर देश की डेमोग्राफी के अनुसार यह लिस्ट चेंज होता है)।

नतीजतन कॉलेज लेवल में आते आते छात्र विश्लेषणात्मक पढाई-लिखाई को दूसरे दर्जे का स्थान दे देता है। सोचने-समझने की शक्ति के स्थान पर “हीरो-फॉलो”, “रट्टा उगलने”, “कृत्रिम क्रांति” और “अंधभक्ति” का विकास होता है। ध्यान दें की यह सिर्फ शिकार हुई समाज के युवा पीढ़ी का हाल है। मत-भ्रष्टता के कारकों और उनके समाज के बच्चे अंग्रेजी माध्यम में पढ़ कर विदेश जा चुके होते हैं।

1.3 सामाजिक जीवन Social Life

पारम्परिक सामाजिक संस्थानों और संगठनों को “फेक” अर्थात कृत्रिम संस्थानों से बदली करो। पारम्परिक संस्थानों के विरुद्ध इन संगठनों को ऐसे प्रस्तुत करो समाज में उसकी वैधता ठट्टा का केंद्र बने और वह बिखर जाए। सामाजिक पहल को समाज के हाथ से छीन कर कृत्रिम संगठनों को प्रदान करो जहां साधारण पहल भी नौकरशाहों के रहमोकरम कर टिकी हो। सामजिक उत्तरदायित्व को पारम्परिक संगठनों जहां एकल, समूह और समाज का ताना-बाना एक साथ निर्णय लेता है को छीन कर नौकरशाही और दिखावटी संगठनों को सौंप दो।

(इस मामले में आज़ाद हुआ भारत भी शिकारी है – ब्रिटिश नौकरशाही और लालफीताशाही सिस्टम गणतांत्रिक प्रथा बनने तक में ख़त्म होना था। सामाजिक प्रतिनिधि अर्थात नेतागण ही दोहरा कार्य सँभालते। परन्तु उच्च-वर्गीय मनुवादियों को यह सिस्टम चरागाह नज़र आया, पढ़े लिखे लोग नौकरशाही में गए और अहंकारी अनपढ़ परन्तु सामंती नेता बने क्यूंकि अब वह खुले में जात-पात तो कर नहीं सकते थे!)

सामाजिक जीवन जो पड़ोस-प्रेम, समन्वयता और सामाजिक संपर्क पर निर्धारित होती है वह अब “सामाजिक कार्यकर्त्ता” और “सामाजिक शुभचिंतक” निर्धारित करते हैं। यह कार्यकर्ता, शुभचिंतक और समाजसेवी क्या आप और हमारे द्वारा चुने हुए हैं? क्या वह हमारे द्वारा दिए चंदे, भुगतान, पेरोल पर जीते हैं? नहीं! वह ऊपर से सेलेक्ट होकर आते हैं और ऊपर अर्थात नौकरशाही द्वारा पेमेंट पाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य मेरा, आपका, आपके परिवार या समाज का भला नहीं – उनका उद्देश्य महीने के अंत का पे चेक है।

1.4 प्रशानिक प्रणाली (Administration)

प्राकृतिक प्रशासनिक प्रणाली समाज द्वारा चुनी हुई प्रतिनिधि और प्रतिनिधि द्वारा चुनी कार्यकर्ताओं द्वारा चलती है – यह गणतंत्र का सिद्धांत है। हमारे पारम्परिक ग्राम सभा में भी समाज ही प्रतिनिधि चुनता है।

मत-भ्रष्ट ग्रसित प्रणाली में अचानक ऐसे संगठनों, कार्यकर्ताओं, संघों और प्रतिनिधिओं का प्रगटन होता है जिसे किसी ने नहीं चुना। न उसके नाम की वोट डाली न ही उसके नाम से सभा निर्धारित हुई। वह अचानक कई बड़े निर्णय में समाज के तरफ से प्रतिनिधित्व करते पाया जाता है जबकि एक आम आदमी को उसके बारे में क ख ग तक नहीं पता। प्रायः ऐसे लोगों को कोई साधारण आदमी पसंद भी नहीं करता। पर वह ताकत के स्थानों में रहते ही हैं।

हमारे बीच भी ऐसे संगठन मौजूद हैं जिनके नेताओं को आपने या हमने नहीं चुना। उनकी ताकत और उनके कथन एकाधिकार से कम नहीं। वह आपके चुने प्रतिनिधि से भी अधिक महत्वपूर्ण नज़र आते हैं और आपके प्रतिनिधि की आवाज़ को भी दबा देते हैं। कैसे? क्यों?

