सामाजिक संकटकाल (Age of Crisis)

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                                                        अभिषेक विल्कन आईंद 

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मत-भ्रष्टता, सामाजिक विकृति एवं मनोवैज्ञानिक युद्ध (Subversion, Social Perversion, and Psychological Warfare) – 2

सामाजिक संकटकाल के आरम्भ होने के संकेत हैं सामाजिक व्यवस्था और परंपरागत संरचना का टूटना। परंपरागत वैध सामाजिक संगठनें अथवा कहें संरचनाएं कार्य करने लायक नहीं बचतीं हैं। इनको “सुधारने” के लिए, इनको “मदद” करने के लिए, या तो चरम स्थिति में इनका “स्थान लेने” के लिए – बाहरी संगठनों को ठूसा जाता है जो की समाज द्वारा न ही चुनी गयीं हैं न ही वह समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं। याद करें, ये वही सामाजिक कार्यकर्ता/नेता/मीडिया व्यक्तित्व इत्यादि हैं जिन्हे कोई नहीं पसंद करता न ही समाज के लिए प्रतिनिधि करने हेतु चुना है।

ऐसे लोग और उनके संगठन दावा करते हैं कि वह जानते हैं की समाज को कैसे चलाना है (असल में नहीं जानते पर दावा करते नज़र आते हैं), समाज को जमा कर परंपरागत व्यवस्थाओं के स्थान पर खुद की बनायीं धार्मिक-सामाजिक विचारधारा बेचते हैं। इन कृत्रिम संगठनों और अगुओं को किसी ने नहीं चुना है परन्तु वह शक्तिप्रदर्शन और शक्तिप्रभाव का दावा करते हैं और अगर उन्हें रोका गया तो वह बलपूर्वक सत्ता हथियाते हैं। यह आधुनिक विश्व (1900 के बाद) में कई बार हो चुका है। कई देशों के उदहारण हैं परन्तु मैं सामान्यीकृत व्याख्यान दे रहा हूँ। अचानक प्रगट हुए इन कृत्रिम संगठनों से सामाजिक क्रांति (Revolution) की बात होती है परन्तु वह असली सामाजिक सेवा अन्तर्निहित युवा वर्ग, बुद्धिजीवी वर्ग और पारम्पारिक कार्यकारी समिति वर्ग जो वर्षों से जमीनी स्तर पर कार्य कर रहे हैं के द्वारा निर्देशित बौद्धिक क्रांति के बिलकुल विपरीत होते हैं। इनके पास सामाजिक निर्णय के अधिकार, सामाजिक न्याय और निष्पादन के अधिकार अचानक से आ जाते हैं। (इन्हे सरकारी नौकरशाही में लिप्त मत-भ्रष्टता के कारक यह ताकत देते हैं ) इन अधिकारों के बल पर यह कृत्रिम संगठन समाज को भटकाना, धमकाना, बरगलाना, विभाजित करना, हिंसक बनाना, अशिक्षित रखना इत्यादि कई कार्य करते हैं जिनका सामाजिक उत्थान से कोई वास्ता नहीं।

इन्हे बृहत अथवा पूर्ण समाज की कोई बौद्धिक/पारमपरिक/मौलिक जानकारी नहीं होती है। उन्हें लगता है उनके अलावा बाकी कोई भी समाज के बारे सही से नहीं जानता। समाज अपने पारम्परिक पद्धति के बिना उत्पादक नहीं रह जाता और पूर्णतः बिखर जाता है। यह है संकटकाल (CRISIS).

तड़प में, क्षुब्ध हो, क्रोध में, भय से, भटक कर, अर्ध-जानकारी में – समाज किसी मसीहा, किसी हीरो, किसी नायक, किसी अगुवे की इच्छा करने लगते हैं। वह यह उम्मीद करते हैं की किसी ऐसे व्यक्ति अथवा सरकार उन्हें बचाने आये जो उन्हें उनके अधिकार दिलाये, उनकी जरूरतों को पूरा करे और एक सुदृढ़ राष्ट्र दे।

ऐसा हमारे देश में केंद्र में एक बार और हमारे झारखण्ड में एक बार हो चुका है। देश के लोगों को एक हीरो की तलाश थी , झारखण्ड को अपने अधिकारों की तलाश थी। दोनों स्थान पर लोगों ने किसे चुना? क्या मिला आखिर में? यह सवाल आप और मुझे दोनों को खोजना है कि क्या हम इससे बाहर निकल सकते हैं?

