आखिर ईश्वर रहता कहाँ हैं ?

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आखिर ईश्वर बसते कहाँ रहता हैं ?

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कागज पर प्रिंटिंग प्रेस में मशीन द्वारा छपे “देवता और भगवान” की तस्वीर वाले कलैण्डर पर ईश्वर कितना चिपका हुआ होता है ??

शिल्पकार, मूर्तिकार के बनाए लकड़ी, पत्थर, मिट्टी और प्लास्टिक के मू्र्तियों में ईश्वर कितना घुसा हुआ रहता है ??

तस्वीरों, मूर्तियों, पूजाघरों में ईश्वर को ढूँढ़ने वालों को किन संज्ञाओं से संबोधित किए जाएँ ???

कई महानुभावों का कहना है तस्वीरों में उनके भगवान के सूरत होते हैं, इसलिए वे उन्हें देखकर ईश्वर को देखने का एहसास करते हैं।

लेकिन क्या ईश्वर के चेहरे वैसे ही हैं ?? पूछने पर वे कहते हैं उन्हें तो बचपन से यही कहा जा रहा है, उन्होंने तो कभी भगवान को देखा नहीं।

कई महानुभावों का कहना है कागज में छपे ईश्वर की तस्वीरें ईश्वर के प्रतीक हैं, इसलिए वे उसकी पूजा करते हैं।

ईश्वर का वास्तविक चेहरा कैसा होता है, किसी ने भी नहीं देखा, उसके सामने जो भी ईश्वर के नाम पर परोस दिया गया है, उसे वे आँख बंद करके, विवेक का इस्तेमाल किए बिना मान लेते हैं।

मुख्य बात पूजा करने की बचपन से लगाई गई आदत है। वे आदत से मजबूर होकर पूजा करते हैं।

लोगबाग बचपन से लगाई गई आदत से धार्मिक कार्य करते हैं।

यदि सप्ताह के किसी वार या दिन में पूजा या प्रार्थना करने के लिए किसी पूजा घर में अथवा प्रार्थनालय में जाने की आदत बचपन से लगाई गई है तो सिर्फ आदतन वे सप्ताह के नियत दिन या समय में वहाँ जरूर जाएँगेँ।

लोग कहते हैं कि नियमित दिन और समय पर न जाने पर मन अशाँत हो जाता है, और किसी दूसरे कार्य में मन नहीं लगता है। उन्हें लगता है कि उनसे कुछ पाप हो गया है।

पाप करने की बातें भी उन्हें बचपन से ही रटाया जाता है।

जिन्हें बचपन से फोटो, मूर्तियों, पूजाघरों की आदत लगाई जाती है, उनके दिमाग को स्थायी रूप से हैक करने के लिए उन्हें हर नियमित दिन को टनों के भाव से नीति वाचक उपदेश भी दिया जाता है, या बड़े बड़े घंटे, झांझ मंजिरों के शोर के महौल में उनके दिमाग का डोमिस्टीकेशन किया जाता है।

यह डोमिस्टीकेशन क्या है ???

जंगली हाथी के बच्चे को मजबूत रस्सी से बाँध दिया जाता है। बच्चा हाथी महीनों तक उसे तोड़ने की कोशिशेँ करता है, लेकिन तोड़ नहीं पाता है, अंत में उसका दिमाग स्वीकार कर लेता है कि वह उसे कभी नहीं तोड़ पाएगा। जवान होने पर भी वह समझता है रस्सी उसकी ताकत से अधिक मजबूत है। यही डोमिस्टीकेशन की प्रक्रिया है।

डोमिस्टीकेटेट लोग जिंदगी भर एक ढर्रे में बँध जाते हैं और अपने ढर्रे या आदत से निकल नहीं पाते हैं।

डोमिस्टीकेशन के प्रभाव से ही वे प्रिंटिंग प्रेस में कोरे कागज़ पर छपे मूल रूप से (बे)तरतीब रूप से फैलाए गये कृत्रिम रंग को ईश्वर मान लेते हैं।