ऐसे लोग मीडिया में भी पाए जाते हैं। यह अपने आपको बुद्धिमान और असाधारण समझते हैं पर यह असल में “मेडिओकर” अर्थात औसत दर्जे से भी नीचले बुद्धि वाले होते हैं। क्यूंकि इनके पोस्ट की यही मांग है कि – सोचने-समझने वाला नहीं अपितु यस सर-नो सर, हामी मे मुंडी हिलाने और ऊपर से आती प्रोपेगंडा को बिना सोचे प्रसारित करना वाला व्यक्ति चाहिए । इसे कहते हैं लीस्ट मिनिमम फैक्टर।

इनके निर्णय, कथन गलत हैं या सही हैं उससे इनको मतलब नहीं, बस कैमरा के लिए मुस्कुराना, ठप्पा लगाना, कल के पेपर के लिए स्टेटमेंट देना ही इनका काम है।

इनके संगठन समाज की पारम्परिक संरचना को तोड़ कर उसमे अपक्षरण लाते हैं। इन लोगों में न अनुभव होता हैं, न योग्यता और न ही समाज द्वारा दी गयी मताधिकार।

1.4 सामाजिक संरचना (Social Structure)

७० से लेकर शुरुआती ९० तक आरक्षण पर टिका टिपण्णी नहीं होती थी। आदिवासी समाज के साथ भेदभाव होता था पर आरक्षण और आदिवासी मेरिट पर लोगों की राय पब्लिक नहीं हुआ करती थी। आरक्षण और मेरिट के अंतर को लोग समझते थे। आज मेरिट और कौशल पर सवाल उठता है और आदिवासी होने को आरक्षण के नकारात्मकता से जोड़ा जाता है। मीडिया फ़िल्में और बौद्धिक क्षेत्र आदिवासी पहचान को हर नयी परिभाषा से गढ़ने लगा है।

सरल स्वभाव को मूर्खता परिभाषित किया जाता है।
शांत आचार को पिछड़ापन और अनपढ़ता द्वारा परिभाषित किया जाता है।
जागरूकता को देशद्रोहिता और नक्सलवाद से दबाया जाता है।

धार्मिक पहचान और सामाजिक पहचान एकीकृत हो गए हैं। प्रोपेगंडा की आवाज़ एकल विचार से ऊँची है। आपकी निजी चुनाव से खास प्रतिनिधिओं को आपत्ति है। आपकी पहचान आपके लिए बना दी गयी है – आप एक्स धर्म के हैं तो आप वाई हैं। आप जेड जनजाति से हैं तो आपको डी कहने का अधिकार नहीं है। आप क्यू को धर्म डिफाइन करते हैं तो उसमे आर इस टी कहाँ से आया?

इन परिभाषाओं का सामाजिक समन्वय, दैनिक सामाजिक जीवन, अथवा सामजिक विकास से कोई लेना देना नहीं। इन नीतिओं को बनाया ही गया है एक खास मानसिक चित्र बनाने के लिए – आदिवासी समाज को चिरकालीन दबी हुई दूसरे दर्जे की स्थान पर फंसा के रखने के लिए। जिनमे जहाँ भरोसा और सामंजस्य होना है वहां ईर्ष्या, संदेह और घृणा राज कर रही है। नैतिक सापेक्षता बर्बाद कर दी गयी है। किसी भी एक वर्ग के लिए मत-भ्रष्टा, उसके अपने वर्ग के लोग जो दूसरे किनारे पर खड़े आदिवासी ही हैं, अधिक घृणित हैं। बाह्य मनुवादी ताकतें, प्रत्यक्ष रूप से विवादित होने पर भी लोगों द्वारा अधिक चाहते “बतलाये” जाते हैं।

नैतिकता का पैमाने उलट होकर शुभचिंतकों को दुश्मन और गीदड़ों को घर का मेहमान परिभाषित कर रहे हैं।

याद रखें, हर एक व्यर्थ वाद, व्यर्थता के समुद्र की बूँद है। आखिर में इसमें आप और हम ही डूबेंगे। यह सब कौन करता है? क्यों करता है?