संकटकाल में जब समाज एक मसीहे की खोज में रहता है तब हमेशा बाह्य ताकतें “बचावकर्ता” के रूप में प्रगट होती हैं। पहले से परेशान समाज आँख मूंद कर इन बाह्य ताकतों को अपना सारा अधिकार दे देती हैं। इस स्थान से दो संभावनाएं प्रकट होती हैं –

१. गृहयुद्ध २. चढ़ाई

आपको लगेगा कि इतना गंभीर परिणाम शायद ही हो। मैं आपसे पूछता हूँ – माओवादी उग्रवाद क्या है? इसमें किसकी मौत हो रही है? गाँव क्यों जल रहे हैं? जंगलों के भीतर जहाँ प्रचुर सम्पदा है वहां क्यों आर्मी कैंप बने हुए हैं? सैन्य बल किस कार्य के लिए हैं? अभी हाल ही में हुई पथलगढ़ी को काण्ड कैसे बनाया गया? क्यों बनाया गया?

ध्यान से गौर करें – गृहयुद्ध और चढ़ाई हमेशा इराक-सीरिया युद्ध सरीखे नहीं होती है। कभी-कभी छुपी हुई चढ़ाई और अस्पष्ट गृहयुद्ध भी होते हैं खासकर तब जब हम इस बात को समझने लगते हैं की अनुसूचित क्षेत्र का अधिकार और स्वशासन आखिर है क्या?

इन दोनों चरण का परिणाम है – सामान्यकरण।

संकटकाल का मुख्य उद्देश्य ही है जनमानस द्वारा उत्पात की स्थिति लाना और उस उत्पात को रोकने के नाम पर बल प्रयोग! इन दोनों चरण का अंतिम परिणाम है – सामान्यकरण। बड़ी भारी मात्रा में सैन्य-पुलिस बल के दम पर स्थिति को सामान्य घोषित किया जाता है। (यह परिभाषा चेकोस्लोवाकिआ में टैंक घुसने के बाद न्यूयोर्क टाइम्स में छपी शब्द Normalized से लिया गया है जिसने स्थिति को सामान्यकरण कहा।) इस स्थिति के बाद बाह्य कारक और उनके कठपुतिलियाँ जिन्होंने खुद को समाज का ठेकेदार कहा है, उनको किसी क्रांति की आवश्यकता नहीं रहती। यह चरण सामाजिक अस्थिरता का विलोम है अर्थात सामाजिक स्थिरता।

  1. सामान्यकरण – सामाजिक स्थिरता (Normalization – Social Stabilization)

एकबार बाह्य ताकतें अधिकार पा जातीं हैं तब पहले चरण के सारे – सामाजिक वक्ता, मत-भ्रष्टता कारक, समाजवादी-साम्यवादी अगुवे, धार्मिक अगुवे, क्रन्तिकारी, सामाजिक चिंतक, बुद्धिजीवी इत्यादि लोगों का त्याग कर दिया जाता है। सोवियत रूस और लौह-परदे के यूरोप में तो उनको जेल में डाल दिया गया, मार दिया गया। अंदाजा लगायी की यहाँ आदिवासी बहुल क्षेत्र में यह किस रूप में यह हुआ/होता है/होगा?

इन नयीं ताकतों/सरकारों को अपने साम्राज्य (जी हाँ, प्रजातान्त्रिक नहीं राजतांत्रिक संरचना अनुरूप) में स्थिरता चाहिए ताकि वह समाज, उत्पाद, उद्योग, बाजार, खनिज-सम्पदा का शोषण कर सकें। उनका नारा – “अब और क्रांति की जरुरत नहीं, (हमारा) स्वर्णिम युग आ गया है।”

“भली श्रमहारी गणतांत्रिक स्वतंत्रता” – क्या सही में?

