लेखन कला, साहित्य और समाज

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                                                                                                                     महली लिवीन्स तिर्की, नई दिल्ली,    

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                    लेखन भी एक कला है, अन्य कला की तरह यह भी तपस्या, एकाग्रचिता और निरन्तर अभ्यास माँगती है। अभ्यास तो चाहिए ही। किसी कवि ने ठीक ही कहा है –  “करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरि आवत जात के शिल पर होत निशान।”

       पर कुछ कला ऐसी भी है जो जन्मजात है, जिसके लिए अभ्यास नगन्य है, जैसे कवि की कविता रचने की रूचि और क्षमता। तब ही लैटिन भाषा में कहा गया है – POETANATUS, ORATOR FIT  कवि जन्मता है, वक्ता बनता है अभ्यास के बल पर। कई उदाहरण मिलेंगे, ग्रीस देश का प्रसिद्ध वक्ता डेमास्थनीज बचपन में हकलाता था, शब्द बोलने उचारने में उसको काफी तकलीफ थी, पर उस हकलाने वाले बालक में एक सफल वक्ता बनने की जुनून थी। अपने मुँह में तालू के नीचे छोटा चिकना कंकड़ वह डालता और समुद्र किनारे खड़ा होकर समुद्र की लहरों को रोज चिल्ला-चिल्लाकर भाषण देने का वह निरन्तर अभ्यास करने लगा। जब सयाना हुआ, डेमास्थनीज ग्रीस का मशहूर वक्ता बन गया।

       लेखन कला भी अभ्यास आधारित कला है, पर दो-तीन बातें इस संबंध में याद रखनी है –

 1      ठीक से जानें क्या बोलना चाहते हैं KNOW WHAT YOU WANT TO SAY – जो भी हम लिखते हैं, सर्वप्रथम दिमाग में विचार बिल्कुल स्पष्ट हो जाना है। विचार जहाँ सही तरह से तैयार नहीं है, वहीं लेख अस्पष्ट और खिचड़ी बन जाता है – ऐसा अलाबामा यूनिवर्सिटी के संचार व्यवस्था के प्रोफेसर जोन एस फील्डन का कहना है। एक शिक्षाविद और कुशल लेखक पीटर एफ. ड्रकन का मानना है कि अस्पष्ट वाक्य लेखक की दिमागी क्षमता से बाहर की वस्तु है। लेखक को प्रथम अपने ही दिमाग में विचारों को सजाना है जिसको वह पाठकों तक पहुँचाना चाहता है।

2    जो लिखना है पाठकों की दृष्टिकोण से लिखें (WRITE FROM THE READER’S POINT OF VIEW)- संचार यानी सूचना पहुँचाने की क्रिया (Communication) पाठक से आरंभ होती है, लेखक से नहीं, पीटर एफ. ड्रकन का कहना है कि लेखक वह कहता है जो पाठक लेखक की कलम से सुनने-पढ़ने की उम्मीद करता है। पाठक की उम्मीदें और इच्छा ही लेखक के दिमाग और कलम को प्रेरणा देकर उत्तेजित करती है, क्योंकि आखिर पाठक ही सूचना प्राप्त करने वाला व्यक्ति (recipient) है। यदि हम चाहते हैं कि पढ़ने वाले हमारे विचारों को समझ पाएँ तो यह जरूरी है कि हम अपने विचार, सूचनाएँ पाठकों के उम्मीद के अनुकूल दें। अखबार या पत्रिका के लिए आलेख लिख रहे हैं, तो तीन छोटी-छोटी बातें ख्याल लायक हैं –

(क) लेख का शीर्षक ऐसा हो कि पहली नजर ही में पाठक का ध्यान उलझ जाए। पाठक के ध्यान पर आप अपनी पकड़ बनाये रखें और उसको अपने लेख के पहले अनुच्छेद में जकड़ कर रखें। अपने लेख में आप क्या बोलना चाहते हैं उसका आभास पाठक को मिलने लगे। उसकी जिज्ञासा बढ़ने लगे।

(ख) लेख का दूसरा भाग व्याख्या, उदाहरण और विश्लेषण का अंग है। अपने विचार पाठक के विचार के साथ खेलाते रहिए।

(ग) तीसरे भाग में पाठकों को अपने साथ ले लीजिए। आप कुछ समस्या का समाधान ढूँढ रहे हैं तो पाठक को ही आगे रखिए (Involve the reader in the search of solution) हलांकि विचारों के अंकुर आप के हैं, चुपके से विचारों के अंकुर पाठक के हाथ थमा दें। ऐसा लगे कि समाधान और सुझाव स्वयं पाठक ने ढूँढ लिया है।  अगर पाठक को इस लक्ष्य तक ले आये, तो समझिए आप का मकसद पूरा हो गया ।

3 स्पष्ट और सजीव शैली व्यवहार में लाएँ (Use the clear lively style) – लेखन शैली हमारे लिखने के उद्देश्य पर निर्भर करती है । हर स्थिति में हमारी प्रभावशाली शैली वह है जो हमारे विचारों को पाठकों की समझ और भावनाओं को स्पष्ट और सीधा असर करने में कामयाब हो। ऐसी शैली में शब्द और वाक्य छोटे हों, ठोस हों, गोली की तरह छूटने वाले हों टक-टक-टक। जब प्रथम ड्राफ लिख रहे हैं, तो कलम से शब्द-धारा अपने विचारों की नहर में कल-कल करते धड़ल्ले से बहने दें। अभी इस स्तर पर शैली और व्याकरण पर ध्यान न दें। इसके चक्र में विचार-बहाव की रफ्तार को न रोकें। जब अपने लेख का संपादन कर रहे हैं, अनावश्यक संज्ञा – विशेषण, क्रिया – विशेषण या अन्य बोझिल शब्दों को निकाल दें। भाषा सरल से सरल, लचकदार एवं मुहावरेदार हो ताकि पाठक को ”बोर“ (मानसिक थकान) न लगे। लेख की लम्बाई इतनी हो कि पाठक एक ही बैठक में पढ़ डाले।