यह सचमुच धार्मिक जैसे अत्यंत गंभीर विषय पर आम मानवीय सोच और चिंतन के सतही भ्रमित होने और उलझन भरे सोच से संचालित होने की ओर इंगित करता है। बचपन से डाले गये आदत के कारण सतही चीजों के सहज झाँसे में आ जाने को दर्शाता है।

यह, यह भी इंगित करता है कि लोगों में अलौकिक दुनिया या ईश्वर के बारे मूल रूप में जानने, समझने या अनुभव करने की इच्छा बचपन से डाले गए आदत के बाहर नहीं होता है।

धर्मांतरण करके भी लोग एक आदत भरे वातावरण से दूसरे आदतभरे वातावरण में जाते हैं। डोमिस्टीकेशन की प्रक्रिया थोड़ी बदल जाती है।

क्या अलौकिकता को पाना इतना सरल है ???

क्या जिंदगी भर किए जाने वाले धार्मिक या आत्मिक कार्यों की समीक्षा नहीं की जानी चाहिए ??

आत्मनिरीक्षण किसे कहते हैं ???

क्या मूर्तियों, तस्वीरों के सामने किए जाने वाले साप्ताहिक आदतन व्यवहार या सतही भक्ति से लोक परलोक सुधर जाएगा ???

यदि भगवान कागज़ में छितरे रंगों में हो सकते हैं या लकड़ी के बने किसी निर्माण में हो सकता हे या किसी मूर्ति में हो सकते हैं, तो वह किसी प्राकृतिक प्रतीक में क्यों नहीं हो सकते हैं ????

वे हवा, पानी, आग, अन्न, नदी, पहाड़, घर, मकान, पेड़, फूल, पत्ते, तितली, पंक्षी, माँ-बाप, पूर्वजों, अबोध बच्चे, चाँद सूरज, तारे या गैलेक्सी में क्यों नहीं हो सकते हैं?

यदि ईश्वर प्राकृतिक रूप से अदृष्य हैं तो क्यों नहीं अदृष्य ईश्वर की अराधना मन में कहीं भी रह कर किया जाए ?

क्या मन और हृदय की पवित्रता, शांति बनाए रखने के लिए किसी पूजा घर में जाना अनिवार्य है, या किसी संगठित धर्म की सदस्यता लेना या प्राप्त करना अनिवार्य है ?

क्या बिना किसी संगठन, किसी किताब, किसी प्रार्थना, किसी धार्मिक क्रिया, अनुष्ठान, पूजा पाठ किए बिना हम धार्मिक नहीं हो सकते हैं ?

आखिर धार्मिक होने की कौन सी अनिवार्य शर्त है ? क्या किसी संगठन, किसी धार्मिक दल या गोष्ठी से संबंध हुए बिना या कहीं गए बिना हम धार्मिक नहीं हो सकते हैं ?

ईश्वर क्या किसी भाषा, किसी धार्मिक किताब, किसी खास व्यक्ति या समूह से संबद्ध है या उसके नियंत्रण में हैं ?

यदि ईश्वर किसी आदमी की तरह हैं और दिखाई देने और अदृष्य होने की शक्ति से संपन्न हैं तो क्या उनका भी कभी जन्म हुआ था ?

आखिर क्यों ईश्वर किसी आदमी की तरह ही प्रगट होता है ? किसी पक्षी या तितली की तरह नहीं ?

तो क्या ईश्वर प्राकृतिक नहीं होकर कोई एलियन है ? तो क्या मनुष्य जाति को को कोई एलियन जाति ने कृत्रिम रूप में बनाया है ? यदि हाँ तो फिर ईश्वर हमेशा अाकाश पथ से ही क्यों अवतरित होता है ?

वह किसी पेड़ पत्ते, फल, फूल से या पानी की बूंदो से क्यों अवतिरत नहीं होता है ? क्या ईश्वर को पृथ्वी में मनुष्यों के सामने अवतरित होने की कोई जरूरत भी है ?

यदि ईश्वर अनदेखा, अदृष्य, मानव की पहुँच से अत्यंत दूर है तो बाजार में बिकने वाला फोटो, मूर्ति, मेटल के बने धार्मिक चिन्ह्, रोड, पहाड़, नगर के बीचोबीच या किनारे बना विशाल पूजाघर या प्रार्थनालय क्यों बनाया गया ?