उदाहरण के लिए – बांग्लादेश , अफ़ग़ानिस्तान, इराक, सीरिया, यूगोस्लाविया (उनका इतिहास आप पढ़ें क्यूंकि पूरा लिखना संभव नहीं) इन सब में समानता है की क्रांति के बाद क्रांतिकारियों को दुनिया से विदा कर दिया गया।

यह सारे चरण उलट करने के लिए भीषण प्रयास की जरुरत पड़ती है जिसमे समाज के बुद्धिजीवी और युवा वर्ग की सबसे बड़े योगदान की जरुरत है। मगर कैसे?

पांचवी चरण में पहुँचते समाज को बचाने के लिए पीड़ित समाज को इन बातों से अवगत कराना होगा – सामाजिक मत-भ्रष्टता, मनोवैज्ञानिक युद्धारिति और सामाजिक विकृति के बारे में न सिर्फ बताना परन्तु बाह्य ताकतों को उखाड़ फेंकना – दोनों कार्य करने पड़ेंगे। समाज को शत-प्रतिशत शाक्षर-शिक्षित और जागरूक होना होगा, आर्थिक रूप में पूंजीपति होना होगा। समाज के हर एक व्यक्ति को सहमति में चलना होगा। अन्तर्युद्ध मिटा कर फोकस होना होगा। यह पेपर पर ठीक लगता है परन्तु असलियत में नहीं हो सकता क्यूंकि मनुष्य एक तरह नहीं सोचता – कुछ दरियदिल और कुछ लोभी हमेशा होते हैं! मनुष्यवृति है।

पांचवी चरण से सिर्फ और सिर्फ सैन्य-हस्तक्षेप ही समाज को वापस लौटा सकता है। और यह लाल-रंग से रंगा चित्र है।

तो क्या हम हार मान लें?

समाज के मत-भ्रष्टता को प्रथम, द्वितीय चरण में ही रोका जाए, मनोवैज्ञानिक युद्ध और सामाजिक विकृति को पहले ही पहचान कर उसपर खुले में चर्चा कर जनसामान्य को उसके असर और उसके लक्ष्य उजागर किये जाएँ तो यह संभव है। इन चरणों में ही बाह्य प्रभाव को हराकर स्वराज्य और सामाजिक दृढ़ता पा ली जाये तो जो भी असहमति वर्तमान में मौजूद है हम आपस में उसको सुलझा सकते हैं। उन मुद्दों को मत-भ्रष्टता के कारकों के सक्रीय रहते उछाला जाना स्वयं के पैर में कुल्हाड़ी मारना है। इन चरण में मुख्य मुद्दा स्वशासन और आदिवासी अधिकार परम लक्ष्य होने है। आपके मौलिक अधिकारों के लिए बाह्य ताकतों और कारकों के भरोसे रहे तो न वह पूरा होगा और न ही स्वशासन मिलेगा।

परन्तु इन चरणों में हमे रोकता भी कौन है? जी मत-भ्रष्टता के कारक को बुद्धिजीवी वर्ग को संक्रमित किये हुए हैं वो!

वह सामाजिक जाग्रति और संवैधानिक अधिकारों के प्रति प्रचार-प्रसार को राष्ट्रविरोधी, बृहत समाज के द्वारा स्थापित साम्राज्य के विरुद्ध कार्य, शांति-भंग, नेताओं के कार्य, केंद्र सरकार के कार्य में हस्तक्षेप इत्यादि कहते हैं। मीडिया भी इसे ऐसे ही प्रस्तुत करता है क्यूंकि उसे इसी के पैसे मिलते हैं। वह जालसाज़ खबर को सच कहते हैं परन्तु वह सत्य नहीं। यह मात्र समाज को धमकाने, डराने और भटकाने का खेल है!