मध्ययुगीन_पितृसत्तात्मक_परंपराओं_की_ओर_लौटते_लोग

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नेह इंदवार

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गुजरात के बनासकांठा जिले के दांतीवाड़ा तालुका के ठाकोर समुदाय ने अपने समाज के अविवाहित लड़कियों के लिए फरमान जारी किया है कि यदि समाज के युवा अंतरजातीय विवाह करते हैं या अविवाहित लड़कियाँ मोबाईल इस्तेमाल करते पकड़ी गईं, तो उनके माता पिता को इसके लिए जिम्मेदार माना जाएगा और उनके परिवार को डेढ़ से दो लाख रूपये जुर्माना भरना पड़ सकता है।
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पितृसत्तात्मक सामाजिक सड़ी-गली जड़ परंपराओं को मानवीय दिमागी स्वतंत्रता पर थोपने और आधुनिक मनुष्य के नैसर्गिक मेधा में उठने वाले वैचारिकी उन्मुक्त हलचलों को बांधने और दिमागी गुलामी व्यवस्था को सुदृढ़ करने का यह एक उदाहरण मात्रा है।
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दिमागी और सांस्कृतिक-धार्मिक रूप से बंद भारतीय समाजों के द्वारा ऐसे सामाजिक धार्मिक फतवा या फरमान जारी करना नई बात नहीं है। वैज्ञानिक सोच से रहित सभी भारतीय और एशियाई-अफ्रीकी समाज कमोबेश ऐसे प्रतिगामी व्यवहार करते हुए देखे गए हैं। आश्चर्य तब होता है, जब ऐसे फतवा जारी करने वाले आधुनिक शिक्षा प्राप्त नागरिक होते हैं।

हाल ही में गुजरात के ही एक युवक को पुलिस की मौजूदगी में ससुराल वालों ने इसलिए मार डाला क्योंकि वह तथाकथित दलित जाति से संबंध रखता था और उसकी बेटी से हुए विवाह को वे मानसिक रूप से स्वीकार करने में असमर्थ थे, क्योंकि जातिवाद, वर्णवाद की भावना उनके दिमाग में मानवीय भावना के ऊपर और अधिक बलशाली थी।
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बरेली, उत्तर प्रदेश में एक तथाकथित उच्च जाति की बालिग लड़की के द्वारा एक तथाकथित नीच जाति के लड़के के साथ की गई शादी और लड़की के द्वारा अपने पिता पर हिंसा के लिए तत्पर होने का सार्वजनिक आरोप को लेकर अखबारों ओर सोशल साईटों में जातिवाद और वर्णवाद पर गर्मागर्म बहस जारी है। इन बहसों से भारतीयों के प्रतिगामी विचारों से लैस होने के लाखों उदाहरण सामने आ रहे हैं। भारत एक अमानवीय, जातिवादी, वर्णवादी हिंसक पिछड़ा राष्ट्र है। इस आरोप से बचने के तमाम तर्क और साक्ष्य-सूरत हमेशा कमजोर साबित हुए हैं।