यदि उसे ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में बनाया गया है तो दूसरी लाखों चीजों को ईश्वर के प्रतिमूर्ति के रूप में क्यों नहीं बनाया जाता है ?

यदि मनुष्य मन या हृदय से धर्म का कार्य कहीं भी कर सकता है तो उसे ऐसे पूजाघर या प्रार्थनालय में जाने की जरूरत क्यों पड़ती है, जहाँ पैसे का कारोबार होता है और किसी के प्रति शारीरिक और मानसिक रूप से किसी के अधीन समर्पण करना होता है या किसी धार्मिक गुरू या स्वामी की शागिर्दी करनी पड़ती है या जो आपको किसी खास धार्मिक क्रिया के नाम पर नियंत्रित करता है और आप उसके अधीन रहने के लिए मजबूर होते हैं ?

क्यों धार्मिक समूह लोगों के जन्म, मृत्य और शादी विवाह में अपनी दादागिरी चलाते हैं और धर्म के अनुयायी को मजबूर करते हैं कि वे उनके कहे अनुसार करे नहीं तो उन्हें वे धार्मिक सुविधाएँ देने से इंकार कर देंगे । क्या यह मजबूर करने की करस्तानी धर्म का असली ध्येय है ? धर्म संगठन क्यों सम्पत्ति को इकट्ठा करता है और हमेशा रूपये कमाने के कार्य को प्राथमिकता देते हैं ?

मनुष्य को मजबूर और असहाय करता है और मनुष्य उसके चंगुल से निकल नहीं पाता है ? मनुष्य क्यों धर्म संगठन या धार्मिक क्रिया करने या मानने के लिए ईश्वर के नाम पर मजबूर होता है और मानसिक और शारीरिक गुलामी करता है ?

ठीक है ऐसे स्थानों पर (दावों के अनुसार) कुछ खास धार्मिक व्यक्ति होते हैं जो अपने बल पर आध्यात्मिक ज्ञान, अनुभव और शक्ति प्राप्त किए होते हैं, लेकिन उनसे आप को क्या हासिल होगा ? उन्होंने जो तेज, बल, ज्ञान, अनुभव, शक्ति आदि प्राप्त किया है वह उनके मन और हृदय पर किए गए आध्यात्मिकता के बल पर उन्होंने खुद अपने लिए हासिल किया है।

लेकिन क्या वे आपको ईश्वर से भेंट करा देंगे ? या आपका परलोक या मृत्यु के बाद के जीवन को सुधार देंगे ? क्या किसी के परलोकी जीवन को सुधारने का जिम्मा किसी को मिला है ? यदि उसे मिला है तो क्यों नहीं एक बार में ही उसे उसकी ठेकेदारी सौंप दी जाए। और यदि उसे ऐसा करने का अधिकार या शक्ति नहीं मिली है तो क्यों उसके पीछे अपनी उर्जा को व्यय करें ?

क्या मनुष्य की गलतियाँ क्षमा मांगने, कान पकड़ कर उठक-बैठक करने, कहीं चढ़ावा, फूल-फल, चादर, रूपये पैसे चढ़ा देने या उपवास करने से क्षमामय हो जाता है ? क्या ईश्वर को पैसे की जरूरत है ? आखिर ईश्वर मनुष्य द्वारा बनाए गए पैसे से क्या खरीदेगा ? क्या उन्हें किसी चीज की आवश्यकता है ? ईश्वर को रिश्वत देने की क्या जरूरत है ? क्या वे किसी आवश्यक चीज को खुद पैदा नहीं कर सकता है ?

ईश्वर को कोई चीज देना या अर्पण करना, क्या शिशुसुलभ विचार नहीं है ? आखिर मनुष्य किसको धोखा देता है ? खुद को या ईश्वर को ?