1.5 श्रमिक,व्यापार और नियुक्ति प्रणाली (Labour, Trade and Employment System)

यह विषय थोड़ी जटिल है क्यूंकि यहाँ वाणिज्य की बातें आ जाती हैं। इसपर विस्तार से चर्चा करना थोड़ा टॉपिक से हटने के सामान है। इसे मैं साधारण से साधारण शब्दों में बताने की कोशिश करता हूँ। । फिलहाल मैं प्राकृतिक और एक्स-वाई-जेड-वाद व्यापार के बारे में बताता हूँ।

प्राकृतिक व्यापार यह कहता हैं की अगर आप चार बोरी चावल उगाते हैं और मैं चार बोरी चप्पल बनता हूँ तो हम आपस में अपने-अपने जरुरत अनुसार व्यापार का आदान-प्रदान कर सकते हैं। मॉडर्न ज़माने में – अगर मैं गणित जानता हूँ और आपकी दूकान की खरीद बिक्री का लेखा-जोखा कर सकता हूँ तो मैं पैसे के लिए आपकी नौकरी करूँगा। पैसे के व्यापार में आदान-प्रदान की शक्ति छपे पेपर पैसे पर बदल दी जाती है।

परन्तु आपसे दोनों अधिकार ले लिए जाएँ – आप अपने इच्छा अनुसार खेती न कर सकें, आपकी जमीन आपसे ले ली जाये और आपको पैसे मिलने के स्थान पर आपको रेजा-कुली बनना पड़े तो यह व्यापार और खुले बाजार की मृत्यु है। इसे रोकने के लिए प्रतिनिधित्व करती संगठन होनी थी। यह आपके प्रॉपर्टी और उसके महत्त्व अनुसार उसकी दाम निर्धारण को देखती, खरीदार धोखा न करें यह जांचती; इंडस्ट्री स्केल में – मुवाओजा, रॉयल्टी, इत्यादि की बातें होनी थी। पर ऐसी संगठनों का क्या हुआ? सरकार से मध्यांतर करने वाली संगठनें क्यों नहीं हैं? अगर हैं तो वह समाज द्वारा क्यों नहीं चुनी जातीं? और चुनी हुई प्रतिनिधि क्यों हमे ही बेचने पर तुली है?
ऐसी संगठन का कार्य, खरीदने वाली पार्टी और प्रॉपर्टी मालिक के बीच कोम्प्रोमाईज़ करवाने के लिए होनी थी। कोम्प्रोमाईज़ के स्थान पर हमे छड़ी के छोटे भाग ही मिल रहे हैं जबकि हमारे सामने हमारी प्रॉपर्टी छिनती जा रही है। कृषक वर्ग भी इसे झेल रहा है। उन्हें मुवाओजा मिलने के स्थान पर उनका रेजा-कुली बनना अधिक संभावित हो रहा है। उनके द्वारा उगाई अनाज के लिए कोई इंसेंटिव नहीं, बिना इंसेंटिव उन्हें पेपर मनी नसीब नहीं – बिना पेपर मनी उनके पास अर्जन का साधन नहीं – मजबूरी में खेत बेचता है पर उसका दाम में भी धांधली – उसी जमीन पर ५-स्टार मॉल। न जमीं का पैसा न फ्यूचर।

साधारणतः देखने पर सारी बातें अलग-थलग और सिंगल इंसिडेंट नज़र आती हैं पर सारी कड़ी एक डोमिनो इफ़ेक्ट की तरह है। बाह्य ताकतें सिर्फ सामाजिक दमन नहीं करती – उसमे मानसिक, शारीरिक, शैक्षणिक, आर्थिक दमन भी शामिल है जो उसने मत-भ्रष्टता के माध्यम से पाया है।
यह टॉपिक और भी जटिल है – ट्रेड यूनियन, माफिया, हत्या – काफी सारी बातें हैं पर हमारा समाज अभी उस स्टेज पर नहीं आया है।

१.१ से लेकर १.५ तक के विषय हमेशा बाह्य ताकतों द्वारा प्रभावित हुए हैं ऐसा नहीं है – परन्तु छोटी-छोटी बातों को बड़ा बनाकर उसका फ़ायदा जरूर उठाया है मत-भ्रष्टता के कारकों ने। इसमें न कोई दो राय है न कोई संदेह। जब भी इन विषयों पर आवाज़ उठती है और जागरूकता के संकेत नज़र आते हैं, कारक प्रोपेगंडा मशीन चालू कर देते हैं और एक खास विचारधारा का प्रवाह होता है – “यहाँ जो लिखा है वही सही है। जो बोला जा रहा है वही सही है।”

कई लोग अंधों के सामान हामी भरते हैं। कहते फिरते हैं “यह सच है।”
मेरा जूता सही है। प्रोपेगंडा ऐसा ताकतवर हो चला है की कोई भी कुछ भी बोल देता है और लोग सच मान लेते हैं।

 

Leave a Reply

Your e-mail address will not be published. Required fields are marked *