जाति, वंश और नस्ल, धर्म, भाषा, संस्कृति आदि की शुद्धता को बचाने की सोच अपने आप में एक अधोगामी सोच है। यह सोच समुदायों के बीच बने मध्ययुगीन, ऐतिहासिक, भिन्नता और विभिन्नता युक्त खाईयों को यथावत बनाए रखने और अपनी जाति, वंश, धर्म, नस्ल के लोगों से असंबंद्ध और इत्तर लोगों के नैसर्गिक, संवैधानिक, कानूनी, स्वतंत्र- स्वाभाविक मानवीय सोच, अधिकार और व्यवहार को नकारने, हेय समझने और सामूहिक रूप से अन्याय, पक्षपात, हिंसा करने की संगठित प्रयास के लिए प्रेरित मानसिक बीमारी है।
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इसी बीमारी से जर्मीनी के तानाशाह हिटलर पीड़ित था, जिसने लाखों यहुदियों को जानवर की तरह मार डाला था। इसी हिंसक मानसिक बीमारी को भारतीय समाज में संगठनिक रूप से संयोजित करने की कोशिशें की जा रही है। भाषा, धर्म, क्षेत्र, राज्य, जाति, वर्ण के नाम पर भारत में पक्षपात, अन्याय की एक अंतःयुद्ध सदियों से ही जारी है। ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि भारत कभी आधुनिक रूप से मान्य न्याय, समता के विचारों से जिंदगी जीने वाला राष्ट्र रहा है या बनने के लिए प्रयासरत रहा है।
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आधुनिक राज्यों की आवधारणा एवं संकल्पनाओं के अधीन गठित गणतांत्रिक व्यवस्था से शासित समाज, लोकतांत्रिक कानूनी मान्यताओं के साथ मानवीय मेधा विकास के उपलब्ध अवसर तथा उच्च मानवीयता के विकास की अवधारणाओं में विकसित मशानी सहयोग को भारतीय समाज स्वतंत्रता प्राप्ति के कई दशक बीत जाने के बाद भी स्वीकार नहीं कर पा रहा है और वह अपनी मध्ययुगीन परंपराओं की जड़ को नये अमानवीय तरीके से सींचने का प्रयास करते रहता है।
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विज्ञानमय वैज्ञानिक दृष्टिकोण से तैयार शिक्षा सामग्री और नयी सतत आधुनिक दृष्टिकोण से घर-घर पहुँचते अल्ट्रमॉर्डन मीडिया, संचार सामग्री भी भारतीय मध्ययुगीन पितृसत्तात्मक पोंगपंथी परंपरा को ध्वस्त करने में नाकाम सिद्ध हो रही है।
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आधुनिक विज्ञान ने मानवीय समाज को स्मार्ट फोन नामक एक नयाब अनोखा वरदान दिया है, जिसने मनुष्य समाज के कार्य-व्यवहार, शिक्षा, संपर्क की दुनिया में अब तक की सबसे बड़ी क्रांति ला दिया है। अब मानवीय समाज एक ऐसी दुनिया में बसता है, जिसमें दुनिया का कोई भी हिस्सा उनसे दूर नहीं है और वह समस्त दुनिया के मानवीय कार्य-व्यवहार-व्यापार और घटनाओं से व्यक्तिगत स्तर पर जुड़ा हुआ रहता है।
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संचार-संवाद-शिक्षा-ज्ञान-विज्ञान आदि का हर क्षेत्र आज के मानव की मुट्ठी में रहता है। इंटरनेट तक की पहुँच को कई देशों में मौलिक अधिकार माना गया है। स्मार्ट फोन इस मौलिक अधिकार को व्यक्ति के हाथों में देकर मानवीय विकास की एक ऐसी संसार की रचना कर रहा है, जो अभूतपूर्व है। 4 जी के बाद अब 5 जी दुनिया को एक ऐसी दुनिया में पहुँचा देगी, जिसकी कल्पना किसी साईंस फिक्शन में भी नहीं की गई होंगी। यह संचार-शिक्षा-शासन, चिकित्सा, वाणिज्य-बाजार और मानवीय संवाद के रूप-रंग, आकार-प्रकार और प्रकृति को ही बदल कर रख देगा।

स्मार्ट फोन से युवाओं को कट के रखना उन्हें विकास के पथ से कट कर सीमित अवसरों वाले नियंत्रित अभयारण्य में रखने के बराबर होगा, जहाँ वे वैयक्तिक और मानसिक रूप से ऐसे लोगों से पिछड़े होंगे, जिनके पास ज्ञान सागर (internet) की असीमित पहुँच होंगी।
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युवाओं को इंटरनेट से अलग-थलग रखने का प्रयास, सिर में उग आए सिंग को काटने के बजाए सिर को ही काटने का निर्णय साबित होगा। एक स्वतंत्र देश में अपनी ही युवाओं की ज्ञान-स्वतंत्रता को सीमित करने और पितृसत्तात्मक जड़ परंपराओं को बनाए रखने के नाम पर बुजुर्गों को ऐसा करने देने की अनुमति देना, आत्महत्या के लिए ऊँची पहाड़ी से नीचे दौड़ने के लिए फतवा देने के लिए मंजूरी देना ही होगा।