मनुष्य ईश्वर को यूनिवर्स का सृष्टिकर्ता, चालक और सभी कार्यों का मुख्य संचालक कहता है, लेकिन वह हर गली और रोड, बाजार और कहीं-कहीं निर्जन जगहों पर ईश्वर के नाम पर पूजाघर या प्रार्थनालय बनाता है।

इन इमारतों को वह ईश्वर का घर कहता है लेकिन उस पर अपना हक दिखाता है और उसकी सुरक्षा का भरपूर इंतजाम भी करता है।

क्या ईश्वर इन घरों में रहते हैं अथवा कैद हैं ? क्या मनुष्य इन घरों या ईमारतों में ईश्वर को रहने के लिए कह सकता है, या मजबूर कर सकता है अथवा निमंत्रण कर सकता है ?

ईश्वर के नाम पर बनने वालों इन घरों, इमारतों का असली मालिक कौन होता है?

उन घरों का लाईसेंस या सम्पत्ति का मालिकाना हक किनके नाम पर होता है?

आखिर ईश्वर के नाम पर सम्पत्ति का खेल खेलना कौन सा धार्मिक काम है ? ईश्वर के नाम पर इन जगहों, सम्पत्तियों को अपने कब्जे में करने की लड़ाई क्यों होती हैं ?

ईश्वर के नाम पर धार्मिक संगठन बने हुए हैं, इन संगठनों के सत्ता में पदवीधारी बैठते हैं जो धार्मिक सत्ता और शक्ति का उपयोग करते हैं और धार्मिक संगठनों के सम्पत्तियों के मालिक बने फिरते हैं।

अथाह सम्पत्ति के मालिक ये राजे महाराजे की तरह जीवन जीते हैं और धार्मिक और संसारिक सुख-सुविधाओं से विमुख होने का खूब स्वांग करते हैं। यदि इन्हें इनके सुख सुविधाओं से विहीन कर दिया जाए तो ये बिना इनके एक साल भी कहीं टिक नहीं पाएँगे, भले दुनिया को दिखाने के लिए कई महीने दुख सहने का दिखावा करेंगे।

ईश्वर और परलोक के नाम पर धार्मिक कार्यकलाप करने वाले भाषा विशेष और संस्कृति तथा सांस्कृतिक खानपान, भेष-भूषा, पर्व त्यौहार विशेष को फैलान, नये लोगों में थोपने और उन्हें अपनी मौलिक भाषा, संस्कृति, भेष-भूषा, पर्व त्यौहारों से अनुयायीओं को असंबद्ध होने से प्रेरित करते हैं। अनेक मामलों में ये धर्म दूसरे धर्म वालों पर अपने विचारों को थोपने का माध्यम होते हैं। अनेक बार ये राजनैतिक, आर्थिक तथा दार्शनिक विचारों को धर्म का केन्द्रबिन्दु बना कर लोगों को विशेष गुप्त उद्देश्य के लिए बदलते हैं। यह किसी के लौकिक को सुधारने या बिगाड़ने का माध्यम हो सकता है लेकिन किसी भी तरह परलोक को सुधारने या ईश्वर के साथ किसी तरह का संंबंध बनाने का काम नहीं होता है।

सवाल यह उठता है कि आखिर ईश्वर रहता कहाँ है ? वह स्त्री या पुरूष है ? यदि वह पुरूष है तो पुरूष क्यों है, स्त्री क्यों नहीं ? क्या उसे हम किसी स्त्री-पुरूष के बंधन में बाँध सकते हैं ? मनुष्य का यह कैसा परिकल्पना है कि चूँकि मनुष्य स्त्री या पुरूष होता है, इसलिए ईश्वर या प्राकृतिक शक्ति भी स्त्री या पुरूष के रूप में होंगे ? आखिर ईश्वर के रूप में इस तरह के विचारों के अविर्भाव का आधार क्या है ? क्या यह मनुष्य का अज्ञानपन है या घोषणा करने की शक्ति का घमंड ?

यदि लोग प्राकृतिक प्रतीकों में ईश्वर को मानने लगेंगे तो धर्म के नाम पर निठ्ठल्ले बैठ कर खाने वालों का बाज़ार ढह जाएगा। धर्म के नाम से कायम किया गया वर्चस्ववाद धर्म का सामंतवाद भी खत्म हो जाएगा।