शब्द बहुत शक्तिशाली हथियार है, इसके प्रयोग में सावधानी बरतें। समाज या व्यक्ति के लिए आप के शब्द भला असर कर सकता है, तो भारी नुकसान भी पहुँचा सकता है। लिखित शब्द का असर कितने लोगों को, कितनी गहराई तक और भविष्य में कितनी दूर तक होगा, हम इसका अंदाज नहीं लगा सकते। लैटिन भाषा में कहावत है – VERBA VOLAT, SCRIPTA MANET – जुबान से निकला शब्द उड़ जाता है, लिखित शब्द रह जाता है । इसीलिए हमारे बुजुर्ग सादरी में कहते हैं – “ बोईल के लाख देबे, मगर लिख के ना तो देबे ।”

 साहित्य और समाज –

शक्तिशाली लेखक के प्रभावशाली विचार समाज को जैसा चाहे सांचे में ढाल सकता है। जर्मन दर्शनिक नित्से न लिखते जर्मन जाति की छिपी क्षमता और सुषप्त भावना के बारे में, तो वहाँ के लोगों में सर्वोच्च जर्मन जाति होने की न भावना उबलती और न ही आडोल्फ हिटलर जैसा व्यक्ति पैदा होता। अगर फ्रांस में रूसो जैसा विचारक और लेखक और भोल्टेर जैसे वक्ता सामने न आते, तो तानाशाही शासन को उलाट फेंकने के लिए अठारहवीं सदी में फ्रांसीसी क्रांति न होती। अगर लेनिन के विचारों ने रूस में लोगों के बीच तूफान पैदा न किया होता और कार्ल-मार्क्स की कलम न फड़कती तो 1917 की रूसी क्रांति न होती और न ही साम्यवाद की जड़ जमती। अगर ची गुवेभरा गोरिल्ला संबंधी युद्ध रणनीति के बारे न लिखता तो क्यूबा के क्रांतिकारी फिडेल कास्ट्रो स्वतंत्रता युद्ध में सफल नहीं होता। एक ग्रीक दार्शनिक ने लेखकों की ताकत और उनकी आवश्यकता के बारे में लिखा है – “ मुझे पाँच कुशल लेखकों को दीजिए और मैं दुनिया की विचारधारा ही बदल दूँगा ।” इसी संबंध में उसने यह भी कहा था – “Give me a strong fulcrum and a lever long enough and I will remove this huge rock” यानी मुझे एक मजबूत टेक और एक लम्बा उत्तोलक लकड़ी का डांग (लम्बी मोटी लट्ठ) दीजिए और मैं इस विशाल चट्टान को लुढ़का दूँगा।

साहित्य के सृजन में लेखक की एक भारी जिम्मेवारी है। लेखन कला, मात्र कला के लिए नहीं (Art not only for art sake) साहित्य मात्र साहित्य के लिए नहीं। साहित्य तो किसी भी समाज का तत्कालीन प्रतिबिंब होता है। लेखक समाज का एक अभिन्न अंग है  और समाज की स्थिति एवं उसमें पनपती सुषुप्त विचार और भावनाओं को अपने शब्दों में चित्रांकित करता है।  इस संबंध में, यदि अतिश्योक्ति न हो नाईजीरिया के साहित्य के लिए नॉबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रोफेसर ओल सायिका जो Voice of Africa पुकारे जाते हैं, की बात दुहराना चाहूँगा। जब प्रोफेसर सायिका कुछ वर्ष हुए हमारे भारत देश आ रहे थे, फ्रैंकफ्रर्ट जर्मनी के एयरपोर्ट में घंटे भर के लिए उनके साथ बैठने का अवसर मुझे मिला था। वार्तालाप के दरमियान मेरे पूछने पर, कि साहित्य के बारे उनका विचार क्या है। उन्होंने थोड़े शब्दों में कहा था What my people see feel and think but cannot speak I bring to light through my pen यानी जो मेरे लोग देखते हैं, अनुभव करते हैं, सोचते हैं पर बोल नहीं पा रहे हैं, उसको मैं अपनी कलम द्वारा सामने लाता हूँ।

इस संदर्भ में फादर डेमोल्डर की पुस्तिका का शीर्षक The tribals have yet to speak आदिवासी अभी तक मुँह नहीं खोले हैं, विचारने लायक है। यानी आदिवासी अब तक संगठित आवाज़ बुलंद नहीं कर पाए हैं इसका अभिप्राय मात्र सड़क पर जनता का नारे लगाना नहीं। यहाँ उन संवेदनशील आदिवासी लेखकों की आवश्यकता से संबंधित है, जिनका दिल आदिवासी समाज की दयनीय परिस्थिति देख धड़कता है, मन बेचैन है, कलम फड़कती है और जब तक समाज के दर्द को शक्तिशाली शब्दों में सटीक चित्रांकित नहीं करती, शाँति नहीं पाती है।  एक लेखक और स्वतंत्र विचारक अपने इर्दगिर्द समाज की धड़कन को पहचानता है और उसको दुनिया के सामने लाता है। लेखक समाज और साहित्य के बीच वह कड़ी है जिसके जिम्मेवारी अनोखी ही नहीं, अतिगंभीर भी है। आदिवासियों में अभी भी स्वतंत्र संवेदनशील और निर्भीक लेखकों की कमी है । शायद फादर डेमोल्डर इसी पर जोर देना चाहते थे।