हशिए की भावना है आस्था !

नेह इंदवार

आमतौर से लोग अपने को धार्मिक घोषित करते हैं या धार्मिक के रूप में परिचय देते हैं। इसके कई कारण और कारक हैं। ऐसे लोगों को कारणों और कारकों के बारे उथली या ठोस जानकारी हो यह अनिवार्य नहीं है। आम सामाजिक और पारंपरिक धारणा है कि धार्मिक लोग सुशील, सज्जन, दूसरों के प्रति प्रेम की भावना उढ़ेलने वाले, गैर कानूनी, असामाजिक कार्यों से दूर रहने वाले धर्मभीरु लोग होते हैं। धर्म के प्रति ऐसी परंपरागत विश्वास का व्यावहारिक लाभ लेने या अपनी दिखावटी मुखौटा को प्रस्तुत करने के लिए भी धार्मिक शब्द या विश्वास का उपयोग या दुरूपयोग किया जाता है। अधिकतर लोग ऐसे परिचय को सहज गारंटीड मानते हैं। इस विषय पर दर्जनों उदाहरण देकर पन्ने काले किए जा सकते हैं। बाहरहाल फोकस रखते हैं पार्ट टाईम भावना पर। सवाल है कि धार्मिक और आस्तिक होने के दावे कितने सही होते हैं ??
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आज तक के तमाम अनुभव यही कहते हैं कि आस्तिक होने का दावा एक छलावा से अधिक नहीं होता है। ऐसी भावनाएँ आम इंसान को एक छलावे की जिंदगी जीने के लिए प्ररित करता है। वास्तविक रूप में, आस्तिकता एक पार्ट टाईम, हाशिये की भावना होती है। पार्ट टाईम की भावनाएँ ऐसी भावनाएँ होती है जो टाईम-टाईम पर परिवर्तित होती है। कम या ज्यादा होती है या जिसे किसी विशेष परिस्थितियों पर त्याग किया जा सकता है या किसी विशेष परिस्थितियों पर किसी दूसरी भावनाओं से बदली की जा सकती है। किसी देवी, देवता, भगवान, ईश्वर आदि पर या कहें किसी आलौकिक शक्तियों पर कभी भी किसी का पूर्ण आस्था या विश्वास नहीं होता है। ऐसे विश्वास की नींव पोपली होती है जो किसी भी तरह की सटीक जाँच में कमजोर साबित हो जाती हैं।
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आलौकिक शक्तियों को मनुष्य को बचाने वाले सिद्ध करने के तमाम कारक, कारण और किस्से हाशिये की कहानियां होती हैं। विभिन्न संकटों से बचने की घटनाओं को अपने विश्वास और आस्था से सहज ही जोड़ दिया जाता है। धार्मिक कहे जाने वाले लोग ऐसी घटनाओं का श्रेय किसी और को न तो देना चाहते हैं और न देते हैं। बल्कि नमक मिर्ची लगातार कर उसे अपने आस्था के केन्द्र बिन्दुओं से जोड़ कर प्रस्तुत किए जाते हैं, ताकि माने जा रहे अपने आस्था के देवता या भगवान की महिमा या प्रसिद्धि को बढ़ाया जा सके, अपनी आस्था के लिए समर्थन जुटाया जा सके और उसकी बड़ाई की जा सके। ऐसी घटनाओं के सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक लाभ और मुनाफा इसके बाई प्रोडक्ट होते हैं। यदि कोई किसी दुर्घटना से बच जाता है तो उसे वह अपने आस्था को समर्पित करता है। मतलब पहाड़ से गिरने पर बच जाए तो उसे आस्था की जीत बताते हैं।
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यदि आस्था वास्तविक रूप से हाशिये की भावना या विश्वास नहीं है और वह मनुष्य के प्राकृतिक मुख्य धारा की भावना और विश्वास है तो ऐसे लोगों को पहाड़ से दस बार छलांग लगाना चाहिए। यदि दसों बार बच जाए तो उनकी आस्था और विश्वास की जाँच पूरी होगी और उस पर कानूनी, सामाजिक, वैज्ञानिक मोहर भी लग जाएगी। ऐसी बातें सिद्ध कर देगी कि धार्मिक भावना सत्यता की पृष्ठभूमि पर टिकी हुई है। लेकिन अफसोस !! कोई भी आस्थावान ऐसी जाँच की सामना करने सामने नहीं आते हैं। अब तक ऐसी बात साबित करने की कोई मान्य घटनाएं भी सामने नहीं आई हैं।
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इसलिए फिलहाल आस्था की बात को पार्ट टाईम दिलबहलाव, हाशिये की भावना मानना ही उचित होगा। इसे किसी धर्म के नाम से जोड़ कर न देखें।